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नवम्बर 7, 2010

अनुपस्थिति का अहसास…(प्रेम कविता – कृष्ण बिहारी)

निश्चित रुप से नहीं कह सकता
कि उस एक पल में
ऐसा क्या था जब तुम्हारी दृष्टि ठहरकर
मुझमें उतर गयी थी
और सूरज के उजाले की तरह
अप्रयास पसरती गई थी।

कोई अनाम रिश्ता
गुमशुदा जान-पहचान
या फिर कुछ और।

कुछ भी तो नहीं लगता आज
मगर सच तो ये है कि
मैं उस उजाले से बुरी तरह त्रस्त हूँ
कि उजाला डसता क्यों है!

क्या ऐसी इसलिये तो नहीं कि
तुम साथ नहीं हो
या अगर हो भी तो अनुपस्थित क्यों हो
अपनी मौजूदगी से।

बताना पड़ता है मुझे तुमसे
कि..
मैं हूँ…
य़ह मैं हूँ
कितना मारक है
अपनी ही अनुपस्थिति का अहसास
वह भी
अपनी ही प्रिया के पास।

{कृष्ण बिहारी}

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