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फ़रवरी 3, 2017

तुम मेरे बोलने और विरोध करने की स्वतंत्रता मुझसे नहीं छीन सकते : अनुराग कश्यप

anuragkप्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक, लेखक एवं अभिनेता अनुराग कश्यप केवल शब्दों के ही धनी नहीं हैं वरन वे बेहद साहसी किस्म के भी हैं| अमिताभ बच्चन ने तो फ़िल्म के परदे पर ही अपनी दमदार आवाज में संवाद बोले कि आज मेरी जेब में पांच पैसे भी नहीं और मैं पांच लाख का सौदा करने निकला हूँ| और वास्तविक जीवन में तो अमिताभ बच्चन ने पूरे समाज की बात छोड़ दीजिए कभी फ़िल्मी दुनिया में कायम किसी गलत बात के लिए भी आवाज नहीं उठायी, और यही हाल कमोबेश हिन्दी फ़िल्म उद्योग के ज्यादातर बड़े नामों का है, किन्तु अनुराग कश्यप जब फ़िल्मी दुनिया में वास्तविक जीवन में भी जब बेहद मुश्किल और हालात से गुजर रहे थे तब भी उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया अमिताभ बच्चन या फ़िल्मी दुनिया में शक्ति केन्द्र बन चुके प्रोडक्शन हाउसेज और बड़े फ़िल्मी लोगों से नेक्सस बनाकर चलने वाले शक्तिशाली फ़िल्म क्रिटिक्स के खिलाफ खुलकर खड़े होकर बोलने में| अनुराग ने परिणाम की परवाह कम ही की है और उनका विरोध और गलत बात से उपजा क्रोध उनकी फिल्मों मे दिखाई भी देता है|
पिछले कुछ समय से जो उन्हें गाल्ट लग रहा है उसके खिलाफ वे मुखर होकर बोल रहे हैं और इंटरनेट संसार के ट्रोल्स (जिनमें पैसा लेकर ऐसा करने वाले किराए के ट्रोल्स भी मौजूद हैं) की भीड़ ने उन पर आक्रमण किये हैं| उन सबका विरोध करते हुए उन्होंने नीचे दिए दो बयान सोशल मीडिया पर चस्पाये|

मैं उस वक्त से अपनी रीढ़ सीधी रखकर खड़ा हो रहा हूँ जब आवाज और चेहरे विहीन लोगों को भीड़ का भ्रम जुटाने के लिए सोशल मीडिया का धरातल उपलब्ध नहीं हुआ करता था| इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरे विरुद्ध क्या कहते हो या क्या करते हो, मुझ पर गालियों से आक्रमण करते हो या मुझ पर शारीरिक आक्रमण करते हो, मुझे जो उचित लगेगा मैं उसे कहता रहूंगा| तुम्हारी भीड़ मुझे भयभीत नहीं कर सकती, मैं तुम्हारी किसी धमकी से नहीं डरता, तुम लाख चीख लो चिल्ला लो, मेरी आवाज तुम्हारी भीड़ के सामूहिक शोर से ज्यादा बुलन्द रहेगी| मैं अपने सच को गले लगाता हूँ और मुझे तुम्हारे दवारा लगाए आरोपों से तनिक भी भय नहीं लगता|
मुझे सिखाया गया है कि अपने विवेकानुसार बोलने, तर्क करने और प्रश्न पूछने की आजादी बाकी सारी आजादियों से बड़ी है और मैं अपने इस अधिकार का उपयोग सदैव करता रहूंगा| तुम मुझे परिभाषित नहीं करते, मैं स्वयं और मेरा काम मुझे परिभाषित करते हैं, और यह परिभाषा कुछ भी हो सकती है लेकिन यह सदैव मेरी अपनी होगीI मैं अपने प्रयासों में सफल बनूँ या असफल, जिस भी मात्रा में ये मुझ तक आएं ये मेरी अपनी होंगीं|
मुझे सिखाया गया है कि उन लोगों के सोच विचार और कर्म पर दृष्टि रखो और उनसे प्रश्न पूछते रहो जिन्हें हमने सरकार बनाने के लिए चुना है| और मैं यह तब से करता आ रहा हूँ जबकि मैं एक विधार्थी ही था और देश के प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह हुआ करते थे] उनके बाद कांग्रेस की सरकारें बनीं फिर भाजपा की बनी| मुझे सिखाया गया कि हमें अपने प्रधानमंत्री से प्रश्न करने, उससे उत्तर पाने की अपेक्षा रखने, उसके निर्णयों और किये पर प्रश्न उठाने, उससे तर्क करने का पूरा अधिकार है और उससे भय तो कदापि नहीं रखना है| अगर किसी को उससे भयभीत होना है तो यह बेहद दुखद बात है क्योंकि उसे हमने देश की खुशहाली के लिए स्वयं चुन कर देश की सर्वोच्च कुर्सी पर बिठाया है| सम्मान निर्देश देकर प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसे कमाना पड़ता है| मेरा किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं है और कुछ भी मुझे राजनीतिक और सत्ता तंत्र से प्रश्न पूछने से नहीं रोकता|
तुम लोग मुझे कुछ भी कह सकते हो, मेरे ऊपर चिल्ला सकते हो| मेरा अपने संविधान पर पूरा भरोसा है और मुझे पूर्ण-विश्वास अपने अधिकारों और अपनी स्वतंत्रता पर और जहां मुझे आवश्यक लगेगा मैं इनका भरपूर उपयोग करूँगा| तो तुम लोग जितना भी जोर लगा लो, तुम मुझे रोक नहीं पाओगे, तुम्हारे मुझ पर प्रेम उडेलने के लिए धन्यवाद|
और जो लोग ये रट लगा रहे हैं – उस वक्त तुम कहाँ थे, उस घटना के कहाँ तुम क्यों चुप थे, ऐसा पूछने वाली ट्रोल्स की भीड़ के लिए मेरे पास एक ही जवाब है कि मैं यहीं था पर मेरे बोलने की जरुरत इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि जिन्हें बोलना चाहिए या जिनके ऊपर बोलने का उत्तरदायित्व था वे बोल रहे थे| चाहे वह जायरा का मामला हो, जहां सरकार और उसके नुमाइंदें तुरंत बोल पड़े थे और गलत की निंदा की उन्होंने, और चाहे विवेक की फ़िल्म की बात हो जहां राज्य का समर्थन उसके साथ था| | मैं तभी बोलता हूँ जब राज्य सत्ता या तो चुप्पी धारण कर लेती है या मामले को नजरंदाज कर देती है| क्योंकि यही समय होता है जब किसी को बल्कि हम सभी को बोलना चाहिए|
जिस एक वक्त की अपनी चुप्पी का मुझे अभी तक खेद है वह है FTII का मामला| जब यह सब चल रहा था मैं सरकार के साथ काम कर रहा था और मुझे विश्वास दिलाया गया था कि सरकार वास्तव में बिगड़ती जा रही स्थितियों को संभालने की कोशिश में लगी हुयी है और मैंने उनके कहे पर विश्वास किया| और मुझसे ये बातें स्वयं आई एंड बी के कनिष्ठ मंत्री ने कहीं| उन्होंने कहा कि मुझे इस मुददे पर शामिल होने की जरुरत नहीं है और वे लोग समाधान पर काम कर रहे हैं| मैंने उनके कहे पर विश्वास कर लिया| एक और बार मैंने विश्वास किया जब सेंसरशिप का मुद्दा उठा और मैं चुप रहा| और तब मुझे दीवार की ओर ढकेल दिया गया जब “उड़ता पंजाब” प्रदर्शन के लिए तैयार थी और उन सबने मौन धारण कर लिया, मुझसे चुप्पी साध ली| उस वक्त मैं उनके तरीके को समझ पाया कि कैसे शोषण किया जाता है और कैसे मेरे जैसे को उसके विश्वास करने के कारण एक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है| तब मैं जागा और तब से मैं यहाँ हूँ और लगातार बोल रहा हूँ उन उन बातों पर जिन पर बहुत से चुप रहे गये| और मैं हर उस बात के लिए बोलूंगा जिस पर बोलना चाहिए और जिस पर सत्ता शक्ति लोगों की चुप्पी चाहती है| मैं इस स्थान पर हूँ और रहूंगा तो तुम सारे लोग जो तोता रटंत लगा रहे हो कि उस वक्त मैं कहाँ था, उस मामले में चुप क्यों रहा, अपनी रट की बत्ती बना लो और ….
धन्यवाद !

फ़रवरी 12, 2011

खुश तो बहुत होगे आज इजिप्ट : रघुवीर सहाय

ऐसा हो जाता है कि लोग अपने आप को खुदा समझने लगते हैं और ऐसी गलतफहमी पाल बैठते हैं कि देश का भला केवल वे ही कर सकते हैं और जो उनके साथ नहीं हैं वे देश के दुश्मन हैं। ऐसे व्यक्त्ति भारत में भी हैं। और ऐसी संस्थायें भी भारत में भी हैं जो देशभक्त्ति पर अपना एकाधिकार समझती हैं और समझती हैं कि जो उनके तौर तरीकों का समर्थन नहीं करते वे भारतीय तो हैं ही नहीं बल्कि देशद्रोही हैं।

ऐसे नेता होते हैं जो सत्ता की शक्त्ति तो जनहित की लुभावनी बातें करके पाते हैं पर सत्ता की बागडोर पाने के बाद वे एकाधिकार प्राप्त करने की साजिश करते हैं और निरंकुशता की ओर बढ़ते जाते हैं। दुनिया का हर ऐशो आराम उन्हे मिल जाता है पर धीरे धीरे वे जनता से मिलने वाले सबसे जरुरी भाव खोते जाते हैं। जनता में उनके प्रति विश्वास और सम्मान खो जाता है और वे सिर्फ और सिर्फ सत्ता की निरंकुश शक्त्ति की बदौलत देश के शाषक बने रहते हैं।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी. पी. सिंह ने सत्ता से चिपकने वाले नेताओं की ऐसी चिपकू प्रवृत्ति की तरफ इशारा करते हुये एक बड़ी अच्छी कविता लिखी थी।

उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वहीं चिपका है
फटे इश्तेहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले
निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता।

एक वक्त्त आता है जब नेताओं को खुद ही नेतागिरी का भ्रम तोड़ देना चाहिये और सत्ता की राजनीति से दूर हट जाना चाहिये ताकि भरपूर ऊर्जा और नये विचारों एवम ताजगी से भरी नेतृत्व क्षमता आकर लोगों को नेतृत्व दे सके और भविष्य के समय का निर्माण कर सके।

होस्नी मुबारक सत्ता के गलियारे से खदेड़ दिये गये और अपनी भद पिटवा कर वे बाकी का जीवन एक कलंकित शाषक के रुप में जियेंगे।

परिवर्तन कुछ अच्छा ही लेकर आयेगा। रुके पानी के सड़ने से उत्पन्न दुर्गंध में कुछ कमी आयेगी। इजिप्ट कुछ आगे की ओर बढ़ेगा।

मुबारक की विदाई मुबारक साबित हो इजिप्ट के लिये।

कल तक जो जनता सड़कों पर संघर्ष कर रही थी। मुबारक की पुलिस की ज्यादतियाँ सहन कर रही थी आज वही जनता विजेता बनकर उन्ही सड़कों पर नाच रही है, जश्न मना रही है।

जीवन में आने वाले ऐसे ही मौकों के लिये ही तो रघुवीर सहाय ने एक बेशकीमती कविता की रचना की थी। उनकी कविता जीवन के पुनर्निमाण का उत्सव मनाती है।

आज फिर शुरु हुआ जीवन
आज मैंने एक छोटी सी सरल सी कविता पढ़ी
आज मैंने सूरज को डूबते देर तक देखा
जी भर आज मैंने शीतल जल से स्नान किया
आज एक छोटी सी बच्ची आयी
किलक मेरे कंधे चढ़ी
आज मैंने आदि से अंत तक
एक पूरा गान किया
आज फिर जीवन शुरु हुआ।

पुनश्च : चित्र स्त्रोत – totallycoolpix.com

नवम्बर 28, 2010

विश्वनाथ प्रताप सिंह : कवि और चित्रकार

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को बहुत सारे लोग भारत के सबसे विवादास्पद प्रधानमंत्री भी कहेंगे।

27 नवम्बर श्री वी.पी सिंह की पुण्य तिथि है अगर वे जीवित होते तो इस साल 25 जून को उनका 79वाँ जन्म दिवस मनाया जाता।

लोकनायक जय प्रकाश नारायण के बाद वही ऐसे राजनेता हुये जिन्होने विपक्ष में रह कर भारत की राजनीति में भूचाल ला खड़ा किया।

अस्सी के दशक के अंत में मंडल कमीशन की सिफारिशों के विरुद्ध खम ठोक कर विरोध करने वाले लोग भी श्री वी.पी.सिंह को सिर्फ इसी एक मुद्दे के बलबूते नकार नहीं पायेंगे। अच्छा या बुरा जैसा भी रहा हो उनके द्वारा उठाये गये कदम का परिणाम पर उनके कदम ने भारत की राजनीति की दिशा ही बदल दी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

इतिहास ऐसे मुँह नहीं मोड़ सकता भारत के पिछले साठ साल के एक ऐसे राजनेता से जिन्होने ईमानदारी के नाम पर सत्ता हासिल करके दिखा दी। जून जुलाई की भयानक गर्मी में मोटर साइकिल पर सवार होकर उन्होने इलाहाबाद में चुनाव प्रचार किया था और अमिताभ बच्चन द्वारा इस्तीफा दिये जाने से खाली हुयी सीट पर हुये उपचुनाव में श्री लाल बहादुर शास्त्री के सुपुत्र श्री सुनील शास्त्री को हराया था। एसी में बैठ रणनीति बनाने वाले नेताओं के बलबूते की चीज नहीं है ऐसा परिश्रम।

नब्बे के दशक में खुद उनके पास चलकर गया प्रधानमंत्री पद सम्भालने का प्रस्ताव, जिसे उन्होने स्वास्थ्य कारणों से ठुकरा दिया। विरोधाभास निस्संदेह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा था। युवावस्था में ही अपनी रियासत की बहुत सारी जमीन उन्होने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से प्रेरित होकर दान कर दी थी। देहरादून में अपनी करोड़ों अरबों की जमीन उन्होने ऐसे ही छोड़ दी उन लोगों के पास जो नाममात्र का किराया देकर वहाँ दुकानें आदि चलाते थे। श्री वी.पी सिंह उन बिरले राजनेताओं में से रहे हैं जिन पर धन के भ्रष्टाचार का आरोप कोई नहीं लगा सकता।

उन्हे सिर्फ एक राजनेता ही नहीं कहा जा सकता। श्री वी.पी सिंह में कई व्यक्तित्व दिखायी देते हैं और उन्हे सिर्फ किसी एक मुद्दे पर खारिज नहीं किया जा सकता। वे एक बेहतरीन कवि, लेखक, चित्रकार और फोटोग्राफर भी थे।

राजा नहीं फकीर है
देश की तकदीर है

का बेहद सटीक नारा गढ़ने वाला व्यक्ति बेहद सक्रिय और तीक्ष्ण बुद्धि का मालिक रहा होगा जिसकी लेखन क्षमता के बारे में संदेह नहीं किया जा सकता।

मंडल कमीशन लागू करने के सामाजिक और राजनीतिक निर्णय ने उनके व्यक्तित्व को बहुत हद तक भ्रम भरे बादलों के पीछे ढ़क दिया है। उनके राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन राजनीतिक इतिहास लिखने वाले लोग करेंगे पर राजनीति से परे उनके अंदर के कलाकार पर तो लेखक और कलाकार समुदाय निगाह डाल ही सकता है।

उनकी कविता में गहरे भाव रहे हैं। उन्होने तात्कालिक परिस्थितियों से उपजी कवितायें भी लिखीं जो काल से परे जाकर भी प्रभाव छोड़ने की माद्दा रखती हैं।

कांग्रेस से इस्तीफा देते समय उन्होने यह कविता भी रची थी।

तुम मुझे क्या खरीदोगे
मैं बिल्कुल मुफ्त हूँ

उनकी कविता आधुनिक है, उसमें हास-परिहास, चुटीलापन भी है और व्यंग्य भी। उनकी कविता बहुअर्थी भी है। बानगी देखिये।

काश उसका दिल एक थर्मस होता
एक बार चाह भरी
गरम की गरम बनी रहती
पर कमबख्त यह केतली निकली।

वे नेताओं के राजनीतिक जीवन की सांझ के दिनों पर भी कविता लिखे बिना नहीं माने।

उसने उसकी गली नहीं छोड़ी
अब भी वहीं चिपका है
फटे इश्तेहार की तरह
अच्छा हुआ मैं पहले
निकल आया
नहीं तो मेरा भी वही हाल होता।

कविता भारत के लगभग हर नेता के जीवन का सच उजागर कर देती है।

आदर्शवाद उनकी कविताओं में भी छलकता है और शायद इसी आदर्शवाद ने उन्हे राजनीति में कुछ खास निर्णय लेने के लिये प्रेरित किया होगा।

निम्नलिखित कविता में नेतृत्व को लेकर कितनी बड़ी बात वे कह गये हैं।

मैं और वक्त
काफिले के आगे-आगे चले
चौराहे पर …
मैं एक ओर मुड़ा
बाकी वक्त के साथ चले गये।

मनुष्य की अंहकार भरी प्रकृति और खासतौर पर समाज में शक्तिशाली व्यक्ति के हथकंडों पर उन्होने एक बेहतरीन कविता लिखी थी।

भगवान हर जगह है
इसलिये जब भी जी चाहता है
मैं उन्हे मुट्ठी में कर लेता हूँ
तुम भी कर सकते हो
हमारे तुम्हारे भगवान में
कौन महान है
निर्भर करता है
किसकी मुट्ठी बलवान है।

मानव मस्तिष्क के अंधेरे बंद कोनों को भी खूब खंगाला उन्होने और कविताओं और पेंटिंग्स के माध्यम से उन्हे अभिव्यक्ति दी।

निराशा का भाव भी उनकी कविताओं में झलकता है और वैराग्य का भाव भी किसी किसी कविता के माध्यम से बाहर आ जाता है।

उनकी एक कविता है मुफ़लिस, जो राजनेता के रुप में उनकी मनोदशा को बहुत अच्छे ढ़ंग से दर्शाती है।

मुफ़लिस से
अब चोर बन रहा हूँ मैं
पर
इस भरे बाज़ार से
चुराऊँ क्या
यहाँ वही चीजें सजी हैं
जिन्हे लुटाकर
मैं मुफ़लिस बन चुका हूँ।

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