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जुलाई 20, 2017

हमारी गाए – मोहम्मद इस्माइल

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मई 23, 2016

मुसलमान … (देवी प्रसाद मिश्र)

कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे

ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे

वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया

वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे

उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की

प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे

न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे

वे मुसलमान थे

वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए

वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू

वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं

वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे

वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए

कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे

वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता

मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती

वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता

वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे

वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे

इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे

वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे

वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे

वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे

वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं

वे शहर के बाहर रहते थे

वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे

वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं

उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे

वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है

अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे

वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे

कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए

वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे

सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे

वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसल

मान थे अफ़वाह नहीं थे

वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे”

 

 (देवीप्रसाद मिश्र)
नवम्बर 26, 2010

कानून को ठेंगा दिखाते दिल्ली मेट्रो के पुरुष एवम महिला यात्री और पुलिस

कुछ साल पहले भारत ने मेरठ के एक पार्क में बैठे युवा जोड़ों को पीटती एक महिला पुलिस अधिकारी के तेवर देखे थे। अगर युवा जोड़े भारतीय कानून की किसी धारा का उल्लंघन कर रहे थे तो महिला पुलिस अधिकारी ने अपनी कानूनी जिम्मेदारी नहीं दिखायी बल्कि उन्हे अपने स्तर पर ही सबक सिखाने का फैसला लिया। जाने कैसे एक सभ्य समाज पुलिस को इतनी छूट दे देता है कि पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर सड़कों पर खुद ही फैसले लेने लग जायें? पुलिस के ऐसे कदमों का समर्थन करने वाले सामाजिक ठेकेदार दर असल एक निरंकुश पुलिस की बुनियाद गहरी और मजबूत कर रहे होते हैं।

भारत में जगह जगह पुलिस वालों को स्वयं ही कानून तोड़ते देखा जा सकता है।

देश के कुछ राज्यों में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को कानून की धज्जियाँ उड़ाकर आम जनता को पीटते, अपमानित करते हुये देश ने कई बार देखा है। लोकतंत्र में सिर्फ भारत में ही ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग समाज के ठेकेदार बनकर फतवे जारी कर दें और इन फतवों से अलग जीवन जी रहे लोगों को सरे आम पीटा जाये क्योंकि ठेकेदार संस्कृति बचाने की कोशिश कर रहे हैं!

दिल्ली मेट्रो ने महिलाओं के लिये अलग से आरक्षित कूपों की व्यवस्था की है जो कि एक सराहनीय कदम है। पर क्या बेहतर न होगा कि एक मेट्रो ट्रेन के कुल कूपों को इस तरह से आरक्षित किया जाये जिससे कि कूपे पुरुषों, महिलाओं और परिवार वालों एवम जोड़ों के लिये आरक्षित हों। जिससे हर तरह के यात्री गण सहुलियत के साथ यात्रा कर सकें। मसलन दिल्ली मेट्रो एक ट्रेन में महिलाओं, पुरुषों एवम परिवारों, प्रत्येक के लिये 33-33% आरक्षण दे सकता है और बाकी बचे 1% को विकलांग यात्रियों के लिये। न्यायोचित बात तो यही है कि कोई भी वर्ग दूसरे वर्ग के लिये आरक्षित वर्ग के कूपों में अनाधिकृत प्रवेश न करे।

बहरहाल अभी तो दिल्ली मेट्रो के कर्ता-धर्ता इतना ही दिमाग लगा पाये हैं कि महिला यात्रियों के लिये कुछ कूपे आरक्षित कर दिये गये हैं।

वैसे ऐसे किसी भी आरक्षण की व्यवस्था भारतीय समाज के मुँह पर तमाचा जड़ती है क्योंकि ऐसी व्यवस्था यह बताती है कि भारतीय इतने सभ्य नहीं हैं कि महिलायें सुरक्षित तरीके से पूरी सहुलियत के साथ पुरुषों के साथ यात्रा कर सकें।

खबर है कि दिल्ली मेट्रो की महिला यात्रियों एवम पुलिस ने महिलाओं के लिये आरक्षित कूपों में घुस आये पुरुष यात्रियों को पीटा। मेट्रो स्टेशन्स पर चेतावनी लिखी हुयी है कि महिला कूपे में यात्रा कर रहे पुरुष यात्री पर 200 रुपयों का जुर्माना लगाया जायेगा।

पुलिस ने अपना कानूनी कर्तव्य नहीं निभाया और महिला कूपों में अनाधिकृत प्रवेश कर यात्रा कर रहे पुरुष यात्रियों पर जुर्माना नहीं लगाया बल्कि उन्हे पीट कर बाहर निकाला, उन्हे स्टेशन पर मुर्गा बनाया गया, शारीरिक प्रताड़ना दी गयी। अगर पुलिस ही सड़कों पर फैसले लेने लगेगी तो न्याय व्यवस्था क्या करेगी?

[ देखें वीडियो ]

गुण्डागर्दी चाहे पुरुषों की हो, महिलाओं की हो निंदनीय है और इन सबसे बढ़कर निंदनीय है पुलिस की गुण्डागर्दी। देश के कानून का सम्मान करने की शपथ लेकर वर्दी पहन कर अधिकार पाने वाली पुलिस से कानून के दायरे में रहकर जनता की सेवा करने की अपेक्षा हरेक लोकतांत्रिक और सभ्य समाज कर सकता है।

अगर भारत में पुलिस का निरंकुश शासन ही चाहिये तो पुलिस और जनता की ऐसी गतिविधियों पर आँखें मूँद कर ताली बजायी जा सकती है, पर ऐसे ही छोटे छोटे कदम बढ़कर आगे चलकर तानाशाही और दिन दहाड़े एनकाऊंटर्स में बदल जाते हैं और तब किये गये स्यापे किसी काम के नहीं होते!

जून 1, 2010

हफीज मेरठी : शायर के खून और पसीने से टपके सात सुर

शानो शौकत के लिये तू परेशान है
और मेरी य’ तमन्ना कि तेरा किरदार बने


यह बाँकपन है हमारा कि जुल्म पर हमने
बजाय माला ओ फरियाद के शाइरी की है


पैगाम ये मिला है जनाबे हफीज को
अंजाम पहले सोच लें तब शाइरी करे


पैरहन की मैने जब तारीफ की कहने लगे
हम तुम्हे अच्छे लगे या पैरहन अच्छा लगा


बारी बारी जागना है खौफ से शबखून के
हम तभी सोयेंगे जब बेदार हो जायेंगे आप


हमारा ही जिगर है यह हमारा ही कलेजा है
हम अपने जिस्म रखते हैं नमकदानों से वाबस्ता


हिसारे जब्र में जिंदा बदन जलाये गये
किसी ने दम नहीं मारा मगर धुँआ बोला
कहा न था कि नवाजेंगे हम हफीज तुझे
उड़ा के वह मेरे दामन की धज्जियाँ बोला

मई 31, 2010

हफीज मेरठी : तीन मोती शायर की विरासत से

कुछ लोग शायद परिचित न हों उर्दू के शायर मरहूम हफीज मेरठी और उनकी शायरी से। मेरठ के रहने वाले हफीज साब ने जिन्दगी से जुड़ी हुयी शायरी की। उनकी शायरी को केवल समय बिताने का ख्याल लिये हुये नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि उनके शब्द पढ़ने वाले को अन्दर तक झकझोरते हैं। उनके शब्द पढ़ने वाले की नींद को तोड़ते हैं। अगर व्यक्ति किसी भी किस्म की खुमारी से घिरा हुआ अपना समय व्यतीत कर रहा है तो मरहूम शायर के शब्द उसकी खुमारी तोड़ कर उसे धरती पर जीते आदमी की जिन्दगी की असलियत से वाकिफ करा देते हैं।

जो लोग कभी भी उनकी शायरी से रुबरु नहीं हुये हैं ऐसे लोगों के लिये हफीज साब द्वारा अपने पीछे छोड़े गये शायरी के अनमोल खजाने से तीन रत्न यहाँ पेश किये जा रहे हैं।

दुआऐं तुमको न दूँगा ऐशो इशरत की,
कि जिन्दगी को जरुरत है सख्त मेहनत की।

बस यही दौड़ है इस दौर के इंसानों की,
तेरी दीवार से ऊँची मेरी दीवार बने

कहीं चमन में नई पौध को जगह न मिले
यह सोच असल में अहसासे कमतरी की है

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