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फ़रवरी 4, 2015

कृष्ण को क्यों याद करे दुनिया?

Krishna 2दुनिया युद्ध, नफरत, आतंकवाद, पर्यावरण के ह्रास और मानवता में गिरावट जैसे मुद्दों से विनाश की ओर अग्रसर है तो ऐसे में अवसाद से घिरी मानवता को बचाने के लिए क्या वही सब कुछ याद न करना पड़ेगा जो मानव जीवन में श्रेष्ठ रहा है, जिसने जीवन को समृद्ध किया है!

श्याम, कान्हा, कृष्ण…मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं वे जीवन के।

क्या मनुष्य रुप में जीवन इससे बड़ा हो सकता है या इससे ऊपर जा सकता है?

कृष्ण को न याद करें तो किसे करें?

    “कान वो कान है जिसने तेरी आवाज सुनी

     आँख वो आँख है जिसने तेरा जलवा देखा

कृष्ण की कथा का रसास्वादन अदभुत है| क्या तो आनंद है बाल-गोपाल की कथा कहने में, सुनने में, और देखने में|

और थोड़े बड़े हो चुके कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी सदियों से मनुष्य को लुभाता आ रहा है|

सिर पर मोर मुकुट, गैया के पास थोड़े तिरछे खड़े, एक पैर पर दूसरा पैर रखे, बांसुरी बजाते कान्हा… वर्णन सुनने में हर बार लगता है जैसे गोकुल ही पहुँच गये हों… परम आनंद की अनुभूति होती है|

* * * * * * * * * * * * * * *  * *

अपने पिता महाराज उग्रसेन को राजगद्दी से उतारकर मथुरा का राजा बन बैठा अत्याचारी कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को उसके विवाहोपरांत ससुराल पहुंचा कर आने के लिए अपने महल से निकल कर बाहर आया ही था कि एक ऋषिवर वहाँ आए और कहा,” राजन, आपके सैनिकों ने वन प्रदेशों में आतंक मचा रखा है, वे तपस्वियों की साधना भंग करते हैं| कई गुरुकुलों को तहस नहस कर चुके हैं| आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की कन्याओं को ही नहीं वरन अब तो ऋषि कन्याओं को भी उठा लेने का दुस्साहस कर रहे हैं|

कंस ने कहा,” ऋषि बेकार की बातें मत करो| मेरे सैनिक वीर हैं और उनकी वीरता पर मुग्ध होकर वन प्रदेशों की कन्याएं स्वयं ही उनके साथ चली जाती होंगी| और मेरे राज्य की सीमाओं के अंदर रहने वाले सभी लोग, चाहे वे तपस्वी हे क्यों न हों, मेरे अधीन हैं, अगर वे मेरे सैनकों को कर नहीं देंगे, उनका कहना नहीं मानेंगे तो मेरे सैनिक उन्हें दंड देंगे ही|

“राजन, सत्ता का इतना नशा ठीक नहीं किसी राजा के लिए”|

“सुनो ऋषि अभी मैं अपनी बहन को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा हूँ| किसी और दिन आना और मेरे सैनिकों के विपरीत बातें करके उनकी छवि बिगाड़ने का प्रयास ना करो| जाकर तपस्वियों को समझाओ कि मेरे सैनिकों से न उलझें और वीर हमेशा ही धरती पर हर सुख को भोगते हैं| उन्हें कोई कन्या पसंद आयेगी तो वे उसे पाने का प्रयास करेंगे ही| आप लोगों में साहस हो तो उनसे लड़ो और पराजित करो उन्हें और अपनी कन्याओं की रक्षा कर लो| अब मेरा मार्ग छोड़ो”

कंस स्वयं ही रथ को हांकने बैठ गया|

रथ के चलने की आवाज और घोड़ों के हिनहिनाने की आवाजों के शोर के मध्य बादल गडगडाने की आवाज आती है|… ऋषि ने कंस को चेताते हुए कहा

 “हे कंस, जिस बहन के प्रति तू इतना लाड दिखा रहा है, याद रखना इसकी आठ संतानों में से एक संतान – एक पुत्र, ही तेरे काल का कारण बनेगी

कंस क्रोध और कुंठा से विचलित होते हुए गरजता है,” ऋषि अपनी वाणी पर नियंत्रण रखो और मेरी निगाह के सामने से दूर हो जाओ”|

ऋषि चला जाता है| कंस कुछ सोच में पड़ जाता है और कुछ पल पश्चात गरज कर कहता है,” देवकी, रथ से नीचे उतरो, तूने उस ऋषि की वाणी सुनी| मुझे, तुम दोनों, तुझे और तेरे पति, को मारना ही पड़ेगा, मैं जोखिम नहीं उठा सकता|”

देवकी रोने लगती है “भईया…”

वसुदेव याचना करते हुए कहता है,” महाराज, आप शक्तिशाली हैं, आपको ज्ञात ही है- आपको हमारी संतान से ख़तरा बताया गया है, आपकी बहन देवकी से तो आपको कोई जोखिम नहीं| उसे मारकर अपनी नवविवाहिता बहन को मारने का पाप आप क्यों अपने सिर लेते हैं| जब भी हमारे संतान होगी मैं स्वयं उसे लेकर आपके सामने उपस्थित हो जाउंगा|

कंस चेतावनी देता है,” देवकी, वासुदेव मुझसे कपट करने का प्रयास कदापि न करना, आज मैं तुम्हे जीवित छोड़े दे रहा हूँ| पर अब से तुम दोनों मथुरा में ही मेरे सैनिकों की देखरेख में रहोगे|”

कंस ने देवकी की छह संतानों को उनके जन्म लेते ही मार दिया| किसी तरह से देवकी और वासुदेव कंस से देवकी के सातवीं बार गर्भधारण होने की बात छिपाने में सफल रहे और वासुदेव द्वारा गोकुल में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहाँ सामाजिक कार्य में सम्मिलित होने हेतु अनुरोध करने पर कंस ने सैनिकों की देखरेख में पति-पत्नी को गोकुल जाने दिया, जहां देवकी का गर्भ, कंस के भय से गोकुल में अज्ञातवास में रह रही वासुदेव की एक अन्य पत्नी रोहिणी के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया गया| वापिस मथुरा आकर देवकी ने फिर से गर्भवती होने और शिशु के गर्भ में ही मृत हो जाने की बात उड़ा दी| देवकी की आठवीं संतान के समय कंस कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था अतः उसने देवकी और वासुदेव को बंदी बना कर, कड़े सुरक्षा से घिरे अपने कारागृह में भेज दिया|

…जारी

….[राकेश]

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मई 20, 2014

कैसे हो द्वारकाधीश?… बोली राधा

radhakrishnaस्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण,
प्रसन्नचित सी राधा…

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई…

इससे पहले
कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल उठी…

कैसे हो द्वारकाधीश?

जो राधा
उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से
द्वारकाधीश का संबोधन
कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी
किसी तरह
अपने आप को संभाल लिया…

और बोले राधा से,
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है…
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो…

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी…

बोली राधा,
मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई
ना कोई आंसू बहा…
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते…

इन आँखों में
सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे…

प्रेम के
अलग होने पर
तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको?

कुछ कडवे सच,
प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा
इस तरक्की में
तुम कितने पिछड़ गए?

यमुना के
मीठे पानी से
जिंदगी शुरू की
और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए?

एक ऊँगली पर
चलने वाले सुदर्शन चक्र पर
भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए?

कान्हा
जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी,
प्रेम से अलग होने पर
वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी?

सुदर्शन चक्र उठाकर
विनाश के काम आने लगी!

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ?

कान्हा होते
तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता!

युद्ध में और प्रेम में
यही तो फर्क होता है!

युद्ध में
आप मिटाकर जीतते हैं
और
प्रेम में
आप मिटकर जीतते हैं!

कान्हा
प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है,
पर किसी को दुःख नहीं देता !

आप तो
कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया ?
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया !

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था
जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे!

आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर, हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे !

आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं !

गीता में
मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर

” राधे राधे” करते है..!

जनवरी 17, 2014

आंसू…

बहुत बड़ी सी भीड़ थी

दोनों पार्श्व में

मंत्रोच्चार करती, जय-जयकार करती!

कान्हा के सामने बैठे थे,

हम तीन

माँ, पिताजी और मैं|

आह्लाद नहीं था

कि कहीं हो रहा था

ईश्वर से मेरा संयोग

वरन,

मैं जार-जार रोया था

सिर्फ इस खुशी को जीकर

कि, आज इस क्षण में

मैं शांत होकर

बैठ सका हूँ

इन् दोनों के साथ

और कि,

कहीं तो ईश्वर मुझ पर मुस्कराया है|

Yugalsign1

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