विवाह

महेन्द्र सिंह की सबसे छोटी संतान की उम्र उस वक्त्त तकरीबन 3 साल की थी जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। चार संतानों, दो बेटियों और दो बेटों, को उन्होने ही माँ और पिता, दोनों की जिम्मेदारी निभाते हुये पाला और बड़ा किया। रिश्तेदारों एवम शुभचिंतकों ने उस वक्त्त उन पर बहुत जोर डाला था कि वे पुनः विवाह कर लें किसी ऐसी स्त्री से जो उनके बच्चों को माँ जैसा लालन-पालन दे सके, परंतु महेन्द्र बाबू नहीं माने, वे बच्चों को सौतेली माँ की छाया देने का रिस्क उठाने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्होने बड़े लाड़-प्यार और भरपूर जिम्मेदारी के साथ अपने बच्चों को पाला। दोनों बेटियाँ बेटों से बड़ी थीं और जब वे कुछ सयानी हो गयीं तो महेन्द्र बाबू को बेटों को पालने में उतनी मुश्किल न उठानी पड़ी और बेटियों ने घर और अपने छोटे भाइयों को अच्छी तरह से सम्भालना शुरु कर दिया।

उचित समय पर महेन्द्र बाबू ने योग्य वरों के साथ अपनी दोनों पुत्रियों के विवाह कर दिये। पुत्रियाँ सुखी रहीं। उनके जाने से घर के प्रबंधन में कुछ दिक्कते आयीं पर महेंद्र बाबू ने जल्दी ही सब कुछ सम्भाल लिया। बेटियाँ उनके बेहद नजदीक थीं अतः भावनात्मक रुप से दूरी खलती रही महेन्द्र बाबू को पर जीवन भर उन्होने घर और बाहर के जीवन और अपने व्यक्तिगत जीवन को बड़े ही संतुलन से जिया था अतः वे शीघ्र ही सम्भल गये।

कुछ साल बाद बेटे भी नौकरी आदि के सिलसिले में दूसरे शहरों में चले गये और फिर उनके भी विवाह हो गये।

बेटे-बेटियाँ अपने अपने जीवन साथियों एवम बच्चों के साथ त्यौहार आदि पर महेन्द्र बाबू से मिलने आते रहते थे। बेटियाँ, बेटों से ज्यादा चक्कर लगातीं। उन्हे अपने पिता के त्यागमयी जीवन का भरपूर ज्ञान था। उन्होने बचपन से पूरे होश में पिता को चारों भाई बहनों के सुख और विकास के लिये जमीन आसमान करते हुये देखा था। फोन से तो वे लगभग हर तीसरे चौथे दिन पिता से बात कर लेतीं थीं।

महेंद्र बाबू साठ के करीब के हो चले थे जब सहसा ही वे गम्भीर रुप से बीमार पड़ गये। बेटे तो उनके दूर थे, एक बेटी भी दूर थी। एक ही बेटी आ पायी वह भी एक दिन बाद। पर वह भी तीमारदारी के लिये रह नहीं सकती थी। बच्चों के इम्तिहान आदि के कारण वह रात को रुक नहीं पायी और एक- दो दिन बाद फिर से आने के लिये कह कर चली गयी।

एक-दो दिन में सभी बेटे बेटियाँ आकर देख गये महेंद्र बाबू को। समय लगा उन्हे पर वे ठीक हो गये।

संतुलित रुप से हँसमुख महेंद्र बाबू बीमारी के बाद कुछ ज्यादा ही गम्भीर हो गये। वे ज्यादातर समय कुछ सोचते रहते थे।

समय बीतता गया। साल-डेढ़ साल बाद की बात है जब चारों संतानों को महेन्द्र बाबू का संदेश मिला कि वे विवाह कर रहे हैं।

बेटियाँ, दामाद, बेटे एवम बहुयें, सभी पहले तो आश्चर्यचकित रह गये और फिर उन्हे महेन्द्र बाबू पर गुस्सा आने लगा।

आठों लोगों को इस बात की फिक्र थी कि लोग उन सबके बारे में क्या सोचेंगे?

इंसानी फितरत ही ऐसी है कि स्वहित बड़ी जल्दी ही सभी समझ लेते हैं।

बेटों को उनकी पत्नियों ने समझा दिया.”ज्यादा हल्ला मचाने की जरुरत नहीं है। एक तरह से बाबू जी ठीक ही कर रहे हैं। अब अगर इस बार बीमार पड़ गये और उन्हे यहाँ लाना पड़ गया तो उनकी तीमारदारी कौन करेगा। हमारे बस की बात तो है नहीं”।

ऐसी सीख पाकर बेटों को व्यवहारिकता समझ में आ गयी और वे सामान्य मुद्रा में आ गये और जब बहनों के फोन आये तो उनसे कह दिया,” दीदी हम कर ही क्या सकते हैं, बाबू जी ने अगर ठान ही लिया है कि वे विवाह करेंगे तो हम कैसे उन्हे रोक सकते हैं। हम विवाह में सम्मिलित तो होने से रहे। उनके विवाह के बाद वहाँ जाना भी मुश्किल हो जायेगा”।

बेटियाँ और दामाद कुछ ज्यादा ही नाराज था। बेटियों को तो महेन्द्र बाबू के पास जाकर रहना नहीं था और न ही महेन्द्र बाबू बेटियों के घर आकर रहने वाले थे तब भी दोनों दामाद, अपने पत्नियों को डाँट रहे थे,” तुम्हारे बाप के ऐसा करने के बाद क्या हमारे बच्चों की शादी में दिक्कतें नहीं आयेंगी? तुम्हारे बाप ने हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा”।

बेटियों ने फोन पर ही अपने पिता को समझाने की बहुत कोशिश की। गुस्से में थोड़ी खरी खोटी भी सुनायी पर महेन्द्र बाबू शांत भाव से इतना ही बोले,” मैंने तय कर लिया है, मुझे लगता है कि मुझे साथी की आवश्यकता है, और मेरा ऐसा करना तुम लोगों में से किसी के जीवन को प्रभावित नहीं करता। तुम सब लोग अपने अपने जीवन में रमे हुये हो। मैं यहाँ अकेला रहता हूँ। मैंने आज या कल क्या खाया, या मैं कहाँ गया, क्या इन सब बातों से तुम्हारा जीवन प्रभावित होता है? मुझे विवाह की ऐसी ही जरुरत होती तो मैं पच्चीस तीस साल पहले न कर लेता?  पर तब तुम लोग मेरे साथ थे। आज तो मैं निपट अकेला हूँ। वक्त्त ने मुझे ऐसा मौका दिया है कि मैं बुढ़ापे में एक अच्छे साथी के साथ बचे जीवन के साल या महीने जी सकता हूँ। मुझे रत्ती भर भी ऐसा महसूस नहीं हो रहा कि मैं कहीं से भी गलत हूँ। तुम लोग आना चाहो तो विवाह में सम्मिलित होने आ जाना। मुझे अच्छा लगेगा। शायद मेरे जीवन साथी से मिलकर तुम्हारे गिले शिकवे दूर हो जायें”।

महेन्द्र बाबू ने अपने नजदीकी मित्रों की उपस्थिति में बेहद सादे तरीके से मंदिर में विवाह कर लिया। उनकी चारों संतानों में से कोई नहीं आया।

बेटे और बेटियों ने अब फोन भी करना बंद कर दिया।

महेन्द्र बाबू ऐसी किसी भी जगह शादी आदि के मौकों पर न जाते जहाँ उन्हे लगता कि उनके बच्चे भी आयेंगे और उनकी स्थिति खराब हो सकती है रिश्तेदारों के सामने अपने ऐसे पिता को देखकर नज़रअंदाज़ करने में, जिन्होने इतनी बड़ी उम्र में विवाह किया है। महेन्द्र बाबू अपनी मिलनसारिता और सबकी सहायता करने की प्रवृति के कारण अपने रिश्तेदारों में अच्छे खासे लोकप्रिय थे और कुछ लोग उन्हे अभी भी इसलिये बुलाते थे क्योंकि विगत में महेन्द्र बाबू ने उनकी किसी न किसी रुप में सहायता की थी। कुछ इस उत्सुकता में निमंत्रण भेजते थे कि उस महिला को तो देखें जिनसे विवाह करने के लिये महेन्द्र बाबू ने अपने बच्चों की नाराज़गी मोल ली और कुछ सिर्फ मज़े लेने के लिये उन्हे आमंत्रित करते थे और यह भी सुनिश्चित करते थे कि निमंत्रण महेन्द्र बाबू की चारों संतानों को भी जरुर जाये। ऐसे लोग देखना चाहते थे कि हो सकता है सब लोग आ जायें और बाकी सबको कुछ तमाशा देखने को मिल जाये।

पर महेन्द्र बाबू ने ऐसा कोई अवसर उत्पन्न ही नहीं होने दिया जहाँ उनकी उपस्थिति की वजह से उनके बेटों और बेटियों को किसी समस्या का सामना करना पड़े।

लोगों में बातें भी उठने लगी थी। बहुत सारे लोग महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी की खूबसूरती और सलीकेदार तौर तरीके की चर्चा करते थे, कुछ उनके बेटों और बेटियों तक यह सूचना पहुँचा आये थे कि असल में महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी बनने वाली महिला को बहुत पहले से जानते हैं। कुछ ने यह कयास भी लगा लिया कि शायद अपनी पहली शादी के पहले से ही| शायद दोनों साथ ही पढ़ते हों और जाति भिन्नता के कारण वे दोनों जवानी में शादी न कर पाये थे। पर दोनों महेन्द्र बाबू के प्रथम विवाह के पहले से ही एक दूसरे से प्रेम करते थे, तभी महिला ने अब तक विवाह नहीं किया था।

हिंदी साहित्य के संसार में थोड़ी बहुत दखल रखने वाले लोग प्रसिद्ध लेखक एवम हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव की उसी समय प्रकाशित होने वाली आत्मकथा “मुड़ मुड़ के देखता हूँ” के हवाले से इस बात की तसदीक कर रहे थे कि महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी को शर्तिया तौर पर अपने प्रथम विवाह के पूर्व से ही जानते थे।

सभी लोगों में महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी को लेकर उत्सुकता थी। लोग तमाशाई ही ज्यादा थे।

जो लोग महेन्द्र बाबू को बहुत अरसे से जानते थे और उनके दूसरे विवाह के बाद के घटनाचक्रों से भी परिचित थे उनमें इस घटना ने बहस छेड़ दी थी। ऐसे लोगों में से कुछ संवेदनशील किस्म के लोगों के पास ही, महेन्द्र बाबू के इस कदम को समझ पाने का संतुलित दृष्टिकोण था।

महेन्द्र बाबू की छोटी बेटी, जो कभी उनकी बहुत करीबी थी, अपने पिता से सालों बात भी नहीं कर पायी और अब जब इस साल 2010 के अक्टुबर माह में महेन्द्र बाबू का देहांत हो गया, कभी कर भी नहीं पायेगी।

एक आदमी अपने बच्चों की परवरिश की खातिर बिना साथी के अकेले ही तीस-बत्तीस साल तक अपना जीवन होम करता रहता है पर जब वह पुनः अकेला रह जाता है बुढ़ापे में, और अपने खुद के लिये एक निर्णय लेता है तो वही बच्चे उसके खिलाफ हो जाते हैं।

अब जब महेन्द्र बाबू नहीं हैं तो क्या उनके चारों बेटे बेटियाँ कभी संतुलित ढ़ंग से अपने पिता के दृष्टिकोण को समझ पायेंगे? क्या उन्हे भी एक इंसान के रुप में स्वीकार कर पायेंगे?

…[राकेश]

2 टिप्पणियाँ to “विवाह”

  1. जनाब राकेश भाई ,लगती ही नहीं कहानी आप द्वारा प्रस्तुत रचना .यह हमारे जीवन की वास्तविकता और त्रसदी दोनों बयान करती है .सच मेंऐसा ही होता किस्मतवालों के साथ होता देखा गया है अन्यथा टूटा हुआ आदमी राख और खाक होजाता है यूँ ही .शुक्रिया

  2. रफत जी,

    धन्यवाद,
    सही लिखा आपने, दौलते इश्क मयस्सर है विशेष के लिये,
    या फिर आदमी इन सबसे उठ सके और अपने में ही आनंदित रहे।
    कथा जीवन से जुड़ी ही रहती है और कल्पित कलेवर में होते हुये भी सत्य का ही अन्वेषण करती है।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: