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मार्च 19, 2018

रुग्ण परिभाषाएँ

लूला, लंगड़ा, टुंडा, गूंगा, बहरा, काना, अंधा

कहकर गाली देते हैं

अपने जैसे पूर्ण देह वाले इंसानों को लोग|

सरकारी परिभाषाएँ “अपूर्ण अंगों”

में किसी प्रकार की “दिव्यता” का दर्शन करते हुए

इन्हे ‘दिव्यांग’ कहती हैं!

शरीर नश्वर है,

और

आत्मा –

अजर है

अमर है,

निराकार है,

शुद्धतम है,

निस्पृह है,

अस्पर्शनीय है ,

अदृश्य है,

आदि हुंकारने वाले,

चेतना और प्रबोधन को फलीभूत कर दिखाने वाले,

और अष्टावक्र सरीखे मनीषियों को जन्म देने वाले,

प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक के जन्मदाता

देश से पूछा तो जा ही सकता है

वास्तव में ये हैं कौन?

 

…[राकेश]

नवम्बर 17, 2013

मृत्युंजय कोई नहीं धरा पर : संत सिद्धार्थ

नहीं नहीं नहीं !karna-001

मृत्युंजय कोई नहीं है धरा पर,

कभी भी नहीं हुआ,

कभी हो नहीं सकता|

जो जन्मा है

वह मरेगा अवश्य|

जन्म और मृत्यु

दो मुख हैं एक ही अटल सत्य के, एक के बिना दूसरा नहीं|

इसे चाहे लम्बाई में समझ लें तो ये दो सिरे हैं और चाहे गोलाई में मान लें तो एक दूजे में गुथी हुयी दो परतें हैं|

एक कथा कहता हूँ तुमसे| महाभारत की है|

कर्ण की वीरता के सच का बोध अर्जुन को करा कर कृष्ण मरणासन्न कर्ण के पास ब्राह्मण वेष में पहुँच दान माँग और मनचाहा दान पाकर  अर्जुन को कर्ण की दानवीरता का भव्य प्रदर्शन भी दिखा चुके थे|

कर्ण के सामने अपने असली रूप में आकर कृष्ण ने कर्ण से उसकी अंतिम इच्छा पूछी|

मरणासन्न पर चेतन कर्ण ने कृष्ण से कहा,”मेरी मृत देह का संस्कार अदग्धा भूमि पर किया जाए|

कृष्ण बोल उठे,”ऐसा ही होगा”|

कथा कहती है कि कर्ण के मरणोपरांत कृष्ण उसके पार्थिव शरीर को लेकर सारे संसार में घूम आए पर हर जगह, धरती ने उन्हें एक ही जवाब दिया,

“अदग्धा भूमि! वह कैसे मिल सकती है? आप तो ज्ञानी हैं, आपने कैसे ऐसा वचन दे दिया? आरम्भ से ही मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते आए हैं और जब तक जीवन है तब तक वे मृत्यु के  शिकार होते ही रहेंगे| अमर कोई नहीं है| ऐसे में अदग्धा स्थल के बारे में कल्पना करना भी असंभव है|”

कहते हैं, कृष्ण ने अपनी हथेली पर कर्ण का दाह संस्कार किया|

कृष्णकर्ण कथा के द्वारा धरती, और यहाँ मनुष्य से सम्बंधित जन्म और मृत्यु के चक्र को सुपरिभाषित किया गया है|

मनुष्य संत हो या शैतान, मृत्यु से परे नहीं है|

मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता|

पर मृत्यु के भय पर उसे विजय प्राप्त करनी होती है…करनी ही होती है|

इस सच के बोध को कभी धूमिल न होने दें| यही सच जीवन में बड़े सच की ओर यात्रा करवा पाने में सहायक सिद्ध होता है|

जून 28, 2013

यह अधिकार तुम्हारा ही है…

अनुभव की मंडी में जाकर

सबसे ऊँचा दाम लगाकर

जिसे खरीद लिया है मैंने

यह अधिकार तुम्हारा ही है…

जो सूरज डूबा करता है

थका थका ऊबा करता है

उसको सुबह मना लाते हो

यह उपकार तुम्हारा ही है

यह अधिकार तुम्हारा ही है…

कलाकार ने चित्र बनाकार

अमर बनाया तुम्हे धरा पर

अब तुम उससे रंग छीन लो

हक सौ बार तुम्हारा ही है

यह अधिकार तुम्हारा ही है…

अपना ही गम किससे कम है

ऊपर से तेरा भी गम है

मुझे चुकानी होगी कीमत

यह अधिभार तुम्हारा ही है

यह अधिकार तुम्हारा ही है…

{कृष्ण बिहारी}

जून 5, 2013

अधूरे काम…मरने से रहे (रघुवीर सहाय)

या तो हिन्दुस्तानी कुछ मामलों में भोले होते हैं या अति चालाक| जीवन भर जिसे शातिर और निकम्मा, एक नंबर का आलसी, हमेशा अपना हित देखने वाला, मानते रहते हैं उसके मरते ही उसकी शान में कसीदे कढने शुरू कर देते हैं और ऐसा लगने लगता है कि मानों हाल ही में मृत आदमी से महान कोई अन्य व्यक्ति मुश्किल से ही धरती पर निकट के वर्षों में जन्मा होगा| नेताओं में तो यह बीमारी बहुत ज्यादा पाई जाती है| कवि रघुवीर सहाय ने दलीय राजनीति का भी स्वाद कुछ बरस चखा (आपातकाल के आसपास और उस दौरान) पर कवि की दृष्टि तो वे राजनीति में जाकर भी छोड़ न पाए होंगे| उनकी एक कविता मनुष्य की इसी दोगली बात को नग्न करती है|

दो बातें मरने पर कहते हैं

-वह अमर रहे

और

-उसे बहुत कुछ करना था|

किसी को भी लो और मार दो

और यह पाओगे

कि उसे बहुत काम करना था|

पर कौन जानता है कि

वह उन्हें क्यों नहीं कर रहा था

काम जो हम चाहते हैं करें,

पर स्थगित करते रहते हैं

बर्बर लोगों की तरह कर नहीं डालते

ऐसे अधूरे काम

जिनकी याद मरने का बाद आती है

कौन जानता है

क्यों अच्छी तरह सोचे भी नहीं गये|

(रघुवीर सहाय)

अप्रैल 15, 2013

मेरे गीत तुम्ही गाओगे

नयन के बादल घने हो गये

क्यों इतने अनमने हो गये

सुनो सुनो ऐ बंधु!

न रूठो, मुझको जीत तुम्ही पाओगे,

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

छोडो तुम यह रोना-धोना

चलो सजाओ स्वप्न सलोना

इतना तो विश्वास करो तुम

मेरी प्रीत तुम्ही पाओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

यह मौसम तूफानी देखो

कितना रेगिस्तानी देखो

ऐसे में मालूम मुझे था

मेरे मीत तुम्ही आओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

तुमने जीवन दान दिया है

गीतों का वरदान दिया है

इन्हें अमर भी कर जाए जो

वह संगीत तुम्ही लाओगे

मेरे गीत तुम्ही गाओगे…|

{कृष्ण बिहारी}

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