Posts tagged ‘Mrityu’

अगस्त 3, 2017

सौंदर्यबोध

 

अपने इस गटापार ची बबुए के

पैरों में शहतीरें बांधकर

चौराहे पर खड़ा कर दो,

फिर, चुपचाप ढ़ोल बजाते जाओ,

शायद पेट भर जाए :

दुनिया विवशता नहीं

कुतूहल खरीदती है|

 

भूखी बिल्ली की तरह

अपनी गरदन में संकरी हाँडी फँसाकर

हाथ-पैर पटको,

दीवारों से टकराओ,

महज छटपटाते जाओ,

शायद दया मिल जाए:

दुनिया आँसू पसन्द करती है

मगर शोख चेहरों के|

 

अपनी हर मृत्यु को

हरी-भरी क्यारियों में

मरी हुई तितलियों-सा

पंख रंगकर छोड़ दो,

शायद संवेदना मिल जाए :

दुनिया हाथों-हाथ उठा सकती है

मगर इस आश्वासन पर

कि रुमाल के हल्के-से स्पर्श के बाद

हथेली पर एक भी धब्बा नहीं रह जाएगा|

 

आज की दुनिया में

विवशता,

भूख,

मृत्यु,

सब सजाने के बाद ही

पहचानी जा सकती है|

बिना आकर्षण के दुकानें टूट जाती हैं|

शायद कल उनकी समाधियां नहीं बनेंगी

जो मरने के पूर्व

कफ़न और फूलों का

प्रबन्ध नहीं कर लेंगें|

ओछी नहीं है दुनिया:

मैं फिर कहता हूँ,

महज उसका सौंदर्य-बोध

बढ़ गया है|

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना)

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मई 23, 2016

मुसलमान … (देवी प्रसाद मिश्र)

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे

वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया

वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे

उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की

प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे

न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे

वे मुसलमान थे

वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू

वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं

वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे

वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए

कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे

वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती

वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता

वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे

वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे

इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे

वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे

वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे

वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे

वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं

वे शहर के बाहर रहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं

उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे

वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है

अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे

वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे

कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए

वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे

सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे

वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसल

मान थे अफ़वाह नहीं थे

वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे”

 

 (देवीप्रसाद मिश्र)
सितम्बर 5, 2015

‘कृष्ण जन्म’ हम जैसा ही था – ओशो

Krishna1कृष्ण का जन्म होता है अँधेरी रात में, अमावस में। सभी का जन्म अँधेरी रात में होता है और अमावस में होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नहीं जन्मती, सब कुछ जन्म अँधेरे में ही होता है। एक बीज भी फूटता है तो जमीन के अँधेरे में जन्मता है। फूल खिलते हैं प्रकाश में, जन्म अँधेरे में होता है।

असल में जन्म की प्रक्रिया इतनी रहस्यपूर्ण है कि अँधेरे में ही हो सकती है। आपके भीतर भी जिन चीजों का जन्म होता है, वे सब गहरे अंधकार में, गहन अंधकार में होती है। एक कविता जन्मती है, तो मन के बहुत अचेतन अंधकार में जन्मती है। बहुत अनकांशस डार्कनेस में पैदा होती है। एक चित्र का जन्म होता है, तो मन की बहुत अतल गहराइयों में जहाँ कोई रोशनी नहीं पहुँचती जगत की, वहाँ होता है। समाधि का जन्म होता है, ध्यान का जन्म होता है, तो सब गहन अंधकार में। गहन अंधकार से अर्थ है, जहाँ बुद्धि का प्रकाश जरा भी नहीं पहुँचता। जहाँ सोच-समझ में कुछ भी नहीं आता, हाथ को हाथ नहीं सूझता है।

कृष्ण का जन्म जिस रात में हुआ, कहानी कहती है कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था, इतना गहन अंधकार था। लेकिन इसमें विशेषता खोजने की जरूरत नहीं है। यह जन्म की सामान्य प्रक्रिया है।

दूसरी बात कृष्ण के जन्म के साथ जुड़ी है- बंधन में जन्म होता है, कारागृह में। किसका जन्म है जो बंधन और कारागृह में नहीं होता है? हम सभी कारागृह में जन्मते हैं। हो सकता है कि मरते वक्त तक हम कारागृह से मुक्त हो जाएँ, जरूरी नहीं है हो सकता है कि हम मरें भी कारागृह में। जन्म एक बंधन में लाता है, सीमा में लाता है। शरीर में आना ही बड़े बंधन में आ जाना है, बड़े कारागृह में आ जाना है। जब भी कोई आत्मा जन्म लेती है तो कारागृह में ही जन्म लेती है।

लेकिन इस प्रतीक को ठीक से नहीं समझा गया। इस बहुत काव्यात्मक बात को ऐतिहासिक घटना समझकर बड़ी भूल हो गई। सभी जन्म कारागृह में होते हैं। सभी मृत्युएँ कारागृह में नहीं होती हैं। कुछ मृत्युएँ मुक्ति में होती है। कुछ अधिक कारागृह में होती हैं। जन्म तो बंधन में होगा, मरते क्षण तक अगर हम बंधन से छूट जाएँ, टूट जाएँ सारे कारागृह, तो जीवन की यात्रा सफल हो गई।

कृष्ण के जन्म के साथ एक और तीसरी बात जुड़ी है और वह यह है कि जन्म के साथ ही उन्हें मारे जाने की धमकी है। किसको नहीं है? जन्म के साथ ही मरने की घटना संभावी हो जाती है। जन्म के बाद – एक पल बाद भी मृत्यु घटित हो सकती है। जन्म के बाद प्रतिपल मृत्यु संभावी है। किसी भी क्षण मौत घट सकती है। मौत के लिए एक ही शर्त जरूरी है, वह जन्म है। और कोई शर्त जरूरी नहीं है। जन्म के बाद एक पल जीया हुआ बालक भी मरने के लिए उतना ही योग्य हो जाता है, जितना सत्तर साल जीया हुआ आदमी होता है। मरने के लिए और कोई योग्यता नहीं चाहिए, जन्म भर चाहिए।

लेकिन कृष्ण के जन्म के साथ एक चौथी बात भी जुड़ी है कि मरने की बहुत तरह की घटनाएँ आती हैं, लेकिन वे सबसे बचकर निकल जाते हैं। जो भी उन्हें मारने आता है, वही मर जाता है। कहें कि मौत ही उनके लिए मर जाती है। मौत सब उपाय करती है और बेकार हो जाती है। कृष्ण ऐसी जिंदगी हैं, जिस दरवाजे पर मौत बहुत रूपों में आती है और हारकर लौट जाती है।

वे सब रूपों की कथाएँ हमें पता हैं कि कितने रूपों में मौत घेरती है और हार जाती है। लेकिन कभी हमें खयाल नहीं आया कि इन कथाओं को हम गहरे में समझने की कोशिश करें। सत्य सिर्फ उन कथाओं में एक है, और वह यह है कि कृष्ण जीवन की तरफ रोज जीतते चले जाते हैं और मौत रोज हारती चली जाती है।

मौत की धमकी एक दिन समाप्त हो जाती है। जिन-जिन ने चाहा है, जिस-जिस ढंग से चाहा है कृष्ण मर जाएँ, वे-वे ढंग असफल हो जाते हैं और कृष्ण जीए ही चले जाते हैं। लेकिन ये बातें इतनी सीधी, जैसा मैं कह रहा हूँ, कही नहीं गई हैं। इतने सीधे कहने का पुराने आदमी के पास कोई उपाय नहीं था। इसे भी थोड़ा समझ लेना जरूरी है।

जितना पुरानी दुनिया में हम वापस लौटेंगे, उतना ही चिंतन का जो ढंग है, वह पिक्टोरियल होता है, चित्रात्मक होता है, शब्दात्मक नहीं होता। अभी भी रात आप सपना देखते हैं, कभी आपने खयाल किया कि सपनों में शब्दों का उपयोग करते हैं कि चित्रों का?

सपने में शब्दों का उपयोग नहीं होता, चित्रों का उपयोग होता है। क्योंकि सपने हमारे आदिम भाषा हैं, प्रिमिटिव लैंग्वेज हैं। सपने के मामले में हममें और आज से दस हजार साल पहले के आदमी में कोई फर्क नहीं पड़ा है। सपने अभी भी पुराने हैं, प्रिमिटिव हैं, अभी भी सपना आधुनिक नहीं हो पाया। अभी भी सपने तो वही हैं जो दस हजार साल, दस साल पुराने थे। गुहा-मानव ने एक गुफा में सोकर रात में जो सपने देखे होंगे, वही एयरकंडीशंड मकान में भी देखे जाते हैं। उससे कोई और फर्क नहीं पड़ा है। सपने की खूबी है कि उसकी सारी अभिव्यक्ति चित्रों में है।

जितना पुरानी दुनिया में हम लौटेंगे- और कृष्ण बहुत पुराने हैं, इन अर्थों में पुराने हैं कि आदमी जब चिंतन शुरू कर रहा है, आदमी जब सोच रहा है जगत और जीवन के बाबत, अभी जब शब्द नहीं बने हैं और जब प्रतीकों में और चित्रों में सारा का सारा कहा जाता है और समझा जाता है, तब कृष्ण के जीवन की घटनाएँ लिखी गई हैं। उन घटनाओं को डीकोड करना पड़ता है। उन घटनाओं को चित्रों से तोड़कर शब्दों में लाना पड़ता है। और कृष्ण शब्द को भी थोड़ा समझना जरूरी है।

कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है, जो आकृष्ट करे, जो आकर्षित करे; सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन, कशिश का केंद्र। कृष्ण शब्द का अर्थ होता है जिस पर सारी चीजें खिंचती हों। जो केंद्रीय चुंबक का काम करे। प्रत्येक व्यक्ति का जन्म एक अर्थ में कृष्ण का जन्म है, क्योंकि हमारे भीतर जो आत्मा है, वह कशिश का केंद्र है। वह सेंटर ऑफ ग्रेविटेशन है जिस पर सब चीजें खिँचती हैं और आकृष्ट होती हैं।

शरीर खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, परिवार खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, समाज खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है, जगत खिँचकर उसके आसपास निर्मित होता है। वह जो हमारे भीतर कृष्ण का केंद्र है, आकर्षण का जो गहरा बिंदु है, उसके आसपास सब घटित होता है। तो जब भी कोई व्यक्ति जन्मता है, तो एक अर्थ में कृष्ण ही जन्मता है वह जो बिंदु है आत्मा का, आकर्षण का, वह जन्मता है, और उसके बाद सब चीजें उसके आसपास निर्मित होनी शुरू होती हैं। उस कृष्ण बिंदु के आसपास क्रिस्टलाइजेशन शुरू होता है और व्यक्तित्व निर्मित होता है। इसलिए कृष्ण का जन्म एक व्यक्ति विशेष का जन्म मात्र नहीं है, बल्कि व्यक्ति मात्र का जन्म है।

कृष्ण जैसा व्यक्ति जब हमें उपलब्ध हो गया तो हमने कृष्ण के व्यक्तित्व के साथ वह सब समाहित कर दिया है जो प्रत्येक आत्मा के जन्म के साथ समाहित है। महापुरुषों की जिंदगी कभी भी ऐतिहासिक नहीं हो पाती है, सदा काव्यात्मक हो जाती है। पीछे लौटकर निर्मित होती है।

पीछे लौटकर जब हम देखते हैं तो हर चीज प्रतीक हो जाती है और दूसरे अर्थ ले लेती है। जो अर्थ घटते हुए क्षण में कभी भी न रहे होंगे। और फिर कृष्ण जैसे व्यक्तियों की जिंदगी एक बार नहीं लिखी जाती, हर सदी बार-बार लिखती है।

हजारों लोग लिखते हैं। जब हजारों लोग लिखते हैं तो हजार व्याख्याएँ होती चली जाती हैं। फिर धीरे-धीरे कृष्ण की जिंदगी किसी व्यक्ति की जिंदगी नहीं रह जाती। कृष्ण एक संस्था हो जाते हैं, एक इंस्टीट्यूट हो जाते हैं। फिर वे समस्त जन्मों का सारभूत हो जाते हैं। फिर मनुष्य मात्र के जन्म की कथा उनके जन्म की कथा हो जाती है। इसलिए व्यक्तिवाची अर्थों में मैं कोई मूल्य नहीं मानता हूँ। कृष्ण जैसे व्यक्ति व्यक्ति रह ही नहीं जाते। वे हमारे मानस के, हमारे चित्त के, हमारे कलेक्टिव माइंड के प्रतीक हो जाते हैं। और हमारे चित्त ने जितने भी जन्म देखे हैं, वे सब उनमें समाहित हो जाते हैं।

ओशो (कृष्ण स्मृति)

दिसम्बर 18, 2014

क्रूरता…

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगाkidcartoon
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा श्रृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अम्बुज)

अप्रैल 5, 2014

क्रूरता…(कुमार अंबुज)

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा
प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी
झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा
क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा
एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग
पराजित न होने के लिए नहीं
अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता
पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी
फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में
फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में
फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी
निरर्थक हो जाएगा विलाप
दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू
पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को
फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी
लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी
सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे
सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता
और सभी में गौरव भाव होगा
वह संस्कृति की तरह आएगी
उसका कोई विरोधी न होगा
कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य
और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी
और सोख लेगी हमारी सारी करुणा
हमारा सारा ऋंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए
और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

(कुमार अंबुज)

जनवरी 6, 2014

Zen Ikkyu… आह! ये कविता

यह उसका पारदर्शी मन zenikkyu-001

जब पूछा,

उसने दिया उत्तर

ना था प्रश्न

ना था उत्तर

तब गुरु

के पास मन में

न था शायद कुछ भी !

उसका मन सतत

ना था आदि,

न हैं अंत

और मेरा मन

जिसका था जन्म

होगी उसकी मृत्यु

यही है शून्य का सत्व!

सभी पाप सभी कर्म

इन तीनों लोकों के

धुंधलाकर हो जायेंगे लुप्त

मेरे साथ ही!

(Zen Ikkyu की एक कविता का अनुवाद)

Yugalsign1

जनवरी 4, 2014

शून्य…

दुनियावी झमेलों से शुरू होकरlifeman-001

कभी न खत्म होने वाली भूलभुलैया

के बीच,

रास्ते में एक विश्राम

अब यदि हो बारिश, तो होवे

अब यदि आएं झंझावात, तो आवें!

मेरा बहुत पुराना स्व:

इस अस्तित्वहीन प्रकृति में

जहां,

मृत्यु के बाद न है जाना कहीं

न है कुछ भी !

Yugalsign1

[Zen Ikkyu की एक कविता का अनुवाद …]

मई 7, 2013

प्रेम पत्र

अब असंभव है तुम्हे चिट्ठी लिख पाना

चाहता हूँ कितना खोलूँ खिड़की

जी भरकर पीऊँ समुद्र-पवन

फिर बैठूं लिखने जो दुनिया का

सबसे आवेगपूर्ण प्रेम पत्र हो और उसका हर पैराग्राफ

वर्णन करे एक सुवासित स्वप्न

उस स्वप्न के कुछ-कुछ आलोकित गलियारों से

मैं तुम्हारे होने की जगह जाता

वह चिट्ठी पढ़ने के बाद

मैं जानता हूँ तुम समझ जाती

मृत्यु का शीतल दुर्ग तोड़ने का जादू

मेरी साँसों में सारी ऋतुएँ स्थित हैं

जाड़े की रात में ढूंढोगी यदि बेला

वह मिलेगा मेरे आत्म समर्पण में|

किन्तु असंभव है अब

तुम्हे चिट्ठी लिख पाना,

केवल स्वप्न में अथवा

स्वप्न-सा निरर्थक लगने में

तुम देखोगी, जब आखें

खुली होंगी और अंग प्रत्यंग

मेरी सचेत इच्छानुसार चलेंगे

तुम बनोगी इतिहास ,

एक प्रागैतिहासिक शहर

जो दब गया समुद्र तले और

जिसकी बिखरी एकाध ईंटें

पड़ जाएँगी किसी दर्शक की दृष्टि में|

मैं भी बदल गया काफी |

मैंने तुम्हे खोया या खोया

मेरे जैसे दिखने वाले मेरे अन्य रूप ने?

उसकी आवाज मेरी आवाज सी थी

जबकि उसमें थी शीतलता, प्रच्छन, विद्रूप|

वह रूप मैं होऊं या वह हो

मेरी आत्मा के छुपे अंगार से बनी

एक प्रतिमूर्ति ,

मेरा नाम आज उसका नाम है

उसे मिलेगी आज दुनिया भर की सहानुभूति

मैं अंधेरी रत में

एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक चलता रहूंगा,

पूरा आकाश भरा होगा तारों से

न जाने कितनी दूर

और किस समघात से

मैं बनूंगा वह पत्र-लेखक

कई देहांत के बाद

जिसकी इतर सत्ताएँ मर जाएँगी,

निर्मल अतीत के साथ एकाकार होगा

शून्य भविष्य|

मुझे लगता हैशुरू हो गया है मेरा देहांत

झरने के कल-कल बहते शब्दों से

संभावना नियंत्रण कुछ भी नहीं है, सिर्फ

एक सह्रीर के ध्वस्त होने के बाद का

विलाप सुनाई देता है और

मेरे प्रेम पत्र की भाषा भी

सुनाई देती है अस्पष्ट स्वरों में|

(रमाकांत रथ)

उडिया से अनुवाद – राजेन्द्रप्रसाद मिश्र

अगस्त 17, 2011

छिन जाने का भय, जो तुम्हारा सुख छीनता है

जन्म से
मृत्यु होने तक
व्यक्ति भय के साये में जीता है,
यह भय और कुछ नहीं बस
कुछ छिन जाने का भय है,
जो तुम्हारा सुख छीनता है|

बच्चा पैदा होने के तुरंत बाद
जोर जोर से रोता है,
उसकी दुनिया बदल गयी है,
उसे भय लग रहा है कि
वह कहाँ पहुँच गया है,
पेट की अँधेरी
नर्क जैसी कोठरी से बाहर
आँखे बंद कर देने वाला प्रकाश भी
उसे भयभीत कर देता है|

जीवन में  फिर
रोटी, कपड़ा और मकान
छिन जाने का भय भी
व्यक्ति को भयभीत करता है|

जीवन का सबसे बड़ा भय,
जो हर व्यक्ति को
हर समय और
हर उम्र में
सबसे अधिक डराता है,
वह शरीर छिन जाने का भय है,
यानि मौत का भय
क्योंकि अपनी जान
हर व्यक्ति को प्यारी होती है|

क्या भय से आखिर
छूटा जा सकता है?
हाँ परन्तु बड़े कष्ट से
क्योंकि भय का मूल
तुम्हारा अपना ही बुना हुआ
मकड़ी का मोहजाल है,
मकड़ी पहले खूब मेहनत कर
जैसे जाला बुनती है
और फिर
उससे छूटने के लिए
छटपटाते हुए
खूब हाथ-पांव मारती है
परन्तु उससे छूटे नहीं बनता
उसे उससे छूटना है तो
वह केवल दो ही स्थितियों में
छूट सकती है,
या तो जाला टूट जाए,
या फिर उसकी जान छूट जाए,
ठीक यही स्थिति व्यक्ति की भी है,
या तो उसका मोहजाल टूट जाए
या उसका शरीर छूट जाए|

मोहजाल यानी
वह मायाजाल
जिसका मूल अज्ञान है,
अज्ञान, न जानना है
यह न जानना कि क्या ‘है’
और यह कि जो ‘है’
वही सत्य है|

सत्य और ज्ञान
पर्याय हैं क्योंकि
सत्य को जानना ही तो
ज्ञान है
और जो है ही नहीं
वह असत्य है|

शरीर नश्वर है,
आत्मा अनश्वर है,
जीवन केवल आत्मा से है
शरीर से नहीं,
इसलिए शरीर छूटने से
जीवन नहीं छूटता,
केवल पुराना घर छूटता है,
और आत्मा फिर से
अपने लिए एक
नया शरीर रुप घर बसा लेती है,
इसलिए यह जानना कि
पुराना घर छूटना ही है
और फिर नया घर बसना है
सत्य है, ज्ञान है
और
सत्य जान लेने से
असत्य और
ज्ञान होने से अज्ञान
स्वतः ही मिट जाता है
जैसे प्रकाशमयी सुबह होने पर
अंधकारमयी रात्रि का अँधेरा
स्वतः ही मिट जाता है
और फिर मोह से मुक्त होने पर
सुख की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है !

(अश्विनी रमेश)

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