Archive for नवम्बर 21st, 2010

नवम्बर 21, 2010

तोते का पिंजरा : एक मंज़र

पड़ोस की दीवार पर लटके
छोटे से पिंजरे में तोता
कभी उपर कभी नीचे
गोल गोल घूमता रहता है
लाल खून सी चोंच से
चबाता रहता है लोहे की तीलियां
जाने कहाँ से उड़ता हुआ
एक तोता पिंजरे के पास
आ बैठा
टीटी… टीटी… टीटी…
टीटाहट के साथ
दोनों में होने लगी बातें
फलों का मिठास
गोल आँखों वाली
मैना का हुस्न
चोंचों का लड़ाना
घोंसले का सकून
कतरों में पानी
प्याली में चुग्गा
बासी बेस्वाद
कटे हुए पंख
घुटती सांसें
भींचती लोहे की तीलियां
असहनीय वेदना
तोतों की भाषा तो
स्वर का रचयिता ही जाने
मैं तो यूँ ही सोच रहा था
हम खुद अपनी ही चीत्कारों पर
अट्टाहस लगाने वाले
अबोल संवदनाओं को क्या समझें
आ गया अचानक, गैलेरी में
पडोसी का मोटा लड़का
फुर से उड़ गया
जो के आजाद था
खून सी लाल चोंच से
लोहे के तार चबा रहा है
पिंजरे वाला तोता।

(रफत आलम)

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