Posts tagged ‘Samudra’

मई 20, 2014

कैसे हो द्वारकाधीश?… बोली राधा

radhakrishnaस्वर्ग में विचरण करते हुए
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण,
प्रसन्नचित सी राधा…

कृष्ण सकपकाए,
राधा मुस्काई…

इससे पहले
कृष्ण कुछ कहते
राधा बोल उठी…

कैसे हो द्वारकाधीश?

जो राधा
उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से
द्वारकाधीश का संबोधन
कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी
किसी तरह
अपने आप को संभाल लिया…

और बोले राधा से,
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है…
कुछ मै अपनी कहता हूँ
कुछ तुम अपनी कहो…

सच कहूँ राधा
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी…

बोली राधा,
मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई
ना कोई आंसू बहा…
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे
जो तुम याद आते…

इन आँखों में
सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे…

प्रेम के
अलग होने पर
तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको?

कुछ कडवे सच,
प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा
इस तरक्की में
तुम कितने पिछड़ गए?

यमुना के
मीठे पानी से
जिंदगी शुरू की
और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए?

एक ऊँगली पर
चलने वाले सुदर्शन चक्र पर
भरोसा कर लिया
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए?

कान्हा
जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी,
प्रेम से अलग होने पर
वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी?

सुदर्शन चक्र उठाकर
विनाश के काम आने लगी!

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ?

कान्हा होते
तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता!

युद्ध में और प्रेम में
यही तो फर्क होता है!

युद्ध में
आप मिटाकर जीतते हैं
और
प्रेम में
आप मिटकर जीतते हैं!

कान्हा
प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है,
पर किसी को दुःख नहीं देता !

आप तो
कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया ?
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया !

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था
जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे!

आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर, हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे !

आज भी मै मानती हूँ
लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं !

गीता में
मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है,
पर आज भी लोग उसके समापन पर

” राधे राधे” करते है..!

मई 9, 2013

यशोदा

तुझे मैं सुला लूंगी

अपनी छाती के कंटीले वन में ,

उलझे बालों को तेरे

संवार दूंगी,

रेगिस्तानों की हवा से

पहना दूंगी तुझे

समुद्र और पूरा आसमान

कहलने को दूंगी तुझे

निर्वासितों को उसाँसें|

चले जायेंगे हम दोनों

एक रोग-शून्य जगह,

जहां बच्चे खेलते होंगे

अस्पताल के खाली कमरों में

जहां मेरा भाग्यफल

अलग होगा और

तेरा भाग्यफल होगाहर रोज बंधा

मेरे आँचल से|

यहाँ तेरी ढूंढाई होती है

आंसुओं और आसक्ति भरी धुंध में,

तू तो बैठा मुस्कुरा रहा है

इतनी बड़ी लहर पर

कोई देख नहीं पाता,

रोते-रोते सूज जाता है मुंह

सभी देखते हैं

केवल गाय के झुण्ड को लौटते

उसके पीछे एक शून्य स्थान|

में तुझे देखती हूँ साफ़-साफ़

आग-सा दीखता है लप-लप

मेरे पागलपन का अति मनोरम स्वप्न

रात भर दिन भर दिखता रहे

तू तो एक नीलकंठ है

बैठा है मैदान के पेड़ पर

कोटि कोटि हैं रूप तेरे,

एक से बढ़कर एक सुंदरता में|

यहाँ के लिए कोई रास्ता-घाट नहीं,

फिर भी मैं कैसे आई यहाँ?

यहाँ पृथ्वी के सारे लोग, सारे पशु-पक्षी

मेरे और तेरे अंदर हैं ,

सारी नदियाँ, पेड़ और पर्वत

बन गये केवल एक नदी, पेड़ पर्वत

विश्राम कर रही हूँ मैं उस पेड़ तले

तुझे चिपकाए अपनी गीली छाती से

गा रही हूँ गीत तेरे लिए,

पर नहीं जानती

वह गीत सुनाई दे रहा है मेरे स्वर से या

मेरे बेटे के स्वर से|

(रमाकांत रथ)

अनुवाद – राधेश्याम मिश्र

मार्च 17, 2013

तुम्हारी हँसी … Pablo Neruda

रोटी मुझसे ले लो,

अगर तुम चाहो तो,

हवा दूर ले जाओ,

लेकिन मुझसे

अपनी हँसी दूर मत ले जाना|

दूर मत ले जाना,

वो गुलाब,

वो लंबा, नुकीला फूल, जो तुमने तोड़ा है,

वो खुशी, जो जल के झरने की तरह

एकदम से फूट पड़ता है

वो चांदी जैसी चमक

जो अनायास जगमगा उठती है

तुम्हारे अंदर|

मेरा संघर्ष कठिन है,

और मैं वापस आता हूँ,

थकी आँखों के साथ,

और कभी-कभी बदलाव न ला पाने की निराशा के साथ

लेकिन जब तुम्हारी हँसी

देखता हूँ तो

यह मुझे अहसास कराती है

कि अभी आकाश की ऊँचाइया

बाकी हैं छू पाने को

तुम्हारी हँसी खोल देती है

जीवन में आशा के सब द्वार|

मेरे प्रिय!

जब तुम हंसती हो तो

जीवन के सबसे अंधकार भरे समय में

भी मुझे संबल मिलता है,

और यदि कभी अचानक तुम

देखो कि मेरा रक्त सडकों

को रंग रहा है,

तो तुम हंसना,

क्योंकि तुम्हारी हँसी

मुझे लड़ने के लिए वही ताजगी देगी

जैसे शस्त्रहीन हो चुके किसी सैनिक

को अचानक से एक नयी धारदार तलवार

मिल जाए|

पतझड़ में

तुम्हारी हँसी

समुद्र से लगातार आती झागदार लहरों को

ऊँचा उठा देती है,

और बसंत में बढ़ा देती है प्यार को,

मुझे तुम्हारी हँसी का इतंजार ऐसे ही रहता है

जैसे कि मैं इंतजार करता हूँ

खिलने का अपने पसंदीदा फूलों के,

नीले फूल,

यादों में बसे मेरे देश के गुलाब|

तुम हंसना रात पर,

दिन पर,

या चाँद पर,

हंसना

इस द्वीप की टेढी-मेढ़ी गलियों पर,

या इस अनगढ़ लड़के पर जो तुमसे प्रेम करता है,

पर जब में अपनी आँखें खोलूं

और बंद करूँ,

जब मैं जाऊं,

जब मैं वापस आऊँ,

मुझे भले ही

रोटी, हवा, प्रकाश,

बसंत,

मत देना,

पर कभी भी मुझे अपनी

हँसी देने से इनकार मत करना,

क्योंकि तुम्हारी हँसी के

लिए मैं मर सकता हूँ|

(Your LaughterPablo Neruda)

हिंदी अनुवाद – …[राकेश]

जुलाई 28, 2011

खुदारा पूछना मत कहाँ थे

सपनों के सजीले शहजादों जैसे कहाँ थे
आपने जो समझा था हम वैसे कहाँ थे

खो गए थे अँधेरे में कहीं शाम के बाद
क्या बताएं रात गये तक कैसे कहाँ थे

रेशमी छोड़ सूती साडी भी ना ला सके
अरमान तो था यार मगर पैसे कहाँ थे

वो कागजी डिग्रियां तो किताबें ले आईं
नौकरी की खरीद के लिए पैसे कहाँ थे

फूल, तितली, बादल, बरखा, धनक, बहार
हसीन थे सब मगर आप जैसे कहाँ थे

गम के सौ समंदरों का निचोड़ हैं आँसू
ये पानी के चंद कतरे ऎसे–वैसे कहाँ थे

शाम हुए घर लौटा है राह भूला आलम
खुदारा कोई ये ना पूछना कैसे कहाँ थे

(रफत आलम)

जुलाई 22, 2011

मौसम

रिमझिम मौसम में
हरी दूब पर
नंगे पाँव चलाना सुहाता है,
बे-एतबार फुहारों में
अक्सर खिलते हैं
रिश्तों के मासूम फूल,
सर्द रूत जमाने लगती है
गुलाबों की पंखडियों पर ओस,
बर्फ होते दिलों के
अजनबी बनते एहसास
बेरुखी के लिहाफ में
करवटें बदल कर सो जाते हैं।

बल खाती नदियों की जवानी
सोख लेती हैं बेदर्द गर्मियां,
जज़्बात की जलन में
चिता होते देखे रेश्मी आँचल
और चौड़े-चकले फौलादी सीने,
संबंधों के सूखे तीरों के बीच
समय का चिरस्थाई समुद्र
बचा रह जाता है.
सूनी आँख से रिसता
मौसमों के बदलाव में।

(रफत आलम)

जुलाई 8, 2011

यह भी एक दुनिया है


दिखती है स्टाफ रुम की खिड़की से
सूनी दुनिया
सूने मकान
सूना समुद्र
सूने जंगल
बड़ा खौफनाक मंजर है।

मैं इसे मुर्दों की बस्ती कहता हूँ।

खूबसूरत मकानों से
झांकता नहीं कभी भी
एक भी चेहरा,
जंगलों की ओर
आता-जाता नहीं
एक भी चहचहाता परिंदा।
कभी-कभी
दिखता है कोई जहाज
समुद्र में, आसमान में
पोर्ट और एयरपोर्ट पास ही हैं।

जंगल भी है तो समुद्र में।

जंगलों का सन्नाटा
समुद्र का सूनापन
सरघटी मकानों का
लंबा अहाता…
कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

खजूर के पेड़ों पर
आ रहे हैं फल
हरे-हरे, छोटे-छोटे
पकेंगे महीनों में
निर्यात होने के लिये
तब कहीं देखेंगे
बाहर की दुनिया
दुनिया की चहल-पहल।

बादाम…
अभी आये नहीं पेड़ों पर
झड़ने के लिये
जमीन पर सूखने के लिये
सुना है-
किस्म ठीक नहीं है।
शायद किस्मत ही ठीक नहीं
रह जायेंगे यहीं
सूनापन सहने के लिये,
कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

इसी दुनिया के एक हिस्से में
मैं हूँ, लोग हैं, पड़ोसी हैं
भीड़ भी बहुत है शहर में
मगर एक को दूसरा
दूसरे को तीसरा
जानता नहीं।

इस तरह अंजान
झूठ-भरी मुस्कान
कहते हैं खूबी है
विकसित देशों की।

कैसी तो दुनिया है…
यह भी एक दुनिया है।

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 11, 2011

साज़ जिंदगी का

 

अंतहीन आसमान
हाथ कब आता है
अंधेरे की कोख से
किन्तु
उजाला उगाता है

बड़ा है समुद्र
बहुत खारा है
तूफ़ान उठता है
किश्तियाँ भी चलाता है

ज़रा सी बूँद है मोती
आंसू का कतरा भी
छोटा सा हीरा कीमती
विषैला भी

छोटे-बड़े का पैमाना
अक्ल का फेर
गलत-सही का ज़िक्र बेमानी
पुण्य क्या पाप क्या
बस फितरत-ए-इंसानी

वक्त एक किस्सा
दुनिया एक कहानी
दिन रात के चक्कर में
जिंदगी है
सांसों की धुन पर बजता
एक अबूझा साज़

(रफत आलम)

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