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नवम्बर 16, 2010

विवाह

महेन्द्र सिंह की सबसे छोटी संतान की उम्र उस वक्त्त तकरीबन 3 साल की थी जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। चार संतानों, दो बेटियों और दो बेटों, को उन्होने ही माँ और पिता, दोनों की जिम्मेदारी निभाते हुये पाला और बड़ा किया। रिश्तेदारों एवम शुभचिंतकों ने उस वक्त्त उन पर बहुत जोर डाला था कि वे पुनः विवाह कर लें किसी ऐसी स्त्री से जो उनके बच्चों को माँ जैसा लालन-पालन दे सके, परंतु महेन्द्र बाबू नहीं माने, वे बच्चों को सौतेली माँ की छाया देने का रिस्क उठाने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्होने बड़े लाड़-प्यार और भरपूर जिम्मेदारी के साथ अपने बच्चों को पाला। दोनों बेटियाँ बेटों से बड़ी थीं और जब वे कुछ सयानी हो गयीं तो महेन्द्र बाबू को बेटों को पालने में उतनी मुश्किल न उठानी पड़ी और बेटियों ने घर और अपने छोटे भाइयों को अच्छी तरह से सम्भालना शुरु कर दिया।

उचित समय पर महेन्द्र बाबू ने योग्य वरों के साथ अपनी दोनों पुत्रियों के विवाह कर दिये। पुत्रियाँ सुखी रहीं। उनके जाने से घर के प्रबंधन में कुछ दिक्कते आयीं पर महेंद्र बाबू ने जल्दी ही सब कुछ सम्भाल लिया। बेटियाँ उनके बेहद नजदीक थीं अतः भावनात्मक रुप से दूरी खलती रही महेन्द्र बाबू को पर जीवन भर उन्होने घर और बाहर के जीवन और अपने व्यक्तिगत जीवन को बड़े ही संतुलन से जिया था अतः वे शीघ्र ही सम्भल गये।

कुछ साल बाद बेटे भी नौकरी आदि के सिलसिले में दूसरे शहरों में चले गये और फिर उनके भी विवाह हो गये।

बेटे-बेटियाँ अपने अपने जीवन साथियों एवम बच्चों के साथ त्यौहार आदि पर महेन्द्र बाबू से मिलने आते रहते थे। बेटियाँ, बेटों से ज्यादा चक्कर लगातीं। उन्हे अपने पिता के त्यागमयी जीवन का भरपूर ज्ञान था। उन्होने बचपन से पूरे होश में पिता को चारों भाई बहनों के सुख और विकास के लिये जमीन आसमान करते हुये देखा था। फोन से तो वे लगभग हर तीसरे चौथे दिन पिता से बात कर लेतीं थीं।

महेंद्र बाबू साठ के करीब के हो चले थे जब सहसा ही वे गम्भीर रुप से बीमार पड़ गये। बेटे तो उनके दूर थे, एक बेटी भी दूर थी। एक ही बेटी आ पायी वह भी एक दिन बाद। पर वह भी तीमारदारी के लिये रह नहीं सकती थी। बच्चों के इम्तिहान आदि के कारण वह रात को रुक नहीं पायी और एक- दो दिन बाद फिर से आने के लिये कह कर चली गयी।

एक-दो दिन में सभी बेटे बेटियाँ आकर देख गये महेंद्र बाबू को। समय लगा उन्हे पर वे ठीक हो गये।

संतुलित रुप से हँसमुख महेंद्र बाबू बीमारी के बाद कुछ ज्यादा ही गम्भीर हो गये। वे ज्यादातर समय कुछ सोचते रहते थे।

समय बीतता गया। साल-डेढ़ साल बाद की बात है जब चारों संतानों को महेन्द्र बाबू का संदेश मिला कि वे विवाह कर रहे हैं।

बेटियाँ, दामाद, बेटे एवम बहुयें, सभी पहले तो आश्चर्यचकित रह गये और फिर उन्हे महेन्द्र बाबू पर गुस्सा आने लगा।

आठों लोगों को इस बात की फिक्र थी कि लोग उन सबके बारे में क्या सोचेंगे?

इंसानी फितरत ही ऐसी है कि स्वहित बड़ी जल्दी ही सभी समझ लेते हैं।

बेटों को उनकी पत्नियों ने समझा दिया.”ज्यादा हल्ला मचाने की जरुरत नहीं है। एक तरह से बाबू जी ठीक ही कर रहे हैं। अब अगर इस बार बीमार पड़ गये और उन्हे यहाँ लाना पड़ गया तो उनकी तीमारदारी कौन करेगा। हमारे बस की बात तो है नहीं”।

ऐसी सीख पाकर बेटों को व्यवहारिकता समझ में आ गयी और वे सामान्य मुद्रा में आ गये और जब बहनों के फोन आये तो उनसे कह दिया,” दीदी हम कर ही क्या सकते हैं, बाबू जी ने अगर ठान ही लिया है कि वे विवाह करेंगे तो हम कैसे उन्हे रोक सकते हैं। हम विवाह में सम्मिलित तो होने से रहे। उनके विवाह के बाद वहाँ जाना भी मुश्किल हो जायेगा”।

बेटियाँ और दामाद कुछ ज्यादा ही नाराज था। बेटियों को तो महेन्द्र बाबू के पास जाकर रहना नहीं था और न ही महेन्द्र बाबू बेटियों के घर आकर रहने वाले थे तब भी दोनों दामाद, अपने पत्नियों को डाँट रहे थे,” तुम्हारे बाप के ऐसा करने के बाद क्या हमारे बच्चों की शादी में दिक्कतें नहीं आयेंगी? तुम्हारे बाप ने हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा”।

बेटियों ने फोन पर ही अपने पिता को समझाने की बहुत कोशिश की। गुस्से में थोड़ी खरी खोटी भी सुनायी पर महेन्द्र बाबू शांत भाव से इतना ही बोले,” मैंने तय कर लिया है, मुझे लगता है कि मुझे साथी की आवश्यकता है, और मेरा ऐसा करना तुम लोगों में से किसी के जीवन को प्रभावित नहीं करता। तुम सब लोग अपने अपने जीवन में रमे हुये हो। मैं यहाँ अकेला रहता हूँ। मैंने आज या कल क्या खाया, या मैं कहाँ गया, क्या इन सब बातों से तुम्हारा जीवन प्रभावित होता है? मुझे विवाह की ऐसी ही जरुरत होती तो मैं पच्चीस तीस साल पहले न कर लेता?  पर तब तुम लोग मेरे साथ थे। आज तो मैं निपट अकेला हूँ। वक्त्त ने मुझे ऐसा मौका दिया है कि मैं बुढ़ापे में एक अच्छे साथी के साथ बचे जीवन के साल या महीने जी सकता हूँ। मुझे रत्ती भर भी ऐसा महसूस नहीं हो रहा कि मैं कहीं से भी गलत हूँ। तुम लोग आना चाहो तो विवाह में सम्मिलित होने आ जाना। मुझे अच्छा लगेगा। शायद मेरे जीवन साथी से मिलकर तुम्हारे गिले शिकवे दूर हो जायें”।

महेन्द्र बाबू ने अपने नजदीकी मित्रों की उपस्थिति में बेहद सादे तरीके से मंदिर में विवाह कर लिया। उनकी चारों संतानों में से कोई नहीं आया।

बेटे और बेटियों ने अब फोन भी करना बंद कर दिया।

महेन्द्र बाबू ऐसी किसी भी जगह शादी आदि के मौकों पर न जाते जहाँ उन्हे लगता कि उनके बच्चे भी आयेंगे और उनकी स्थिति खराब हो सकती है रिश्तेदारों के सामने अपने ऐसे पिता को देखकर नज़रअंदाज़ करने में, जिन्होने इतनी बड़ी उम्र में विवाह किया है। महेन्द्र बाबू अपनी मिलनसारिता और सबकी सहायता करने की प्रवृति के कारण अपने रिश्तेदारों में अच्छे खासे लोकप्रिय थे और कुछ लोग उन्हे अभी भी इसलिये बुलाते थे क्योंकि विगत में महेन्द्र बाबू ने उनकी किसी न किसी रुप में सहायता की थी। कुछ इस उत्सुकता में निमंत्रण भेजते थे कि उस महिला को तो देखें जिनसे विवाह करने के लिये महेन्द्र बाबू ने अपने बच्चों की नाराज़गी मोल ली और कुछ सिर्फ मज़े लेने के लिये उन्हे आमंत्रित करते थे और यह भी सुनिश्चित करते थे कि निमंत्रण महेन्द्र बाबू की चारों संतानों को भी जरुर जाये। ऐसे लोग देखना चाहते थे कि हो सकता है सब लोग आ जायें और बाकी सबको कुछ तमाशा देखने को मिल जाये।

पर महेन्द्र बाबू ने ऐसा कोई अवसर उत्पन्न ही नहीं होने दिया जहाँ उनकी उपस्थिति की वजह से उनके बेटों और बेटियों को किसी समस्या का सामना करना पड़े।

लोगों में बातें भी उठने लगी थी। बहुत सारे लोग महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी की खूबसूरती और सलीकेदार तौर तरीके की चर्चा करते थे, कुछ उनके बेटों और बेटियों तक यह सूचना पहुँचा आये थे कि असल में महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी बनने वाली महिला को बहुत पहले से जानते हैं। कुछ ने यह कयास भी लगा लिया कि शायद अपनी पहली शादी के पहले से ही| शायद दोनों साथ ही पढ़ते हों और जाति भिन्नता के कारण वे दोनों जवानी में शादी न कर पाये थे। पर दोनों महेन्द्र बाबू के प्रथम विवाह के पहले से ही एक दूसरे से प्रेम करते थे, तभी महिला ने अब तक विवाह नहीं किया था।

हिंदी साहित्य के संसार में थोड़ी बहुत दखल रखने वाले लोग प्रसिद्ध लेखक एवम हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव की उसी समय प्रकाशित होने वाली आत्मकथा “मुड़ मुड़ के देखता हूँ” के हवाले से इस बात की तसदीक कर रहे थे कि महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी को शर्तिया तौर पर अपने प्रथम विवाह के पूर्व से ही जानते थे।

सभी लोगों में महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी को लेकर उत्सुकता थी। लोग तमाशाई ही ज्यादा थे।

जो लोग महेन्द्र बाबू को बहुत अरसे से जानते थे और उनके दूसरे विवाह के बाद के घटनाचक्रों से भी परिचित थे उनमें इस घटना ने बहस छेड़ दी थी। ऐसे लोगों में से कुछ संवेदनशील किस्म के लोगों के पास ही, महेन्द्र बाबू के इस कदम को समझ पाने का संतुलित दृष्टिकोण था।

महेन्द्र बाबू की छोटी बेटी, जो कभी उनकी बहुत करीबी थी, अपने पिता से सालों बात भी नहीं कर पायी और अब जब इस साल 2010 के अक्टुबर माह में महेन्द्र बाबू का देहांत हो गया, कभी कर भी नहीं पायेगी।

एक आदमी अपने बच्चों की परवरिश की खातिर बिना साथी के अकेले ही तीस-बत्तीस साल तक अपना जीवन होम करता रहता है पर जब वह पुनः अकेला रह जाता है बुढ़ापे में, और अपने खुद के लिये एक निर्णय लेता है तो वही बच्चे उसके खिलाफ हो जाते हैं।

अब जब महेन्द्र बाबू नहीं हैं तो क्या उनके चारों बेटे बेटियाँ कभी संतुलित ढ़ंग से अपने पिता के दृष्टिकोण को समझ पायेंगे? क्या उन्हे भी एक इंसान के रुप में स्वीकार कर पायेंगे?

…[राकेश]

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जुलाई 14, 2010

गालिब छुटी शराब : मयखाने से होशियार लौटते रवीन्द्र कालिया

बात सूफियों की हो तो उनकी मधुशाला तो भिन्न होती है, उनकी मधु ही कुछ अलग होती है और वहाँ ऐसा आदमी तो बेकार है जो इतनी न पी ले कि होश खो जाये। वे तो कहते हैं

वही है बेखुदे-नाकाम तुम समझ लेना
शराबखाने से जो होशियार आयेगा।

पर आम जीवन में जो मयखाने से होशियार लौट आये उसे भाग्यशाली ही समझा जायेगा। आम जन जीवन वाला मयखाना तो एक ही रास्ते पर भेजता है और मयकशी के रास्ते पर अत्यंत रुचि के साथ चलने वाले के लिये ही किसी ने कहा है कि

कारवां खड़ा रहा
और वे अपनी दुकान बढ़ा चले।

जीवन के कितने कामों को अधूरा छोड़कर, अति प्रिय सपनों को पूरा करने का प्रयास करे बगैर ही आदमी कूच कर जाता है। मयगोशी के ऐसे ही वन वे ट्रैफिक वाले रास्ते से वरिष्ठ साहित्यकार श्री रवीन्द्र कालिया न केवल वापिस घर आ गये बल्कि उन्होने वापसी के इस सफर में गुजारे क्षणों में, जब वे लगभग अकेले ही यात्रा कर रहे थे, सबको अकेले ही करनी पड़ती है ऐसी यात्रा, एक बहुत ही जीवंत किताब की रचना भी कर दी। किताब की अवधारणा तो तभी बन गयी होगी जब वे वापिस जीवन की ओर आने के लिये प्रयासरत रहे होंगे, किताब को लिखा भले ही कुछ समय बाद हो उन्होने।

गालिब छुटी शराब” एक जीवंत आत्मकथा है। यह शुरु से अंत तक रोचक है और कितने ही पाठक इसे एक ही बार में पढ़ गये होंगे और जिन्होने नहीं पढ़ी है वे एक ही बार में पढ़ जाने के लिये विवश हो जायेंगे, जब भी पुस्तक उनके हाथ पड़ेगी। आत्मकथाओं के साथ ऐसा कम ही होता है और ज्यादातर पाठक इन्हे किस्तों में पढ़ते हैं क्योंकि भले ही बहुत अच्छी सामग्री इन किताबों में हो पर कहीं न कहीं वे बोझिल हो उठती हैं और लगातार पढ़ना थोड़ा भारी लगता है पाठकों को।

गालिब छुटी शराब” के साथ ऐसा नहीं है। हास्य तो हर पन्ने पर बिखरा पड़ा है और केवल दूसरों की ही खिंचाई रवीन्द्र कालिया जी ने इस हास्य बोध के द्वारा नहीं की है बल्कि बहुत निर्ममता से अपना और अपनी आदतों का पोस्ट-मार्टम भी किया है। इंसान का दिल तो दुखता ही दुखता है पर इस दुख को भी लेखक ने हास्य के आवरण में लपेट कर पेश किया है और अपनी तरफ से भरकस कोशिश की है कि सब कुछ पाठक हँसते हँसते हुये ही समझ जाये।

गालिब छुटी शराब” को पढ़ना “चार्ली चैप्लिन” की बेहतरीन मूक फिल्में देखने जैसा है जहाँ दर्शक उनके द्वारा घटनाओं को दर्शाने के तौर तरीकों पर हँसता भी रहता है और उनके द्वारा निभाये गये पात्र के दुखों को महसूस भी करता रहता है। ऐसा संतुलन बनाये रखना अत्यंत कठिन काम है। इस तरह की शैली में लिखी दूसरी आत्मकथा हिन्दी साहित्य में याद नहीं पड़ती हाँ मराठी में जरुर रामनगरकर की आत्मकथा रामनगरी ऐसी ही शैली में लिखी गयी थी जहाँ जीवन के मार्मिक प्रसंगों को भी हास्यबोध के मुलम्मे से ढ़क कर प्रस्तुत किया गया था।

पुस्तक पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी सपाट चेहरे से हास्य उत्पन्न करने वाली बातें कहने में पारंगत होंगे। दिल्ली में अपने मित्र के साथ माता के दरबार में हाजिरी लगाने वाले प्रसंग में उनकी यह प्रतिभा अपने विकट रुप में सामने आती है। ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ पाठक पढ़ते पढ़ते हँसी से लोट पोट हो सकते है।

कन्हैया लाल नंदन जी के साथ इलाहाबाद पहुँचने वाला प्रसंग भी रवीन्द्र जी की कलम की श्रेष्ठता हास्य के क्षेत्र में दर्शाता है।

गालिब छुटी शराब” में सिर्फ हास्य ही नहीं है बल्कि जीवन के और भी दूसरे रंग अपनी छटा बिखेरते हुये सामने आते हैं। ग़ालिब का नाम शीर्षक में शामिल है तो शायरी की मौजूदगी पुस्तक में मौजूद होना भरपूर वाजिब है और मौकों पर बड़े माकूल शे’र सामने आते रहते हैं। पिछले पाँच दशकों में हिन्दी साहित्य में उभरे कितने ही नाम जीवंत होकर उभरते रहते हैं। एक ही व्यक्ति का अलग अलग व्यक्तियों से अलग अलग किस्म का सम्बंध हो सकता है और अब जब रवीन्द्र कालिया जी की पीढ़ी के रचनाकार आत्मकथायें लिखने की ओर अग्रसर हैं तो अलग अलग रचनाकार इन रचनाओं में अलग अलग रुपों में नजर आयेंगे। कितनी बातें प्रभावित करती हैं किसी भी व्यक्ति का रेखाचित्र लिखने में।

एक तो रचनाकार को उसकी रचनाओं के जरिये जानना होता है, और एक होता है उसे व्यक्तिगत रुप से जानना और दोनों रुप काफी हद तक अलग हो सकते हैं और होते हैं अगर ऐसा न होता तो प्रेमकहानियों की रचना करने वाले रचनाकारों के अपनी पत्नी या प्रेमिका/ओं से अलगाव न हुआ करते। व्यक्तिगत सम्बंध रचनाकार की समझ, दृष्टिकोण और कलम को भी कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में प्रभावित करते ही हैं।

गालिब छुटी शराब” पढ़कर ऐसा भी प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी की याददाश्त बहुत अच्छी होनी चाहिये या फिर हो सकता है कि वे अपने कालेज के दिनों से ही डायरी लिखते रहे हों क्योंकि बहुत पहले के प्रसंग भी अपनी पूरी जीवंतता के साथ सामने आते हैं और एक अन्य खासियत इस पुस्तक की यह लगती है कि रवीन्द्र जी ने अपनी वर्तमान आयु की समझदारी का मुलम्मा पुराने प्रसंगों और काफी पहले जीवन में आये व्यक्तियों की छवि पर नहीं चढ़ाया है और जैसा तब सोचते होंगे उन लोगों के बारे में या जैसा उन्हे देखा होगा वैसा ही उनके बारे में लिखा है। चाहे पंजाब में गुजारे हुये साल हों या बम्बई, दिल्ली और इलाहाबाद में गुजारे साल, यह बात सब जगह दिखायी देती है।

केवल व्यक्ति ही नहीं वरन वे सब जगहें भी, जहाँ रवीन्द्र जी ने अपने जीवन का कुछ समय व्यतीत किया, अपने पूरे जीवंत रुप में किताब के द्वारा पाठक के सामने आती हैं। खासकर इलाहाबाद के मिजाज को लेखक ने खास तवज्जो दी है। अमरकांत जी और राजेन्द्र यादव जी जैसे प्रसंगों के जरिये उन्होने इलाहाबादी माहौल और हिन्दी साहित्य के पिछले चालीस-पचास सालों के धुरंधर नामों के बीच बिछी, अदृष्य शतरंज की झलक भी दिखायी है। हर काल में समकालीनों के मध्य ऐसा ही होता है।

किताब में केवल शराब, लेखन, पार्टियाँ और धमाल आदि ही नहीं है वरन रवीन्द्र जी ज्योतिष और होम्योपैथी चिकित्सा शैली से अपनी मुठभेड़ और स्वाध्याय के आधार पर दोनों ही क्षेत्रों में कुछ समय तक डूबकर इन विधाओं के प्रति उत्पन्न अपने लगाव की भी चर्चा करते हैं। उनके जीवन में भविष्यवाणियों ने असर दिखाया, इस बात की पुष्टि उन्होने कुछ प्रसंगों द्वारा की है। संजय गाँधी की असमय मृत्यु की भविष्यवाणी हो या दिवंगत राजनेता चन्द्रशेखर द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की घोषणा सत्तर के दशक में ही करने वाला प्रसंग हो या चेहरा देख कर ही व्यक्ति का भूत-वर्तमान और भविष्य बता सकने के प्रसंग हों, रहस्यवाद का जीवन में स्थान है यह बात आत्मकथा दर्शाती है।

आत्मकथा इस बात को स्थापित करती है कि जवानी में रवीन्द्र जी यारों के यार वाले ढ़ांचे में रहे होंगे और कुछ हद तक आदर्शवाद भी उनके मन मस्तिष्क पर छाया रहता होगा वरना डा. धर्मवीर भारती से जुड़े प्रसंग उनकी किताब में इस तरह से उभर कर न आते आखिरकार पुस्तक यही बताती है कि व्यक्तिगत रुप से डा भारती हमेशा अच्छे ही रहे रवीन्द्र जी के लिये परन्तु रवीन्द्र जी ने उनका विरोध उनकी सामान्य छवि के आधार पर किया।

किताब रवीन्द्र जी के जीवन में आये साहित्यकारों, राजनेताओं और अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत करती है।

यह बात जरुर गौर करने वाली है कि क्या कोई भी साहित्यकार बिल्कुल निरपेक्ष रह पाता है जब वह अपने जीवन में आये लोगों और खासकर प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में लिखता है?

क्या लेखक की कलम भेदभाव करती है मित्रों, गहरे मित्रों, परिचितों और व्यक्तिगत रुप से अपरिचित लोगों के प्रति?

गालिब छुटी शराब में भी कहीं कहीं इस अंतर को महसूस किया जा सकता है।

आशा की जा सकती है कि पूर्ण रुप से स्वास्थ्य लाभ करके पुनः साहित्य की दुनिया में पुरजोर सक्रिय होने वाले श्री रवीन्द्र कालिया इस बाद के जीवन पर भी अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लिखंगे।

जिसने न पढ़ी हो वे अवश्य पढ़ें इस बेहद रोचक ढ़ंग से लिखी आत्मकथा को।

जून 24, 2010

अर्द्धनारीश्वर

हिन्दी में छपने वाली प्रसिद्ध पत्रिका हंस में इधर उधर छपी रचनाओं में व्याकरण की गलतियाँ ढ़ूँढ़ कर उन्हे सुधारने का सुझाव देने वाले, मनोरंजक और शैक्षणिक मूल्यों वाले एक स्तम्भ, अक्षरश: में इसके लेखक श्री अभिनव ओझा ने हंस के मई 2010 के अंक में अपने पहले ही सुधार में निम्नलिखित सुझाव दिया है,

हिजड़ा औरत या हिजड़ा मर्द नहीं होते मित्र! हिजड़ा अपने आप में अर्द्धनारीश्वर है “।

मूल पंक्ति थी ” उन तीन जवान हिजड़ा औरतों के कानों में यह बात पड़ी

श्री अभिनव ओझा की सुधारवादी पंक्तियों में कुछ पेंच हैं।

भारत में अर्द्धनारीश्वर की परिकल्पना हिन्दू मिथकों और विशेषकर शिव के अर्द्धनारी और अर्द्ध पुरुष रुप से जुड़े मिथक से पनपी है। यह सिर्फ मानव का लिंग निर्धारण करने वाले अंगों और उनमें किसी किस्म के अभाव आदि से जुड़ी छवि नहीं है बल्कि अर्द्धनारीश्वर रुप में शिव का पूरा शरीर ही स्त्री और पुरुष दो भागों का मिश्रण है।

तो ऐसे में किसी किन्नर को या किसी भी स्त्री या पुरुष को अर्द्धनारीश्वर कहा जाना संदेह उत्पन्न करता है। व्याकरण की दृष्टि से तो पता नहीं परंतु माइथोलॉजी की दृष्टि से तो ऐसा कहना गलत ही लगता है। यह तो ऐसा ही है जैसे किसी भी ब्राह्मण शूरवीर को परशुराम कहने लगो, और क्षत्रिय को रामराम और परशुराम नाम रखना और बात है या उन जैसा बताना और बात है परन्तु कोई कितना भी शूरवीर क्यों न हो, लोग उन्हे हिन्दू
माइथोलॉजी वाले राम और परशुराम तो नहीं कहने लगेंगे।

अर्द्धनारीश्वर, आधुनिक काल में ज्यादा उपयोग में आने वाले शब्द हरिजन जैसा शब्दमात्र नहीं है। अर्द्धनारीश्वर कोई खास वर्ग नहीं है। स्त्री, पुरुष और किन्नर तीन अलग अलग वर्ग हैं मनुष्य जाति के, पर अर्द्धनारीश्वर के साथ ऐसा नहीं है। अर्द्धनारीश्वर एक अतिविशिष्ट शब्द है और इसके पीछे एक विशिष्ट कथा है, इसके साथ एक विशिष्ट मिथक का जुड़ाव रहा है। यह तो महेश, शंकर और रुद्र की भाँति शिव का ही एक रुप है।

आम आदमी किन्नरों को भले ही एक ही परिभाषा से समझता हो या उनकी प्रकृति से अंजान रहता हो पर व्यवहार में यही देखने में आता है कि किन्नर भी अपने आप को स्त्री किन्नर या पुरुष किन्नर रुप में प्रस्तुत करते हैं हाँलाकि नाचने और गाने वाला काम करते हुये वे अधिकतर स्त्री वेश में ही ज्यादा देखे जाते हैं।

सिर्फ व्यवहार में ही ऐसा नहीं होता कि कोई स्त्री  एक पुरुष जैसा व्यवहार करे उस जैसी आदतें और प्रवृति और प्रकृति रखे और कोई पुरुष एक स्त्री जैसा रहे बल्कि अस्तित्व की गहराई में तो हरेक स्त्री के अंदर एक पुरुष भी है और हरेक पुरुष के अंदर एक स्त्री। पुरुषों में ऊपरी सतह पर पुरुष गुण अधिकता में होते हैं और स्त्री में स्त्रियोचित गुणों की अधिकता होती है। पर बने तो दोनों स्त्री पुरुष के संगम से ही हैं।

मूल विषय पर वापिस आयें तो प्रश्न उठता है कि अर्द्धनारीश्वर तो छोड़िये क्या किन्नर को अर्द्धनारी भी कहा जा सकता है?

यदि हाँ तब तो अर्द्धपुरुष भी किन्नरों में ही होने चाहियें?

कोई जानकार इस बारे में कुछ कह पायेगा क्या? हो सकता है लोग अर्द्धनारीश्वर शब्द का प्रयोग किन्नर समुदाय के लोगों के लिये करते रहे हों पर क्या यह उचित है?

ऐसा देखा गया है कि प्राय: हिजड़ा शब्द तब प्रयोग में लाया जाता है जब सामान्य नर नारी किन्नरों को अपने से थोड़ा नीचे का दर्जा देकर देखते हैं और कई लोग तो इस वर्ग को अपमानित करने की मंशा से हिजड़ा शब्द का प्रयोग करते हैं। पुरुषों को अपमानित करने की मंशा से भी उन्हे हिजड़ा शब्द से सम्बोधित किया जाता है और ऐसा वातावरण तैयार करने में साहित्य और खास कर फिल्मों ने भी अपना भरपूर योगदान दिया है, मानो पुरुष का पौरुष सिर्फ उसकी सैक्सुअल संभावना और क्षमता से मापा जा सकता है!

किन्नर भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से चला रहा एक वृहद रुप से स्वीकृत नाम है और क्यों न इसी एक नाम का उपयोग किया जाये इस वर्ग को सम्बोधित करने के लिये!

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