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नवम्बर 15, 2010

एक प्रश्न : एक उत्तर …(कविता- कृष्ण बिहारी)

 

मैंने कल उससे पूछा था –
वक्त,
गुजरा हुआ अतीत हो
या फिर वर्तमान
एक तमाशा ही तो है!

कल जो कुछ हुआ
मेरे साथ हुआ या तुम्हारे
हम उसमें कहीं नहीं थे
लेकिन
लोग थे,
ढ़ेर सारे लोग
और उनकी हैसियत
सिर्फ एक तमाशाई की थी
बस-
एक तमाशाई की हैसियत से
लोगों ने वक्त्त का
यानि की जो कुछ हमारे साथ हुआ
उसका तमाशा ही तो देखा!
इसलिये अब मैं सोचता हूँ
तमाशाई हो जाना
तमाशा हो जाने से बेहतर है!
“तुम्हारा क्या ख्याल है,
तुम क्या सोचती हो, बताओगी?”

मेरे मित्र!
तुम्हारे सवाल का जवाब
मेरे मौन में है
फिर भी यदि तुम शब्दों में जानना चाहो
तो, सुनो
वक्त्त, तमाशा, तमाशाई
सब बेकार की बातें हैं।
मैं और तुम
खाली ही कहाँ हैं कि
यह सब सोचें
आओ हम खुद में ही
खुद को खोजें।

{कृष्ण बिहारी}

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