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नवम्बर 1, 2010

मौत की इबारत…(कविता-रफत आलम)

सड़क किनारे खड़े थे जो पेड़
अब नहीं हैं
कोलतार पुत गया है
उनकी कब्रों पर
दौड़ रही हैं तेज रफ़्तार गाडियां
काला धुआं उगलती हुयी।

हर शाम दिखता है
एक उदास मंज़र
शहर के किनारे का आकाश
सिंदूरी नहीं लगता
राख रंग का नज़र आता है।

कल एक जंगल और कटेगा
जिंदगी की दौड़ तेज रखने के लिए
क्षितिज पर सियाही से लिखी
मौत की इबारत को
कोई पढ़ नहीं पा रहा अभी!

 

(रफत आलम)

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