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फ़रवरी 13, 2017

कैसे मुसलमां हो भाई…

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फ़रवरी 1, 2014

जीवन रस की हर बूँद पी लेना : संत सिद्धार्थ

जीवन हमें मिलता है तो इसलिए नहीं कि हम मौत के साये में जीकर जीवन के पलों को व्यर्थ कर दें या मौत का इन्तजार करें कि एक दिन वह आयेगी इसलिए उसे रोकने के साधन जुटा लें| मौत आनी है एक दिन यह बोध होना अत्यंत आवश्यक है लेकिन यह आवश्यक इसलिए है कि एक दिन मौत आकर जीवन को अपने साथ ले जायेगी इसलिए जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना बेहद जरूरी है| मौत के सत्य का बोध इसलिए नहीं कि उसके आने के भय में जीवन को बच बच कर जीने लगें, जो करना चाहते हैं उसे कल पर टालने लगें|

जीवन के हर पल को सघनता से जीना, हर पल को जीने में अपने अंतस के गहनतम तल तक की उर्जा लगा देना तभी पूर्णता की अनुभूति होगी और किसी भी बात में अटकने से बच जाओगे| जीवन का हरेक पल का एकमात्र लक्ष्य है मनुष्य को अनुभूति देकर उसके पार पहुंचाना|

ऊर्जा को बचाने वाले कंजूस का जीवन मत जीना, न ही पलों को संजोकर रखने वाले जमाखोर का जीवन जीना| कुछ अच्छा करने की इच्छा बलवती हो जाए तो उसे कर गुजरना क्योंकि केवल करने से ही उसे समझ पाओगे, उसके पार हो पाओगे अगर दमन करते रहोगे, कल परसों पर बात को टालते रहोगे तो चेतनता पर इच्छाओं का बोझ लदता चला जाएगा और जब जाने का मौक़ा आएगा तो उस समय बेहद दरिद्र जीवन जीकर मौत के चंगुल में जाने का भाव सारे जीवन की व्यर्थता की पीड़ा को और घनीभूत कर देगा| जब जाना हो तो इच्छाओं की स्लेट एकदम कोरी हो, यही शर्त है श्रेष्ठ तरीके से जीवन जीने की|

तुम्हे पहाओं पर चढ़ना है, तैरना सीखना है, गीत गाना सीखना है, वाद्ययंत्र बजाने सीखने हैं, चित्रकला सीखनी है, मूर्ति बनाना सीखना है, कोई खेल विशेष खेलना है, कहीं यात्रा पर जाना है, विभिन्न स्थान देखने हैं,एक कविता,कहानी,उपन्यास, या किताब लिखनी है, या कुछ भी सीखना है, तो ऐसी सब इच्छाओं की पूर्ती करने के प्रयास ही एकमात्र रास्ता  है| इन्हें टालना मत क्योंकि नहीं पता कि फिर इन रास्तों से गुजरने का मौक़ा मिले न मिले| मौत जब दस्तक दे तो उसके सामने गिडगिडाने की जरुरत न पड़े कि अभी तो यह रह गया था वह रह गया था करने से|

मौत हमारे हाथ की बात नहीं पर जीवन कैसे जियें यह पूरी तरह से हमारे वश में है| बच्चों को देखते हो कैसे जो वे करना चाहते हैं उसे करने में पूरी तल्लीनता से मगन हो जाते हैं बस वही तो कुंजी है जीवन जीने की जिसे बड़े होते होते सब लोग कहीं खो देते हैं और फिर जीवन भर दुख से भरे रहते हैं कि यह नहीं कर पा रहे, वह नहीं कर पा रहे| नौकरी और व्यवसाय के कारण सब छुटा जा रहा है, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कुछ छुटा जा रहा है| जब करने की इच्छा सच्ची हो तो उसे करने का वक्त भी निकल जाता है| हो सकता है गले गले तक जिम्मेदारियों में डूबे हुए हो पर तब भी समय और ऊर्जा निकालना उन कामों को करने के लिए जिन्हें करना चाहते हो केवल अपने लिए, अपने अंतर्मन को आनंद पहुंचाने के लिए|

जरूरी नहीं कि हर काम में औरों को पीछे छोड़कर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाने के लिए प्रयास किये जाएँ और जब तक ऐसा न लगे कि अच्छा स्तर पा लिया है तब तक काम शुरू न किया जाए| बहुत बार ऐसा होता है कि सपने पाल लिए जाते हैं कि अगर ऐसा न करके वैसा करते जो जीवन कुछ और ही होता| जिस मार्ग को चुनना चाहते थे उस पर अब चलना शुरू करके देखो| ऐसा भी हो सकता है कि दूसरों की देखादेखी उस मार्ग पर चलने की इच्छा बलवती हुयी थी| अपने मन की सच्ची संतुष्टि और आनंद के लिए कामों को करो| जीवन में ऐसा हल्का महसूस करने लगोगे जैसा पहले कभी नहीं किया| बोझ हटाओ उन सब बातों का जिनका दमन किया है, या जिन्हें कर नहीं पाए हो| जितना संभव हो उन्हें करने का प्रयास करो|

जीवन को जी लोगे तो मौत के भय का कोई अर्थ नहीं रह जाता वह अटल सत्य की तरह आयेगी पर तब वह तुम्हारी दमित इच्छाओं को साथ नहीं लेकर जायेगी|

जाते समय कोरे कोरे जाओ इससे बेहतर योगदान धरती पर तुम नहीं दे नहीं सकते|

सारे अध्यात्मिक संदेशों में महत्वपूर्ण है यह बात कि – जीवन को जियो!

नवम्बर 10, 2013

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 1)

विरोध की हल्की सी झलक पाते ही लेखिका कम सम्पादक कम विभागाध्यक्ष महोदया – प्रोफ़ेसर कामना बिफर उठीं। चेहरा आवेश में लाल हो गया। मेज पर रखे मोबाइल को उठाकर उसमें कुछ देखा और फिर उसे वापस मेज पर रखते हुये बोलीं,” देखिये अनिल जी, कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी समाज को दर्पण दिखाती है और लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों को प्रकट करते हैं।”

कुछ हद तक आपका कहना ठीक है कामना जी परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। आप सोचकर बतायें कि क्या कहानी के पात्र स्वतंत्र होते हैं? कौन उन्हे विचार देता है? क्या वे अपनी मनचाही दिशा में भ्रमण करने के लिये स्वतंत्र होते हैं? या लेखक उन पर उनकी प्रत्येक किस्म की गति, चाहे वह किसी भी दिशा में क्यों न हो, पर अपना पूरा नियंत्रण रखता है?

लेखिका कुर्सी पर बैठे बैठे बिलबिलाने लगीं, उनका क्रोध और बढ़ गया। ऊँचे स्वर में कहने लगीं।

लेखक समाज में से ही तो चरित्रों को लेता है, वह उन्हे संवाद और मनोस्थिति देता है पर वह उन्हे ऐसी दिशा में ही नियंत्रित करता है जिससे समाज को कुछ बातें कह सके।

कामना जी, अगर कहानी समाज को उसका वास्तविक चेहरा दिखाने का ही नाम है फिर तो यह काम एक साधारण पत्रकार बहुत सस्ते में कर देता है और अपने लिखे पर उसे ऐसा बहुत ज्यादा गर्व भी नहीं होता जैसा कि अपनी एक भी कहानी कहीं छपने वाला लेखक दर्शाने लगता है। पत्रकार के व्यवहार में तो यह चाह भी नहीं दिखायी देती कि उसे चिंता है कितने लोग उसके लिखे को पढ़ेंगे और इस पर उसे पुरस्कार मिलेगा या नहीं।

अनिल जी, मैं आप से फिर से कह रही हूँ कि कहानी और लेख दो अलग अलग विधायें हैं। कहानी में जहाँ लेखक का कोई सामाजिक दायित्व नहीं होता वहीं लेख में वह अपने नितांत व्यक्तिगत विचार प्रस्तुत कर सकता है।

तो फिर कामना जी, डबल स्टैंडर्ड वाली बात कहाँ तक झूठ है? एक तरफ तो आपकी कहानियों के चरित्र खासकर महिला चरित्र विवाहपूर्व और विवाहेत्तर सभी प्रकार के शारीरिक संबंधों में सलंग्न रहते हैं और दूसरी ओर आपके लेख हद दर्जे की चिंता में घुले जाते हैं कि लड़कियों को इन सब तरह के शारीरिक सम्बंधों से दूर रहना चाहिये। आपकी लगभग हर कहानी की नायिका विवाह से पूर्व और विवाह के बाद वैवाहिक जीवन से बाहर शारीरिक सम्बंध बनाने में सलंग्न दिखायी देती है पर वास्तविक जीवन की तरह वह कभी भी गर्भवती नहीं होती। ऐसा क्यों? अब यह मानने का तो कोई कारण है नहीं कि आपकी कहानियों में एकदम से स्थापित इन शारीरिक सम्बंधों की मुठभेड़ों से निबटने के लिये आपके नायक या नायिका अपने साथ गर्भ निरोधक साधन साथ लेकर घूमते होंगे? आपकी कहानियाँ ऐसा तो कोई संकेत नहीं देतीं। क्या किशोर पाठक आपकी कहानियों को पढ़कर ऐसी प्रेरणा नहीं लेगें कि ठीक बात है कि विवाहपूर्व शारीरिक सम्बंध हानिकारक नहीं हैं लड़कियों के लिये।

अनिल जी, मेरी नायिकायें पच्चीस की वय को पार कर चुकी वयस्क नारियाँ हैं जो अपना भला बुरा बखूबी समझती हैं।

कामना जी सच पूछें और मुझे सच बोलने की अनुमति दें तो मेरी इच्छा हो रही है कि मैं इस बात का जवाब कुछ यूँ दूँ कि एकदम से हुये इन सैक्स एनकाऊंटर्स में नारी पात्रों की परिपक्वता गर्भ निरोधक का कार्य तो करेगी नहीं। शुक्राणु और अंडाणु को क्या मतलब नर-नारी की मानसिक परिपक्वता से? वे तो मिलन का मौका छोड़ने से रहे और देखा तो ऐसा गया है कि अगर युगल अविवाहित हैं तो इनके मिलन कुछ जल्दी ही हो जाते हैं।

अनिल ने लेखिका की ओर देखा तो वे गुस्से से उसकी ओर ही देख रही थीं और उनके इर्द गिर्द बैठी और खड़ी उनकी शिष्यायें भी गुस्से से भरी साँसें और क्रुद्ध दृष्टिपात उसकी ओर फेंक रही थीं।

उन्हे हल्के मूड में लाने के लिये अनिल ने मुस्कुराते हुये कहा।

आपने देखा ही होगा प्रकाश झा की राजनीति में कि भारत में स्त्री-पुरुष की फर्टीलिटी पॉवर कितनी ज्यादा है! इस फिल्म की तीन स्त्रियाँ एक ही बार के संसर्ग में गर्भवती हो गयीं और विवाह पूर्व बनाये ऐसे संबध ने कितना बड़ा हत्याकांड करवा दिया। प्राचीन काल से ही महाभारत आदि भी इस बात की गवाही देते रहे हैं।

अनिल के इस उदाहरण से न चाहते हुये भी लेखिका और उनकी शिष्य मंडली के मुख मंडलों पर तिर्यक रेखायें खिंच गयीं पर वे ढ़ील देना नहीं चाहती थीं सो गम्भीर मुद्रा ही बनाये रहीं।

…जारी

…[राकेश]

यथार्थ बनाम कल्पना…(भाग 2)

फ़रवरी 20, 2013

इतने मुझको प्यारे हो तुम

जितना चिंतन कोई कुंआरा

जितना भोला कोई इशारा

जितना बंधन कोई दुलारा

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितनी बारिश कोई सुहानी

जितनी प्यारी कोई कहानी

जितनी डगर कोई अनजानी

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

जितना सपन कोई सीने में

जितना नशा है गम पीने में

जितना दर्द है चुप जीने में

उससे अधिक कुआँरे हो तुम

इतने मुझको प्यारे हो तुम |

{कृष्ण बिहारी}

फ़रवरी 17, 2013

सारा सावन पिघल न जाए

वही कहानी मत दुहराओ

मेरा मन हो विकल न जाए

भावुकता की बात और है

प्रीत निभाना बहुत कठिन है

यौवन का उन्माद और है

जनम बिताना बहुत कठिन है

आँचल फिर तुम मत लहराओ

पागल मन है मचल न जाए

दर्पण जैसा था मन मेरा

जिसमें तुमने रूप संवारा

तुम्हे जिताने की खातिर में

जीती बाजी हरदम हारा

मेघ नयन में मत लहराओ

सारा सावन पिघल न जाए

तोड़ा तुमने ऐसे मन को

पुरवा जैसे तोड़े तन को

सोचो मौसम का क्या होगा

बादल यदि छोड़े सावन को

मन चंचल है मत ठहराओ

अमरित ही हो गरल न जाए

कदम कदम पर वंदन करके

यदि में तुमको जीत न पाया

कमी रही होगी कुछ मुझमे

जो तुमने संगीत न पाया

तान मगर अब मत गहराओ

जीवन हो फिर तरल न जाए

{कृष्ण बिहारी}

सितम्बर 6, 2011

कैसे हुई बदनाम कहानी?

शायद कहता नहीं तो रह जाती गुमनाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

कुहरे की मैं शाम हो गया
घर-बाहर नीलाम हो गया
तेरे साथ घड़ी भर रहकर
जीवन भर बदनाम हो गया

तेरी-मेरी खास बात थी मगर बन गई आम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

चर्चित भी मैं खूब हुआ हूँ
गली रही हो या चौराहा
मधुर-मिलन के पहले लेकिन
आना था आया दोराहा

अलग वहाँ से होनी ही थी अपनी वो सरनाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

तुम क्या छूटे मंजिल छूटी
दिल टूटा पर प्रीत न टूटी
जैसे किसी सुहागन की हो
यौवन में ही किस्मत फूटी

सब कुछ तो लुट गया मगर शेष रही नाकाम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी,

यूँ तो सारा खेल जगत में
विधि का ही बस रचा हुआ है
लेकिन मेरे भोले मन पर
एक प्रश्न यह खिंचा हुआ है

आखिर उजले मन की ही क्यों बन जाती है श्याम कहानी
किन्तु मुझे भी ज्ञात नहीं है कैसे हुई बदनाम कहानी।

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 22, 2011

हॉफ टिकट

चाणक्यपुरी में खड़े खड़े बहुत देर तक उसे ऑटो नहीं मिला तो मोहन, शिवाजी स्टेडियम जाने वाली बस में बैठ गया। विदेशी दूतावास वालों ने उसका दिमाग मथ कर रख दिया था। अगर कम्पनी के काम से विदेश जाना न होता तो वह दूतावास की इमारत में दुबारा कदम भी न रखता पर उसे एक बार और आना पड़ेगा। दूतावास के कर्मचारियों का व्यवहार बेहद घटिया था। अपना नम्बर आने के इंतजार में बैठे हुये वह सोचता रहा था कि विदेशी दूतावास में काम करने वाले कर्मचारी ऐसा क्यों सोचते हैं कि भारत से बाहर जाने वाले सभी अपराधी ही हैं और गलत कागजों के सहारे ही बाहर जा रहे होंगे? विदेशी कर्मचारी तो एकतरफ, इन विदेशी दूतावासों में काम करने वाले भारतीय कर्मचारी भी बेहद कर्कश पाये जाते हैं और वे घटिया तरीके से भारतीयों के साथ व्यवहार करते हैं।

बस में चढ़ते ही उसने शिवाजी स्टेडियम के लिये टिकट ले लिया। उसने सौ का नोट कंडक्टर को दिया तो उसने उसे बाकी पैसे कुछ देर में देने के लिये कहा और बस के कनॉट प्लेस के क्षेत्र में घुसने से पहले ही पैसे दे भी दिये। बस में भीड़ थी और सारी यात्रा खड़े हुये ही करनी पड़ी थी। रास्ते भर लोग चढ़ते उतरते रहे और इस आवागमन के कारण वह बस के दरवाजे से बस के मध्य में पहुँच गया।

बस शिवाजी स्टेडियम जाकर रुकी तो कंडक्टर ने लोगों को नीचे उतारने की जल्दी मचा दी जबकि लोग खुद ही उतरने के लिये रेलेपेल मचाये हुये थे। कंडक्टर आगे के दरवाजे से लोगों को उतरने का निर्देश बार बार दे रहा था और पीछे के दरवाजे पर खड़े अपने सहायक को चिल्ला चिल्ला कर निर्देशित कर रहा था नयी सवारियों को वहाँ से बस में चढ़ाने के लिये।

मोहन भी उतरने लगा और बस की सीढ़ियाँ उतरते हुये उसने टिकट फाड़ा और उसका आधा हिस्सा जमीन पर गिर कर हवा के साथ उड़ गया और नीचे का आधा हिस्सा उसके हाथ में रह गया। उसने जमीन पर पैर रखे ही थे कि एक प्रौढ़ व्यक्ति ने उससे कहा,” टिकट दिखाइये”।

मोहन ने अब उस व्यक्ति पर ध्यान दिया। पुलिस के एक सिपाही के साथ खड़ा प्रौढ़ उससे टिकट माँग रहा था। शर्तिया प्रौढ़ ने उसे उतरते हुये टिकट फाड़ते हुये देखा होगा।

मोहन ने उसे टिकट का आधा हिस्सा दे दिया। प्रौढ़ ने टिकट अपने हाथ में लिया और उसे देखा और कहा कि यह वेलिड टिकट नहीं है। कंडक्टर भी मोहन के साथ नीचे उतर आया था।

प्रौढ़ ने मोहन से कहा,”इधर साइड में खड़े हो जाओ”। मोहन के बाद 5-6 लोग और उतरे। एक आदमी ने अपना टिकट एकदम मसला हुआ था। प्रौढ़ ने उसका टिकट उसके हाथ में दूर से ही देखा और उसे जाने दिया।

मोहन ने प्रौढ़ से पूछा,” टिकट वेलिड क्यों नहीं है, अभी आपके सामने इस बस से मैं उतरा हूँ, रास्ते में टिकट खरीदा है”?

प्रौढ़ ने कहा,” हमें कैसे पता चलेगा आधे टिकट से कि यह अभी का है और यात्रा के पूरे पैसे दिये गये हैं या सही टिकट लिया गया है”।

सही टिकट? आप कंडक्टर से पूछिये, मैं चाणक्यपुरी से चढ़ा, इनसे शिवाजी स्टेडियम का टिकट माँगा और इन्होने जो टिकट दिया और जितने पैसे माँगे मैंने दिये और टिकट लिया”।

पास खड़े कंडक्टर ने स्वीकृति में सिर हिलाया। प्रौढ़ ने कंडक्टर की ओर देखा भी नहीं और उसे वहाँ से हटने के लिये हाथ से इशारा किया और मोहन से कहा,” हमें इस बात से मतलब नहीं, हमें तो यहाँ पूरा और वेलिड टिकट चाहिये”।

बस पुनः सवारियों से भर चुकी थी और ड्राइवर ने तेज आवाज में हॉर्न बजाया और कंडक्टर को आवाज लगायी चलने के लिये।

कंडक्टर, सरकारी अधिकारी और मोहन को देखते हुये पिछले दरवाजे से बस में चढ़ गया और उसने सीटी मारकर ड्राइवर को चलने का संदेश दिया। बस चल दी।

मोहन को कुछ आभास हो गया कि प्रौढ़ अधिकारी उसे फँसा रहा है। कंडक्टर ही उसका गवाह था और वह चला गया था।

देखिये मैं आपको बता चुका हूँ कि मैंने चाणक्यपुरी से टिकट लिया और पूरे पैसे कंडक्टर को दिये। उसे आपने रोका नहीं वरना वह आपको सच बता देता।

हमें सुनना ही नहीं कंडक्टर से कुछ भी। हमें वेलिड टिकट दिखा दो।

टिकट तो आपको दिया अभी। बस से उतरते समय आधा फाड़ दिया था। बस में बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था कि यात्रा के पूरा होने पर टिकट को नष्ट कर दें जिससे उसका दुरुपयोग न होने पाये।

हमें बस के अंदर से मतलब ही नहीं। हमें तो यहाँ की गयी यात्रा के लिये वेलिड टिकट चाहिये।

अब मैं टिकट का दूसरा हिस्सा कहाँ से खोजूँगा।

आपने बिना टिकट यात्रा की है।

बताया तो आपको कि चाणक्यपुरी से टिकट लिया था।

हमें क्या पता कि आप चाणक्यपुरी से ही चढ़े थे? क्या पता आप किसी पहले के स्टॉप से चढ़े हो? हौज़ खास से आये हो? अपनी यात्रा की वैधता के लिये वेलिड टिकट दो।

कंडक्टर को तो आपने भगा दिया। वही तो बता सकता था कि मैं चाणक्यपुरी से ही चढ़ा और वहीं से टिकट लिया। वैसे मुझे ऐसा लग रहा है कि अगर मेरे पास पूरा टिकट भी होता तब भी आप यह बात कहते कि आपको कैसे पता कि मैं कहाँ से चढ़ा था और क्या वाकई मैंने सही टिकट लिया था?

“आपने बिना टिकट यात्रा की है”। नाक पर नीचे खिसक आये चश्मे को ऊपर खिसकाते हुये प्रौढ़ ने दोहराया।

ऐसे कैसे बिना टिकट के यात्रा की है।

आप पर बिना टिकट यात्रा करने का केस हो सकता है।

प्रौढ़ ने सिपाही की ओर देखा।

सिपाही मोहन के पास आ गया और फुसफुसाते हुये कहा,” सौ रुपये देकर रफा दफा करो मामला”।

मुझे ऐसा लग रहा है आप मुझे जानकर फंसा रहे हैं।

प्रौढ़ अपनी जेब टटोलने लगा और जेब से पान निकालकर उसने खा लिया।

सिपाही ने फिर मोहन से धीरे से कहा,” मामला न बढ़ाओ, चुपके से सौ रुपये दो और खिसको”।

मोहन ने सिपाही की बात पर ध्यान नहीं दिया और प्रौढ़ से कहा,” वहाँ नियंत्रण कक्ष में चलिये, उस बस का नम्बर पता चल जायेगा। मैं तैयार हूँ वापिस उसी बस के यहाँ तक आने के लिये। कंडक्टर बता देगा सही बात”।

प्रौढ़ ने मुँह बिचका कर कहा,” हम यहाँ सारा दिन तो बैठे नहीं रहेंगे।”

मैंने देखा कि एक कुचले मसले हुये टिकट पर आपने कोई आपत्ति नहीं की और यात्री को जाने दिया।

हमारे विवेक के ऊपर है। हमें लगा उसका टिकट सही था। आपका नहीं हैं।

एक बस चलने को तैयार थी। प्रौढ़ उसमें सवार होने लगा और सिपाही से उसने मोहन को साथ लेने के लिये कहा।

सिपाही मोहन को लेकर बस में चढ़ गया।

मोहन ने पूछा,” कहाँ ले जा रहे हैं मुझे”।

हेड आफिस जायेंगे वहीं मामला सुलटेगा।

सिपाही ने मोहन को घूर कर कहा,” अरे साहब को जुर्माने के सौ रुपये दो और जाओ”।

बस रेंग कर चल पड़ी थी। बस अड्डे से निकल कर सड़क पर रेड लाइट पर आकर खड़ी हो गयी।

मोहन ने प्रौढ़ से कहा,” मुझे जबरदस्ती फंसाया जा रहा है। आपको कोटा पूरा करना होगा। मेरे पास टिकट था। चलो मैं जुर्माना देने को तैयार हूँ। काटो कितना जुर्माना लगेगा।”

प्रौढ़ ने गुस्से से उसे घूरते हुये कहा,” हमारे ऊपर है हम जुर्माना लें न लें। हम तो आपको जेल भेज सकते हैं।”

मोहन को भी गुस्सा आ गया,” चलो आप जेल ही भेजो। मैं भी देखता हूँ क्या क्या कर सकते हो। इतनी अंधेरगर्दी नहीं छायी हुई है देश में कि आप जो चाहे सो कर लो। आप जुर्माना बताओ, मैं तैयार हूँ देने के लिये जबकि मेरी गलती नहीं है”।

प्रौढ़ उसे घूरता रहा और कहा,: दौ सौ पचास रुपये जुर्माना है”।

सिपाही ने मोहन से कहा,” अरे क्यों मामला उलझा रहा है, सौ में काम हो रहा है तेरा, दे के सुलटा ले”।

मोहन ने कहा,” ठीक है आप रसीद काटो, मैं दौ सौ पचास रुपये देता हूँ।”

ग्रीन लाइट होते ही बस चल पड़ी थी।

प्रौढ़ ने अपने बैग से रसीद काटने वाली पुस्तिका निकाली और मोहन से कहा,” निकालो दौ सौ पचास”।

इस बस का कंडक्टर और उसमें बैठी सवारियाँ उसकी ओर ऐसे देख रहीं थीं मानो वह कोई अपराधी हो।

मोहन की ऊपरी जेब में दौ सौ रुपये थे उसने निकाले और पर्स उसने हाथ में पकड़े बैग में रखा हुआ था सो उसे खोलने लगा।

सिपाही ने उसके हाथ से दौ सौ रुपये ले लिये।

सिपाही ने कंडक्टर से बस रुकवाने के लिये कहा।

बस के रुकते ही सिपाही ने मोहन को बस से नीचे धकेलते हुये कहा,”चल सुलट गया मामला”। और ड्राइवर को बस चलाने के लिये कहा।

सिपाही के अचानक नीचे धकेलने से मोहन एकदम से संभल नहीं पाया और जब तक वह संभलता बस आगे जा चुकी थी।

उसकी समझ में नहीं आया कि पहले वह अपने को कोसे कि उसने टिकट क्यों फाड़ दिया था या सिपाही और टिकट चैकर को गाली दे जिन्होने उसे फँसाकर लूट लिया था।

उसने गुस्से से जाती हुयी बस को देखा जिसके पीछे लिखी इबारत उसे चिढ़ा रही थी।

यो तो ऐसे ही चलेगी

…[राकेश]

अप्रैल 12, 2011

जय जवान

बर्फीले तूफान के कारण गाड़ी बहुत धीमे धीमे  चल पा रही थी। कप्तान साहब परेशान थे कि अगर समय रहते सुंरग तक न पहुँच पाये और किसी दुर्घटनावश सुरंग बंद हो गयी तो बहुत दिक्कत आ जायेगी। वे चालक से तेज चलाने के लिये कह भी नहीं पा रहे थे। इतने भारी हिमपात में वह गाड़ी चला पा रहा था यही बहुत बड़े साहस की और मूर्खता की बात थी। जब मैदानी बेस स्टेशन से चले थे तो हल्के हिमपात के ही आसार थे और उन्होने अनुमान लगाया था कि अगर हिमपात बढ़ा तो भी वे समय रहते सुरंग पार कर जायेंगे और उसके बाद तो धीरे धीरे भी गाड़ी चलायी तो भी अगले दिन तक कैम्प तक पहुँच ही जायेंगे। इसलिये वे सुबह छह बजे ही बेस स्टेशन से चल पड़े थे। पर दुर्भाग्य से रास्ते में ही हिमपात अनुमान से ज्यादा होने लगा और वे अपने अनुमानित समय से कुछ घंटे की देरी से सुरंग के पास पहुँचे। उनकी गाड़ी से पहले ही ट्रकों एवम अन्य वाहनों की कतारें सड़क पर खड़ी थीं। उनकी गाड़ी सुरंग से कम से कम १ किमी पहले ही रुक गयी। नीचे उतर कर पहले से खड़ी गाड़ियों से मालूम किया तो पता चला कि वहाँ लैंड-स्लाइडिंग होने से सुरंग का मुँह बंद हो गया है। बर्फबारी रुकने से पहले सुरंग की सफाई का काम शुरु नहीं हो सकता। इतनी भारी बर्फबारी में मशीने और मजदूर ही वहाँ तक नहीं आ सकते। बर्फबारी रुक भी जाये तो भी आड़े तिरछे खड़े वाहनों को हटाने में ही बहुत समय लग जाना है।
कप्तान साहब चिंतित हो गये। दुश्मन ने पर्वतों की चोटियों पर स्थित उनकी चौकियों पर चुपके से कब्जा कर लिया था। उनके लिये गाड़ी में रखी अत्यंत जरुरी सामग्री को अपने कैम्प तक ले जाना बहुत जरुरी था। चालक के अलावा उनके साथ सिक्योरिटी के लिये दो जवान और थे। उन्होने गाड़ी में मौजूद वायरलैस से बेस स्टेशन या कैम्प पर सम्पर्क साधने के लिये एक जवान से कहा परंतु सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाया। आतंकवादियों ने अलग दहशत फैला रखी थी राज्य में।

वे चिंतित होकर इधर उधर टहल रहे थे। कभी सुरंग की ओर जाते वाहनों के बीच स्थान खोजते हुये और कभी अपनी गाड़ी के पीछे की तरफ जाते। पीछे से उनके बाद भी कई वाहन आ गये थे।
समय बीत नहीं रहा था।

कुछ देर बाद उन्होने सेना की वर्दी पहने कुछ जवानों को कमर पर पिट्ठू बैग कसे हुये पास के ढ़लान से उतरते हुये देखा। उन्हे ऐसा लगा जैसे वे सुरंग के दूसरी ओर से आये हैं। वे लपक कर उनके उतरने की जगह के करीब पहुँचे। छह जवान सावधानी से ढ़लान से नीचे उतर रहे थे। जवान भी अपने सामने सेना के एक अधिकारी को खड़े देखकर कुछ चौकन्ने हो गये। उन्होने कप्तान साहब को सेल्यूट किया।

कप्तान साहब ने पूछा,” क्यों मेजर, क्या सुरंग के दूसरी तरफ से आ रहे हो आप लोग”।

जी साहब, उधर भी ऐसा ही हाल है। सुरंग बंद हो गयी है और वाहन अटके खड़े हैं। हम लोग तो कोई चारा न देखकर पैदल ही चढ़ाई करके आ रहे हैं। हमें लगा था कि इधर आ जायेंगे तो हो सकता है कि कोई वाहन वापिस जाने की तलाश में हो और हमें जगह मिल जाये

कहाँ जा रहे हो आप लोग?

साहब हम लोग तो छुट्टी पर घर जा रहे हैं। आप यहाँ कैसे अटक गये?

कप्तान साहब बातें करते करते उन्हे अपनी गाड़ी तक ले आये थे। कप्तान के साथ सेना के जवानों को देखकर उनकी गाड़ी में बैठे चालक और दोनों जवान भी गाड़ी से बाहर आ गये।

उन्होने जवानों से पीछे गाड़ी में बैठने को कहा। सब अंदर बैठ गये तो कप्तान साहब ने अपने साथ आये जवानों से थर्मसों में रखी चाय सबको देने के लिये कहा।

चाय पीकर सबके शरीर भी खुले और दिमाग में भी चुस्ती आयी।

कप्तान ने जवानों को बताया कि कैसे वे यहाँ अटक गये हैं और कैसे उनका कैम्प पर पहुँचना बहुत जरुरी है। उन्होने समस्या की गम्भीरता उन्हे बतायी।

जवानों ने कहा,” साहब सुरंग के दूसरी ओर तो सड़क का भी बहुत बुरा हाल है। बर्फ हटाये बिना वाहन चल भी नहीं सकते। अगर आप हमारी तरह चढ़ाई करके उधर पहुँच भी गये तो उधर कोई वाहन मिल भी सकता है परंतु इंतजार तो करना ही पड़ेगा जब तक कि रास्ता साफ न हो जाये”।

कप्तान साहब चिंतित स्वर में बोले,” अरे बहुत दिक्कत हो जायेगी अगर सामान न पहुँचा समय पर”।

थोड़ी देर गाड़ी में चुप्पी समायी रही। जवान एक दूसरे की ओर देख रहे थे। नये आये जवानों ने आँखों-आँखों में कुछ बातें कीं और उनमें से एक जवान ने कहा,” साहब एक काम हो सकता है। हममें से दो पिछले साल सर्दियों में भी ऐसे ही सुरंग के पास फँस गये थे। इतना खराब मौसम नहीं था पर सुरंग के दूसरी ओर वाहनों की दुर्घटना होने के कारण रास्ता बंद हो गया था और जाम लग गया था। बर्फ भी पड़ने लगी थी पर इतनी भारी बर्फबारी नहीं थी उस वक्त। हम आठ लोग थे और हम लोगों को ड्यूटी ज्वाइन करनी थी। हम लोगों ने पैदल ही रास्ता पार किया था। सुरंग से करीब दस किमी चलना पड़ेगा पर आगे शायद मौसम ठीक हो और वाहन मँगवाया जा सके”।

कप्तान साहब की आँखों में चमक तो आयी पर उन्होने सीमायें भी जता दीं,” हम तो केवल तीन लोग हैं, चालक को तो यहीं गाड़ी के साथ रहना होगा, सामान हमारे पास बहुत है, बिना सामान के जाने का कोई मतलब नहीं और उसे छोड़ा भी नहीं जा सकता, बल्कि यहाँ गाड़ी के साथ भी एक और जवान चाहिये”।

कप्तान साहब कुछ कहना चाहते थे पर हिचकिचाहट के मारे कह नहीं पाये और गाड़ी से बाहर धुआँधार गिरती बर्फ को देखने लगे।

जवान कप्तान साहब की परेशानी समझ गये। सैनिकों के दिमाग और ह्रदय एक ही तरीके से काम करते हैं। उन्होने फिर से आपस में इशारों में बात की। आशायें, लाचारियाँ और फर्ज आपस में गुत्थमगुत्था हुये पर जो निकल कर आया उसने कप्तान साहब को चौंका दिया।

एक जवान ने कहा,” साहब, हम लोग आपके साथ चलते हैं। अपने अपने पिट्ठुओं में सामान भर लेंगे”।

“पर आप लोग छुट्टी पर जा रहे हैं। कितने समय बाद जा रहे होंगे। घर-परिवार के लोगों से मिलने की उत्सुकता होगी”।

“साहब आप इस बात की चिंता न करें। फर्ज छोड़कर तो भागेंगे नहीं। पीठ दिखाकर चले गये तो कैसी छुट्टियाँ? घरवालों के साथ रहते हुये भी कैसे कटेंगी वे”।

कप्तान साहब के पूरे चेहरे और आँखों में गर्व दमकने लगा। गर्वीले और जोशीले स्वर में उन्होने कहा,” शाबास मेजर! आप जैसे जाबांजों पर सेना और पूरा देश फख्र करता है”।


जवानों ने साहसी स्वर में कहा,” साहब चूँकि गाड़ी यहीं रहेगी आप चालक से इतना इंतजाम करने के लिये कह दीजिये कि हमारे घरों पर सूचना दे दे कि शायद आने में देरी हो जाये और एक दो दिन में हम सम्पर्क कर लेंगे।”

कप्तान साहब ने कहा,” उसकी आप लोग चिंता न करें। मैं कोशिश करुँगा कि आपके अधिकारी आपकी छुट्टियाँ रीशेडयूल कर दें। चालक के पास वायरलैस है वह बेस स्टेशन पर सम्पर्क साधने की कोशिश करता रहेगा और आप अपने डिटेल्स उसे देंदें वह सब सम्भाल लेगा”।

उन्होने झट से योजना बना दी। उन्होने कहा चूँकि हमारे पास केवल दो हथियारबंद जवान हैं सो दोनों हमारे साथ चलेंगे। गाड़ी के साथ चालक और आप में से कोई एक रुक जाओ।

जवानों ने झटपट अपने अपने पिट्ठुओं को खाली करके उनमें कप्तान साहब की दी हुयी सामग्री भर ली।

थोड़ी देर बाद ही बर्फीले तूफान को मात देते हुये अपने फर्ज़ को अंजाम देने के लिये भारतीय सेना के आठ जांबाज सैनिक अपने अपने कंधों पर भारी पिट्ठुओं को लादे चढ़ाई चढ़ते जा रहे थे।

…[राकेश]

नवम्बर 16, 2010

विवाह

महेन्द्र सिंह की सबसे छोटी संतान की उम्र उस वक्त्त तकरीबन 3 साल की थी जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया था। चार संतानों, दो बेटियों और दो बेटों, को उन्होने ही माँ और पिता, दोनों की जिम्मेदारी निभाते हुये पाला और बड़ा किया। रिश्तेदारों एवम शुभचिंतकों ने उस वक्त्त उन पर बहुत जोर डाला था कि वे पुनः विवाह कर लें किसी ऐसी स्त्री से जो उनके बच्चों को माँ जैसा लालन-पालन दे सके, परंतु महेन्द्र बाबू नहीं माने, वे बच्चों को सौतेली माँ की छाया देने का रिस्क उठाने के लिये बिल्कुल तैयार नहीं थे। उन्होने बड़े लाड़-प्यार और भरपूर जिम्मेदारी के साथ अपने बच्चों को पाला। दोनों बेटियाँ बेटों से बड़ी थीं और जब वे कुछ सयानी हो गयीं तो महेन्द्र बाबू को बेटों को पालने में उतनी मुश्किल न उठानी पड़ी और बेटियों ने घर और अपने छोटे भाइयों को अच्छी तरह से सम्भालना शुरु कर दिया।

उचित समय पर महेन्द्र बाबू ने योग्य वरों के साथ अपनी दोनों पुत्रियों के विवाह कर दिये। पुत्रियाँ सुखी रहीं। उनके जाने से घर के प्रबंधन में कुछ दिक्कते आयीं पर महेंद्र बाबू ने जल्दी ही सब कुछ सम्भाल लिया। बेटियाँ उनके बेहद नजदीक थीं अतः भावनात्मक रुप से दूरी खलती रही महेन्द्र बाबू को पर जीवन भर उन्होने घर और बाहर के जीवन और अपने व्यक्तिगत जीवन को बड़े ही संतुलन से जिया था अतः वे शीघ्र ही सम्भल गये।

कुछ साल बाद बेटे भी नौकरी आदि के सिलसिले में दूसरे शहरों में चले गये और फिर उनके भी विवाह हो गये।

बेटे-बेटियाँ अपने अपने जीवन साथियों एवम बच्चों के साथ त्यौहार आदि पर महेन्द्र बाबू से मिलने आते रहते थे। बेटियाँ, बेटों से ज्यादा चक्कर लगातीं। उन्हे अपने पिता के त्यागमयी जीवन का भरपूर ज्ञान था। उन्होने बचपन से पूरे होश में पिता को चारों भाई बहनों के सुख और विकास के लिये जमीन आसमान करते हुये देखा था। फोन से तो वे लगभग हर तीसरे चौथे दिन पिता से बात कर लेतीं थीं।

महेंद्र बाबू साठ के करीब के हो चले थे जब सहसा ही वे गम्भीर रुप से बीमार पड़ गये। बेटे तो उनके दूर थे, एक बेटी भी दूर थी। एक ही बेटी आ पायी वह भी एक दिन बाद। पर वह भी तीमारदारी के लिये रह नहीं सकती थी। बच्चों के इम्तिहान आदि के कारण वह रात को रुक नहीं पायी और एक- दो दिन बाद फिर से आने के लिये कह कर चली गयी।

एक-दो दिन में सभी बेटे बेटियाँ आकर देख गये महेंद्र बाबू को। समय लगा उन्हे पर वे ठीक हो गये।

संतुलित रुप से हँसमुख महेंद्र बाबू बीमारी के बाद कुछ ज्यादा ही गम्भीर हो गये। वे ज्यादातर समय कुछ सोचते रहते थे।

समय बीतता गया। साल-डेढ़ साल बाद की बात है जब चारों संतानों को महेन्द्र बाबू का संदेश मिला कि वे विवाह कर रहे हैं।

बेटियाँ, दामाद, बेटे एवम बहुयें, सभी पहले तो आश्चर्यचकित रह गये और फिर उन्हे महेन्द्र बाबू पर गुस्सा आने लगा।

आठों लोगों को इस बात की फिक्र थी कि लोग उन सबके बारे में क्या सोचेंगे?

इंसानी फितरत ही ऐसी है कि स्वहित बड़ी जल्दी ही सभी समझ लेते हैं।

बेटों को उनकी पत्नियों ने समझा दिया.”ज्यादा हल्ला मचाने की जरुरत नहीं है। एक तरह से बाबू जी ठीक ही कर रहे हैं। अब अगर इस बार बीमार पड़ गये और उन्हे यहाँ लाना पड़ गया तो उनकी तीमारदारी कौन करेगा। हमारे बस की बात तो है नहीं”।

ऐसी सीख पाकर बेटों को व्यवहारिकता समझ में आ गयी और वे सामान्य मुद्रा में आ गये और जब बहनों के फोन आये तो उनसे कह दिया,” दीदी हम कर ही क्या सकते हैं, बाबू जी ने अगर ठान ही लिया है कि वे विवाह करेंगे तो हम कैसे उन्हे रोक सकते हैं। हम विवाह में सम्मिलित तो होने से रहे। उनके विवाह के बाद वहाँ जाना भी मुश्किल हो जायेगा”।

बेटियाँ और दामाद कुछ ज्यादा ही नाराज था। बेटियों को तो महेन्द्र बाबू के पास जाकर रहना नहीं था और न ही महेन्द्र बाबू बेटियों के घर आकर रहने वाले थे तब भी दोनों दामाद, अपने पत्नियों को डाँट रहे थे,” तुम्हारे बाप के ऐसा करने के बाद क्या हमारे बच्चों की शादी में दिक्कतें नहीं आयेंगी? तुम्हारे बाप ने हमें कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा”।

बेटियों ने फोन पर ही अपने पिता को समझाने की बहुत कोशिश की। गुस्से में थोड़ी खरी खोटी भी सुनायी पर महेन्द्र बाबू शांत भाव से इतना ही बोले,” मैंने तय कर लिया है, मुझे लगता है कि मुझे साथी की आवश्यकता है, और मेरा ऐसा करना तुम लोगों में से किसी के जीवन को प्रभावित नहीं करता। तुम सब लोग अपने अपने जीवन में रमे हुये हो। मैं यहाँ अकेला रहता हूँ। मैंने आज या कल क्या खाया, या मैं कहाँ गया, क्या इन सब बातों से तुम्हारा जीवन प्रभावित होता है? मुझे विवाह की ऐसी ही जरुरत होती तो मैं पच्चीस तीस साल पहले न कर लेता?  पर तब तुम लोग मेरे साथ थे। आज तो मैं निपट अकेला हूँ। वक्त्त ने मुझे ऐसा मौका दिया है कि मैं बुढ़ापे में एक अच्छे साथी के साथ बचे जीवन के साल या महीने जी सकता हूँ। मुझे रत्ती भर भी ऐसा महसूस नहीं हो रहा कि मैं कहीं से भी गलत हूँ। तुम लोग आना चाहो तो विवाह में सम्मिलित होने आ जाना। मुझे अच्छा लगेगा। शायद मेरे जीवन साथी से मिलकर तुम्हारे गिले शिकवे दूर हो जायें”।

महेन्द्र बाबू ने अपने नजदीकी मित्रों की उपस्थिति में बेहद सादे तरीके से मंदिर में विवाह कर लिया। उनकी चारों संतानों में से कोई नहीं आया।

बेटे और बेटियों ने अब फोन भी करना बंद कर दिया।

महेन्द्र बाबू ऐसी किसी भी जगह शादी आदि के मौकों पर न जाते जहाँ उन्हे लगता कि उनके बच्चे भी आयेंगे और उनकी स्थिति खराब हो सकती है रिश्तेदारों के सामने अपने ऐसे पिता को देखकर नज़रअंदाज़ करने में, जिन्होने इतनी बड़ी उम्र में विवाह किया है। महेन्द्र बाबू अपनी मिलनसारिता और सबकी सहायता करने की प्रवृति के कारण अपने रिश्तेदारों में अच्छे खासे लोकप्रिय थे और कुछ लोग उन्हे अभी भी इसलिये बुलाते थे क्योंकि विगत में महेन्द्र बाबू ने उनकी किसी न किसी रुप में सहायता की थी। कुछ इस उत्सुकता में निमंत्रण भेजते थे कि उस महिला को तो देखें जिनसे विवाह करने के लिये महेन्द्र बाबू ने अपने बच्चों की नाराज़गी मोल ली और कुछ सिर्फ मज़े लेने के लिये उन्हे आमंत्रित करते थे और यह भी सुनिश्चित करते थे कि निमंत्रण महेन्द्र बाबू की चारों संतानों को भी जरुर जाये। ऐसे लोग देखना चाहते थे कि हो सकता है सब लोग आ जायें और बाकी सबको कुछ तमाशा देखने को मिल जाये।

पर महेन्द्र बाबू ने ऐसा कोई अवसर उत्पन्न ही नहीं होने दिया जहाँ उनकी उपस्थिति की वजह से उनके बेटों और बेटियों को किसी समस्या का सामना करना पड़े।

लोगों में बातें भी उठने लगी थी। बहुत सारे लोग महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी की खूबसूरती और सलीकेदार तौर तरीके की चर्चा करते थे, कुछ उनके बेटों और बेटियों तक यह सूचना पहुँचा आये थे कि असल में महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी बनने वाली महिला को बहुत पहले से जानते हैं। कुछ ने यह कयास भी लगा लिया कि शायद अपनी पहली शादी के पहले से ही| शायद दोनों साथ ही पढ़ते हों और जाति भिन्नता के कारण वे दोनों जवानी में शादी न कर पाये थे। पर दोनों महेन्द्र बाबू के प्रथम विवाह के पहले से ही एक दूसरे से प्रेम करते थे, तभी महिला ने अब तक विवाह नहीं किया था।

हिंदी साहित्य के संसार में थोड़ी बहुत दखल रखने वाले लोग प्रसिद्ध लेखक एवम हंस के सम्पादक राजेंद्र यादव की उसी समय प्रकाशित होने वाली आत्मकथा “मुड़ मुड़ के देखता हूँ” के हवाले से इस बात की तसदीक कर रहे थे कि महेन्द्र बाबू अपनी दूसरी पत्नी को शर्तिया तौर पर अपने प्रथम विवाह के पूर्व से ही जानते थे।

सभी लोगों में महेन्द्र बाबू की दूसरी पत्नी को लेकर उत्सुकता थी। लोग तमाशाई ही ज्यादा थे।

जो लोग महेन्द्र बाबू को बहुत अरसे से जानते थे और उनके दूसरे विवाह के बाद के घटनाचक्रों से भी परिचित थे उनमें इस घटना ने बहस छेड़ दी थी। ऐसे लोगों में से कुछ संवेदनशील किस्म के लोगों के पास ही, महेन्द्र बाबू के इस कदम को समझ पाने का संतुलित दृष्टिकोण था।

महेन्द्र बाबू की छोटी बेटी, जो कभी उनकी बहुत करीबी थी, अपने पिता से सालों बात भी नहीं कर पायी और अब जब इस साल 2010 के अक्टुबर माह में महेन्द्र बाबू का देहांत हो गया, कभी कर भी नहीं पायेगी।

एक आदमी अपने बच्चों की परवरिश की खातिर बिना साथी के अकेले ही तीस-बत्तीस साल तक अपना जीवन होम करता रहता है पर जब वह पुनः अकेला रह जाता है बुढ़ापे में, और अपने खुद के लिये एक निर्णय लेता है तो वही बच्चे उसके खिलाफ हो जाते हैं।

अब जब महेन्द्र बाबू नहीं हैं तो क्या उनके चारों बेटे बेटियाँ कभी संतुलित ढ़ंग से अपने पिता के दृष्टिकोण को समझ पायेंगे? क्या उन्हे भी एक इंसान के रुप में स्वीकार कर पायेंगे?

…[राकेश]

अक्टूबर 11, 2010

उधार का भाग्य…

प्रकाश माइक के पास पहुँचे। उन्होने सामने बैठी और खड़ी भीड़ को देखा और बोलना शुरु किया।

आज मैं अंतिम बार इस स्कूल के प्रिंसीपल के रुप में आप सबसे बात कर रहा हूँ। इसी जगह खड़े होकर मैंने बरसों भाषण दिये हैं। आज जब मेरी नौकरी का अंतिम दिन है तो मैं सोचता हूँ कि इस शिक्षण संस्थान की नौकरी से तो मुक्ति मिल रही है पर क्या कल से मेरे अंदर बैठा शिक्षक भी सेवानिवृत हो जायेगा? क्या एक शिक्षक कभी भी अपने कर्तव्य से मुक्त्त हो सकता है? कुछ सवाल हैं जो मेरे अंदर उमड़ रहे हैं, उनके उत्तर भी मिल ही जायेंगे।
इस परिसर में इस मंच से अपने अंतिम सम्बोधन में एक कथा आप सबसे, विधार्थियों से खास तौर पर, कहना चाहूँगा।

बहुत साल पहले की बात है।

एक लड़का था। उम्र तकरीबन आठ-नौ साल रही होगी उस समय उसकी। एक शाम वह तेजी से लपका हुआ घर की ओर जा रहा था। दोनों हाथ उसने अपने सीने पर कस कर जकड़ रखे थे और हाथों में कोई चीज छिपा रखी थी। साँस उसकी तेज चल रही थी।

घर पहुँच कर वह सीधा अपने दादा के पास पहुँचा।

बाबा, देखो आज मुझे क्या मिला?

उसने दादा के हाथ में पर्स की शक्ल का एक छोटा सा बैग थमा दिया।

ये कहाँ मिला तुझे बेटा?

खोल कर तो देखो बाबा, कितने सारे रुपये हैं इसमें।

इतने सारे रुपये? कहाँ से लाया है तू इसे?

बाबा सड़क किनारे मिला। मेरे पैर से ठोकर लगी तो मैंने उठाकर देखा। खोला तो रुपये मिले। कोई नहीं था वहाँ मैं इसे उठा लाया।

तूने देखा वहाँ ढ़ंग से कोई खोज नहीं रहा था इसे?

नहीं बाबा। वहाँ कोई भी नहीं था। आप और बाबूजी उस दिन पैसों की बात कर रहे थे अब तो हमारे बहुत सारे काम हो जायेंगे।

पर बेटा ये हमारा पैसा नहीं है।

पर बाबा मुझे तो ये सड़क पर मिला। अब तो ये मेरा ही हुआ।

दादा के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं।

नहीं बेटा, ये तुम्हारा पैसा नहीं है। उस आदमी के बारे में सोचो जिसका इतना सारा पैसा खो गया है। कौन जाने कितने जरुरी काम के लिये वह इस पैसे को लेकर कहीं जा रहा हो। पैसा खो जाने से उसके सामने कितनी बड़ी परेशानी आ जायेगी। उस दुखी आदमी की आह भी तो इस पैसे से जुड़ी हुयी है। हो सकता है इस पैसे से हमारे कुछ काम हो जायें और कुछ आर्थिक परेशानियाँ इस समय कम हो जायें पर यह पैसा हमारा कमाया हुआ नहीं है, इस पैसे के साथ किसी का दुख दर्द जुड़ा हो सकता है, इन सबसे पैदा होने वाली परेशानियों की बात तो हम जानते नहीं। जाने कैसी मुसीबतें इस पैसे के साथ आकर हमें घेर लें। उस आदमी का दुर्भाग्य था कि उसके हाथ से बैग गिर गया पर वह दुर्भाग्य तो इस पैसे से जुड़ा हुआ है ही। हमें तो इसे इसके असली मालिक के पास पहुँचाना ही होगा।

प्रकाश ने रुककर भीड़ की तरफ देखा, सभी रुचि के साथ उन्हे सुन रहे थे। वे आगे बोले।

किस्सा तो लम्बा है। संक्षेप में इतना बता दूँ कि लड़के के पिता और दादा ने पैसा उसके मालिक तक पँहुचा दिया।

इस घटना के कुछ ही दिनों बाद की बात है। लड़का अपने दादा जी के साथ टहल रहा था। चलते हुये लड़के को रास्ते में दस पैसे मिले, उसने झुककर सिक्का उठा लिया।

उसने दादा की तरफ देखकर पूछा,”बाबा, इसका क्या करेंगे। क्या इसे यहीं पड़ा रहने दें। अब इसके मालिक को कैसे ढ़ूँढ़ेंगे?”
दादा ने मुस्कुरा कर कहा,” हमारे देश की मुद्रा है बेटा। नोट छापने, सिक्के बनाने में देश का पैसा खर्च होता है। इसका सम्मान करना हर देशवासी का कर्तव्य है। इसे रख लो। कहीं दान-पात्र में जमा कर देंगे।

बाबा, इसके साथ इसके मालिक की आह नहीं जुड़ी होगी?

बेटा, इतने कम पैसे खोने वाले का दुख भी कम होगा। इससे उसका बहुत बड़ा काम सिद्ध नहीं होने वाला था। हाँ तुम्हारे लिये इसे भी रखना  गलत है। इसे दान-पात्र में डाल दो, किसी अच्छे काम को करने में इसका उपयोग हो जायेगा।

लड़के को कुछ असमंजस में पाकर दादा ने कहा,” बेटा उधार का धन, भाग्य और ज्ञान काम नहीं आता। वह अपने साथ मुसीबतें भी लाता है। अपने आप अर्जित किया हुआ ही फलदायी होता है”।

लड़के के दादा एक प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे।

आज वह लड़का आपके सामने आपके प्रिंसीपल के रुप में खड़ा है। ईमानदारी और स्वयं अर्जित करने की शिक्षा मैंने अपने बाबा से ग्रहण की थी। मुझे संतोष है कि उनकी शिक्षा के कारण मैं जीवन में ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर सका। मुझे भरपूर संतोष है। आज मैं अपने बाबा के द्वारा दी गयी सीख आप सबको सौंपता हूँ। मुझे विश्वास है, कि यहाँ मौजूद सारे लोग नहीं तो कुछ अवश्य ही इस विरासत को अपनायेंगे। कुछ भी अर्जित करने की इच्छा हो उसे स्वयं ही अपनी बुद्धि और लगन से प्राप्त करें। ऐसा करना आपके लिये एक साफ-सुथरे और तनाव रहित जीवन की बुनियाद प्रदान करेगा।

…[राकेश]

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