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नवम्बर 10, 2010

दुनिया की रीत समझते आलम साब…(गज़ल-रफत आलम)

 

प्यादे से फरजी बने थे खूब इतराये आलम साब
वक्त ने ऐसी चाल चली चित आये आलम साब

तुमको समझाये कौन यही चलन है दुनिया का
मेरी कुटिया बनी रहे भाड़ में जाये आलम साब

सुबह के बुद्धु का आखिर यह अंजाम ही होना था
शाम हुई जब अंधेरी रोते घर आये आलम साब

पासे अदब कहाँ से आता निपट गंवार जो ठहरे
औकात हर महफ़िल में दिखा आये आलम साब

उतरने लगता है जब अँधेरा शाम के आंचल से
आने लगते हैं अपने घर कुछ साये आलम साब

निभता भी तो साथ कैसे मेल ही जब ऐसा था
वो सुबह नवेली तुम शाम के साये आलम साब

डगर भूलभुलैया की जिंदगी के रुपहले रास्ते थे
अबूझ इस सफर में गाढ़े भरमाये आलम साब

जगहँसाई जी भर हुई उसूलों की बात करने पर
घर बस्ती सब ठौर पागल कहलाये आलम साब

क्या ज़रुरी था कहकहों में उदासी लेके तुम जाते
अब भी तो बैठे हो ना मुँह लटकाए आलम साब

(रफत आलम)

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