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जनवरी 31, 2015

महाभारत

शकुनि को पूरा विश्वास था किHusain

अबकी बार बारी कौरवों की है।

क्या उसे ध्यान नहीं आया दुर्योधन की नयी दुरभिसंधि का ?

अपने परिवार के वृद्ध परिजनों को चुप कर देने का अभियान ?

 

 

ऐसा नहीं है कत्तई

कि युद्ध में विजेता वे होते हैं

जो किसी युद्ध में हुआ करते हैं योद्धा ।

सच तो यह है,

कि विजेता होते हैं वे,

जो होते हैं, उस युद्ध के प्रायोजक ।

और अब वे मांगेंगे अपने-अपने पारितोषिक

एक एक रथ के लिए, दस दस रथ,

हर एक अश्व के बदले सौ-सौ घोड़े।

 

 

क्या नीतियां अलग और भिन्न होतीं

यदि विजयी हुए होते पांडव ?

नीतियों का तो नहीं होता कोई अर्थ,

महत्वपूर्ण होती है तत्परता।

सत्य भी नहीं होता कोई मुद्दा,

महत्वपूर्ण होता है यह

कि झूठ को कौन कितनी अच्छी तरह से बेच सकता है।

 

शब्दाडंबर असत्य को बेहतर ढंग से छुपाते हैं

संकोच और संयम के मुकाबले,

और यदि धर्म का हो पीठ पर हाथ,

तब तो हो जाता है चमत्कार।

 

जीते कोई भी कोई युद्ध,

हर बार मारे जाने वाले लोग वही-वही होते हैं।

उन्हीं की हुआ करती हैं विधवाएं,उन्हीं के होते हैं अनाथ।

 

जितना चतुर-चालाक शासन,शत्रु की उतनी तत्काल मृत्यु।

 

इसका नहीं है कोई अर्थ कि क्या जला …

खांडव या लंका ?

धुएं का रंग है काला,

जिसमें से आती है जले हुए पक्षियों, वृक्षों

और आदिवासियों की गंध।

 

अभी तो बहुतेरे वनों की कटाई है शेष,

बहुत से खदानों का होना बाकी है उत्खनन।

कुछ बलिदान तो अनिवार्य ही हुआ करते हैं,

उन्हें टाला नहीं जा सकता।

पेड़ों पर लटकेंगे अभी और भी कई शव,

कुछ और भी शव ढोये जायेंगे चप्पुओं-नौकाओं में।

 

जो अशक्त है,

वह जीवित है किसी तरह,

अनाम, भूमिहीन,

परंतु यही तो है पांडवों की विरासत

अपने समूचे सामर्थ्य के साथ ढोई जाती हुई।

 

संजय अंधे को अंधा बनाये रखेगा,

विजेता के पक्ष में करता रहेगा वह हर घटना की व्याख्या,

बस, सिर्फ भूत-प्रेतों के मुंह बंद रखने की आवश्यकता है।

 

मान लो,

वे जो मरे पांडवों के पक्ष में लड़ते हुए

और उनके साथ कौरव

किसी साझा जुलूस में एक साथ उठ खड़े हों ?

 

नदियों को तो हम जोड़ सकते हैं, लेकिन पहाड़ ?

 

कैसे कोई तय करेगा कि जो सो रहे हैं, वे सोये ही रहेंगे सदा ?

 

क्या अब वे कोई नया महाकाव्य लिखेंगे,जिसमें न पांडव होंगे न कौरव ?

 

शकुनि यह भी समझता है

दस साल, मात्र दस वर्ष उसे चाहिये

कोई भी निर्धन तब नहीं रहेगा जीवित

और

नये शिशुओं को जन्म देने का साहस

नहीं कर पायेंगी स्त्रियां।

 

( के. सच्चिदानंदन  )   अनुवाद – (उदय प्रकाश)

(10 जून, 2014 को, सुप्रसिद्ध भारतीय कवि के. सच्चिदानंदन की मलयालम में लिखी कविता के उन्हीं के द्वारा अंग्रेज़ी में अनुदित पाठ के आधार पर अनुवाद )

साभार : उदय प्रकाश

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नवम्बर 17, 2013

मृत्युंजय कोई नहीं धरा पर : संत सिद्धार्थ

नहीं नहीं नहीं !karna-001

मृत्युंजय कोई नहीं है धरा पर,

कभी भी नहीं हुआ,

कभी हो नहीं सकता|

जो जन्मा है

वह मरेगा अवश्य|

जन्म और मृत्यु

दो मुख हैं एक ही अटल सत्य के, एक के बिना दूसरा नहीं|

इसे चाहे लम्बाई में समझ लें तो ये दो सिरे हैं और चाहे गोलाई में मान लें तो एक दूजे में गुथी हुयी दो परतें हैं|

एक कथा कहता हूँ तुमसे| महाभारत की है|

कर्ण की वीरता के सच का बोध अर्जुन को करा कर कृष्ण मरणासन्न कर्ण के पास ब्राह्मण वेष में पहुँच दान माँग और मनचाहा दान पाकर  अर्जुन को कर्ण की दानवीरता का भव्य प्रदर्शन भी दिखा चुके थे|

कर्ण के सामने अपने असली रूप में आकर कृष्ण ने कर्ण से उसकी अंतिम इच्छा पूछी|

मरणासन्न पर चेतन कर्ण ने कृष्ण से कहा,”मेरी मृत देह का संस्कार अदग्धा भूमि पर किया जाए|

कृष्ण बोल उठे,”ऐसा ही होगा”|

कथा कहती है कि कर्ण के मरणोपरांत कृष्ण उसके पार्थिव शरीर को लेकर सारे संसार में घूम आए पर हर जगह, धरती ने उन्हें एक ही जवाब दिया,

“अदग्धा भूमि! वह कैसे मिल सकती है? आप तो ज्ञानी हैं, आपने कैसे ऐसा वचन दे दिया? आरम्भ से ही मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते आए हैं और जब तक जीवन है तब तक वे मृत्यु के  शिकार होते ही रहेंगे| अमर कोई नहीं है| ऐसे में अदग्धा स्थल के बारे में कल्पना करना भी असंभव है|”

कहते हैं, कृष्ण ने अपनी हथेली पर कर्ण का दाह संस्कार किया|

कृष्णकर्ण कथा के द्वारा धरती, और यहाँ मनुष्य से सम्बंधित जन्म और मृत्यु के चक्र को सुपरिभाषित किया गया है|

मनुष्य संत हो या शैतान, मृत्यु से परे नहीं है|

मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता|

पर मृत्यु के भय पर उसे विजय प्राप्त करनी होती है…करनी ही होती है|

इस सच के बोध को कभी धूमिल न होने दें| यही सच जीवन में बड़े सच की ओर यात्रा करवा पाने में सहायक सिद्ध होता है|

जुलाई 8, 2010

भारत पाक शांति प्रयास : पाक शायर अहमद फरहाज़

बीती सदी में नब्बे के दशक के अंत में जब भारत और पाकिस्तान अपने अपने परमाणु अभियानों क्रमश: “शक्ति” और “गौरी” की आँच से तप रहे थे तो ग़ालिब के दो सदी बाद मनाये जाने वाले जयंती समारोह “अंदाज-ए.बयां” की मार्फत मशहूर पाक शायर मरहूम अहमद फराज़ साब द्वारा पढ़ी गयी निम्नलिखित कविता प्रकाश में आयी थी।

गुजरे कई मौसम, कई रातें बदलीं
उदास तुम भी हो यारों उदास हम भी हैं
फक़त तुम्ही को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी
सच तो ये है कि दारीदाने-लिबास हम भी हैं…

तुम्हे भी जिद है कि मश्के-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि ज़ोरो-जफ़ा के आदी हैं

तुम्हे भी जाम कि महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी नाज़ कि कर्बला के आदी हैं।

ना खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के पड़ाव
ना शाखे अमन लिये कोई फाख्ता आयी…

तो अब ये हाल है दरिंदगी के सबब
तुम्हारे पाँव सलामत रहे ना हाथ मेरे

ना जीत तुम्हारी ना कोई हार मेरी
ना साथ तुम्हारे कोई ना कोई साथ मेरे…

तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तों अब के
ना साज़ो-नग्मों की महफिल ना शायरी के लिये

अगर तुम्हारी आना ही का सवाल है तो
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिये।

{Dove Talkअहमद फराज़}

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भारतीय शायर मरहूम अली सरदार जाफ़री साब द्वारा अहमद फराज़ साब के कलाम के जवाब में पढ़ी गयी कविता यहाँ पढ़ें।

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