Archive for नवम्बर, 2010

नवम्बर 28, 2010

विश्वनाथ प्रताप सिंह : कवि और चित्रकार

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को बहुत सारे लोग भारत के सबसे विवादास्पद प्रधानमंत्री भी कहेंगे।

27 नवम्बर श्री वी.पी सिंह की पुण्य तिथि है अगर वे जीवित होते तो इस साल 25 जून को उनका 79वाँ जन्म दिवस मनाया जाता।

लोकनायक जय प्रकाश नारायण के बाद वही ऐसे राजनेता हुये जिन्होने विपक्ष में रह कर भारत की राजनीति में भूचाल ला खड़ा किया।

अस्सी के दशक के अंत में मंडल कमीशन की सिफारिशों के विरुद्ध खम ठोक कर विरोध करने वाले लोग भी श्री वी.पी.सिंह को सिर्फ इसी एक मुद्दे के बलबूते नकार नहीं पायेंगे। अच्छा या बुरा जैसा भी रहा हो उनके द्वारा उठाये गये कदम का परिणाम पर उनके कदम ने भारत की राजनीति की दिशा ही बदल दी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

इतिहास ऐसे मुँह नहीं मोड़ सकता भारत के पिछले साठ साल के एक ऐसे राजनेता से जिन्होने ईमानदारी के नाम पर सत्ता हासिल करके दिखा दी। जून जुलाई की भयानक गर्मी में मोटर साइकिल पर सवार होकर उन्होने इलाहाबाद में चुनाव प्रचार किया था और अमिताभ बच्चन द्वारा इस्तीफा दिये जाने से खाली हुयी सीट पर हुये उपचुनाव में श्री लाल बहादुर शास्त्री के सुपुत्र श्री सुनील शास्त्री को हराया था। एसी में बैठ रणनीति बनाने वाले नेताओं के बलबूते की चीज नहीं है ऐसा परिश्रम।

नब्बे के दशक में खुद उनके पास चलकर गया प्रधानमंत्री पद सम्भालने का प्रस्ताव, जिसे उन्होने स्वास्थ्य कारणों से ठुकरा दिया। विरोधाभास निस्संदेह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। युवावस्था में ही अपनी रियासत की बहुत सारी जमीन उन्होने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से प्रेरित होकर दान कर दी थी। देहरादून में अपनी करोड़ों अरबों की जमीन उन्होने ऐसे ही छोड़ दी उन लोगों के पास जो नाममात्र का किराया देकर वहाँ दुकानें आदि चलाते थे। श्री वी.पी सिंह उन बिरले राजनेताओं में से रहे हैं जिन पर धन के भ्रष्टाचार का आरोप कोई नहीं लगा सकता।

उन्हे सिर्फ एक राजनेता ही नहीं कहा जा सकता। श्री वी.पी सिंह में कई व्यक्तित्व दिखायी देते हैं और उन्हे सिर्फ किसी एक मुद्दे पर खारिज नहीं किया जा सकता। वे एक बेहतरीन कवि, लेखक, चित्रकार और फोटोग्राफर भी थे।

राजा नहीं फकीर है
देश की तकदीर है

का बेहद सटीक नारा गढ़ने वाला व्यक्ति बेहद सक्रिय और तीक्ष्ण बुद्धि का मालिक रहा होगा जिसकी लेखन क्षमता के बारे में संदेह नहीं किया जा सकता।

मंडल कमीशन लागू करने के सामाजिक और राजनीतिक निर्णय ने उनके व्यक्तित्व को बहुत हद तक भ्रम भरे बादलों के पीछे ढ़क दिया है। उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन राजनीतिक इतिहास लिखने वाले लोग करेंगे पर राजनीति से परे उनके अंदर के कलाकार पर तो लेखक और कलाकार समुदाय निगाह डाल ही सकता है।

उनकी कविता में गहरे भाव रहे हैं। उन्होने तात्कालिक परिस्थितियों से उपजी कवितायें भी लिखीं जो काल से परे जाकर भी प्रभाव छोड़ने की माद्दा रखती हैं।

कांग्रेस से इस्तीफा देते समय उन्होने यह कविता भी रची थी।

तुम मुझे क्या खरीदोगे
मैं बिल्कुल मुफ्त हूँ

उनकी कविता आधुनिक है, उसमें हास-परिहास, चुटीलापन भी है और व्यंग्य भी। उनकी कविता बहुअर्थी भी है। बानगी देखिये।

काश उसका दिल एक थर्मस होता
एक बार चाह भरी
गरम की गरम बनी रहती
पर कमबख्त यह केतली निकली।

वे नेताओं के राजनीतिक जीवन की सांझ के दिनों पर भी कविता लिखे बिना नहीं माने।

उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वहीं चिपका है
फटे इश्तेहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले
निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता।

कविता भारत के लगभग हर नेता के जीवन का सच उजागर कर देती है।

आदर्शवाद उनकी कविताओं में भी छलकता है और शायद इसी आदर्शवाद ने उन्हे राजनीति में कुछ खास निर्णय लेने के लिये प्रेरित किया होगा।

निम्नलिखित कविता में नेतृत्व को लेकर कितनी बड़ी बात वे कह गये हैं।

मैं और वक्त
काफिले के आगे-आगे चले
चौराहे पर …
मैं एक ओर मुड़ा
बाकी वक्त के साथ चले गये।

मनुष्य की अंहकार भरी प्रकृति और खासतौर पर समाज में शक्तिशाली व्यक्ति के हथकंडों पर उन्होने एक बेहतरीन कविता लिखी थी।

भगवान हर जगह है
इसलिये जब भी जी चाहता है
मैं उन्हे मुट्ठी में कर लेता हूँ
तुम भी कर सकते हो
हमारे तुम्हारे भगवान में
कौन महान है
निर्भर करता है
किसकी मुट्ठी बलवान है।

मानव मस्तिष्क के अंधेरे बंद कोनों को भी खूब खंगाला उन्होने और कविताओं और पेंटिंग्स के माध्यम से उन्हे अभिव्यक्ति दी।

निराशा का भाव भी उनकी कविताओं में झलकता है और वैराग्य का भाव भी किसी किसी कविता के माध्यम से बाहर आ जाता है।

उनकी एक कविता है मुफ़लिस, जो राजनेता के रुप में उनकी मनोदशा को बहुत अच्छे ढ़ंग से दर्शाती है।

मुफ़लिस से
अब चोर बन रहा हूँ मैं
पर
इस भरे बाज़ार से
चुराऊँ क्या
यहाँ वही चीजें सजी हैं
जिन्हे लुटाकर
मैं मुफ़लिस बन चुका हूँ।

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नवम्बर 27, 2010

दुख! क्यों भटक जाता है तू … (कविता – रफत आलम)

दुख!

क्यों भटक जाता है तू ?
तेरा नाम दो आखर का
ज़रा सा,
मैं तेरा दोस्त पुराना
छह फुटा
बड़ा सा।

रग ओ जान में बसाता हूँ तुझे
अश्क के मोतियों से सजाता हूँ तुझे
खुद जाग कर सुलाता हूँ तुझे
यानि हर हाल लढ़ाता हूँ तुझे
क्या है के बहक जाता है तू
मेरे होते दुनिया को सताता है तू
दुख! क्यों भटक जाता है तू

 

(रफत आलम)

नवम्बर 26, 2010

कानून को ठेंगा दिखाते दिल्ली मेट्रो के पुरुष एवम महिला यात्री और पुलिस

कुछ साल पहले भारत ने मेरठ के एक पार्क में बैठे युवा जोड़ों को पीटती एक महिला पुलिस अधिकारी के तेवर देखे थे। अगर युवा जोड़े भारतीय कानून की किसी धारा का उल्लंघन कर रहे थे तो महिला पुलिस अधिकारी ने अपनी कानूनी जिम्मेदारी नहीं दिखायी बल्कि उन्हे अपने स्तर पर ही सबक सिखाने का फैसला लिया। जाने कैसे एक सभ्य समाज पुलिस को इतनी छूट दे देता है कि पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर सड़कों पर खुद ही फैसले लेने लग जायें? पुलिस के ऐसे कदमों का समर्थन करने वाले सामाजिक ठेकेदार दर असल एक निरंकुश पुलिस की बुनियाद गहरी और मजबूत कर रहे होते हैं।

भारत में जगह जगह पुलिस वालों को स्वयं ही कानून तोड़ते देखा जा सकता है।

देश के कुछ राज्यों में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को कानून की धज्जियाँ उड़ाकर आम जनता को पीटते, अपमानित करते हुये देश ने कई बार देखा है। लोकतंत्र में सिर्फ भारत में ही ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग समाज के ठेकेदार बनकर फतवे जारी कर दें और इन फतवों से अलग जीवन जी रहे लोगों को सरे आम पीटा जाये क्योंकि ठेकेदार संस्कृति बचाने की कोशिश कर रहे हैं!

दिल्ली मेट्रो ने महिलाओं के लिये अलग से आरक्षित कूपों की व्यवस्था की है जो कि एक सराहनीय कदम है। पर क्या बेहतर न होगा कि एक मेट्रो ट्रेन के कुल कूपों को इस तरह से आरक्षित किया जाये जिससे कि कूपे पुरुषों, महिलाओं और परिवार वालों एवम जोड़ों के लिये आरक्षित हों। जिससे हर तरह के यात्री गण सहुलियत के साथ यात्रा कर सकें। मसलन दिल्ली मेट्रो एक ट्रेन में महिलाओं, पुरुषों एवम परिवारों, प्रत्येक के लिये 33-33% आरक्षण दे सकता है और बाकी बचे 1% को विकलांग यात्रियों के लिये। न्यायोचित बात तो यही है कि कोई भी वर्ग दूसरे वर्ग के लिये आरक्षित वर्ग के कूपों में अनाधिकृत प्रवेश न करे।

बहरहाल अभी तो दिल्ली मेट्रो के कर्ता-धर्ता इतना ही दिमाग लगा पाये हैं कि महिला यात्रियों के लिये कुछ कूपे आरक्षित कर दिये गये हैं।

वैसे ऐसे किसी भी आरक्षण की व्यवस्था भारतीय समाज के मुँह पर तमाचा जड़ती है क्योंकि ऐसी व्यवस्था यह बताती है कि भारतीय इतने सभ्य नहीं हैं कि महिलायें सुरक्षित तरीके से पूरी सहुलियत के साथ पुरुषों के साथ यात्रा कर सकें।

खबर है कि दिल्ली मेट्रो की महिला यात्रियों एवम पुलिस ने महिलाओं के लिये आरक्षित कूपों में घुस आये पुरुष यात्रियों को पीटा। मेट्रो स्टेशन्स पर चेतावनी लिखी हुयी है कि महिला कूपे में यात्रा कर रहे पुरुष यात्री पर 200 रुपयों का जुर्माना लगाया जायेगा।

पुलिस ने अपना कानूनी कर्तव्य नहीं निभाया और महिला कूपों में अनाधिकृत प्रवेश कर यात्रा कर रहे पुरुष यात्रियों पर जुर्माना नहीं लगाया बल्कि उन्हे पीट कर बाहर निकाला, उन्हे स्टेशन पर मुर्गा बनाया गया, शारीरिक प्रताड़ना दी गयी। अगर पुलिस ही सड़कों पर फैसले लेने लगेगी तो न्याय व्यवस्था क्या करेगी?

[ देखें वीडियो ]

गुण्डागर्दी चाहे पुरुषों की हो, महिलाओं की हो निंदनीय है और इन सबसे बढ़कर निंदनीय है पुलिस की गुण्डागर्दी। देश के कानून का सम्मान करने की शपथ लेकर वर्दी पहन कर अधिकार पाने वाली पुलिस से कानून के दायरे में रहकर जनता की सेवा करने की अपेक्षा हरेक लोकतांत्रिक और सभ्य समाज कर सकता है।

अगर भारत में पुलिस का निरंकुश शासन ही चाहिये तो पुलिस और जनता की ऐसी गतिविधियों पर आँखें मूँद कर ताली बजायी जा सकती है, पर ऐसे ही छोटे छोटे कदम बढ़कर आगे चलकर तानाशाही और दिन दहाड़े एनकाऊंटर्स में बदल जाते हैं और तब किये गये स्यापे किसी काम के नहीं होते!

नवम्बर 25, 2010

सच्चे मित्र सच्ची मित्रता … (संत सिद्धार्थ)

संत सिद्धार्थ ने कमरे में प्रवेश करते ही वहाँ पहले से मौजूद लोगों का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और अपने लिये नियत स्थान पर बैठ गये।

उन्होने लोगों से पूछा कि वे किस विषय पर चर्चा करना चाहते हैं?

एक सज्जन ने कहा,” महात्मन, कुछ मित्रता पर बताने का कष्ट करें। क्यों ऐसा होता है कि जिन लोगों को हम मित्र समझते हैं वही हमें धोखा देते हैं, हमें दुख पहुँचाते हैं। दुनिया में मित्रता के नाम पर इतनी धोखाधड़ी क्यों है?

संत सिद्धार्थ ने कहा,” ठीक है आज मित्रता और मित्र पर बात कर लेते हैं। सबसे पहला प्रश्न उठता है कि मित्र कौन है? आप लोग बतायें आप लोगों के लिये मित्र की परिभाषा क्या है?

महात्मन, जो सुख दुख में साथ रहे वही मित्र है।
जो संकट में साथ दे, सहायता करे वही मित्र है।
जो दुनिया के लाख विरोध के बाद भी साथ दे वही सच्चा मित्र है।
जो दिल से आपका भला चाहे वही मित्र है।
जो ईमानदारी से दोस्ती का रिश्ता निभाये वही सच्चा मित्र है।

लोगों ने अपनी समझ से मित्रता की भिन्न-भिन्न परिभाषायें कह दीं।

संत सिद्धार्थ ने कहा,” ठीक है, मित्र होने के कई लक्षण आप लोगों ने गिना दिये। आप लोगों ने कहा कि जो संकट में साथ दे वह सच्चा मित्र है, पर ऐसा देखा गया है कि सहायता करने वाले व्यक्ति के साथ कालांतर में सम्बंध ठीक नहीं रहते, कहीं न कहीं विगत में की गयी सहायता का अहसान ही तथाकथित मित्रों के मध्य दरार पड़ने का माध्यम बन जाता है। क्या ऐसा भी कहा जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति संकट में सहायता करता है वह मित्र बन सकता है? तब समाज सेवियों को क्या कहियेगा?

थोड़ा रुककर उन्होने अपनी बात आगे बढ़ाई,” मित्र और मित्रता की बात को यूँ समझते हैं… आपकी तरफ से कौन आपका मित्र हो सकता है? आप किस व्यक्ति के सच्चे मित्र हो सकते हैं? मित्रता एक तरफ से नहीं हो सकती। आपके विचार और भावनायें आदि भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

उन्होने नजर सामने बैठे लोगों पर दौड़ाई और कहा,” मोटे तौर पर एक बात तय कर लें कि वह क्या भाव है जिसके पार करने पर सच्ची मित्रता की बुनियाद मजबूत हो जाती है? आप लोगों में मित्रता को लेकर निराशा है तो स्पष्ट है कि जितनी भी कसौटियाँ हैं आप लोगों के सामने मित्रता को परखने के लिये वे खरी नहीं उतरतीं क्योंकि अंत में आपको मित्रों से ठेस ही लगती है।

लोगों को चुप देखकर उन्होने कहा,” आप सबसे ज्यादा परेशान होते हैं उस मित्र से जो आपके अहं को ठेस पहुँचाता है। यह अंतिम और सबसे बड़ी कसौटी है जिसे पार करने के बाद ही सच्ची मित्रता की बुनियाद पड़ती है। इसे पार करे बगैर मित्रता में कोई सच्चाई उत्पन्न नहीं होती। इससे पहले सारी तथाकथित मित्रतायें भुरभुरे महल ही हैं जो जल्दी ही गिर जाते हैं। अगर आपके तथाकथित मित्रों में ऐसा कोई है जिसके सामने आपका अहं पिघल जाता है, वही आपकी तरफ से आपका मित्र बन सकता है।

इस अवस्था से पहले यदि कोई आपकी सहायता करता है तो गहरे में आपके अहं को ठेस लगती है। यदि आप ही किसी की सहायता कर रहे हैं तो आपके अंदर भी यह भावना जन्म लेती है कि आपने उस व्यक्ति के ऊपर अहसान किया है। अगर वह आपसे कुछ गलत व्यवहार करता है या आपकी उपेक्षा करता है तो आपको लगता है कि आपने तो उस पर अहसान किया और वह आपको ही उपेक्षित समझ रहा है। आप चाहते हैं कि वह आपके द्वारा की गयी सहायता को हमेशा याद रखे, पर यही बात आप तब लागू नहीं करना चाहते जब कोई आपकी सहायता करता है।

साधारण रिश्तों में व्यक्ति का अहंकार मौजूद रहता है अतः रिश्ते गहरायी नहीं पा पाते।

सच्चा मित्र आपके अहंकार की परवाह किये बगैर आपको टोकेगा जरुर जब भी आपको गलत राह पर चलता हुआ पायेगा। सच्चा मित्र कभी आपके साथ उस कर्म में खड़ा हुआ नहीं दिखायी देगा जो कर्म मानवता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाते हों। आपको चाहे कितना बुरा लगे, वह इस बात की परवाह किये बिना ही आपको सत्य मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करेगा। वह आपको गलत कर्म को करने के लिये साथ होने की ऊर्जा नहीं देगा। सच्चा मित्र तो बहुत बार आपके विरोध में खड़ा दिखायी देगा क्योंकि वह कटिबद्ध है आपको गलत मार्ग पर चलने से रोकने के लिये।

जो हर कर्म में, चाहे वे गलत ही क्यों न हों, साथ देते दिखायी देते हैं वे चापलूस होते हैं, सच्चे मित्र नहीं। सच्चा मित्र कैसे आपको पाप के मार्ग पर चलने देगा?

सच्चा मित्र वही है, जो भरपूर ईमानदारी से आपके अहंकार को ठेस पहुँचाये और तब भी आप उसके साथ के लिये अपने अंतर्मन में इच्छा को जिंदा पायें। बाकी सब तरह की मित्रतायें अवसरवादी हैं, सतही हैं, कम आयु की हैं।

कभी ऐसा ईमानदार मित्र मिल जाये जो मित्रता निभाने में भी उतना ही ईमानदार हो तो ऐसे सच्चे मित्र की मित्रता पाने के लिये अपने को भाग्यशाली समझना और उस मित्रता की रक्षा हर हाल में करना। और स्वयं भी ऐसा ही ईमानदार मित्र बनने की चेष्टा करना, बल्कि आपकी पहल ही ज्यादा महत्वपूर्ण है, आप स्वयं की ही दिशा तो संचालित कर सकते हैं। इस अवस्था के बाद मित्रता दुख नहीं देगी, ठेस नहीं पहुँचायेगी।

नवम्बर 21, 2010

तोते का पिंजरा : एक मंज़र

पड़ोस की दीवार पर लटके
छोटे से पिंजरे में तोता
कभी उपर कभी नीचे
गोल गोल घूमता रहता है
लाल खून सी चोंच से
चबाता रहता है लोहे की तीलियां
जाने कहाँ से उड़ता हुआ
एक तोता पिंजरे के पास
आ बैठा
टीटी… टीटी… टीटी…
टीटाहट के साथ
दोनों में होने लगी बातें
फलों का मिठास
गोल आँखों वाली
मैना का हुस्न
चोंचों का लड़ाना
घोंसले का सकून
कतरों में पानी
प्याली में चुग्गा
बासी बेस्वाद
कटे हुए पंख
घुटती सांसें
भींचती लोहे की तीलियां
असहनीय वेदना
तोतों की भाषा तो
स्वर का रचयिता ही जाने
मैं तो यूँ ही सोच रहा था
हम खुद अपनी ही चीत्कारों पर
अट्टाहस लगाने वाले
अबोल संवदनाओं को क्या समझें
आ गया अचानक, गैलेरी में
पडोसी का मोटा लड़का
फुर से उड़ गया
जो के आजाद था
खून सी लाल चोंच से
लोहे के तार चबा रहा है
पिंजरे वाला तोता।

(रफत आलम)

नवम्बर 16, 2010

विवाह

महेन्द्र सिंह की सबसे छोटी संतान की उम्र उस वक्त्त तकरीबन 3 साल की थी जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। चार संतानों, दो बेटियों और दो बेटों, को उन्होने ही माँ और पिता, दोनों की जिम्मेदारी निभाते हुये पाला और बड़ा किया। रिश्तेदारों एवम शुभचिंतकों ने उस वक्त्त उन पर बहुत जोर डाला था कि वे पुनः विवाह कर लें किसी ऐसी स्त्री से जो उनके बच्चों को माँ जैसा लालन-पालन दे सके, परंतु महेन्द्र बाबू नहीं माने, वे बच्चों को सौतेली माँ की छाया देने का रिस्क उठाने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्होने बड़े लाड़-प्यार और भरपूर जिम्मेदारी के साथ अपने बच्चों को पाला। दोनों बेटियाँ बेटों से बड़ी थीं और जब वे कुछ सयानी हो गयीं तो महेन्द्र बाबू को बेटों को पालने में उतनी मुश्किल न उठानी पड़ी और बेटियों ने घर और अपने छोटे भाइयों को अच्छी तरह से सम्भालना शुरु कर दिया।

उचित समय पर महेन्द्र बाबू ने योग्य वरों के साथ अपनी दोनों पुत्रियों के विवाह कर दिये। पुत्रियाँ सुखी रहीं। उनके जाने से घर के प्रबंधन में कुछ दिक्कते आयीं पर महेंद्र बाबू ने जल्दी ही सब कुछ सम्भाल लिया। बेटियाँ उनके बेहद नजदीक थीं अतः भावनात्मक रुप से दूरी खलती रही महेन्द्र बाबू को पर जीवन भर उन्होने घर और बाहर के जीवन और अपने व्यक्तिगत जीवन को बड़े ही संतुलन से जिया था अतः वे शीघ्र ही सम्भल गये।

कुछ साल बाद बेटे भी नौकरी आदि के सिलसिले में दूसरे शहरों में चले गये और फिर उनके भी विवाह हो गये।

बेटे-बेटियाँ अपने अपने जीवन साथियों एवम बच्चों के साथ त्यौहार आदि पर महेन्द्र बाबू से मिलने आते रहते थे। बेटियाँ, बेटों से ज्यादा चक्कर लगातीं। उन्हे अपने पिता के त्यागमयी जीवन का भरपूर ज्ञान था। उन्होने बचपन से पूरे होश में पिता को चारों भाई बहनों के सुख और विकास के लिये जमीन आसमान करते हुये देखा था। फोन से तो वे लगभग हर तीसरे चौथे दिन पिता से बात कर लेतीं थीं।

महेंद्र बाबू साठ के करीब के हो चले थे जब सहसा ही वे गम्भीर रुप से बीमार पड़ गये। बेटे तो उनके दूर थे, एक बेटी भी दूर थी। एक ही बेटी आ पायी वह भी एक दिन बाद। पर वह भी तीमारदारी के लिये रह नहीं सकती थी। बच्चों के इम्तिहान आदि के कारण वह रात को रुक नहीं पायी और एक- दो दिन बाद फिर से आने के लिये कह कर चली गयी।

एक-दो दिन में सभी बेटे बेटियाँ आकर देख गये महेंद्र बाबू को। समय लगा उन्हे पर वे ठीक हो गये।

संतुलित रुप से हँसमुख महेंद्र बाबू बीमारी के बाद कुछ ज्यादा ही गम्भीर हो गये। वे ज्यादातर समय कुछ सोचते रहते थे।

समय बीतता गया। साल-डेढ़ साल बाद की बात है जब चारों संतानों को महेन्द्र बाबू का संदेश मिला कि वे विवाह कर रहे हैं।

बेटियाँ, दामाद, बेटे एवम बहुयें, सभी पहले तो आश्चर्यचकित रह गये और फिर उन्हे महेन्द्र बाबू पर गुस्सा आने लगा।

आठों लोगों को इस बात की फिक्र थी कि लोग उन सबके बारे में क्या सोचेंगे?

इंसानी फितरत ही ऐसी है कि स्वहित बड़ी जल्दी ही सभी समझ लेते हैं।

बेटों को उनकी पत्नियों ने समझा दिया.”ज्यादा हल्ला मचाने की जरुरत नहीं है। एक तरह से बाबू जी ठीक ही कर रहे हैं। अब अगर इस बार बीमार पड़ गये और उन्हे यहाँ लाना पड़ गया तो उनकी तीमारदारी कौन करेगा। हमारे बस की बात तो है नहीं”।

ऐसी सीख पाकर बेटों को व्यवहारिकता समझ में आ गयी और वे सामान्य मुद्रा में आ गये और जब बहनों के फोन आये तो उनसे कह दिया,” दीदी हम कर ही क्या सकते हैं, बाबू जी ने अगर ठान ही लिया है कि वे विवाह करेंगे तो हम कैसे उन्हे रोक सकते हैं। हम विवाह में सम्मिलित तो होने से रहे। उनके विवाह के बाद वहाँ जाना भी मुश्किल हो जायेगा”।

बेटियाँ और दामाद कुछ ज्यादा ही नाराज था। बेटियों को तो महेन्द्र बाबू के पास जाकर रहना नहीं था और न ही महेन्द्र बाबू बेटियों के घर आकर रहने वाले थे तब भी दोनों दामाद, अपने पत्नियों को डाँट रहे थे,” तुम्हारे बाप के ऐसा करने के बाद क्या हमारे बच्चों की शादी में दिक्कतें नहीं आयेंगी? तुम्हारे बाप ने हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा”।

बेटियों ने फोन पर ही अपने पिता को समझाने की बहुत कोशिश की। गुस्से में थोड़ी खरी खोटी भी सुनायी पर महेन्द्र बाबू शांत भाव से इतना ही बोले,” मैंने तय कर लिया है, मुझे लगता है कि मुझे साथी की आवश्यकता है, और मेरा ऐसा करना तुम लोगों में से किसी के जीवन को प्रभावित नहीं करता। तुम सब लोग अपने अपने जीवन में रमे हुये हो। मैं यहाँ अकेला रहता हूँ। मैंने आज या कल क्या खाया, या मैं कहाँ गया, क्या इन सब बातों से तुम्हारा जीवन प्रभावित होता है? मुझे विवाह की ऐसी ही जरुरत होती तो मैं पच्चीस तीस साल पहले न कर लेता?  पर तब तुम लोग मेरे साथ थे। आज तो मैं निपट अकेला हूँ। वक्त्त ने मुझे ऐसा मौका दिया है कि मैं बुढ़ापे में एक अच्छे साथी के साथ बचे जीवन के साल या महीने जी सकता हूँ। मुझे रत्ती भर भी ऐसा महसूस नहीं हो रहा कि मैं कहीं से भी गलत हूँ। तुम लोग आना चाहो तो विवाह में सम्मिलित होने आ जाना। मुझे अच्छा लगेगा। शायद मेरे जीवन साथी से मिलकर तुम्हारे गिले शिकवे दूर हो जायें”।

महेन्द्र बाबू ने अपने नजदीकी मित्रों की उपस्थिति में बेहद सादे तरीके से मंदिर में विवाह कर लिया। उनकी चारों संतानों में से कोई नहीं आया।

बेटे और बेटियों ने अब फोन भी करना बंद कर दिया।

महेन्द्र बाबू ऐसी किसी भी जगह शादी आदि के मौकों पर न जाते जहाँ उन्हे लगता कि उनके बच्चे भी आयेंगे और उनकी स्थिति खराब हो सकती है रिश्तेदारों के सामने अपने ऐसे पिता को देखकर नज़रअंदाज़ करने में, जिन्होने इतनी बड़ी उम्र में विवाह किया है। महेन्द्र बाबू अपनी मिलनसारिता और सबकी सहायता करने की प्रवृति के कारण अपने रिश्तेदारों में अच्छे खासे लोकप्रिय थे और कुछ लोग उन्हे अभी भी इसलिये बुलाते थे क्योंकि विगत में महेन्द्र बाबू ने उनकी किसी न किसी रुप में सहायता की थी। कुछ इस उत्सुकता में निमंत्रण भेजते थे कि उस महिला को तो देखें जिनसे विवाह करने के लिये महेन्द्र बाबू ने अपने बच्चों की नाराज़गी मोल ली और कुछ सिर्फ मज़े लेने के लिये उन्हे आमंत्रित करते थे और यह भी सुनिश्चित करते थे कि निमंत्रण महेन्द्र बाबू की चारों संतानों को भी जरुर जाये। ऐसे लोग देखना चाहते थे कि हो सकता है सब लोग आ जायें और बाकी सबको कुछ तमाशा देखने को मिल जाये।

पर महेन्द्र बाबू ने ऐसा कोई अवसर उत्पन्न ही नहीं होने दिया जहाँ उनकी उपस्थिति की वजह से उनके बेटों और बेटियों को किसी समस्या का सामना करना पड़े।

लोगों में बातें भी उठने लगी थी। बहुत सारे लोग महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी की खूबसूरती और सलीकेदार तौर तरीके की चर्चा करते थे, कुछ उनके बेटों और बेटियों तक यह सूचना पहुँचा आये थे कि असल में महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी बनने वाली महिला को बहुत पहले से जानते हैं। कुछ ने यह कयास भी लगा लिया कि शायद अपनी पहली शादी के पहले से ही| शायद दोनों साथ ही पढ़ते हों और जाति भिन्नता के कारण वे दोनों जवानी में शादी न कर पाये थे। पर दोनों महेन्द्र बाबू के प्रथम विवाह के पहले से ही एक दूसरे से प्रेम करते थे, तभी महिला ने अब तक विवाह नहीं किया था।

हिंदी साहित्य के संसार में थोड़ी बहुत दखल रखने वाले लोग प्रसिद्ध लेखक एवम हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव की उसी समय प्रकाशित होने वाली आत्मकथा “मुड़ मुड़ के देखता हूँ” के हवाले से इस बात की तसदीक कर रहे थे कि महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी को शर्तिया तौर पर अपने प्रथम विवाह के पूर्व से ही जानते थे।

सभी लोगों में महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी को लेकर उत्सुकता थी। लोग तमाशाई ही ज्यादा थे।

जो लोग महेन्द्र बाबू को बहुत अरसे से जानते थे और उनके दूसरे विवाह के बाद के घटनाचक्रों से भी परिचित थे उनमें इस घटना ने बहस छेड़ दी थी। ऐसे लोगों में से कुछ संवेदनशील किस्म के लोगों के पास ही, महेन्द्र बाबू के इस कदम को समझ पाने का संतुलित दृष्टिकोण था।

महेन्द्र बाबू की छोटी बेटी, जो कभी उनकी बहुत करीबी थी, अपने पिता से सालों बात भी नहीं कर पायी और अब जब इस साल 2010 के अक्टुबर माह में महेन्द्र बाबू का देहांत हो गया, कभी कर भी नहीं पायेगी।

एक आदमी अपने बच्चों की परवरिश की खातिर बिना साथी के अकेले ही तीस-बत्तीस साल तक अपना जीवन होम करता रहता है पर जब वह पुनः अकेला रह जाता है बुढ़ापे में, और अपने खुद के लिये एक निर्णय लेता है तो वही बच्चे उसके खिलाफ हो जाते हैं।

अब जब महेन्द्र बाबू नहीं हैं तो क्या उनके चारों बेटे बेटियाँ कभी संतुलित ढ़ंग से अपने पिता के दृष्टिकोण को समझ पायेंगे? क्या उन्हे भी एक इंसान के रुप में स्वीकार कर पायेंगे?

…[राकेश]

नवम्बर 15, 2010

एक प्रश्न : एक उत्तर …(कविता- कृष्ण बिहारी)

 

मैंने कल उससे पूछा था –
वक्त,
गुजरा हुआ अतीत हो
या फिर वर्तमान
एक तमाशा ही तो है!

कल जो कुछ हुआ
मेरे साथ हुआ या तुम्हारे
हम उसमें कहीं नहीं थे
लेकिन
लोग थे,
ढ़ेर सारे लोग
और उनकी हैसियत
सिर्फ एक तमाशाई की थी
बस-
एक तमाशाई की हैसियत से
लोगों ने वक्त्त का
यानि की जो कुछ हमारे साथ हुआ
उसका तमाशा ही तो देखा!
इसलिये अब मैं सोचता हूँ
तमाशाई हो जाना
तमाशा हो जाने से बेहतर है!
“तुम्हारा क्या ख्याल है,
तुम क्या सोचती हो, बताओगी?”

मेरे मित्र!
तुम्हारे सवाल का जवाब
मेरे मौन में है
फिर भी यदि तुम शब्दों में जानना चाहो
तो, सुनो
वक्त्त, तमाशा, तमाशाई
सब बेकार की बातें हैं।
मैं और तुम
खाली ही कहाँ हैं कि
यह सब सोचें
आओ हम खुद में ही
खुद को खोजें।

{कृष्ण बिहारी}

नवम्बर 13, 2010

एक और सुबह…(कविता-रफत आलम)

रात ढ़ले
कमरे की दीवार पर हिलता डुलता
साया खामोश।

किताब आँखों से लग कर
दिल की धड़कन के साथ
बतियाने लगी
लाल हो चली आँखों के सामने
शब्दों की दुनिया रंगमय हुई।

उदासी की बेख्वाब सियाही से दूर
वक्त बहल गया आज भी
खिडकी की जालियों से
नीचे उतर कर चाँद
दूर ऊँचे काम्प्लेक्स के पीछे
छुप गया।

सुरमई धुँधलके नज़र आने लगे
परिंदे अब नहीं चहचाहते
कोई दरख्त ही नहीं बचा।

बजने लगे होर्न गाड़ियों के
सड़क पर चहल पहल हो चली
बरामदे मे फेंके गये
अखबार की आवाज़ से
टूटता हुआ बदन
अंगडाई लेकर खड़ा हुआ
जिंदगी के कैलेंडर में
जुड गयी
एक और सुबह।

(रफत आलम)

नवम्बर 10, 2010

दुनिया की रीत समझते आलम साब…(गज़ल-रफत आलम)

 

प्यादे से फरजी बने थे खूब इतराये आलम साब
वक्त ने ऐसी चाल चली चित आये आलम साब

तुमको समझाये कौन यही चलन है दुनिया का
मेरी कुटिया बनी रहे भाड़ में जाये आलम साब

सुबह के बुद्धु का आखिर यह अंजाम ही होना था
शाम हुई जब अंधेरी रोते घर आये आलम साब

पासे अदब कहाँ से आता निपट गंवार जो ठहरे
औकात हर महफ़िल में दिखा आये आलम साब

उतरने लगता है जब अँधेरा शाम के आंचल से
आने लगते हैं अपने घर कुछ साये आलम साब

निभता भी तो साथ कैसे मेल ही जब ऐसा था
वो सुबह नवेली तुम शाम के साये आलम साब

डगर भूलभुलैया की जिंदगी के रुपहले रास्ते थे
अबूझ इस सफर में गाढ़े भरमाये आलम साब

जगहँसाई जी भर हुई उसूलों की बात करने पर
घर बस्ती सब ठौर पागल कहलाये आलम साब

क्या ज़रुरी था कहकहों में उदासी लेके तुम जाते
अब भी तो बैठे हो ना मुँह लटकाए आलम साब

(रफत आलम)

नवम्बर 7, 2010

अनुपस्थिति का अहसास…(प्रेम कविता – कृष्ण बिहारी)

निश्चित रुप से नहीं कह सकता
कि उस एक पल में
ऐसा क्या था जब तुम्हारी दृष्टि ठहरकर
मुझमें उतर गयी थी
और सूरज के उजाले की तरह
अप्रयास पसरती गई थी।

कोई अनाम रिश्ता
गुमशुदा जान-पहचान
या फिर कुछ और।

कुछ भी तो नहीं लगता आज
मगर सच तो ये है कि
मैं उस उजाले से बुरी तरह त्रस्त हूँ
कि उजाला डसता क्यों है!

क्या ऐसी इसलिये तो नहीं कि
तुम साथ नहीं हो
या अगर हो भी तो अनुपस्थित क्यों हो
अपनी मौजूदगी से।

बताना पड़ता है मुझे तुमसे
कि..
मैं हूँ…
य़ह मैं हूँ
कितना मारक है
अपनी ही अनुपस्थिति का अहसास
वह भी
अपनी ही प्रिया के पास।

{कृष्ण बिहारी}

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