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नवम्बर 13, 2010

एक और सुबह…(कविता-रफत आलम)

रात ढ़ले
कमरे की दीवार पर हिलता डुलता
साया खामोश।

किताब आँखों से लग कर
दिल की धड़कन के साथ
बतियाने लगी
लाल हो चली आँखों के सामने
शब्दों की दुनिया रंगमय हुई।

उदासी की बेख्वाब सियाही से दूर
वक्त बहल गया आज भी
खिडकी की जालियों से
नीचे उतर कर चाँद
दूर ऊँचे काम्प्लेक्स के पीछे
छुप गया।

सुरमई धुँधलके नज़र आने लगे
परिंदे अब नहीं चहचाहते
कोई दरख्त ही नहीं बचा।

बजने लगे होर्न गाड़ियों के
सड़क पर चहल पहल हो चली
बरामदे मे फेंके गये
अखबार की आवाज़ से
टूटता हुआ बदन
अंगडाई लेकर खड़ा हुआ
जिंदगी के कैलेंडर में
जुड गयी
एक और सुबह।

(रफत आलम)

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