Archive for नवम्बर, 2010

नवम्बर 3, 2010

लक्ष्मी माता मुफलिस भी तो राह तके तेरी…(कविता-रफत आलम)

शहर का माहौल
जगमग है आजकल
अखबार भी देखो
विज्ञापनों की रंगीनियों में डूबे
सुनहरे सपनों को बेचने में हैं शामिल।

दो बच्चों के साथ
क़र्ज़ से दबे
परिवार के आत्महनन की खबर
किसने पढ़ी?

रौशनी तेरा स्वागत
गुलाम बेगम बादशाह इक्के
सब नाच में है मगन
बाज़ी दो बाज़ी
हार जीत का
क्या फर्क पड़ेगा?

रिश्वत, उपहार या नजराने में
कई गुना होकर लौटेगी लक्ष्मी
तेरा प्रताप सदा रहे माता
जाने क्यों देखती ही नहीं
झोंपडियों में बिखरी दुनिया की तरफ
जहाँ ऑंखों में रौशनी बस
दूर लेम्पपोस्ट से छनकर आती है।

सौ रुपये का नोट
बडा सपना होता है खाली जेब का
सोचा करती है भूख
उतरे कोई चमचमती कार से
भोजन का पैकेट बाँट जाये।

फटी साड़ी में लिपटी सिन्दूर रेखा
दुआ मांग रही है-
आज तो कालू का पापा
बिना दारू पिए लोटे
चार टुकड़े मिठाई लेके।

दो तीन उदास दीपक जल रहे है
मुफलिस के द्वारे भी
तेरी तस्वीर के सामने माता
तू देखती ही नहीं।

(रफत आलम)

 

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नवम्बर 3, 2010

वयस्क होता गरीब बचपन…(कविता-रफत आलम)

कांधे पर झोला उठाये
बीन रहे हैं नन्हे नन्हे हाथ
दूध की खाली थैलियां
टूटा प्लास्टिक
जंग लगा लोहा
अखबार के टुकड़े
कुछ भी कचरा
नंगे पाव झपट पड़ते है
व्हिस्की की खाली बोतल पर
बूँद दो बूंद बची हुई पीकर
बच्चे! बड़े बन जाते हैं।

 

(रफत आलम)

नवम्बर 2, 2010

झूठन…(कविता-रफत आलम)

पंचतारा होटल से नज़दीक
देर रात पार्टी के बाद
फेंकी गयी झूठन की बाँट में
शूकर – कुत्तों के साथ
आदमी भी है शामिल
खोजते छांटते बीनते
कुछ खाने योग्य।

शहर को दिखता नहीं ये मंज़र
या जानबूझ कर अंधे बने हैं
हम संवेदना से हीन भूरे साब
घिन से मुँह फेर लेते हैं।

अपने सम्मानीय मेहमान
गोरे पर्यटक ही अच्छे
आँखों के साथ
कैमरे से भी देखते हैं।

(रफत आलम)

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नवम्बर 1, 2010

मौत की इबारत…(कविता-रफत आलम)

सड़क किनारे खड़े थे जो पेड़
अब नहीं हैं
कोलतार पुत गया है
उनकी कब्रों पर
दौड़ रही हैं तेज रफ़्तार गाडियां
काला धुआं उगलती हुयी।

हर शाम दिखता है
एक उदास मंज़र
शहर के किनारे का आकाश
सिंदूरी नहीं लगता
राख रंग का नज़र आता है।

कल एक जंगल और कटेगा
जिंदगी की दौड़ तेज रखने के लिए
क्षितिज पर सियाही से लिखी
मौत की इबारत को
कोई पढ़ नहीं पा रहा अभी!

 

(रफत आलम)

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