Posts tagged ‘Ishq’

जनवरी 17, 2014

बहूँगा धमनियों में इश्क बन के…

मैं  गुज़र भी जाऊंगा अगर,

तो बीत  जाऊँगा  नहीं

रहूँगा यहीं हवाओ में आस पास घुल के

महसूस कर सकोगी मुझे

अपनी आती जाती साँसों में

ये बेनाम दर्द बहेगा

धमनियों में इश्क बन के…

Rajnish sign

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नवम्बर 11, 2013

यूँ ही हँसती रहो मुँह छिपाकर

dewflowerतुमने कभी देखा

ओस की बूंद को फूल पे?

एक छोटी सी बूँद …

बहुत नाज़ुक लेकिन कितनी जीवंत!

सारे रंग अपने में समेटे,

फूल के आगोश में लिपटी

‘बूँद’

रात भर सपना देखती है…

सुबह का,

सुबह के ताजगी भरे उजाले में

अपने प्रेमी फूल को देखने का…

उसे सहलाने का

बहुत क्षणिक  होता है ये मिलन

रात के लम्बे इंतज़ार के सामने

पर कितना सघन!

दो पल का स्पर्श…

पोर पोर सहलाना

फूल को दे जाता है

सबब

पूरे दिन महकने का…

खिले रहने का…

मुस्कराने का

और खुशिया बिखेरने का

गुदगुदाती है

उसे बूँद की याद दिन भर

और उसी के सहारे

सह लेता है फूल

दिन भर की तपन

मुस्कुराते…

manisha-001खिलखिलाते…

महकते…

महकाते…

मैं भी मुस्कुराता हूँ …

बेवज़ह भी…

कभी जब याद आता है

तुम्हारा मुंह छुपा के मुस्कुराना…

मेरे दिन रात

महक उठते हैं…

काश

तुझ फूल को हँसने

खिलने और महकने के लिए

मैं ही ओस की बूँद रूपी

बहाना बन जाऊं…

(रजनीश)

फ़रवरी 22, 2012

मुझे ना ढूंढ!

फ़ना होना ये ही है अंजामे-इश्क, उसमे ज़िन्दगी ना ढूंढ,
आफताब का जलवा देख, ज़र्रे में रौशनी ना ढूंढ|

नए आयाम को देख, जो हो चुका उसे मुड कर न देख,
ग़म दबा हुआ निकाल, बेवजह पड़ा ग़म ना देख |

मेरे हाल-ए-बेज़ार से नफरत न कर,  दिल को देख,
सहर भी जिसकी शाम हो , उसकी ज़िन्दगी ना देख !

(बकुल ध्रुव)

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

सितम्बर 22, 2011

खुदकशी – मर्ज़ और दवा

बिखरे हुए सपने अपनी जिंदगी से गए
बूढ़े कुछ चश्मे आँख की रोशनी से गए
झुका हुआ एक दरख्त ठूंठ हुआ बेचारा
बेरुते फल थे टूट कर खुद-खुशी से गए

दुःख को साथी मानते कट जाता दुःख
कबीर-गालिब को पढ़ते बट जाता दुःख
तुम मोल तो करते अमूल्य जीवन का
बिन अश्रु आँखों में सिमट जाता दुःख

जलते दीपक से सीख जीने का करीना
दुनिया के आगे हँसना पीछे अश्रु पीना
सोच ये हो तेरे साथ बिताये पल जीलूँ
ये सोच गलत है तेरे बिना क्या जीना

टूटे आस तो खुदा का आसरा है बहुत
हो भरोसा तो स्वयं का सहारा है बहुत
सपनों के साथ आँखे नहीं मरा करती
देख तो सही आगे अभी रास्ता है बहुत

नफा-नुकसान, दुख-सुख, मिलना–बिछड़ना
अनुभव है जिंदगी के, इनसे सीख समझ
समय का शिकारी तो खुद तेरी टोह में है
उसके जाल में न आ, फंदों में न उलझ

(प्रेम में असफलता पाने से की गई आत्महत्या की खबर से जन्मा ख्याल)

(रफत आलम)

सितम्बर 13, 2011

ज़हर भी है मुस्कान में

 

काबे में मिले ना हमको सनमखानों
कुछ होश वाले जो मिले मयखानों में

मेरे जुनूं को तलाश जिस होश की है
फरजानों में पाया न मिला दीवानों में

अक्ल के फ़रमान सहन होते किससे
शुक्रिया तेरा जो रखा हमें दीवानों में

हुस्न, इश्क, यारी, ईमान, अकीदे खुदा
क्या नहीं बिकता है आज दुकानों में

मौत को भी जाने ठौर मिले न मिले
जिंदगी तो कटी किराए के मकानों में

कसले दौर में सांस लेने की है सज़ा
कांटे उग आये लोगों  की ज़बानों में

कभी खापों के रुलाते फैसले भी देख
लैला मजनू तो पढ़े तूने दास्तानों में

नर्म मैदान ने गंदा कर के खा लिया
नदी पाक थी जब तक बही चट्टानों में

हँसी की महफ़िल में ज़रा होश आलम
ज़हर का भी पुट होता है मुस्कानों में

(रफत आलम)

फरजानों – बुद्धिमानों , फ़रमान – आदेश

जून 17, 2011

दिल बहलाने का ख्याल

तन्हाई की घुटन में सन्नाटों से दिल बहलाते रहे
रात भर गिनते रहे करवटों से दिल बहलाते रहे

खुद से भी डर गए जो जानते थे चेहरों का सच
हाँ जो बहरूपिये थे मुखौटों से दिल बहलाते रहे

घर की देहरी इन्तज़ार में पत्थर हो गयी आखिर
एहले-हवस शहर की गुड़ियों से दिल बहलाते रहे

इश्क के रास्ते में मिटने से भला डरता है कौन?
चिरागों के हौसले थे हवाओं से दिल बहलाते रहे

ज़ख्म देने वालों से मरहम की आस थी फ़िज़ूल
कुछ दर्दमंद थे जो मुस्कानों से दिल बहलाते रहे

(रफत आलम)

मई 10, 2011

नीम की छांव

लोग जिसका नाम बेच रहे हैं खुली दुकानों में
कहते हैं उसका घर है दूर कहीं आसमानों में

मुझे कब से है तलाश कहीं उसका पता मिले
मंदिर की झाँकी में के मस्जिद की अजानों में

हकीकत की सख्त ज़मीन पर सब बिखर गए
हवा-महलों से निकला करते थे सपने उड़ानों में

कंक्रीट के दडबों से तंग आओ तो कभी लौटना
नीम की छांव आज भी है गावं के मकानों में

गौर से देखो तो सभी के चेहरे खून से रंगे हैं
इतिहास ने लिखे हैं जितने भी नाम महानों में

किसने कहा पत्थर के सीने में दिल नहीं होता
चोट खा के दरारें पड जाती हैं सख्त चट्टानों में

हर कहीं देख लो मासूम इश्क का वही अंजाम
यार खोये हो कहाँ लैला मजनूँ की दास्तानों में

गया वक्त रोता फिर रहा है सन्नाटों के साथ
वहाँ भी सकून नहीं है जाके देख लो वीरानों में

शर्मदार की मौत को चुल्लू भर पानी है काफी
छली गयी उमंगें ही डूबी आलम शराबखानों में

(रफत आलम)

मई 5, 2011

ढाई अक्षर की महिमा

बेतुके शब्दों से
हमने रचे
अनगिनत गीत
काश!
सही से चुन पाते
ढाई अक्षर।
….

प्रेम में
कहाँ है अंतर
हुस्न और इश्क के बीच
ये भेद खुला उसी पर
जिसने!
लैला को मजनूँ समझा
मजनूँ को लैला जाना।
….

दुनिया भर के
तनावों में जकड़े हुए आदमी!
किसी दीवाने से लें
मुक्ति का सबक।

(रफत आलम)

अप्रैल 25, 2011

किसी ने दीवाना समझा किसी ने सरफिरा

सरमस्ती-ए-इश्क को ज़माने ने कभी भी ना जाना
कोई सरफिरा समझा हमें किसी ने दीवाना जाना

रास्ते को मंजिल समझा मंजिल को रास्ता जाना
तब कहीं जाकर दीवाने ने खुद अपना पता जाना

साक्षात सच को समझने वाले कब डरे सूलियों से
विष के प्याले को भी पगलों ने अमृत भरा जाना

हमारे लिए तो नामालूम सफर का एक ठहराव है
और लोगों ने दुनिया को मंजिल का रास्ता जाना

कुछ भरोसा लुटा कुछ और खलिश दिल को मिली
नादान दिल ने जब कभी किसी को अपना जाना

सब अपने हैं यहाँ हमारे दिल को वहम था बहुत
भरम तोड़ गया किसी का मुँह फेर के चला जाना

डूब गए टूटी हुई पतवार पर भरोसा करके आलम
वो तिनका भी नहीं था जिसे हमने सफीना जाना

(रफत आलम)

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