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नवम्बर 2, 2010

झूठन…(कविता-रफत आलम)

पंचतारा होटल से नज़दीक
देर रात पार्टी के बाद
फेंकी गयी झूठन की बाँट में
शूकर – कुत्तों के साथ
आदमी भी है शामिल
खोजते छांटते बीनते
कुछ खाने योग्य।

शहर को दिखता नहीं ये मंज़र
या जानबूझ कर अंधे बने हैं
हम संवेदना से हीन भूरे साब
घिन से मुँह फेर लेते हैं।

अपने सम्मानीय मेहमान
गोरे पर्यटक ही अच्छे
आँखों के साथ
कैमरे से भी देखते हैं।

(रफत आलम)

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