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नवम्बर 26, 2010

कानून को ठेंगा दिखाते दिल्ली मेट्रो के पुरुष एवम महिला यात्री और पुलिस

कुछ साल पहले भारत ने मेरठ के एक पार्क में बैठे युवा जोड़ों को पीटती एक महिला पुलिस अधिकारी के तेवर देखे थे। अगर युवा जोड़े भारतीय कानून की किसी धारा का उल्लंघन कर रहे थे तो महिला पुलिस अधिकारी ने अपनी कानूनी जिम्मेदारी नहीं दिखायी बल्कि उन्हे अपने स्तर पर ही सबक सिखाने का फैसला लिया। जाने कैसे एक सभ्य समाज पुलिस को इतनी छूट दे देता है कि पुलिस अधिकारी अपने स्तर पर सड़कों पर खुद ही फैसले लेने लग जायें? पुलिस के ऐसे कदमों का समर्थन करने वाले सामाजिक ठेकेदार दर असल एक निरंकुश पुलिस की बुनियाद गहरी और मजबूत कर रहे होते हैं।

भारत में जगह जगह पुलिस वालों को स्वयं ही कानून तोड़ते देखा जा सकता है।

देश के कुछ राज्यों में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को कानून की धज्जियाँ उड़ाकर आम जनता को पीटते, अपमानित करते हुये देश ने कई बार देखा है। लोकतंत्र में सिर्फ भारत में ही ऐसा हो सकता है कि कुछ लोग समाज के ठेकेदार बनकर फतवे जारी कर दें और इन फतवों से अलग जीवन जी रहे लोगों को सरे आम पीटा जाये क्योंकि ठेकेदार संस्कृति बचाने की कोशिश कर रहे हैं!

दिल्ली मेट्रो ने महिलाओं के लिये अलग से आरक्षित कूपों की व्यवस्था की है जो कि एक सराहनीय कदम है। पर क्या बेहतर न होगा कि एक मेट्रो ट्रेन के कुल कूपों को इस तरह से आरक्षित किया जाये जिससे कि कूपे पुरुषों, महिलाओं और परिवार वालों एवम जोड़ों के लिये आरक्षित हों। जिससे हर तरह के यात्री गण सहुलियत के साथ यात्रा कर सकें। मसलन दिल्ली मेट्रो एक ट्रेन में महिलाओं, पुरुषों एवम परिवारों, प्रत्येक के लिये 33-33% आरक्षण दे सकता है और बाकी बचे 1% को विकलांग यात्रियों के लिये। न्यायोचित बात तो यही है कि कोई भी वर्ग दूसरे वर्ग के लिये आरक्षित वर्ग के कूपों में अनाधिकृत प्रवेश न करे।

बहरहाल अभी तो दिल्ली मेट्रो के कर्ता-धर्ता इतना ही दिमाग लगा पाये हैं कि महिला यात्रियों के लिये कुछ कूपे आरक्षित कर दिये गये हैं।

वैसे ऐसे किसी भी आरक्षण की व्यवस्था भारतीय समाज के मुँह पर तमाचा जड़ती है क्योंकि ऐसी व्यवस्था यह बताती है कि भारतीय इतने सभ्य नहीं हैं कि महिलायें सुरक्षित तरीके से पूरी सहुलियत के साथ पुरुषों के साथ यात्रा कर सकें।

खबर है कि दिल्ली मेट्रो की महिला यात्रियों एवम पुलिस ने महिलाओं के लिये आरक्षित कूपों में घुस आये पुरुष यात्रियों को पीटा। मेट्रो स्टेशन्स पर चेतावनी लिखी हुयी है कि महिला कूपे में यात्रा कर रहे पुरुष यात्री पर 200 रुपयों का जुर्माना लगाया जायेगा।

पुलिस ने अपना कानूनी कर्तव्य नहीं निभाया और महिला कूपों में अनाधिकृत प्रवेश कर यात्रा कर रहे पुरुष यात्रियों पर जुर्माना नहीं लगाया बल्कि उन्हे पीट कर बाहर निकाला, उन्हे स्टेशन पर मुर्गा बनाया गया, शारीरिक प्रताड़ना दी गयी। अगर पुलिस ही सड़कों पर फैसले लेने लगेगी तो न्याय व्यवस्था क्या करेगी?

[ देखें वीडियो ]

गुण्डागर्दी चाहे पुरुषों की हो, महिलाओं की हो निंदनीय है और इन सबसे बढ़कर निंदनीय है पुलिस की गुण्डागर्दी। देश के कानून का सम्मान करने की शपथ लेकर वर्दी पहन कर अधिकार पाने वाली पुलिस से कानून के दायरे में रहकर जनता की सेवा करने की अपेक्षा हरेक लोकतांत्रिक और सभ्य समाज कर सकता है।

अगर भारत में पुलिस का निरंकुश शासन ही चाहिये तो पुलिस और जनता की ऐसी गतिविधियों पर आँखें मूँद कर ताली बजायी जा सकती है, पर ऐसे ही छोटे छोटे कदम बढ़कर आगे चलकर तानाशाही और दिन दहाड़े एनकाऊंटर्स में बदल जाते हैं और तब किये गये स्यापे किसी काम के नहीं होते!

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