Posts tagged ‘Corruption’

सितम्बर 5, 2011

मास्टर, डॉक्टर और पुलिस – भ्रष्टाचार के तीन स्त्रोत

वह एक पुलिस का सिपाही है
जो तलाश रहा है
एक सभ्य नागरिक
जिसकी ज़ेब से निकलवा सके
वह आखिरी नोट।

और

वह जो बंगला है ना
सामने
मेडिकल कॉलेज के एक
डॉक्टर का है
वहाँ जो भीड़ है
वह पागलों की है
बीमारों की है
मरीजों के साथ साथ उनके परिजन भी
बीमार हो गये हैं।
पागलों का इलाज करते करते
डॉक्टर भी हो गया है पागल पैसे के पीछे।

और

ये महाश्य जो अभी अभी घड़ी देखते
तेजी से घर से निकले हैं
वो रहे…
वो नाक की सीध में बढ़ते हुये
अध्यापक हैं
उन्हे पढ़ानी है ट्यूशन
फेल करते हैं बच्चों को एक एक नम्बर से
हर वीकली टैस्ट में
डर जाते हैं माँ-बाप
डर जाता है पूरा समाज
और पढ़ने लगता है ट्यूशन

ताकि हो सके सभ्य
और हो जाये पागल
दे सके ज़ेब का आखिरी नोट
किसी पुलिसिये को
किसी पागल डॉक्टर को
या फिर मास्टर को।


समाज को ये तीनों ही बचायेंगे…
फिर खायेंगे।


{कृष्ण बिहारी}

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अगस्त 29, 2011

कौन रहेगा ईमानदार?


विजय दिवस था कल
एक बूढी लाठी के आगे
नतमस्तक हुए शाह–वजीर
अचरज से देख रहे थे
कबाड़े से निकल आई
गाँधी टोपियों का कमाल
सिर पर रखते ही
हरीशचन्द्र बन रहे थे लोग
जिन्हें लेख का शीर्षक भी पता नही
टीकाकार बन गए थे कौवे
कोयलें चुप थीं।

उस बड़े मैदान में
सुनहरे कल के सपने
प्यासों के आगे
बिसलेरी बोतलों के समान
उछाले जा रहे थे,
परंतु जो सपना उठा लाया
वह रात भर सो न सका
उसे याद आ गया था
माटी बने पुल की नींव से
कमीशन खोद कर निकालना है,
उसने भी माइक पर
ईमान की कसम दोहराई थी
रोज गीता–कुरआन पर
हाथ रख कर,
झूठी गवाहियाँ देने वाला दिल
व्याकुल रहता कब तक?

वह उठा और
माटी के पुल के रास्ते चल पडा
उस समय तक सभी सियार
जश्न का खुमार उतरने के बाद
शेर की खाल ओढ़ रहे थे,
रोज़मर्रा समान
निजी लाकरों और स्विस बैंकों के
दफ्तर भी खुल चुके थे।

(रफत आलम)

अगस्त 25, 2011

कितना ज़रूरी है सह-अस्तित्व पर चलना

भ्रष्टाचार
भौतिकवाद का लाडला परपोता है
जबकि पूंजीवाद इसका बेटा
और उपभोक्तावाद
भौतिकवाद का पोता है।

इतनी पीढ़ियों तक
जिस भौतिकवाद ने
अपने पांव जमा दिए हों
तो सोचो ज़रा
बाप, दादा, परदादा के होते
क्या तुम इस लाडले परपोते
भ्रष्टाचार के पांव उखाड़ सकते हो?

यह तुम कैसे भूल गए कि
तुम भी तो उस
राजा परीक्षित की संतान हो
जिसने कलियुग यानी
मशीनीयुग संपन्न भौतिकवाद को
अपने मुकुट पर जगह देकर
इसे सम्मानित, सुशोभित किया था।

इसके असर का जादू तो
तुम पर भी सिर चढ़कर बोलता है
एक चेतन पुरुष ने भी तो
सही कहा था कि
भौतिकवाद का चहेता पूँजीवाद
अपने नए नए रुप बदलकर
इन्सान को छलने के लिए शोषण के
नए नए तरीकों के साथ आता है।

उपभोक्तावाद हमारे युग का वही चेहरा है
जिसे भौतिकवाद की संतान पूंजीवाद ने
तुम्हे रिझाने के लिये
मैदान में उतारा है
और तुम उपभोक्तावाद से
ऐसे ही आकर्षित होते हो
और ऐसे ही नाचते हो
जैसे मदारी बन्दर को नचाता है
फिर भ्रष्टाचार से शिकायत कैसी और क्योँ?

यह तो बेचारा उसी उपभोक्तावाद का
बच्चा ही तो है
उपभोक्तावाद की न रूकने वाली प्रतिस्पर्धा में
तुम्हारा तो केवल
एक ही लक्ष्य है
प्रतिस्पर्धा यानि अपने पड़ोसी और
दूसरे लोगों से
तुम आगे रहना चाहते हो।

प्रतिस्पर्धा,
उपभोक्तावाद का ऐसा करिश्माई जादू है
जो हर व्यक्ति के
सर चढ़कर बोलता है
अगर तुम्हारे पडोसी के पास
मारूति ८०० है तो तुम
मारुति स्विफ्ट खरीदकर ही दम लोगे
उसके पास चार कमरे है तो तुम
आठ कमरे बनाकर ही छोड़ोगे
जब हर व्यक्ति प्रतिस्पर्धा के
चक्रब्यूह में फसा हुआ है तो
क्या भ्रष्टाचार पर किसी
जादुई छड़ी से अंकुश लगेगा
या फिर क़ानून बनाने से
कानून को लागू करने वाले और
उसपर अमल करने वाले
क्या आसमान से टपकेंगे
वे भी तो तुम्ही में से होंगे

इसलिए व्यक्ति सुनो!
जिस दृढ़ता के साथ
कलियुग यानि भोतिकवाद के मशीनीयुग ने
इस पृथ्वी पर अपना पांव जमाया है
क्या तुममे इतना धैर्य और दृढ़ता है
जो इस पांव को निष्प्रभाव कर सके, उखाड़ सके
अभी ऐसा नहीं लगता
फिर भी यदि कोई
ईमानदारी से
इस मज़बूत पांव उखाड़ने की
अपनी सोच में भी
नियत रखता है तो
वह व्यक्ति इसलिए ईमानदार है कि
उपभोक्तावाद उसे अभी
अन्धा और निष्क्रिय नहीं कर पाया
और उसकी चेतना जिंदा है।

यह जानते हुए कि
जीवन का अहसास
वस्तु से नहीं
चेतना से है
और प्रतिस्पर्धा–
एक व्यक्ति से
दूसरे व्यक्ति के बीच का
वह फासला है
जो उन्हें नज़दीक नहीं आने देता
और जिस दिन तुम
यह अहसास कर लोगे कि
यह फासला स्वाभाविक नहीं बल्कि कृत्रिम है
उस दिन तुम
प्रतिस्पर्धा की अन्धी दौड़ से
बाहर निकलकर
अपनी जीवनयात्रा के
सहयात्रियों का बारी बारी हाथ पकड़कर
इस जीवनयात्रा को
सुखमय बना दोगे
और इस तरह तुम
सह-अस्तित्व के पथ पर
चलते हुए
जीवन को जीवन की तरह
जीते हुए
इसे सार्थक कर दोगे!

(अश्विनी रमेश)

अगस्त 17, 2011

मुनादी…(धर्मवीर भारती)

सत्तर के दशक में डा. धर्मवीर भारती द्वारा लिखी कविता “मुनादी” उस समय की घटनाओं से प्रेरित थी पर किसी भी दौर में जब जब सत्ता निरंकुशता की ओर बढ़ेगी और जनता से कोई आगे आकर सत्ता की असंवेदनशीलता के खिलाफ आवाज उठायेगा तब-तब “मुनादी“-कविता, प्रासंगिक हो जायेगी। आज के हालात में भी “मुनादी” सटीक बैठती है। बार-बार “मुनादी” का सतह पर आना इसके कालजयी रचना होने का प्रमाण है।

खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगह किया जाता है
कि खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से
कुंडी चढा़कर बन्द कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें
क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है

शहर का हर बशर वाकिफ है
कि पच्चीस साल से मुजिर है यह
कि हालात को हालात की तरह बयान किया जाए
कि चोर को चोर और हत्यारे को हत्यारा कहा जाए
कि मार खाते भले आदमी को
और असमत लुटती औरत को
और भूख से पेट दबाये ढाँचे को
और जीप के नीचे कुचलते बच्चे को
बचाने की बेअदबी की जाये

जीप अगर बाश्शा की है तो
उसे बच्चे के पेट पर से गुजरने का हक क्यों नहीं ?
आखिर सड़क भी तो बाश्शा ने बनवायी है !
बुड्ढे के पीछे दौड़ पड़ने वाले
अहसान फरामोशों ! क्या तुम भूल गये कि बाश्शा ने
एक खूबसूरत माहौल दिया है जहाँ
भूख से ही सही, दिन में तुम्हें तारे नजर आते हैं
और फुटपाथों पर फरिश्तों के पंख रात भर
तुम पर छाँह किये रहते हैं
और हूरें हर लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी
मोटर वालों की ओर लपकती हैं
कि जन्नत तारी हो गयी है जमीं पर;
तुम्हें इस बुड्ढे के पीछे दौड़कर
भला और क्या हासिल होने वाला है ?

आखिर क्या दुश्मनी है तुम्हारी उन लोगों से
जो भलेमानुसों की तरह अपनी कुरसी पर चुपचाप
बैठे-बैठे मुल्क की भलाई के लिए
रात-रात जागते हैं;
और गाँव की नाली की मरम्मत के लिए
मास्को, न्यूयार्क, टोकियो, लन्दन की खाक
छानते फकीरों की तरह भटकते रहते हैं…
तोड़ दिये जाएँगे पैर
और फोड़ दी जाएँगी आँखें
अगर तुमने अपने पाँव चल कर
महल-सरा की चहारदीवारी फलाँग कर
अन्दर झाँकने की कोशिश की

क्या तुमने नहीं देखी वह लाठी
जिससे हमारे एक कद्दावर जवान ने इस निहत्थे
काँपते बुड्ढे को ढेर कर दिया ?
वह लाठी हमने समय मंजूषा के साथ
गहराइयों में गाड़ दी है
कि आने वाली नस्लें उसे देखें और
हमारी जवाँमर्दी की दाद दें

अब पूछो कहाँ है वह सच जो
इस बुड्ढे ने सड़कों पर बकना शुरू किया था ?
हमने अपने रेडियो के स्वर ऊँचे करा दिये हैं
और कहा है कि जोर-जोर से फिल्मी गीत बजायें
ताकि थिरकती धुनों की दिलकश बलन्दी में
इस बुड्ढे की बकवास दब जाए

नासमझ बच्चों ने पटक दिये पोथियाँ और बस्ते
फेंक दी है खड़िया और स्लेट
इस नामाकूल जादूगर के पीछे चूहों की तरह
फदर-फदर भागते चले आ रहे हैं
और जिसका बच्चा परसों मारा गया
वह औरत आँचल परचम की तरह लहराती हुई
सड़क पर निकल आयी है।

ख़बरदार यह सारा मुल्क तुम्हारा है
पर जहाँ हो वहीं रहो
यह बगावत नहीं बर्दाश्त की जाएगी कि
तुम फासले तय करो और
मंजिल तक पहुँचो

इस बार रेलों के चक्के हम खुद जाम कर देंगे
नावें मँझधार में रोक दी जाएँगी
बैलगाड़ियाँ सड़क-किनारे नीमतले खड़ी कर दी जाएँगी
ट्रकों को नुक्कड़ से लौटा दिया जाएगा
सब अपनी-अपनी जगह ठप
क्योंकि याद रखो कि मुल्क को आगे बढ़ना है
और उसके लिए जरूरी है कि जो जहाँ है
वहीं ठप कर दिया जाए

बेताब मत हो
तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गूल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है
बाश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से
तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए
बाश्शा के खास हुक्म से
उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा
दर्शन करो !
वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी
बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी
ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा
नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा
और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा
लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में
और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो
ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से
बहा, वह पुँछ जाए

बाश्शा सलामत को खूनखराबा पसन्द नहीं

अगस्त 10, 2011

भ्रष्टाचार की परिभाषा

भ्रष्टाचार के विरुद्ध
जंग लड़ने से पहले
स्पष्ट करना होगा
भ्रष्टाचार का अर्थ
तय करनी होगी इसकी परिभाषा
ताकि भूखा, नंगा और
खुले आसमान के नीचे
सोने वाला इन्सान कहीं
भ्रष्टाचार के अर्थ की
गिरफ्त में न आ जाए
और यदि ऐसा हुआ तो
प्रकृति-रुप सत्य पर भी
लग जाएगा प्रश्नचिन्ह
क्योंकि
भूखा, नंगा और बेघर व्यक्ति
यदि दिन रात मेहनत कर
रोटी, कपड़ा और मकान न कमा पाया
तो होगा सत्य-प्रकृति और
उसके अंश इन्सान पर
घोर अन्याय क्योंकि
रोटी, कपड़ा और मकान
इन्सान की वह कुदरती जरूरत है
जो उसे शरीर मिलने के साथ मिली है
शरीर प्रकृति का अंश है
शरीर टूटेगा तो
प्रकृति-नियम के प्रति
अन्याय होगा क्योंकि
शरीर प्रकृति है
भूखे नंगे और बेघर इन्सान को
इन्सान ही रहने दो
मेहनत करने का उसका हक
और मेहनत करके
कमाए जाने वाले
रोटी, कपड़ा और मकान को
उससे छिनने का प्रयास न करो
वर्ना वह डाका डालेगा और
चोरी भी करेगा
और तुम उसे भी
भ्रष्टाचारी कहोगे क्योंकि
तुमने अपने समर्थन में
जोड़ना है हर व्यक्ति
ताकि बड़ी भीड़ में
तुम्हे कोई आसानी से पहचान न सके
लेकिन याद रखो कि
भूखा. नंगा और बेघर आदमी
अपना शरीर तो बेच सकता है
अपनी आत्मा नहीं
कभी नहीं
वह बिके हुए शरीर होते हुए भी
तुमसे लाख दर्ज़े अच्छा है
क्योंकि उसने अभी तक भी
तुम्हारी तरह अपनी आत्मा नहीं बेचीं
और यह भूल जाओ कि
प्रकृति नियम
तुम्हारी भ्रष्टाचारी के रुप में
पहचान करने में असमर्थ होंगे
प्रकृति में
भूख और वासना का स्वरुप
स्वतः निर्धारित है
और तुम्हारा निर्दयी अन्त
तुम्हारी अपनी ही वासना से होगा
सत्य हमेशा सत्य ही रहेगा
क्योंकि भूख सत्य है
वासना नहीं
और तुम आज भी
हारे हुए हो
और कल भी
क्योंकि तुम वासना यानि
असत्य के रास्ते पर हो
और असत्य की हमेशा
हार होती है और
सत्य की हमेशा जीत !

(अश्विनी रमेश)

मई 15, 2011

साइकिल वाले खान साहब

खान साब सहायक से उप-सचिव पद पर सचिवालय के मलाईदार खान विभाग में पदोन्नत हुए तो सभी पड़ोसियों को एक जिज्ञासा होनी लाज़िमी थी कि सदा से साइकिल पर चलने वाले और मोबाइल जैसी सुविधाओं से परहेज़ करने वाले खान साब क्या अब अपनी सादा जीवन शैली में परिवर्तन करेंगे, या पहले जैसे सीधे सरल और ईमानदार बने रहेंगे?

खान साब की पत्नी अलबत्ता दुनियादार महिला थीं। इस चमचमाहट के दौर में खान साब जैसा सादा-सरल पति पाकर कुंठा से ग्रसित रहती थीं। घर में ऐशो-आराम की आधुनिक सुविधाए नहीं होने का उन्हें बड़ा मलाल था और इसका सारा दोष वे अपने पति की ईमानदारी को दिया करती थीं।

खान साब की पदोन्नति के बाद जल्दी ही उनकी पत्नी ने आस-पड़ोस की महिलाओं को अपने पति से जुडा एक रोचक किस्सा सुना भी दिया।

“कल तो इनके साथ अच्छा हुआ। ये तो आदत के मुताबिक छुट्टी होते ही ऑफिस से ६ बजे निकल आये। सैक्रेटरी साब ने तलब कर लिया। जनाब न तो घर में फोन लगाते हैं न मोबाइल रखते है सो खूब झाड पड़ी”।

पदोन्नति के एक महीने के अंदर ही खान साब ने अचानक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली तो सब पडोसियों और इस बार तो उनकी पत्नी तक का चौंकना वाजिब था।

उनकी पत्नी ने बताया कि आज तो खान साब नौकरी भी छोड़ आये। सवेरे देर तक बिस्तर में पड़े रहे थे।

कहने लगीं,” मैंने पूछा, जी आज ऑफिस नहीं जाओगे, तो फरमाने लगे, बेगम! हमने इस्तीफा दे दिया है”।

“जैसे नौकरी भी अखबार हो, पढ़ा तो पढ़ा नहीं तो उलट के पटक दिया। ऊपर से ज़रा भी अफ़सोस नहीं। जनाब आराम से अखबार पढ़ रहे थे। मैंने भी ऐसी क्लास ली कि खाना भी नहीं खाया देर तक। जी तो चाहा भूखा ही मरने दूं। पर क्या करूँ बहिन! मन मार कर रोटी खिलानी पड़ी। खूंटे बंधे जानवर को भी भूखा नहीं रखा जाता। फिर ये तो जैसे हैं वैसे ही हैं। क्या किया जाए”?

“किस्मत ही फूटी है जो इन जैसे करमनिखट्टू के पल्ले बंधी। घर में दो बेरोजगार बेटे छाती पर मूंग दल रहे हैं। अरे! नौकरी में रहते बेटी के हाथ ही पीले कर देते। शासन सचिव के रुतबे में ढंग का लड़का तो मिल जाता। ज़रा भी नहीं सोचा बुद्धू जी ने”। वे सर पकड़ कर बैठ गयीं।

खान साब चूँकि आपने आप तक ही सीमित रहते थे, इसलिए इस्तीफे देने के कारण का तसल्लीबख्श जवाब मिलना असंभव सा लगता था। फिर भी एक शाम बतौर संवेदना उनके घर जाकर बातों के दौरान झिझकते हुये पूछ ही लिया,” भाई साहब! ऐसा क्या हुआ कि आपने अचानक इस्तीफा दे दिया”?

जनाब, सवाल उछालने भर की देर थी कि जैसे बरसों से कैद किसी तड़क गयी चट्टान से लावा फूट पडा हो।

“यार! सब साले बेईमान हैं, कब तक सहन करता? देखो प्रमोशन दे के क्या अहसान किया, कुँए से खाई में पटक दिया। खान विभाग तो भाई डाकुओं का अड्डा निकला”।

तीसरे दिन ही सचिव साब ने तलब किया और कहने लगे,” खान! ये फलां फलां फाइलें है इनमें मंत्री महोदय का इनट्रेस्ट् है, ज़रा देख लेना”।

आगे की बेहयाई तो देखो, खुद मेरा असिस्टेंट फाइल के साथ रिश्वत लेकर हाज़िर। पहले तो दुनिया भर की बातें करता रहा फिर बेशर्म हंसी के साथ कहने लगा,” हें ..हें ..हें साब ये लिफाफा आपके प्रमोशन पर, बतौर गिफ्ट फलां साहब ने भिजवाया है. सर! एक लाख रूपये हैं”।

फिर साले ने उसी गंदी बनावटी हंसी के साथ सलाह भी दे डाली,” हें…हें …हें वैसे भी तो अपने को फ़ाइल निकालनी है ना साब, सो कुछ हाथ पल्ले आ रहा है तो बुरा क्या है?”

खान साब बिफ़र रहे थे,” यार! क्या ऐसा भी वक्त देखना लिखा था। जी तो चाहा हरामखोर की गर्दन मरोड़ दूं पर फटकार लगाने के सिवा क्या कर सकता था”।

चलो यार! यहाँ तक भी सब्र था लेकिन रोज सचिव के उलहानों और मंत्री के पी.ए. का फोन पर बार-बार तकाजा, खोपड़ी ही आऊट हो रही थी। बताओ, कैसे सिफारिश कर देता करोडों की खानें लाखों में अलॉट करने की। भाई! साली, हद तो तब हो गई जब लंच में खुद पार्टी हाज़िर मेरे उसी नालायक असिस्टेंट के साथ। साला! पच्चीस लाख ब्रीफकेस में लाकर सीधी रिश्वत देना चाह रहा था। पहले तो राज़ी-राज़ी समझा कर रवाना करना चाहता था। मोटी चमड़ी वाले नहीं माने तो आखिर एंटीकरप्शन विभाग बुलाने की धमकी देकर कमरे से निकाला।

बेईमानों का हौसला तो देखो उलटे मुझी को तड़ी दे गए कि मैं क्या एंटीकरप्शन विभाग बुलवाऊँगा वे लोग ही कुछ दिन में मुझे सीखचों के पीछे भिजवा देंगें।

भाई! मैं सकते में आ गया था सब लोगों की मिलीभगत देखकर। एक काल्पनिक परन्तु आज के कुँए में भाँग पड़ी वाले बेईमान दौर में, कभी भी सच हो सकने वाला मंज़र, जिसमें मैं जेल में बैठा हूँ, आँखों के सामने लहरा गया था। क्या बताऊँ उस वक्त की कैफियत।

रोज़ मर्रा के हिसाब से मुझे परेशान करने लगे। मैं सोचता रहता कि क्या करूँ? आखिर अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर उन फाइलों पर जो वाजिब टिप्पणियाँ होनी चाहिए थीं दर्ज कर दीं। फिर कागज़ उठाया और इस्तीफा लिख, दस्तखत कर सैक्रेटरी महोदय को पेश कर आया। ज़िंदगी ने दुःख तो कई और भी दिए हैं पर सबसे बड़ा अफ़सोस यही है कि किसी ने नहीं टोका मुझे। दफ्तर में कोई नहीं बोला कि पकी-पकाई नौकरी क्यों छोड़ रहा हूँ?

बोलते-बोलते खान साब की आवेश पूर्ण आवाज़ स्वतः ही धीमी होती चली गयी थी। अचानक लंबी साँस लेकर वे चुप हो गए। गीली हो गयी थीं उनकी आँखे।

अक्सर शहर के रास्तों पर चौपहिया वाहनों और मोटर साइकिलों के रेल-पेल में खान साब दिखायी दे जाते हैं अपनी साइकिल पर सवार। ऐसा लगता है उन्हे देख कि आज भी उनकी आँखें गीली हैं।

(रफत आलम)

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जिंदगी से बड़ी सजा  ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बंट गया हूँ मैं
अपने हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
जिंदगी मौत  तेरी  मंजिल है
दूसरा  कोई  रास्ता  ही  नहीं
सच घटे या बढे तो सच न रहे
झूठ की कोई इन्तेहा ही  नहीं
जड़ दो चांदी में चाहे सोने में
आइना  झूठ  बोलता ही  नहीं  (कृष्ण बिहारी नूर)

मई 2, 2011

ख्वाब इंकलाब का

फिर आ रही है इंकलाब की सदाएं फिर दौर ले रहा है अंगड़ाई
दूर हैं अभी इन्साफ-तलबों की आहटें के कांपने लगे हैं आततायी
काल धन खुद उगलेंगे बरसों से जनता का हक डकारते अजगर
काला बाजारियों के गोदाम जब लुटेंगे खुद मिट जायगी मंहगाई

इस ख्वाब की ताबीर के लिए आँखों की बेदारी दरकार है अभी
लाखों झूठ के फंदे कटने है जनता वहम में गिरिफ्तार है अभी
झूठ के साथी ले आये है कोई सी.डी किसी के महल का ब्यौरा
बेईमानी उजागर करने वाले दामनों पर धब्बों की मार है अभी

बात ये नहीं यारों कौन चोर कौन साहूकर है बात नीयत की है
हम सबके विवेक का इम्तेहान होना है आज फैसले की घडी है
उठ कर कहो हमें हर हाल देश की अकूत लूट का हिसाब चाहिए
बताओ, बताओ रहनुमाओ बताओ काली दौलत कहाँ पर गड़ी है

कुछ ही सीखचों के पीछे जाए और बात खत्म ये न होने देना
पाई पाई का जब तक ना मिले हिसाब न सोना न सोने देना
भ्रष्टाचार को मिटा कर ही दम लेना है कसम मुल्क की तुम्हे
ईमान के इन्साफ का अवसर हाथ आया है इसे न खोने देना

(रफत आलम)

मई 1, 2011

भ्रष्टाचार का प्राइमरी स्कूल

जन्म लेते ही बेईमान बना रहा है बाप
बच्चे को लाके हराम खिला रहा है बाप
जहर का पला सर्प के सिवा क्या बनेगा
आम की आस में बबूल उगा रहा है बाप

क़र्ज़ बाप के नाम का चुकायेगा ही सही
पैसा दे के आया है घूस खायगा ही सही
नौकरी की पहली ईंट बेईमानी ने रखी है
ये भ्रष्टाचार का महल बनायगा ही सही

(रफत आलम)

अप्रैल 23, 2011

प्राइवेट बनती कॉमन वेल्थ

नेता जी
घर के आगे
एक्सप्रैस रेल रुकवाकर
उतर गए
गुनाह हुआ क्या?

नेता जी की मर्ज़ी से रोज
निम्नस्तरीय गोली, टैंक, तोप, जहाज़
दवाइयां-आपरेशन उपकरण
दस गुना दामों में
खरीदे जा रहे हैं
अंतहीन सूची है अनियमिताओं की।

“कॉमन वेल्थ”
“प्राइवेट’ काली पूँजी बन कर
दफन हो रही है
भ्रष्टाचार के घिनौने अन्धकार में!

नई बात नहीं हैं घोटाले
किसे परवाह है
जनता तो ऊँन उतराती भेड़ है
जिसके मांस पर आखिर
इन कसाइयों का पुश्तैनी हक है

भूख, प्यास, बेघरी और फटेहाली को
मालिक की देन मान कर
लहू–पसीने को बस चिंता है
कैसे शाम की रोटी का जुगाड़ हो
इन किस्मत के मारों को क्या पता
उनके हिस्से की धूप
खुद सूरज खा रहा है।

फैले हुए शापित हाथों के लिए
दान में मिला खाने का पैकेट
कोहिनूर से कम नहीं
कल ही देखना चुनाव् के दिन
ये सभी सर्वहारा
ताड़ी की बोतल या
एक अदद साड़ी के बदले
नेता जी को फिर चुन लायेंगे।

(रफत आलम)

अप्रैल 22, 2011

हॉफ टिकट

चाणक्यपुरी में खड़े खड़े बहुत देर तक उसे ऑटो नहीं मिला तो मोहन, शिवाजी स्टेडियम जाने वाली बस में बैठ गया। विदेशी दूतावास वालों ने उसका दिमाग मथ कर रख दिया था। अगर कम्पनी के काम से विदेश जाना न होता तो वह दूतावास की इमारत में दुबारा कदम भी न रखता पर उसे एक बार और आना पड़ेगा। दूतावास के कर्मचारियों का व्यवहार बेहद घटिया था। अपना नम्बर आने के इंतजार में बैठे हुये वह सोचता रहा था कि विदेशी दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी ऐसा क्यों सोचते हैं कि भारत से बाहर जाने वाले सभी अपराधी ही हैं और गलत कागजों के सहारे ही बाहर जा रहे होंगे? विदेशी कर्मचारी तो एकतरफ, इन विदेशी दूतावासों में काम करने वाले भारतीय कर्मचारी भी बेहद कर्कश पाये जाते हैं और वे घटिया तरीके से भारतीयों के साथ व्यवहार करते हैं।

बस में चढ़ते ही उसने शिवाजी स्टेडियम के लिये टिकट ले लिया। उसने सौ का नोट कंडक्टर को दिया तो उसने उसे बाकी पैसे कुछ देर में देने के लिये कहा और बस के कनॉट प्लेस के क्षेत्र में घुसने से पहले ही पैसे दे भी दिये। बस में भीड़ थी और सारी यात्रा खड़े हुये ही करनी पड़ी थी। रास्ते भर लोग चढ़ते उतरते रहे और इस आवागमन के कारण वह बस के दरवाजे से बस के मध्य में पहुँच गया।

बस शिवाजी स्टेडियम जाकर रुकी तो कंडक्टर ने लोगों को नीचे उतारने की जल्दी मचा दी जबकि लोग खुद ही उतरने के लिये रेलेपेल मचाये हुये थे। कंडक्टर आगे के दरवाजे से लोगों को उतरने का निर्देश बार बार दे रहा था और पीछे के दरवाजे पर खड़े अपने सहायक को चिल्ला चिल्ला कर निर्देशित कर रहा था नयी सवारियों को वहाँ से बस में चढ़ाने के लिये।

मोहन भी उतरने लगा और बस की सीढ़ियाँ उतरते हुये उसने टिकट फाड़ा और उसका आधा हिस्सा जमीन पर गिर कर हवा के साथ उड़ गया और नीचे का आधा हिस्सा उसके हाथ में रह गया। उसने जमीन पर पैर रखे ही थे कि एक प्रौढ़ व्यक्ति ने उससे कहा,” टिकट दिखाइये”।

मोहन ने अब उस व्यक्ति पर ध्यान दिया। पुलिस के एक सिपाही के साथ खड़ा प्रौढ़ उससे टिकट माँग रहा था। शर्तिया प्रौढ़ ने उसे उतरते हुये टिकट फाड़ते हुये देखा होगा।

मोहन ने उसे टिकट का आधा हिस्सा दे दिया। प्रौढ़ ने टिकट अपने हाथ में लिया और उसे देखा और कहा कि यह वेलिड टिकट नहीं है। कंडक्टर भी मोहन के साथ नीचे उतर आया था।

प्रौढ़ ने मोहन से कहा,”इधर साइड में खड़े हो जाओ”। मोहन के बाद 5-6 लोग और उतरे। एक आदमी ने अपना टिकट एकदम मसला हुआ था। प्रौढ़ ने उसका टिकट उसके हाथ में दूर से ही देखा और उसे जाने दिया।

मोहन ने प्रौढ़ से पूछा,” टिकट वेलिड क्यों नहीं है, अभी आपके सामने इस बस से मैं उतरा हूँ, रास्ते में टिकट खरीदा है”?

प्रौढ़ ने कहा,” हमें कैसे पता चलेगा आधे टिकट से कि यह अभी का है और यात्रा के पूरे पैसे दिये गये हैं या सही टिकट लिया गया है”।

सही टिकट? आप कंडक्टर से पूछिये, मैं चाणक्यपुरी से चढ़ा, इनसे शिवाजी स्टेडियम का टिकट माँगा और इन्होने जो टिकट दिया और जितने पैसे माँगे मैंने दिये और टिकट लिया”।

पास खड़े कंडक्टर ने स्वीकृति में सिर हिलाया। प्रौढ़ ने कंडक्टर की ओर देखा भी नहीं और उसे वहाँ से हटने के लिये हाथ से इशारा किया और मोहन से कहा,” हमें इस बात से मतलब नहीं, हमें तो यहाँ पूरा और वेलिड टिकट चाहिये”।

बस पुनः सवारियों से भर चुकी थी और ड्राइवर ने तेज आवाज में हॉर्न बजाया और कंडक्टर को आवाज लगायी चलने के लिये।

कंडक्टर, सरकारी अधिकारी और मोहन को देखते हुये पिछले दरवाजे से बस में चढ़ गया और उसने सीटी मारकर ड्राइवर को चलने का संदेश दिया। बस चल दी।

मोहन को कुछ आभास हो गया कि प्रौढ़ अधिकारी उसे फँसा रहा है। कंडक्टर ही उसका गवाह था और वह चला गया था।

देखिये मैं आपको बता चुका हूँ कि मैंने चाणक्यपुरी से टिकट लिया और पूरे पैसे कंडक्टर को दिये। उसे आपने रोका नहीं वरना वह आपको सच बता देता।

हमें सुनना ही नहीं कंडक्टर से कुछ भी। हमें वेलिड टिकट दिखा दो।

टिकट तो आपको दिया अभी। बस से उतरते समय आधा फाड़ दिया था। बस में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था कि यात्रा के पूरा होने पर टिकट को नष्ट कर दें जिससे उसका दुरुपयोग न होने पाये।

हमें बस के अंदर से मतलब ही नहीं। हमें तो यहाँ की गयी यात्रा के लिये वेलिड टिकट चाहिये।

अब मैं टिकट का दूसरा हिस्सा कहाँ से खोजूँगा।

आपने बिना टिकट यात्रा की है।

बताया तो आपको कि चाणक्यपुरी से टिकट लिया था।

हमें क्या पता कि आप चाणक्यपुरी से ही चढ़े थे? क्या पता आप किसी पहले के स्टॉप से चढ़े हो? हौज़ खास से आये हो? अपनी यात्रा की वैधता के लिये वेलिड टिकट दो।

कंडक्टर को तो आपने भगा दिया। वही तो बता सकता था कि मैं चाणक्यपुरी से ही चढ़ा और वहीं से टिकट लिया। वैसे मुझे ऐसा लग रहा है कि अगर मेरे पास पूरा टिकट भी होता तब भी आप यह बात कहते कि आपको कैसे पता कि मैं कहाँ से चढ़ा था और क्या वाकई मैंने सही टिकट लिया था?

“आपने बिना टिकट यात्रा की है”। नाक पर नीचे खिसक आये चश्मे को ऊपर खिसकाते हुये प्रौढ़ ने दोहराया।

ऐसे कैसे बिना टिकट के यात्रा की है।

आप पर बिना टिकट यात्रा करने का केस हो सकता है।

प्रौढ़ ने सिपाही की ओर देखा।

सिपाही मोहन के पास आ गया और फुसफुसाते हुये कहा,” सौ रुपये देकर रफा दफा करो मामला”।

मुझे ऐसा लग रहा है आप मुझे जानकर फंसा रहे हैं।

प्रौढ़ अपनी जेब टटोलने लगा और जेब से पान निकालकर उसने खा लिया।

सिपाही ने फिर मोहन से धीरे से कहा,” मामला न बढ़ाओ, चुपके से सौ रुपये दो और खिसको”।

मोहन ने सिपाही की बात पर ध्यान नहीं दिया और प्रौढ़ से कहा,” वहाँ नियंत्रण कक्ष में चलिये, उस बस का नम्बर पता चल जायेगा। मैं तैयार हूँ वापिस उसी बस के यहाँ तक आने के लिये। कंडक्टर बता देगा सही बात”।

प्रौढ़ ने मुँह बिचका कर कहा,” हम यहाँ सारा दिन तो बैठे नहीं रहेंगे।”

मैंने देखा कि एक कुचले मसले हुये टिकट पर आपने कोई आपत्ति नहीं की और यात्री को जाने दिया।

हमारे विवेक के ऊपर है। हमें लगा उसका टिकट सही था। आपका नहीं हैं।

एक बस चलने को तैयार थी। प्रौढ़ उसमें सवार होने लगा और सिपाही से उसने मोहन को साथ लेने के लिये कहा।

सिपाही मोहन को लेकर बस में चढ़ गया।

मोहन ने पूछा,” कहाँ ले जा रहे हैं मुझे”।

हेड आफिस जायेंगे वहीं मामला सुलटेगा।

सिपाही ने मोहन को घूर कर कहा,” अरे साहब को जुर्माने के सौ रुपये दो और जाओ”।

बस रेंग कर चल पड़ी थी। बस अड्डे से निकल कर सड़क पर रेड लाइट पर आकर खड़ी हो गयी।

मोहन ने प्रौढ़ से कहा,” मुझे जबरदस्ती फंसाया जा रहा है। आपको कोटा पूरा करना होगा। मेरे पास टिकट था। चलो मैं जुर्माना देने को तैयार हूँ। काटो कितना जुर्माना लगेगा।”

प्रौढ़ ने गुस्से से उसे घूरते हुये कहा,” हमारे ऊपर है हम जुर्माना लें न लें। हम तो आपको जेल भेज सकते हैं।”

मोहन को भी गुस्सा आ गया,” चलो आप जेल ही भेजो। मैं भी देखता हूँ क्या क्या कर सकते हो। इतनी अंधेरगर्दी नहीं छायी हुई है देश में कि आप जो चाहे सो कर लो। आप जुर्माना बताओ, मैं तैयार हूँ देने के लिये जबकि मेरी गलती नहीं है”।

प्रौढ़ उसे घूरता रहा और कहा,: दौ सौ पचास रुपये जुर्माना है”।

सिपाही ने मोहन से कहा,” अरे क्यों मामला उलझा रहा है, सौ में काम हो रहा है तेरा, दे के सुलटा ले”।

मोहन ने कहा,” ठीक है आप रसीद काटो, मैं दौ सौ पचास रुपये देता हूँ।”

ग्रीन लाइट होते ही बस चल पड़ी थी।

प्रौढ़ ने अपने बैग से रसीद काटने वाली पुस्तिका निकाली और मोहन से कहा,” निकालो दौ सौ पचास”।

इस बस का कंडक्टर और उसमें बैठी सवारियाँ उसकी ओर ऐसे देख रहीं थीं मानो वह कोई अपराधी हो।

मोहन की ऊपरी जेब में दौ सौ रुपये थे उसने निकाले और पर्स उसने हाथ में पकड़े बैग में रखा हुआ था सो उसे खोलने लगा।

सिपाही ने उसके हाथ से दौ सौ रुपये ले लिये।

सिपाही ने कंडक्टर से बस रुकवाने के लिये कहा।

बस के रुकते ही सिपाही ने मोहन को बस से नीचे धकेलते हुये कहा,”चल सुलट गया मामला”। और ड्राइवर को बस चलाने के लिये कहा।

सिपाही के अचानक नीचे धकेलने से मोहन एकदम से संभल नहीं पाया और जब तक वह संभलता बस आगे जा चुकी थी।

उसकी समझ में नहीं आया कि पहले वह अपने को कोसे कि उसने टिकट क्यों फाड़ दिया था या सिपाही और टिकट चैकर को गाली दे जिन्होने उसे फँसाकर लूट लिया था।

उसने गुस्से से जाती हुयी बस को देखा जिसके पीछे लिखी इबारत उसे चिढ़ा रही थी।

यो तो ऐसे ही चलेगी

…[राकेश]

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