Archive for नवम्बर, 2014

नवम्बर 30, 2014

अरी ओ करुणा प्रभामय…अज्ञेय

जियो उस प्यार में जो मैंने तुम्हें दिया हैagyeya
उस दुख में नही जिसे बेझिझक मैने पिया है।
उस गान में जियो जो मैंने तुम्हें सुनाया है,
उस आह में नही जिसे मैंने तुमसे छिपाया है।

उस द्वार से गुजरो जो मैंने तुम्हारे लिए खोला है
उस अंधकार से नहीं जिसकी गहराई को
बार बार मैंने तुम्हारी रक्षा की भावना से टटोला है।

वह छादन तुम्हारा घर हो
जिसे मैं असीसों से बुनता हूँ, बुनूँगा,
वे काँटेगोखतो मेरे हैं
जिन्हें मैं राह से चुनता हूँ, चुनूँगा।

वह पथ तुम्हारा हो
जिसे मैं तुम्हारे हित बनाता हूँ, बनाता रहूँगा,
मैं जो रोड़ा हूँ, उसे हथौड़े से तोड़तोड़
मैं जो कारीगर हूँ, करीने से
सँवारता सजाता हूँ, सजाता रहूँगा।

सागर के किनारे तक
तुम्हें पहुँचाने का
उदार उद्यम मेरा होः
फिर वहॉ जो लहर हो, तारा हो,
सोनतरी हो, अरुण सवेरा हो,
वह सब, ओ मेरे वर्ग !
तुम्हारा हो, तुम्हारा हो, तुम्हारा हो।

(अज्ञेय)

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नवम्बर 24, 2014

नखशिख… (अज्ञेय)

agyeyaतुम्हारी देह
मुझको कनकचम्पे की कली है
दूर से ही स्मरण में भी गंध देती है
(रूप स्पर्शातीत वह जिसकी लुनाई
कुहासेसी चेतना को मोह ले)

तुम्हारे नैन
पहले भोर की दो ओस बूँदें हैं
अछूती, ज्योतिमय, भीतर द्रवित।
(मानो विधाता के हृदय में
जग गई हो भाप कणा की अपरिमित)

तुम्हारे ओठ
पर उस दहकते दाड़िम पुहप को
मूक तकता रह सकूँ मैं
(सह सकूँ मैं ताप उष्मा को
मुझे जो लील लेती है।)

 

[अज्ञेय]

नवम्बर 24, 2014

महात्मा गांधी और वसुधैव कुटुम्बकम : इटेलियन स्टाइल

धार्मिक प्रतीकों से अलग हटें तो पूरी दुनिया में जिस भारतीय का नाम सबसे ज्यादा जाना जाता है और जिस एक भारतीय को पूरी दुनिया सम्मान देती है, और अपनी नै पीढ़ी को जिसके बारे मने लगातार जाग्रत बनाए रखती है उस शख्सियत का नाम गांधी है|

इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य को, कि भारत में ऐसे वर्ग भी हैं जो गांधी से घृणा तक करते रहे हैं,  नजरअंदाज करें तो हर उस भारतीय के लिए जिसे गांधी में थोड़ी सी भी दिलचस्पी है, इटेलियन विज्ञापन एक सुखद एहसास लेकर आता है|

नवम्बर 21, 2014

विलक्षण बाल-गायिका और ‘कुमार विश्वास’

१९ नवंबर को किसी ने कविता के मंच के प्रसिद्द हस्ताक्षर और आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास को नीचे दिये वीडियो का लिंक भेजा |

 

बालिका की विलक्षण गायन प्रतिभा से कोई संगीत प्रेमी प्रभावित न हो ऐसा संभव ही नहीं है| हर संगीत प्रेमी को लगेगा कि यह बालिका सही प्रशिक्षण पाकर संगीत की ऊँचाइयों को प्राप्त करेगी पर ऐसा होना सबके साथ संभव नहीं होता| कुमार विश्वास भी बालिका के गायन से प्रभावित हुए पर जब पता चला कि इस बालिका का परिवार संभवतः आर्थिक रूप से समर्थ नहीं है तो बहुतों की तरह उन्हें भी भय लगा कि इस अनूठी बाल-गायिका का संगीत कहीं गरीबी के कारण दम न तोड़ दे| तब उन्होंने नीचे दिया सन्देश लिखा|

“कुछ ऐसे फूल हैं जिन्हे मिला नहीं माहौल ,
महक रहे हैं मगर जंगलों में रहते हैं…..!”
किसी ने ये विडिओ भेजा है ! उनके अनुसार विडिओ में दिख रही बच्ची घरेलु सहायक का काम करती है ! दस बार सुन चुका हूँ और आखँ की कोर हर बार भीग रही है ! आप में से कोई अगर इस बेटी का अता-पता निकाल सके तो बड़ी कृपा होगी ! माँ सरस्वती साक्षात इस शिशु-कंठ पर विराजमान है ! जीती रहो स्वर-कोकिला ! बस ये मिल जाये तो इसे सर्वोत्तम शिक्षा और साधना का ज़िम्मा मेरा ! ढूँढो दोस्तों अगली सम्भावना को !

 

सन्देश ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सअप के माध्यमों से लाखों लोगों तक पहुंचा| और बालिका की खोज सम्पन्न हुयी| कुमार विश्वास अपने वादे के मुताबिक़ बालिका के अच्छे भविष्य के लिए प्रयासरत हैं|

 

आद्य शकराचार्य की आविर्भाव भूमि केरल के एक तटीय गावँ में नन्ही जयलक्ष्मी मिल गयी है ! शाम तक उसके माता-पिता से बात भी हो जाएगी ! सब कुछ ठीक रहा तो कुछ ही दिन में, माँ शारदा की यह नन्ही-बेटी विधिवत संगीत-शिक्षा ग्रहण कर रही होगी ! कोशिश करूँगा कि किसी चैनल में उस पर एक शो भी बनवाऊँ ! आभार कोमल,राजश्री और मनोज का इस खोज को अंजाम तक पहुँचाने के लिए
“हर फूल को हक़ है कि चमन में हो क़ामयाब ,
माली को भी ये फ़र्ज़ मगर याद तो रहे.…।”

 

 

 

नवम्बर 21, 2014

भारतीय प्रधानमंत्रियों की विदेश यात्राओं का सूत्र : शरद जोशी

देश के लिए यह सौभाग्य की बात है या दुर्भाग्य की, मगर यह सच है कि भारत के प्रधानमंत्री के पद का दर्जा कुछ महीनों से बहुत तेजी से उठ गया है। जो साधारण सड़कछाप वोटर इस गलतफहमी में थे कि वे अपने लिए एक एमपी या देश का प्रधानमंत्री चुन रहे हैं, उन्हें यह पता लगना चाहिए कि दरअसल उन्होंने एक विश्वनेता चुना था, जो इस समय संसार की समस्याएं सुलझाने में लगा है।

संसार में समस्याएं बहुत अधिक हैं, मगर खेद है कि यह देश अपनी संवैधानिक मजबूरियों के कारण केवल एक प्रधानमंत्री संसार को सप्लाई कर सकता है। काश, हमारे पास चार-पांच प्रधानमंत्री होते, तो हम उन्हें पूरी दुनिया में फैला देते। और तब शायद यह भी संभव होता कि उनमें से एक प्रधानमंत्री हम अपने देश के लिए भी रख लेते, जो असम समस्या, अकाली समस्या, सूखा समस्या, भूखा समस्या टाइप की जो छोटी-मोटी समस्याएं हैं, उनसे माथापच्ची कर लेता। हमारे पास सिर्फ एक प्रधानमंत्री है। इतने सारे देश हैं। उससे जितना बनता है, वही तो करेगा। मुहावरे में कहा जाए, तो अकेली जान क्या-क्या करे! ….

संसार के देश तो चाहते हैं कि हमारे भारत का प्रधानमंत्री पूरे वक्त उनके मुल्कों में ही घूमता रहे और विश्वशांति, परस्पर सहयोग, छोटे देशों की कड़की दूर करने में बड़े देशों का योग आदि नियमित विषयों पर पूरे उत्साह से भाषण देता रहे। अच्छे भाषण सुनना कौन नहीं चाहता! अच्छी अंगरेजी सुनना कौन नहीं चाहता! पर हमारी मजबूरी है कि हमारी प्रधानमंत्री पूरे साल बाहर नहीं रह सकतीं। उन्हें कुछ दिनों देश में भी रहना पड़ता है। लोकसभा का सेशन होता है, कश्मीर में चुनाव आ जाता है। या दीगर ऐसी कुछ बातें हैं, जब भारत के प्रधानमंत्री को भारत में रहना जरूरी है, मजबूरी है। कई बार जवाबी कार्रवाई करने किसी दूसरे देश का प्रधानमंत्री भारत में टपक पड़ता है। तू हमारे देश में भाषण देगा, तो हम तेरे देश में भाषण देंगे बदले की भावना के साथ। उस समय उसका स्वागत तथा दीगर औपचारिकताएं बरतने भारत के प्रधानमंत्री को भारत लौटना पड़ता है। …

भारत का प्रधानमंत्री ऐसी ऊंची चीज है कि वह अब दुनिया का नेता है। वह भारत के काम का नहीं रहा। एक तो ऐसी टुच्ची देसी समस्याओं में उसका माइंड खराब करवाना भी ठीक नहीं है। अगर चाहते ही हो कि भारत का प्रधानमंत्री भारत की समस्या पर ध्यान दे, तो समस्या का लेवल उठाओ। उसे इतनी बड़ी बनाओ कि वह भारत के प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित करने के काबिल लगे। आप चाहते हो कि बंबई की कपड़ा मिलें बंद पड़ी हैं, तो भारत का प्रधानमंत्री उस छोटी-सी बात में लगा रहे। फिर तीसरी शक्ति के देशों की ओर पहली और दूसरी शक्ति का ध्यान कौन चौथी शक्ति खींचेगी, अगर प्रधानमंत्री की एनर्जी बंबई के मजदूरों पर सोचने में चली गई। समस्या का स्तर उठाओ। जब तक वह अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का दर्जा नहीं प्राप्त कर लेती, तब तक कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का नेता उर्फ भारत की प्रधानमंत्री उस पर कैसे ध्यान देंगी?

दूसरा तरीका यह है कि आपस में निपट लो। शांति और सद्भाव से निपटो, तो अच्छी बात है। नहीं, तो कोई जरूरी नहीं, क्योंकि ये चीजें तो अंतरराष्ट्रीय मामलों में जरूरी होती हैं। जैसे चाहो निपट लो। जब हमारा प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मामले निपटाने में लगा है, तो हम आपसी मामले तो निपटा ही सकते हैं। एक व्यस्त भारतीय प्रधानमंत्री के साथ उसके देश के निवासी इतना सहयोग तो कर ही सकते हैं। उसे तंग मत करो। खुद कर लो, क्या करना चाहते हो।

… वह (विदेश) जाता है। बार-बार एक ही बात को कहने जाता है। और न जाए तो बेचारा क्या करे! इस घटिया देश की दो कौड़ी की समस्याओं में सिर चटवाने से तो किसी अंतरराष्ट्रीय जमघट में बड़ी समस्या पर भाषण देना अच्छा है। भारत का प्रधानमंत्री यही करता है। देश की हालत कुछ भी हो, पर यही हमारी महानता है। सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है।

{शरद जोशी}

[(साप्ताहिक ‘रविवार’: 24-30 जुलाई, 1983 में “सारे जहां का दर्द ” शीर्षक से प्रकाशित)]

नवम्बर 12, 2014

कामकाजी गर्भवती स्त्री : महान भारतीय संस्कृति

नारी तुम केवल श्रद्धा हो!

यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता ‘  (जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं )

माँ की स्तुति में हजारों बातें लोग सामने रख देंगे पर असल में कैसा व्यवहार गर्भवती महिलाओं के साथ भारत में होता है, खासकर कामकाजी महिलाओं के साथ, इसकी बानगी नीचे दिए वीडियो से मिल जाती है|

और यह सब देश की राजधानी दिल्ली में होता है| स्कूल के खिलाफ कोई कार्यवाही हुयी?
ऐसे प्रबंधकों को कौन सा सभ्य देश बर्दाश्त कर सकता है?

भारत कर रहा है तो भारतीय संस्कृति महान ही होगी!
 

 

नवम्बर 6, 2014

काला धन : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

sarveshwardayal Saxena

नवम्बर 6, 2014

जिंदगी और मौत की जंग के फोटो ने फोटोग्राफर से आत्महत्या करवाई…

FamineSudanसाउथ अफ्रीकन फोटो जर्नलिस्ट Kevin Carter 1993 के मार्च माह में अकाल को कवर करने के सूडान गये थे, जहां यू.एन के फूडिंग कैम्प के बाहर एक दिल चीरने वाला  दृश्य देखकर उन्होंने दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर लिया|

सूडान में अकाल के कारण भूखमरी से कृशकाय हो चुकी एक बालिका जमीन पर घिसट घिसट कर यू.एन के फूडिंग कैम्प की ओर जा रही है और एक गिद्ध उसके पीछे आकर बैठ गया है इस इंतजार एन कि जल्द ही ज़िंदगी बालिका का साथ छोड़ देगी और उसके लिए भोजन का इंतजाम कर देगी|

इस फोटो को 1994 में अप्रैल माह में पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया और यह फोटो दुनिया भर के अखबारों और पत्रिकाओं में छपा और चर्चा का केन्द्र बना|

भूख से कंकाल बन चुकी अभागिन बालिका का क्या हुआ?  क्या वह बच पाई?

27 July 1994 को Kevin Carter  ने आत्महत्या कर ली|

उनकी कहानी 2010 की Canadian-South African फिल्म – The Bang Bang Club में दर्शाई गई है|

Kevin Carter के सुसाइड नोट में लिखा था –

“I’m really, really sorry. The pain of life overrides the joy to the point that joy does not exist… depressed … without phone … money for rent … money for child support … money for debts … money!!! … I am haunted by the vivid memories of killings and corpses and anger and pain … of starving or wounded children, of trigger-happy madmen, often police, of killer executioners …”

 

नवम्बर 2, 2014

अरविंद केजरीवाल : रहस्य स्टील के गिलास का

AKHungerstrikeअरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, और गोपाल राय, सैंकड़ों अन्य स्वयंसेवकों के साथ 25 जुलाई July 2012 को भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ SIT घोषित करने की मांग के साथ अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गये| अरविंद केजरीवाल के मधुमेह के रोगी होने के कारण बहुत से लोग उनके अनशन करने के निर्णय से चिंतित थे| अनशन न करने के लोगों हजारों लोगों के अनुरोध एवं मेडिकल क्षेत्र के विशेषज्ञों की चेतावनी को दरकिनार कर अरविंद अपने फैसले पर अडिग रहे और अनशन पर बैठ गये|

मैं मधुमेह रोग का विशेषज्ञ चिकित्सक हूँ और मुझे पता था कि वे एक जिद्दी रोगी हैं और उनका एलोपैथिक पद्धति पर कम और नेचुरोपैथी (प्राकृतिक चिकित्सा) पर ज्यादा विश्वास है| एक चिकित्सक के नाते मेरे लिए वे पहले ही catabolic अवस्था के मरीज थे, और उनका शुगर लेवल कुछ समय से अनियंत्रित था, और यह तय था कि अगर वे उपवास पर जाते हैं तो ketosis का ख़तरा उन पर छायेगा ही छायेगा|

उनके अनशन से पहले मुझे बहुत सी मेडिकल सामग्री पढनी पड़ी यह सीखने के लिए कि अगर मधुमेह का रोगी उपवास करता है तो उसकी शारीरिक स्थितियों को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है| कुछ ऐसी रिपोर्ट्स थीं जहां मधुमेह के रोगी लम्बी भूख हड़ताल के बावजूद जीवित बच गये| मैं अरविंद के लगातार संपर्क में था और जंतर मंतर पर उनके अनशन के दौरान उनके साथ रहने के लिए सहमत था| Dr Atul Gupta (Anesthesiologist) और Dr Vipin Mittal (dentist) अरविंद और अन्य उपवासियों की देखभाल कर रही मेडिकल टीम के मुखिया थे| दोनों फोन के दवारा निरंतर मेरे संपर्क में थे, क्योंकि उपवास के तीन दिनों तक मुझे जयपुर में ही रुकना पड़ा जहां मेरे कुछ साथी अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल पर जमे हुए थे|

28 जुलाई 2012 को सुबह-सवेरे ही मैं जंतर-मंतर पहुँच गया| मैंने अरविंद की जांच की और उनकी मेडिकल स्थिति की ताजा रपटें पढीं| जैसा कि अपेक्षित था वे ketosis की अवस्था में पहले ही आ चुके थे| सुनीता केजरीवाल (अरविंद की धर्मपत्नी), ड़ा. मित्तल, और रणसिंह आर्य (प्राकृतिक चिकित्सक) मेरे साथ थे और मधुमेह रोग का विशेषज्ञ होने के नाते मैं उन्हें अरविंद की मेडिकल स्थिति और संभावित खतरों के बारे में समझा रहा था| एलोपेथिक चिकित्सा की परिभाषा से वे पहले ही उस स्थिति में पहुँच चुके थे जहां उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाना जरूरी था, हालांकि वे बाहर से ठीक दिखाई दे रहे थे और आत्मविश्वास से भरे हुए थे पर उनकी मेडिकल जांच रपट में ketone का स्तर बहुत ज्यादा था| अरविंद को अस्पताल में भर्ती करे जाने के लिए तैयार करना बहुत कठिन था, वे जब तक कि बेहोश न हो जाएँ तब तक वहाँ से हटने को तैयार नहीं थे| हमारे पास उस समय तक उन पर निगाह रखने के सिवा कोई चारा नहीं था जब तक कि वे गंभीर रूप से बीमार न हो जाएँ| ड़ा. मित्तल को सांत्वना मिली यह जानकर कि मैं उपवास के खत्म होने तक चौबीसों घंटे वहाँ रहूंगा और अरविंद की मेडिकल स्थितियों पर नजर रखूंगा| चिकित्सक की दृष्टि से देखूं तो यह एक चमत्कार ही था कि अरविंद अगले एक हफ्ते तक अनशन पर डटे रहे|

अरविंद के राजनीतिक विरोधियों ने उनकी मेडिकल स्थितियों और मधुमेह के बावजूद अनशन जारी रखने के बारे में कई कहानियां उडानी शुरू कर दीं| सोशल मीडिया पर उनके स्टील के गिलास को चर्चाओं का केन्द्र बनाया गया| क्योंकि अरविंद कैमरे पर स्टील के गिलास में पानी पीते दिखाए गये थे तो उनके विरोधियों ने कहना शुरू कर दिया कि स्टील के गिलास में जीवन रक्षक द्रव अरविंद को दिया जा रहा था अगर ऐसा न होता तो वे पारदर्शी शीशे के गिलास में पानी पीते| मुझे अब तक आरोप आश्चर्य में डालता है अगर अरविंद स्टील के गिलास में छिपा कर लिक्विड डायट ग्रहण करते तो उन्हें यह सरेआम कैमरों के सामने करने की क्या जरुरत थी?

बहरहाल इन् फिजूल बातों से अलग यह बात मार्के की है कि बिगड़े हुए मधुमेह के रोगी होने के बावजूद वे कैसे 10 दिनों से ज्यादा समय तक अनशन करके जीवित रह पाए?

उनके उपवास की तैयारियां तकरीबन एक माह पूर्व शुरू हो चुकी थीं| हम जैसे एलोपैथिक चिकित्सक ऐसे मामलों से सबन्धित साहित्य पढ़ रहे थे और प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम उनके शरीर को एक लंबे उपवास के योग्य बनाने में जुटी हुयी थी| तथ्यात्मक रूप से अगर अरविंद इतने लंबे उपवास के बावजूद बच पाए तो इस एक कारण से कि उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सकों दवारा उनके लिए तैयार किये गये प्रोटोकोल का पूरी तरह से पालन किया| अरविंद का विश्वास एलोपैथी पर नहीं था और हम वहाँ केवल किसी आपातकालीन स्थिति से निबटने के लिए उपस्थित थे| हमने उनके स्वास्थ्य का नियमित रिकार्ड बनाया और मीडिया को इसके बारे में नियमित रूप से अपडेट करते रहे| प्राकृतिक चिकित्सकों की टीम अनुभवी थी और मधुमेह के रोगियों के उपावास को पहले संभाल चुकी थी| बल्कि उन्होंने यह तक दावा किया कि वे लमने उपास के माध्यम से ही मधुमेह के कुछ रोगियों को ठीक कर चुके थे| उनकी तैयारी अच्छी और उनका आत्मविश्वास दृढ़ दिखाई देता था|

प्राकृतिक चिकित्सकों ने उपवास से एक माह पहले अरविंद की डायट को इस तरीके से संचालित किया जिससे उनका शरीर भरपूर मात्रा में प्रोटीन ग्रहण कर सके और उनके भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा न्यूनतम हो| इस डायट से संभावना थी कि उनके शरीर की पाचन व्यवस्था anabolic अवस्था की ओर अग्रसारित होगी| जब उन्होंने उपवास शुरू किया अताब तक उनके शरीर में प्रोटीन की अच्छी खासी मात्रा संचयित हो चुकी थी और अब तक उनका शरीर भोजन में कार्बोहाइड्रेट के निम्न स्तर का आदि हो चुका था|

अरविंद एरोबिक्स, योग और प्राणायाम के संयुक्त प्रोटोकोल (तीनों एक एक घंटे की अवधि के लिए) का भली भान्ति पालन कर रहे थे| व्यायाम और प्राणायाम के इस संयुक्त कार्यक्रम ने उनके शरीर की Insulin संवेदनशीलता को बढ़ाया होगा और beta cell function में बढोत्तरी की होगी| इसी अनुशासन के कारणउपवास के शुरुआती दिनों में glycemic नियंत्रण स्थायी रहा जबकि उनकी मधुमेह की दवाइयां बंद की जा चुकी थीं| वास्तव में उनकी सारी anti-diabetic medicines उपवास से कुछ दिन पहले ही बंद कर डी गई थीं और ऐसा करना इसलिए उपवास के दौरान hypoglycemia की स्थिति न उत्पन्न हो जाए|

उपवास के दौरान शरीर में एक उचित हाइड्रेशन बनाए रखने के लिए उन्हें समुचित मात्रा में पानी पीने के लिए दिया गया| शरीर में हाइड्रेशन का स्तर अच्छा बनाए रखने के साथ पानी का काम उपवास के कारण शरीर में उत्पन्न ketone को बाहर निकाल भी था| उपवास के दौरान, जब कि रोगी को खाना नहेने दिया जाता तो उसके शरीर में जमा वसा (फैट) ऊर्जा देने के काम आती है| पर इस क्रिया के दौरान Ketone bodies भी उत्पन्न हो जाती हैं जो शरीर के लिए बेहद हानिकारक हैं|

समुचित हाइड्रेशन स्तर बनाए रखने के साथ साथ शरीर से ketone bodies और अन्य toxins को बाहर निकालने के लिए अरविंद को प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण तरीके कुंजल और एनिमा भी दैनिक स्तर पर अपनाने पड़े|

अरविंद की शारीरिक गतिविधियों को न्यूनतम स्तर पर नियंत्रित करके कैलोरीज के खर्च होने पर नियंत्रण पाया गया| उन्हें न ताली जा सकने वाली बिल्कुल आवश्यक गतिविधियों से ज्यादा चलने फिरने नहीं दिया गया| कैलोरीज क्रचने के स्तर को नियंत्रित करके ketone bodies के उत्पन्न होने को नियंत्रित किया जा सकता है क्योंकि अब वसा की कम मात्रा शरीर में पचाई जा रही है|

उनकी शारीरिक जांच नियमित रूप से की जा रही थी और उनके शरीर की बायोकमिस्ट्री भी नियमित जांची जा रही थी| उन्हें नियमित रूप से जांच के लिए खून के सैम्पल देने में एतराज था| उपवास के अंतिम पांच दिन एलोपैथी में विश्वास करने वाले सभी लोग बेहद चिंतित हो चले थे| उनका ketones का स्तर 4+ और 5+ के बीच झूल रहा था, electrolytes असामान्य अवस्था में थे और अंतिम 3 दिनों में bilirubin भी बढ़ना शुरू हो गया था| लेकिन रपट में इन् सब आकंडों में लगातार वृद्धि होने से शरीर के लगातार कमजोर होते रहने के बावजूद अरविंद पूरी तरह से जीवंत थे और अपने निश्चय पर अडिग|

उपवास के छठवें दिन ketone bodies का स्तर स्थायीत्व को प्राप्त कर गया और उससे ज्यादा नहीं बढ़ा| उस समय तक उनके शरीर ने शायद सारे संचित फैट का क्षय कर लिया था, और नके शरीर की कैलोरीज की आपूर्ति के लिए प्रोटीन्स टूट गये थे और यह यूरिक एसिड लेवल के बढे होने से भी सिद्ध हो रहा था|

सरकारी डाक्टरों की एक टीम अरविंद की जांच करने आई और उन्होंने दबाव डाला कि अरविंद को अविलम्ब अस्पताल में भर्ती करवाना चाहिए| हमारे डाक्टरों की टीम तब तक अरविंद के अपने विश्वास में अपना विश्वास समाहित कर चुकी थी और सब अरविंद के समर्थन में खड़े रहे| जीवन और मृत्यु का मामला आते ही कोई भी चिकित्सक तनिक भी ख़तरा नहीं उठाना चाहता| सरकारी डाक्टरों ने वही सलाह डी थी जो मैंने उपवास के चौथे दिन अरविंद को दे थी| भोपाल से आए हुए cardiologist, Dr Ayyar, ने भी यही सलाह दी|

चौबीसों घंटे जंतर मंतर पर उपस्थित देशभक्ति के गीत गाते, उन पर झूमते, और तिरंगा लहराते दीवाने लोगों और स्वयंसेवकों के मध्य हम लोग भी केवल मेडिकल जांच रपटों पर ही विश्वास करने वाले चिकित्सक न रहकर उन जैसे आम भारतीय ही बन चुके थे, जिनका प्रारब्ध पर पूर्ण विश्वास था|

मैं 2 अगस्त के शाम को जीवन भर नहेने भूल सकता जब अन्ना हजारे ने घोषित किया कि अरविंद एवं साथी अगले दिन उपवास तोड़ देंगें| मेरे हाथ में अरविंद की नवीनतम मेडिकल रपट थी और उनका serum pottasium 3.2,(सामान्य स्तर 3.5-5 meq/l) था| Hypokalemia एक बेहद खतरनाक स्थिति है और उनके स्तर खतरनाक स्थिति की ओर जा रहे थे| Further drop in Potassium के स्तर में और घटोत्तरी का मतलब था एकदम से ह्रदय समस्या के खतरे का उत्पन्न होना|

मैं उस जगह गया जहां अरविंद को रखा गया था| वे उस वक्त अकेले थे| मैंने उन्हें potassium के कम स्तर के बारे में सूचित किया और इससे होने वाले खतरों के प्रति सचेत किया| मैंने उनके सामने तर्क दिया – “अन्ना पहले ही देश के सामने घोषित कर चुके हैं कि उपवास कल टूट जायेगा और हम लोग देश को एक राजनीतिक विकल्प देने जा रहे हैं तो आज की रात के खतरे को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा| जब कल उपवास टूटना ही है तो आज की रात आपके जीवन को खतरे में डालने का क्या मतलब है| अगर आप थोड़े से नारियल पानी का सेवन कर लें तो potassium का स्तर सामान्य हो सकता है, और आपके जीवन से एक बड़ा ख़तरा टल सकता है और नारियल पानी के सेवन से आपका उपवास भी नहीं टूटेगा| इसे आपद-धर्म समझा जाए”|

अरविंद ने कहा,

“ड़ा. पारिख, मैं ईश्वर को धोखा नहीं दे सकता, हम दोनों के सिवा यहाँ कोई और नहीं है पर ईश्वर तो हमारे साथ सदैव ही है| अन्ना ने कहा है कि उपवास कल टूटेगा तो यह कल ही टूटेगा उससे पहले नहीं| चाहे जो कुछ भी मेरे साथ हो जाए, और चाहे मेरा निश्चय सार्थक न लगता हो, पर मैं मुँह से कुछ भी ग्रहण नहीं करूँगा जब तक कि कल अन्ना घोषणा न कर दें”|

क्या उन्हें जिलाए हुए था तमाम प्रतिकूल शारीरिक परिस्थितियों में? क्या रहस्य था स्टील के गिलास का? ये रहस्य हैं – कर्म में दृढ़ विश्वास, लक्ष्य में पूर्ण आस्था और अगर आवश्यकता हो तो अंतिम त्याग करने की पूर्ण तैयारी|
जंतर मंतर पर व्यतीत किये गये सात दिनों में मैं मुश्किल से ही सो पाया और उस रात तो मैं एक झपकी तक न ले पाया| Potassium के घटते स्तर का ग्राफ मेरी आँखों के सामने तैरता रहा| लेकिन, यह आदमी- अरविंद केजरीवाल, जिसे यह विश्वास नहीं था कि वह अगली सुबह जीवित उठ पायेगा या नहीं, शान्ति से अपने बिस्तर पर सो रहा था|
अगले दिन, अरविंद के उपवास तोड़ने के बाद, जयपुर जाने के लिए जंतर मंतर से निकलने से पहले मैं भीड़ से घिरे अरविंद के पास गया| मैंने उनके कक्ष के दरवाजे से उनकी ओर हाथ हिलाया और अरविंद ने मुझे अंदर बुलाया और बाहें खोल कर मुझे गले लगा लिया| मेरे सब्र का बाँध टूट गया और उनकी बाहों में बंध कर मैं एक बच्चे की भांति फूट-फूट कर रो पड़ा| मैं इस भावुकतापूर्ण क्रंदन के पीछे कोई कारण नहीं खोज पाता| यही वे क्षण थे जब मैं एक बहुत बड़े तनाव और दबाव से मुक्त हुआ| मेरे कन्धों पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी एक ऐसे आदमी की मेडिकल देखरेख की जिसे लाखों भारतीय युवा प्रेम करते हैं और जिसकी ओर समूचा देश आशा भरी दृष्टि से देख रहा था| हर क्षण उनका जीवन ईश्वर की दया के वश लगता था जबकि बाकी लोगों का विश्वास था कि उनकी देखरेख एक कुशल चिकित्सक के हाथों हो रही है| शायद इसी दबाव से मुक्ति आंसुओं के रास्ते बह निकली|

 

[ड़ा. राकेश पारिख]

मूल लेख

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