Archive for जून, 2011

जून 30, 2011

प्रेम से भय कैसा

प्रेम में
खोना पड़ता है
बहुत सारी बातों को
बल्कि खो देना पड़ता है खुद को ही
इस भय से
प्रेम में पूर्ण-समर्पण
न कर पाने वालों
की संख्या अनगिनत है।

सतह पर ही तैरते रहने से
जल की गहराई
नहीं आँकी जा सकती
उसके लिये गहरे पानी पैठना
ही पड़ता है।

प्रेम में होने से
भय कैसा?
मानव जीवन
का सारा लेखा-जोखा बाँच
पता यही चलता है –
चिर काल से ही
प्रेम में उत्थान पाये
अस्तित्व ही
जी पाये हैं
काल की सीमाओं को
पार कर पाये हैं।

इस अदभुत अनुभव
को जी पाने
की संभावना
से मुँह क्यों मोड़ना?

प्रेम करो
प्रेम पाओ
प्रेम में होकर ही तो
पता चलता है
कि प्रेममयी मानव
इतना सब कुछ देख, जान,
और जी सकता है
जो कभी भी संभव न हो पाता
और जीवन कितने ही अनदेखे पहलुओं से
अनभिज्ञ ही रह जाता
अगर प्रेम उसके जीवन में न आया होता।

…[राकेश]

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जून 30, 2011

पिता की चाह

मेरे बेटे,
किलकारियाँ मारता हुआ तुम्हारा बचपन
जवान हो
मुस्कुराए
हर नज़र तुम्हारी तरफ हसरत से उठे
बढ़ के आये,
और कहे –
तुम हो
जग के रचियता
की अद्वितीय कृति।

तुम्हे देखकर
तुम्हारे कंधे छूकर
मैं कहूँ –
शाबास… बेटे… शाबास।

तुम मेरी आँखों में देखो
और कहो –
मैं आपका बेटा हूँ,
अपने आपको उठाऊँगा मैं
बहुत ऊँचे, बहुत ऊँचे
अपने कर्म से
सच्चे धर्म से
मेरे प्रकाश में
आपके आशीर्वचन हैं।

तुम ऐसा कहोगे न!
मुझे कितनी खुशी होगी!

{कृष्ण बिहारी}

जून 29, 2011

प्रेम जीवन का द्वार

प्रेम में
छिपी होती है
एक आग
जो तपा कर
सोने को कुंदन बना देती है।

प्रेम के
स्वादिष्ट भोज
में
समाविष्ट
रहते हैं
मीठे,
खट्टे,
कड़वे,
और कसैले
भाव रुपी
व्यंजन भी।

प्रेम के
अमृत रुपी
कलश में
ही बसा होता है
मीठा जहर भी।

प्रेम
अस्तित्व में
पूरकता भी लाता है
और यह
एक बहुत बड़े अभाव
की ओर इशारा भी कर देता है।

प्रेम के
साथ आने वाला सुख
गुलज़ार कर देता है
गुलशन
तो इसके साथ आने वाली
पीड़ा
उपजा देती है
एक नासूर भी
जो रिस रिस कर
जीवन को
एक लुभावनी मौत की
ओर खींचता ले जाता है।

प्रेम में
आपस में गुथे होते हैं
हार और जीत
इन्हे अलग नहीं किया
जा सकता।

प्रेम
जीवन की
निजता है
अस्मिता है।

प्रेम कर पाना,
प्रेम में होना,
जीवन जीने की,
जीवन जी पाने की,
जीवन से तारतम्य
बैठा पाने की
कसौटी है।

…[राकेश]

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जून 25, 2011

उपभोक्तावाद को ललकारती कविता का शंखनाद

इससे पहले कि
उपभोक्तावाद
तुम्हे
बहरा
गूंगा
और
अन्धा कर दे
और तुम कुछ
सुन
बोल
और
देख न सको
मैं कर रहा हूँ
उपभोक्तावाद को
ललकारती कविता का
शंखनाद—–
ताकि
इसकी ध्वनि
तुम्हारे
अंतर्मन के
अंतरिक्ष में
हमेशा
गूंजती रहे
और
तुम
एक निर्जीव वस्तु की तरह
एक कोने में पड़े हुए
उपभोक्तावाद के
इस खूंखार तांडव को
चुपचाप
देखते न रह जाओ
इसलिए यह
छटपटाते हुए भी
तुम्हे हमेशा
यह जिन्दा अहसास
करवाती रहे कि
तुम वस्तु के लिए नहीं
वस्तु तुम्हारे लिए है
और
यह अहसास भी कि
तुम अकेले नहीं
मैं सत्य की
ऊँची पताका लिए
इस युद्ध में
तुम्हारे साथ
हमेशा खड़ा हूँ !

© अश्विनी रमेश

जून 23, 2011

प्रेमानुभूति

स्त्री हो या पुरुष
प्रेम में होते ही
उन्हे रुबरु होना
पड़ता है
दुख के।

प्रेम दुख
लाता ही लाता है,
गहन प्रेम
गहरा दुख!

प्रेम परिवर्तित करता ही करता है
मानव को
और खुद के सिवा
और दुख भी
मानव में आंतरिक
परिवर्तन लाने
का एक मुख्य औजार है
प्रेम के लिये।

दुख रुपी छैनी-हथौड़े से
प्रेम
मानव मन को एक सुगढ़ रुप
देता है
उसकी साज-सज्जा करता है,
दुख रुपी जल से
उसके अंतर्मन का शोधन करता है।
मानव जीवन के
आरंभ से ही
इतिहास बनता आया हैसभी जानते हैं
समझते हैं
कि
प्रेम
दुख में भी ले जाता है
पर तब भी मानव
प्रेम में होने को उत्सुक
रहता है
क्योंकि
प्रेम
मानव के जीवन में
घटित होने वाली
सर्वोत्तम अनुभूति है।

…[राकेश]

जून 22, 2011

बतकही : जाम

बतकही : आरम्भ ,
सोनिया गाँधी और संघ परिवार ,
और उदारीकरण और भारत
से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

विजय और हरि भी बोले,” सुनील जी बधाई”।

सुनील बैठते हुये बोले,” हमें भी रात ही पता चला बेटे के फोन से। मिठाई आप लोगों के घर पहुँच गयी होगी अभी छोटे बेटे को बोलकर ही चला था कि आप सबके यहाँ मिठाई देकर आये। आप लोग मेरे साथ चलोगे ही घर पर वहीं चाय मिठाई हो जायेगी।”

अजी ये सब तो होता रहेगा। बड़े दिनों बाद ढ़ंग की धूप निकली है जरा आनन्द तो उठा लें धूप का। हरीश जी बोले।

हाँ ये भी ठीक है। यहाँ धूप में गपशप कर लें। लौटते समय हमारे यहाँ से होकर निकल लेना। सुनील बोले।

आप तो कुछ समय पहले बता भी रहे थे कि बेटे का प्रमोशन ड्रयू है। विजय बाबू ने कहा।

हाँ होना तो पिछले साल फरवरी में ही था पर कोई कमीशन बैठा था उसकी रिपोर्ट आने के बाद ही इस जनवरी में आदेश हो पाये।

चलिये अब तो हो गया प्रमोशन। उसने तो वेलिंग्टन कालेज वाला कोर्स भी कर रखा है। अब तो काफी आगे तक जायेगा।

देखिये विजय बाबू जाना तो चाहिये ऊपर तक। बाकी सब तो किस्मत है। सुनील ठण्डी साँस छोड़कर बोले।

अजी सही उम्र में सब कुछ हो रहा है जायेगा कैसे नहीं अपनी निर्धारित प्रगति तक? पर आप ये तो बताओ कहाँ रह गये थे आप हम लोग तो कब से आपकी राह देख रहे हैं। रहा है जैसे पूरा बाजार ही घर ले आये हो। अशोक ने कहा।

गया था मिठाई लेने। एक दो काम और भी थे घंटाघर की तरफ। सोचा पहले वहीं के काम निबटाता चलूँ। वहाँ से काम करके वापिस आने ही लगा था कि पाया कि छात्रों का जलूस निकल रहा है विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनावों के ​सिलसिले में। ऐसा जाम लगा कि एक घंटे से ज्यादा वहीं फंसे रहे न आगे जा सके न पीछे। सुनील रोष से बोले।

एक तो शहर की सड़कें ही इतनी चौड़ी हैं कि मुश्किल से एक ही गाड़ी निकल पाती है और ऊपर से बाजार में इतनी भीड़ हो गयी है कि अब तो ट्रैफिक के कारण डर और लगता है बाजार जाने में। ये भीड़ भड़क्का कहीं आने जाने लायक छोड़गा ही नहीं इस शहर को। वहीं पैदल, साइकिल, रिक्शा चल रहे हैं वहीं घोड़ा ताँगा और वहीं स्कूटर, मोटरसायकिल, कार, बसे और ट्रक चल रहे हैं। बस एक रेल की कमी रह गयी है। और मंडी की तरफ तो बहुत ही बुरा हाल है। हम तो चला नहीं पाते बाजार में कोई भी वाहन। एक जगह खड़ा करके पैदल ही काम निबटाते हैं। विजय बाबू शिकायती लहजे में बोले।

अजी इतने ट्रैफिक में भी इन लड़कों को देखो कैसे सायं सायं करते हुये आड़े तिरछे चलाते हैं मोटरसायकिल। और मोटरसायकिल तो हो गया है पुराना शब्द। अब तो सीधे बाइक बोला जाता हैं। एक भी हेलमेट नहीं लगाता और रोज एक्सीडैन्ट होते हैं इनके और या तो ये बाइक वाले खुद चोट खाते हैं या दूसरों को चोट देते हैं। अशोक ने कहा।

अशोक बाबू कहीं न कहीं घर के लोग भी जिम्मेदार हैं। बारह चौदह साल के लड़कों को बाइक दे देते हैं और लड़कियाँ ही कौन सा कम हैं जब से सेल्फ स्टार्ट वाले दुपहिया वाहन आ गये हैं लड़कियाँ भी दौड़ी घूम रही हैं। लाइसेंस लेने की उम्र हुयी या न हुयी हो बस बाइक लेकर निकल पड़ते हैं शहर में। सुनील बोले।

सुनील जी बच्चे भी क्या करें। स्कूल कालेज से छुटकर कोई कोचिंग करने जा रहा है कोई कुछ अन्य रूचि की चीज सीखने जा रहा है। समय बदल गया है और लोगों की जरूरतें भी पर शहर की सुविधायें वहीं की वहीं हैं जहाँ बीस तीस साल पहले थीं। सड़कें तो उतनी ही चौड़ी हैं और संख्या में गाडि़याँ बढ गयी हैं बेतहाशा जाम न लगे तो क्या हो। विजय ने कहा।

हरि बोले,” जाम लगने की अच्छी बात कही। परसों का सुनो। पिछले हफ्ते नातिन आयी हुयी थी नये साल की छुट्टियाँ मनाने पर यहाँ आकर उसे लग गयी ठंड। तो मैं उसे छोड़ने रूड़की चला गया। रात में सोचा कि जब रूड़की तक आ गया हूँ तो अगले दिन सुबह जल्दी हरिद्वार जाकर वहीं से वापसी की बस ले लूँगा। बस सुबह हरिद्वार पहुँच गया और गंगा जी के दर्शन करके बारह बजे की बस ले ली सोचा था पाँच नहीं तो छह घंटे में घर पहुँच ही जाऊँगा। रूड़की तक पहुँचते-पहुँचते आँख भी लग गयी। नींद खुली तो पाया कि बस रूकी हुयी थी। दूर दूर तक गाडि़याँ ही गाडि़याँ दिखायी दे रही थीं। बड़ा तगड़ा जाम लग रहा था। बस में चाट और मूंगफली बेचने वाले लड़के चढ़े तो मैने पूछा कि माजरा क्या है और कहाँ रूके हुये हैं। उसने बताया कि पुरकाजी से करीब आधा किमी पहले बस खड़ी है और पहले आगे ​सिखों का कोई जलूस निकल रहा था और जिसके कारण पुरकाजी के दोनों ओर जाम लग गया जो अब इतनी खराब ​स्थिति में पहुँच चुका है कि जल्दी खुलने वाला है नही। बस से नीचे उतरे तो देखा बसें, ट्रक, ट्रैक्टर अपनी लम्बी ट्रालियों सहित, कारें,  और भैंसा-बुग्गी, आदि सब कुछ आपस में गडमड होकर फंसे हुये थे। दर्जनों ट्रक तो गन्ने से लदे दिखायी दे रहे थे। दो तीन सेना के ट्रक भी दिखायी दे रहे थे।

थोड़ा रूककर हरि बोले,” दिखायी तो दे ही रहा था कि जाम जल्दी खुलने वाला है नहीं पर दिल को कैसे राहत हो। हर आदमी को जल्दी होती है। नीचे खड़े लोगों में से कुछ जलूस को कोस रहे थे कि इसे भी आज ही निकलना था। जलूस वाले तो अपना काम कर गये पर इस जाम में फंसे लोगों के कामों का क्या होगा।

अशोक बोले,” जब से डा. मनमोहन ​सिंह पी.एम बने हैं तबसे सिखों में जोश भी बहुत ज्यादा आ गया है। रोज़ ही इनके जलूस निकल रहे हैं”।

हरि हँस कर बोले,” अजी और क्या अब तो पहली बार सेना प्रमुख भी एक ​सिख बने हैं। जोश तो आना ही चाहिये। सही मायने में नारा सही हो गया है कि राज करेगा खालसा। पर अभी कुछ साल पहले ही तो खालसा के तीन सौ साल पूरे होने के जश्न मनाये गये थे। अब कौन सा अवसर आ गया इतना बड़ा जलूस निकालने का। और वह भी पुरकाजी जैसी छोटी जगह में?”

अब सरकार को गम्भीरता से सोचना चाहिये इन धार्मिक और राजनीतिक जलूसों के बारे में कोई नीति बनाने के बारे में। रोज ही कोई न कोई जलूस निकल रहा है और जनता परेशान होती रहती है। हर सम्प्रदाय और राजनीतिक दल को इस जलूस निकालने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहिये। विजय ने कहा।

सुनील भी सहमति में बोले,” हाँ जी कोई जनहित याचिका होनी चाहिये इस पर भी। सुप्रीम कोर्ट आदेश देगा तब ही कुछ हो पायेगा। कोई भी सरकार अपने आप कुछ करने वाली है नहीं ऐसे मामले में सबको सबके वोट चाहियें। फिर यहाँ तो ये हाल है कि दूसरे सम्प्रदाय और दूसरे दल के जलूस आदि खराब हैं और हमारे तो मतलब से ही निकलते हैं।”

हरि ने कहा,” अजी आप आगे तो सुनो जाम की बात। हमारी बस के एक यात्री ने अपने मोबाइल से किसी को फोन किया तो पता चला कि वे महाशय भी इसी जाम में फंसे हुये हैं जबकि वे हमारी बस से दो घंटे पहले वाली बस से चल पड़े थे। मतलब दो घंटे पहले से तो जाम लगा ही हुआ था। हमारी बस करीब दो बजे जाम में आकर रूकी थी और करीब चार बजे जाम खुलने पर खिसकी। रात़े साढ़े आठ बजे घर पहुँचे। रास्ते में कहीं मौका नहीं लगा कि घर पर फोन करके बता दें। बस वाला फिर कहीं रूका ही नहीं सवारियों को उतारने के अलावा।”

हाँ जी चिन्ता तो हो ही जाती है घर पर। मोबाइल का बड़ा फायदा है ऐसे समय। कहीं भी फंसे हों ऐसी ​स्थिति में कम से कम घर पर फोन से बता तो सकते हैं। अशोक ने कहा।

उस दिन तो हमें भी मोबाइल के फायदे नजर आये। पर सबसे खराब लगा एक एम्बूलैंस को देखकर। जब जाम खुला तो थोड़ा सा चलने के बाद ही हमारी बस को क्रॉस किया एम्बूलैंस ने। कहीं पास में दुघर्टना हुयी होगी और घायल लोग भी कब से जाम में फंसे पड़ होंगें। एम्बूलैंस लगभग जाम के बीच में फंसी हुयी थी। ना तो रूड़की की तरफ जा सकते थे और ना ही वापस मुजफ्फरनगर की ओर। छोटे बच्चों का अलग बुरा हाल था। हरि बोले।

जलूस निकालने वालों या जाम लगाने वालों को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि उनके काम का दूसरे लोगों पर क्या फर्क पड़ रहा हैं। ये लोग तो अपनी ही धुन की ऊर्जा से भरे हुये होते हैं इन्हे कुछ दिखायी नहीं देता अपनी जरूरत के ​सिवा। विजय ने कहा।

सुनील बोले,” सड़क जाम करना तो सबसे आसान काम है अपने देश में। इलाके का ट्रांसफारमर फूक गया है तो सड़क जाम कर दो। सरकार की किसी बात से नाराजगी है तो सड़क जाम कर दो। ये सरकार को संदेश पहुँचाने का एक आसान तरीका लगता है लोगों को। जाम वाले ये नहीं सोचते कि सड़क पर चल कौन रहा है किसे अपने काम पर जाने की जल्दी है? उनके जैसे ही जनता के आम लोग। इन मंत्रियों और बड़े अधिकारियों का क्या फर्क पड़ता है ऐसे जामों से। भुगतना तो आम आदमी को ही पड़ता है”।

एक और बात भी तो है किस तरह सरकार तक अपनी आवाज पहुँचायी जाये। खैर छोड़ो इस बात को। तो सुनील जी जी शहर में आज छात्रों का चुनाव प्रचार चल रहा है। अशोक ने पूछा।

हाँ कारों की छतों पर बैठकर छात्र छात्रायें चुनाव प्रचार कर रहे थे। इतनी कारें, स्कूटर, मोटरसायकिलें थीं उन लोगों के काफिले में कि अचरज होता है सोचकर कि ये कालेजों के छात्रसंघ के चुनाव के लिये प्रचार हो रहा है। ऐसा लगता था जैसे एम.एल.ए या सभासद के चुनाव के चुनाव के लिये निकले हों।

अरे छात्रसंघों के चुनावों से लाभ क्या होना है इन कालेजों और विश्वविद्यालयों का। चारों तरफ दीवारें पोस्टरों से पाट देते हैं। चुनाव तो ये लोग ऐसे अन्दाज़ में लड़ते हैं जैसे विधायकी या सांसदी का चुनाव लड़ रहे हों। ऊपर से चुनाव में होने वाले इन इन लोगों के झगड़े। हरि बोले।

विजय बोले,”चुनाव की जरूरत क्या है और चुनाव हो भी तो प्रत्याशियों के लिये पढ़ाई में मेरिट सबसे बड़ा क्राइटेरिया होना चाहिये। अभी तो ये हाल हो गया है कि चुनाव वे छात्र लड़ते हैं जिनका पढ़ने लिखने से कोई मतलब नहीं रह गया है। राजनीति तो कालेज स्तर से ही खराब हो जाती है। वहीं से युवा लोग गुंडों के सामने नत-मस्तक होना सीख जाते हैं क्योंकि जहाँ बहुमत शिक्षा प्राप्त करके अपना जीवन संवारने के लिये वहाँ जाता है वहीं राजनीतिक महत्वाकांक्षा लिये हुये गुंडे टाइप युवा सिर्फ राजनीति चमकाने कालेजों में पड़े रहते हैं और अच्छे विधार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं”।

…जारी…

जून 21, 2011

पिता की पाती पुत्र के नाम

अनचाही दूरियों का
अनचाहा दायरा
क्या किसी दिन हटेगा,
मिटेगा?
मैं तुम्हें आँखों से छूना और
हाथों से देखना चाहता हूँ,
मुझे पता है
तुम्हारे पास सब कुछ है,
सब कुछ …यानी कि माँ है
तुम्हे नहीं पता है कि
मेरे पास भी सब कुछ है
सिर्फ तुम नहीं हो
तुम्हारा मेरे पास न होना
किस कंगाली से कम है!

काश!
वह दिन आता
मेरी बाहों में मेरा आकाश होता
यानि कि तुम होते
और,
तुम्हारे कंधों पर मेरे आँसू
अविराम गिरते,
अजस्त्र…निर्भय…
जानता हूँ कि
प्रायश्चित से ही तो
सब कुछ सामान्य नहीं हो जाता
स्वीकारोक्ति भर से ही तो
सब कुछ मान्य नहीं हो जाता
फिर भी मुझे लगता है कि-
मैं अपने अधूरेपन को पाट गया हूँ
और,
स्वयं को सही ढ़ंग से बाँट गया हूँ।

मेरी आँखों में इंतजार के
दीप जल रहे हैं
मेरे सपने
अगन की मीठी आँच में पल रहे हैं
तुम इसमें ईँधन की ज्योति
जलाये रखना
मैं तुम्हे अवश्य मिलूंगा
एक सही समय पर।

{कृष्ण बिहारी}

जून 20, 2011

पिता तुम्हे याद करते हुये

हे पिता!
कितने वर्ष हो गये
तुम्हे इसी तरह कभी कभी याद करते हुये
जन्म से मृत्यु तक
तुम्हारा सघर्ष
सुना-जाना और देखा मैंने
अपराजेय काल से भी तो
खूब लड़े तुम,
उस एक पल के सिवा
कुछ भी तो नहीं झुका पाया तुम्हे
चाहा मैंने भी तो कितना
तुम्हे झुकाना
पराजित करना
पीढ़ियों के संघर्ष में
आपसी रण में
मगर समान ध्रुव थे हम
एक-दूसरे को दूर भगाने में ही
लगे रहे ताउम्र
पास आने की हर कोशिश में
दूर जाते रहे
और
अपनी असफलता को
विजय का सोपान समझ
मुस्कराते रहे हम
हार मानना
हमारे स्वभावों में नहीं
हार जाना
हमारी किस्मत में था
पर-
मैं तुम्हारा पुत्र
तुम्हारी तरह ही जिद्दी,
मैं समर से जूझूंगा
भले ही मारा जाऊँ अभिमन्यु की तरह
आशीर्वाद, अब तो दो
“वत्स, विजयी भवः”
मेरे लिये ईश्वर भी तुम
और देवता भी तुम।

हे पिता!
तुम्हारे सिवा
और किसकी ओर देखूँ मैं
संघर्ष के क्षणों में
तुम बहुत याद आते हो मुझे
कभी-कभी तो बहुत ज्यादा
जिस वक्त्त
लड़ रहा होता हूँ
मैं खुद से…

{कृष्ण बिहारी}

जून 19, 2011

उदारीकरण और भारत

बतकही : आरम्भ और
सोनिया गाँधी और संघ परिवार से आगे
:-
9 जनवरी, 2005

तीनों लोग धीरे धीरे चलकर पार्क में पहुँच गये। एक तरफ कुछ बच्चे टेनिस की बॉल से क्रिकेट खेल रहे थे। तीनो लोग पार्क के दूसरे कोने की और बढ़ गये जहाँ सीमेन्ट की बैंचें भी लगी हुयी थीं।
तीनों ने बैंचों पर न बैठकर नीचे घास में ही आसन जमा लिया। हरीश बाबू तो अपनी दायीं करवट से लेट ही गये और ​िसर को दायें हाथ के सहारे से उठा दिया। विजय बाबू ने बैठकर अपने दोनो हाथों को शरीर से पीछे जमीन पर टिका दिया।

अशोक बाबू सुखासन की मुद्रा में बैठ कर बोले ये विकास प्राधिकरण द्वारा विक​सित कालोनियों में ये बात अच्छी है कि ये पार्क आदि के लिये प्रावधान रखते हैं। कभी कभार यहाँ आकर बैठना हो जाता है और बच्चों को खेलने की जगह मिल जाती है वरना सड़क पर खेलते रहते हैं।

ये बात तो है ही। फिर सारी चीजें पूर्वनियोजित रहती हैं ऐसी परियोजनाओं में। नब्बे डिग्री पर आपस में काटती सड़के मिलती हैं। सीवेज ​सिस्टम पहले से मिलता है। फिर अपनी इस कालोनी के तो बहुत सारे फायदे हैं। शहर के कोलाहल और प्रदुषण से दूर। बस एक परिवहन की समस्या है यदि अपना वाहन खराब हो या न हो तो शहर जाने की दिक्कत है। पर ये भी दो तीन सालों में ठीक हो जायेगा। विजय बाबू ने कहा।

कुछ सालों में नहीं विजय बाबू। साल भर में ही। आपको पता है मेन रोड से जो डबल लेन हमारी कालोनी की तरफ आ रही है वहाँ शुरूआत में ही ​स्थित बाग वाली जमीन का विवाद सुलझ गया है और जमीन बिक गयी है। वहाँ जल्दी ही एक मल्टीप्लैक्स और एक शापिंग मॉल बनने वाला है। हरि बाबू ने सूचित करते हुये कहा।

अजी वो आम के बाग वाली जमीन की बात तो नहीं कर रहे आप। वो तो जमीन ही करोड़ों की है, किसने ले ली? अशोक बाबू ने अचरज प्रकट किया।

हाँ जी वही जमीन जो कारगिल मे शहीद हुये मेजर के नाम पर खुले पैट्रोल पम्प के पीछे है। ऐसा सुना जा रहा है कि जो उद्योगपति इस बार एम.पी. की सीट के लिये चुनाव में खड़ा हुआ था, उसी ने सारी जमीन खरीदी है। हरि बाबू ने आगे बताया।

इनका क्या है, धनी लोग हैं। जो चाहे खरीद लें जो चाहे बना लें जैसा चाहे बना लें। दिक्कत तो आम आदमी की है। यदि मकान में एक खिड़की भी बाद में अतिरिक्त बनवानी पड़ जाये तो ये प्राधिकरण और नगर निगम वाले खून पी जाते हैं आदमी का कि आपने बना कैसे ली बिना उनकी मंजुरी के। विजय बाबू ने कहा।

बात आप सही कह रहे हो जनाब। हमारे घर से दो मकान छोड़कर विकास प्राधिकरण का इंजीनियर रहता है। उसने पूरे मकान का नक्शा ही बदल दिया है कौन उसे कहने आयेगा। और एक हमारे पीछे पेपर मिल का इंजीनियर रहता है। बेचारे ने पीछे वाली खाली जमीन पर दो कमरों का सैट बनवा लिया ये सोचकर कि प्राइवेट नौकरी है और कम्पनी की हालत डांवाडोल चल रही है। बन्द भी हो सकती है और ऐसा हो गया तो नये बनाये दो कमरे किराये पर दे देगा।
एकदम से दूसरी नौकरी मिले न मिले। उसे रूला मारा प्राधिकरण वालों ने। मेरे पास आया था सोचकर कि शायद मेरी पहचान होगी विकास प्राधिकरण के इंजीनियर से। हम गये भी पर इससे बस इतना हुआ कि जो पैसा उससे माँगा जा रहा था उसमें कुछ घटोत्तरी हो गयी। हमारी तो समझ में आता नहीं कि जब प्राधिकरण मकान बेच दिये पीछे की खाली जमीन के भी पूरे पैसे लेकर तो अब खरीदने वाला आदमी कुछ भी करे उस जमीन का चाहे तो अमरूद के पेड़ लगाये या ताजमहल बनाये। उसकी मर्जी। भाई अगर कोई ऊपर की मंजिल बना रहा है या मकान के आगे की सरकारी जमीन हड़प रहा है तब तो विरोध की बात समझ में आती है पर जिस जमीन का पैसा प्राधिकरण पहले ही ले चुका है उस पर निर्माण करनें से उनके पेट में दर्द क्यों होता है? अशोक बाबू गुस्से में बोले।

इन सरकारी दफतरों का हिसाब ऐसा ही है। जहाँ जिसे जो पावर मिली हुयी है वह उसी का रोब दिखाकर कमाई कर रहा है। इन दफतरों के चक्कर में फंस कर अच्छा भला आदमी पागल हो जाये। आदमी को ये इतने कानून बता देंगे कि आदमी उस काम से ही तौबा कर लेगा। यहाँ अपने देश में तो एक ही चीज चलती है मुद्रा। पैसा दो और काम कम बाधाओं के साथ कराओ। घूस लेना देना फैशन हो गया है और अब तो लगता ही नहीं कि कोई ऐसा विभाग भी होगा जहाँ आज भी बिना धन दिये काम हो सकता हो। विजय बाबू ने कहा।

अजी आप लोगों को भले ही पसन्द न हो भाजपा पर भाजपा के राज में ही इंस्पेक्टर राज खत्म हो रहा था। सब तरह के कंट्रोल सरकार हटा रही थी। पहले रसोई गैस सिलिन्डर का क्या हाल था बुक कराने के कितने समय बाद कनेक्शन मिलता था अब आज के आज ले लो। पहले स्कूटर बुक कराने के सालों बाद स्कूटर घर में आ पाता था आज एक दिन में बीस स्कूटर आप खरीद लो। ऐसा ही टेलिफोन के साथ है। भाजपा ने सोने की तस्करी का तो धंधा ही बंद करा दिया। सड़कों वाली स्वर्णिम चतुर्भज परियोजना को ही देख लो। आठ आठ लेन के हाइवे। कुछ साल और भाजपा रह जाती तो इतना चमका जाती देश को कि विश्व शक्ति तो भारत दस सालों में ही बन जाता। अशोक बाबू गर्व से बोले।

अजी दस साल कहाँ। भाजपा ने तो भारत को पिछले लोकसभा चुनावों में ही चमका दिया था। आप भूल गये क्या “इंडिया शाइनिंग” को? हरि बाबू ने मुस्कुराते हुये कहा।

अशोक बाबू को अपनी ओर देखता पाकर वे आगे बोले ऐसा नहीं है कि भाजपा ने काम नहीं किया। पर जितने आपने काम गिनाये उनमें से बहुत सारे काम या तो राव सरकार में शुरू हो गये थे बल्कि कुछ योजनाओं पर अमल तो राजीव गांधी ही शुरू करवा चुके थे जैसे टेलिफोन की बात आपने की। भारत में दूरसंचार क्रान्ति राजीव गांधी की देन है। इसी काम के लिये राजीव ने अमेरिका से सैम पित्रोदा को बुलाया था। सी डॉट आप भूल गये क्या। उस समय कितनी आलोचना राजीव की होती थी कि वह पित्रोदा जैसे टैक्नोक्रेट पर देश का पैसा लुटा रहे हैं। स्वर्णिम चतुर्भज सड़क परियोजना का पूरा खाका राव सरकार तैयार कर चुकी थी और ये हो सकता है कि बाद की संयुक्त मोर्चे की सरकारें इस पर अमल न कर पायी हों और राव सरकार द्वारा बोयी फसल भाजपा ने काटी। ये सब भी ठीक है पर दिक्कत तब आती है जब आप जब आप योजना बनाने वाले को इतना श्रेय भी न दो कि कम से कम उसने सोचा तो कि ऐसा हो सकता है। आप ही बताओ जब भाजपा ने किसी भी अच्छे काम का श्रेय अपने पूर्ववर्तियों को नहीं दिया तो भाजपा को कौन श्रेय देना चाहेगा।

विजय बाबू ने हरीश जी की बात समाप्त होते ही कहा आप एकदम लेटस्ट बात लो अशोक बाबू। अभी पिछले दिनों राव साहब का देहान्त हुआ और अटल जी ने कहा कि परमाणु विस्फोट की सब रूपरेखा राव के समय में ही बन गयी थी और तैयारी पूरी थी पर राव सरकार किसी कारण से ​विस्फोट नही करा पायी। अटल जी ने कहा कि जब वे पी0एम बने तो राव ने उनके हाथ में एक पर्चा दिया था जिस पर लिखा था कि सब तैयारी है आप आगे बढ़कर श्रीगणेश करें। अब अटल जी ने करीब छह साल सरकार चलायी और कितनी ही बार ऐसी बातें उठीं की कितनी ही ऐसी योजनायें हैं जो राव सरकार के समय में या तो निर्धारित हो गयीं थीं या शुरू हो गयी थीं और इन बातों का श्रेय राव सरकार को मिलना चाहिये पर न तो भाजपा ने न ही अटल जी ने ऐसी किसी बात का स्वागत किया बल्कि संघ परिवार इसी बात को गाता रहा कि भाजपा भाजपा के राज से पहले भारत में कुछ नहीं हुआ और देश गर्त में जा रहा था और पुरानी सब सरकारें बेकार थीं खास तौर पर कांग्रेस की सरकारें। अब अटल जी का बहुत पुराना सम्बंध राव साहब से रहा है और हो सकता है कि मित्र के देहान्त पर शोकाकुल होकर अटल जी ने भावावेश मे सच कह दिया हो और इस बात का आज की राजनीति से कोई मतलब न रहा हो। पर जब कहने का समय था तो अटल जी ने ये बात नहीं स्वीकारी। हमारी तो अटल जी से ये शिकायत रही ही है कि वे बात को तभी स्वीकारते हैं बाद में जब उस बात का कोई मतलब नहीं रहता और जब बात स्वीकारने का महत्व था तब वे राजनीति के दबाव के कारण चुप्पी साधे बैठे रहे। कितने ही ऐसे मामले हैं उनके छह साल के शासन में।

देखो जी भाजपा ने भारत को सड़े गले समाजवादी विचारों से और बाजार को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराया। अशोक बाबू कुछ हठधर्मिता के साथ बोले।

उदारीकरण तो राव सरकार के समय डा. मनमोहन ​सिंह ने शुरू कर दिया था और भाजपा और अन्य विपक्षी दल तब पानी पी पीकर उदारीकरण को कोसते थे। ढंग से याद नहीं आ रहा किस विपक्षी नेता ने संसद में कहा था कि राव साहब आप और मनमोहन ​सिंह जी आप सुन लें आने वाली पीढ़ियाँ आप दोनों को कभी माफ़ नहीं करेंगीं। हरि बाबू ने कहा।

अजी विपक्ष में रहकर सरकार का विरोध तो करते ही हैं राजनीतिक दल। भाजपा ने भी कर दिया होगा उदारीकरण का विरोध शुरू में। पर मुख्य बात तो ये है कि जब भाजपा की सरकार बनी तो उसने बाजार को उदार बनाया या नहीं। अशोक बाबू कुछ समझौते के स्वर में बोले।

विजय बाबू ने भी सहमति में ​सिर हिलाते हुये कहा कि ठीक कह रहे हो आप हमारे राजनीनिक दल सत्ता में रहकर एक ढ़ंग से व्यवहार करते हैं और विपक्ष में रहकर दूसरे ढ़ंग से। बल्कि कई बार तो अपनी ही सरकार द्वारा चलाये कार्यक्रमों का भी विरोध करने लग जाते हैं जब वही काम दूसरी सरकार चलाये रखना चाहती है। पर इन राजनीतिक चालबाजियों से अलग बात करूं तो जब इन्दिरा जी की सरकार फिर से बनी थी जनता पार्टी के शासन के बाद तो सन उन्नासी या सन अस्सी में ही इन्दिरा जी ने स्वराज पॉल को अनुमति दी थी भारत में उद्योगों में पैसा निवेश करने की और स्वराज पॉल ने अच्छी खासी रकम दो भारतीय उद्योगों में लगायी थी। याद नहीं आ रहा किस ग्रुप के उद्योग थे पर भारतीय उद्योगपति इतने सीधे हैं नहीं। उन्होने स्वराज पॉल के पौण्डस तो लगवा लिये थे अपने उद्योगों में पर उन्हे शेयर देने के समय मुकर गये थे और घबराकर या चालाकी में कोर्ट में चले गये थे। स्वराज पॉल का तो पैसा ही डूबा पर इन्दिरा गांधी के भारतीय बाजार में उदारीकरण लाने के प्रयासों पर तो पानी फिर गया वरना भारत भी चीन की तरह अपने बाजार विश्व के लिये सन अस्सी में ही खोल देता और भारत को सन नब्बे के शर्मनाक दौर से न गुजरना पड़ता जब विदेशी मुद्रा के लिये देश को सोना गिरवी रखना पड़ा।

सही कह रहे हो आप। भारतीय उद्योगपति बहुत चालाक रहा है। जब इनके पास इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं था तो इन्होने सरकार को खूब सराहा बड़े बड़े सार्वजनिक उपक्रम खड़ा करने के लिये ताकि इन्हे सस्ते रॉ मैटिरियल मिलते रहें और सालों तक ये लोग खुद चाहते रहे थे कि बाजार पर सरकार इस तरह से नियंत्रण रखे जिससे दूसरे लोगों को लाइसेंस न मिल सके उस उत्पाद को बनाने का जिसे ये बनाते रहे हैं और उनकी मोनोपॉली चलती रहे। अब जब हर तरफ वैश्वीकरण का जोर है और ये लोग बिना किसी मल्टीनेशनल कम्पनी से गठजोड़ किये बाजार में रह नहीं सकते क्योंकि नयी तकनीक तो इन्होने विक​सित की नहीं कभी भी तो अब ये सरकार को कोसते हैं। पुराने ​सिस्टम को कोसते हैं। और हर गलत चीज सरकार के माथे मढ़ देते हैं। मानो इनके उद्योगों में शोध एवं विकास का कार्य करने भी उद्योगमंत्री जाता। हरि बाबू ने कहा।

हाँ कांग्रेस के जमाने में भारत में एक ही कार एम्बेस्डर बनती थी और उससे छूटो तो फियेट मिलती थी आज देखो बाजार अटा पड़ा है तरह तरह की कारों से। अशोक बाबू ने कहा।

अशोक जी मारूति भी कांग्रेस सरकार की ही देन है। इसके लिये सजंय गांधी की अच्छी खासी फजीहत हुयी थी विपक्ष द्वारा। जैसे राजीव गांधी की ऐसी तैसी कर रखी थी तब के विपक्ष ने कम्पयूटर के नाम पर कि देश का पैसा बिना मतलब ऐसी मशीनों पर खर्च किया जा रहा है जिनकी भारत को जरूरत ही नहीं है। आज मारूति सबसे ज्यादा कारें बेच रही है और निर्यात भी कर रही है। और कम्पयूटर का क्षेत्र विक​सित न होता भारत में तो जो नवयुवकों की फौज सॉफ्टवेयर आदि के काम में जुटी पड़ी है इसे कहाँ से तो रोजगार मिलता? आज तो ये लोग देश विदेश में झंडे गाड़ रहे हैं पर तब क्या होता? । हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू ने भी हामी भरते हुये कहाये तो बात है। चाहे ​सिविल इंजीनियरिंग का स्टुडैन्ट हो या मैकेनिकल का नौकरी सब सॉफ्टवेयर में कर रहे हैं । विजय बाबू को सोच में डूबा देखकर उन्होने पूछा आप किस सोच में पड़ गये?

मैं ये सोच रहा था कि सारी सरकारें सार्वजनिक उपकरणों को क्यों बन्द करना चाहती हैं? अब ये नये पेटेन्ट कानून का हल्ला उड़ा हुआ है कि इसके लागू होने के बाद दवाइयों के दाम आसमान छूने लगेंगे। अच्छा खासा आइ.डी.पी.एल था। जीवनरक्षक दवाइयां बनाता था और इस और इस कारण बाजार में ऐसी दवाइयों के मूल्य पर नियंत्रण रहता था। सरकार ने घाटे के नाम पर बन्द करा दिया सारा का सारा आइ.डी.पी.एल जबकि उसकी सब यूनिटें तो घाटे में थी नहीं। जो घाटे में थीं उन्हे बन्द कर देते। वैसे भी नेहरू के समय आइ.डी.पी.एल कोई लाभ कमाने के लिये तो लगा नहीं था। बाजार में जीवनरक्षक दवाइयों की आपूर्ति करना और कीमतों पर नियंत्रण रखना ये दो उददेश्य थे।

अजी सरकारी कम्पनियों के साथ सौ बबाल होते हैं। कितने ही सरकारी विभाग ऐसे होंगे जिन पर कम्पनी का बकाया होगा क्योंकि कोई भी सरकारी विभाग दूसरे सरकारी विभाग को समय पर भुगतान तो करता नहीं। और हमें तो पता चला था कि दवाई बनाने के मामले में तो कम्पनी अच्छी थी पर अपनी दवाइयां बेच नहीं पाती थी बाजार में। हरि बाबू ने कहा।

बेचती भी कैसे। प्राइवेट कम्पनियाँ तो डाक्टरों को कमीशन दे सकती हैं गिफ्ट दे सकती हैं जिससे डाक्टर लोग उनकी बनायी दवा को मरीजों को रिकमेन्ड करें। सरकारी कम्पनी कहाँ से कमीशन और गिफ्ट देगी। आइ.डी.पी.एल ने भी मार्केटिंग में मात खायी होगी। हमने तो सुना है कि एक प्राइवेट दवा कम्पनी आइ.डी.पी.एल से बल्क में दवा का पाउडर खरीदती थी। कैपसूलेशन अपने आप करती थी और अस्सी के दशक में एक कैपसूल साढ़े तीन रूपये का बेचती थी। जबकि आइ.डी.पी.एल का उसी दवा का अपना बनाया कैपसूल पिच्चहत्तर पैसे या एक रूपये में मिला करता था पर तब भी डाक्टर प्राइवेट दवा कम्पनी वाले कैपसूल को खरीदने को कहते थे। इन सार्वजनिक उपकरणों का मैनेजमैंट भी सुस्त रहा होगा जो अपनी दवाओं की मार्केटिंग प्राइवेट कम्पनियों से ठेके पर नहीं करवा पाये। विजय बाबू बोले

अरे सरकारी कर्मचारी काम कहाँ करके देते हैं। फिर यूनियनबाजी। पचासों अन्य कारण रहे होंगे घाटे में जाने के। हमें तो याद आता है कि राव सरकार के समय ही बंद हो गयी थी आइ.डी.पी.एल। अशोक बाबू ने कहा।

नहीं बंद तो शायद छियानवें में हुयी है पर बी.आइ.एफ.आर ने इसे बीमार घोषित तो सन बयानवें में ही कर दिया था। विजय बाबू ने कहा।

और बेवकूफियां देखो कैसी कैसी चलती हैं भारत में। सरकारें गाना गाये जाती हैं कि टैक्स पेयर्स का पैसा ऐसे बर्बाद नहीं किया जा सकता हानि में चलने वाली यूनिटों को चलाने में और उधर आइ.डी.पी.एल जैसी यूनिटों के केस चल रहे हैं कोर्ट में। अब सरकार पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को जिन्होने वी.आर.एस नही लिया और जो अभी केस लड़ रहे हैं इस आशा में की कभी तो फैक्टरी दुबारा चलेगी। भले ही सरकार छह छह महीने का पैसा देती है ऐसे कर्मचारियों को पर ये पैसा क्या पेड़ से टपक रहा है? ये पैसा भी टैक्स देने वाले लोगों का ही है। अब जब तक फैक्टरी का निश्चित फैसला नहीं हो जाता तब तक सरकार ऐसे ही पैसा देगी वो भी बिना कुछ काम लिये हुये। एक तो इतना बड़ा क्षेत्र जहाँ फैक्टरी थी आावासीय कालोनी थी स्कूल थे अस्पताल था सब रखरखाव के अभाव में खंडहर हो रहा होगा दूसरे यदि खुदा न खास्ता कभी फैक्टरी को दुबारा चलाना तय हो गया तो सरकार को कितना धन खर्च करना पड़ेगा सब टूटे फूटे को फिर से संवारने में। अगर फैक्टरी चलती रहती तो कम से कम दवाओं का निर्माण तो होता रहता और हो सकता है कि मुक्त बाजार के दौर में ये कम्पनी भी उठ जाती। हरि बाबू ने कहा।

बात तो आप एकदम खरी कह रहे हो। ये जो आई.आई.एम और ऐसे अन्य मैनेजमैंट संस्थानों का इतना हल्ला है और हर साल अखबार छापते रहते हैं कि इस बार यहाँ के स्टूडैन्ट को इतने लाख रूपये का पैकेज मिला और वहाँ के स्टूडैन्ट को उतने लाख का। तो ये क्या पढ़ाते हैं वहाँ। एक भी स्टूडैन्ट ऐसे संस्थानों से नहीं निकलता जो कहे कि मुझे दो ​सिक यूनिट और मैं इसे ढ़ंग से चलाकर दिखाऊंगा। और क्या वहाँ पढ़ाने वाले प्रोफेसर करते हैं जो एक के पास भी समाधान नहीं है बीमार सार्वजनिक उपकरणों की दशा सुधारने का? अशोक बाबू ने शंका प्रकट की।

ये प्रोफेसर इतने उद्यमी होते तो अपने कई उद्योग खड़े कर चुके होते क्लासरूम में लैक्चर न दे रहे होते और सारे संस्थान लाइन लगा देते देश भर में रतन टाटा राहुल बजाज अम्बानी और प्रेमजी जैसों की। ये लोग तो नौकरी कर सकते हैं। जो कम्पनी चल रही है उसी में काम करके पैसा कमा सकते हैं। कुछ विद्धार्थी होते हैं उद्यमी भी, पर उनकी गिनती बहुत कम है। हरि बाबू ने कहा।

अशोक बाबू को बहुत मजेदार लगी बात और वे हँसकर बोले,” सही कह रहे हो आप जो कभी आई.आई.टी न निकाल पाये ऐसे अक्सर कोचिंग देते हैं जे.ई.ई पास करने की”।

विजय बाबू भी हास्य में योगदान देते हुये बोले,” याद नहीं आपको इस लोकसभा चुनाव में दिल्ली से एक मैनेजमैंट गुरू भी लोकसभा चुनाव में खड़ा हुआ था। अब खुद ही हार गया। पता नहीं जमानत भी बची थी या नहीं। स्लोगन बड़ा अच्छा है उसका- विनर्स डोन्ट डू डिफरेन्ट थिंग्स दे डू थिंग्स डिफरेन्टली। अब दिल्ली में कितने लोगों ने उसकी किताब पढ़ी होगी? मैनेजमैंट के स्टूडैन्टस ही वोट दे सकते हैं”।

अशोक बाबू भी हँसते हुये बोले,” हाँ जी पर उपदेश कुशल बहुतेरे”। लो जी सुनील जी भी आ गये आओ सुनील जी पहले तो आप बधाई स्वीकार करो बेटे के प्रमोशन की। हमें तो विजय बाबू से पता चला।

…जारी…

जून 19, 2011

सोनिया गाँधी और संघ परिवार

बतकही : आरम्भ से आगे :-

…9 जनवरी, 2005…

सही कह रहे हो आप। उन्ही अटल जी की कविताओं को अमिताभ द्वारा स्वर दिये जाने की बात थी लोकसभा चुनावों से पहले। ये तो वक्त वक्त की बात है। भाजपा, शिव सेना ने बच्चन परिवार का जीना मुश्किल कर दिया था और शिवसेना ने तो अमिताभ की शहंशाह फिल्म की रिलीज पर जमकर हँगामा किया था। आज अमिताभ को कहना पड़ता है कि बाल ठाकरे तो उनके मित्र हैं। आज तो अमिताभ सपा के साथ खड़े दिखायी देते हैं जबकि मुलायम ​सिंह यादव ने भी बोफोर्स के दिनों में वी.पी.सिंह के समर्थन में बच्चन परिवार के खिलाफ जम कर सभायें की होंगी। आपको याद होगा कि सपा ने अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता अपने पक्ष में भुनाने के लिये ब्लड डोनेशन कैम्प लगवाये थे क्योंकि अमिताभ अब राजनीति में सीधी भागीदारी से बचते हैं और ऐसे ही किसी जगह उन्होने कह दिया था कि मुलायम सिंह यादव तो उनके लिये पिता समान हैं। तब भाजपायी नेताओं ने पूरे चुनावों के दौरान अमिताभ की खिल्ली उड़ायी थी कि साठ साल का पुत्र और पैंसठ साल का पिता। अब अमिताभ ने जो कहा था वह एक भावनात्मक बात थी। और आप ताज्जुब देखो कि कुछ समय बाद जब अटल जी की कविताओं को लता मंगेशकर ने गाया था और कैसेट के विमोचन पर लता जी कह रही थीं कि अग्रेंजी में नाम लिखने पर लता का उल्टा अटल है और अटल का उल्टा लता और अटल जी मेरे पिता समान हैं तो भाजपायी भावविभोर होकर धन्य हो धन्य हो का कोरस गान कर रहे थे। अब भाजपाइयों जैसा कोई कह ही सकता था कि अठत्तर साल की पुत्री और अस्सी साल का पिता। पर माफ करना अशोक जी ऐसी टिप्पणियाँ सामान्यत: भाजपा के खेमे से ही निकलती रही हैं। बरसों ये लोग विपक्ष में रहे हैं सो बिना किसी जवाबदेही के कुछ भी बोलने की आदत पड़ गयी है जो छह साल की सत्ता मिलने के बाद भी नहीं गयी है।

आप तो विजय बाबू ऐसे कह रहे हो जैसे मैंने पूरी भाजपा का ठेका ले लिया हो। अरे कह दिया होगा किसी राज्य स्तर के छोटे मोटे नेता ने कुछ। सबके मुँह से फिसल जाता है। भाजपा का केन्द्रिय नेतृत्व देखिये कितना शालीन है। आडवाणी जी को देखो। मजाल है कोई फालतू बात मुँह से निकल जाये जैसे फिल्टर लगा हो मुँह में और हर बात छनकर बाहर आती हो। आपको याद दिला दूँ कि त्याग की मूर्ति सोनिया गांधी ने अटल जी के लिये कहा था कि जिनके अपने घुटने कमजोर हों वे देश क्या संभालेंगें। अभी इनकी पुत्री प्रियंका गांधी ने लोकसभा चुनाव के दौरान अटल जी जैसे वष्ठितम राजनेता के खिलाफ टिप्पणी कर दी थी वह भी थी उनके स्वास्थ्य को लेकर। अब ये हैं क्या अटल जी के सामने। अशोक बाबू भड़कते हुये बोले।

मैने पहले भी सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की टिप्पणियों की आलोचना की थी। शारीरिक अवस्था पर टिप्पणी स्वस्थ बात नहीं है। वैसे इस तरह की शुरूआत तो चीन युद्ध के बाद डा.लोहिया की बीमार नेहरू पर की गयी टिप्पणी से ही हो गयी थी। बाद में उन्होने इंदिरा गाँधी पर भी व्यक्तिगत टिप्पणी की थी। शायद उन्होने या उनके किसी समकालीन बड़े नेता ने उन्हे गूँगी गुड़िया कहा था। किसी ने उनके बारे में कहा था कि संसद में अब एक हसीन चेहरा देखने को मिल जायेगा। वैसे अशोक जी मेरा मानना है कि भाजपा और सोनिया गांधी के मामले मे पहल भाजपा द्वारा की गयी है। बरसों ऊटपटांग टिप्पणियां सोनिया पर की गयी हैं और आज भी की जाती हैं। अभी पिछले राजस्थान चुनावों की बात ले लो। भाजपा की तो जबर्दस्त जीत हुयी थी वहाँ। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक शेखर गुप्ता की रिपोर्ट थी। शेखर जब चुनाव की कवरेज के लिये जयपुर–कोटा राजमार्ग पर ​स्थित एक गाँव में चाय की दुकान पर ठहरे तो वहाँ भाजपा समर्थक दावा कर रहा था कि उसने आर.एस.एस की किसी पत्रिका में पढ़ा था कि कुछ पत्रकार इटली में सोनिया गांधी के गाँव में गये थे और उन्हे वहाँ बताया गया था कि सोनिया इटली में कैबरे डांसर हुआ करती थीं। शेखर ने कहा कि ऐसा नहीं है और मान लो किसंघ की पत्रिका में ऐसा छपा भी हो तो आप लोग ऐसी बात को गम्भीरता से नहीं ले सकते। पर भाजपा समर्थक मानने को तैयार नहीं थे। मान लो शेखर गुप्ता झूठ बोल रहे थे उनका भाजपा से दुराव और कांग्रेस से लगाव रहा होगा। दूसरा किस्सा सुनो जो हमारा अपना ही सुना हुआ है। लोकसभा चुनावों की बात है। उन्ही दिनों हमने बच्चों से इंटरनेट प्रयोग करना सीखा था। टाइम्स आफ इण्डिया की वेब साइट हमने खोली और समाचार पढ़ने लगे। वहाँ हमने रेडियो पर भी समाचार सुने। वहीं हमारी दृष्टि पड़ी एक खबर पर राहुल गांधी के खिलाफ खड़े भाजपा के उम्मीदवार श्री वेदांती से वार्ता। मै‍र्ने उस वार्ता के लिंक पर क्लिक कर दिया। एक से बढ़कर एक वचन सुनायी दिये वेदांती जी के सुमुख से नेहरू–गांधी परिवार के खिलाफ खासकर सोनिया और राहुल के खिलाफ। वेदांती जी को पता चला कहीं से कि राहुल का प्रेम चल रहा है किसी कोलम्बियन लड़की से तो वेदांती जी लगे पड़े थे कि अमेठी में कोलम्बिया की एक हजार लड़कियां घूम रही हैं नवयुवकों के वोट राहुल को दिलवाने के लिये। शाम को बागों में अश्लील नृत्य चल रहे हैं।

साक्षात्कार लेने वाले ने पूछा कि वेदांती जी क्या आपने खुद देखा है किसी विदेशी लड़की को। तो वेदांती जी बोले कि हमारे देखने की जरूरत नहीं है सब जानते हैं। और आगे सुनो। वेदांती जी ने सोनिया गांधी को अपशकुनी बता दिया कि सोनिया के आने से सबसे पहले संजय गांधी की अकाल मृत्यु हुयी और फिर इन्दिरा और राजीव गांधी की हत्यायें। अब वेदांती जी की परिभाषा से मेनका गांधी क्या हुयी ये तो वही जाने। और इस सोच से वरुण गाँधी कितने भाग्यशाली हुये अपने पिता के लिये? आप खुद ही बताओ ऐसी दकियानूसी बातें कहाँ मिलेंगी?

अजी विजय बाबू ऐसे एक दो तो हरेक पार्टी में होते हैं। कौन सा किसी को जीतना था राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से? ये तो इस फैमिली की घर की सीट है।

अशोक बाबू बात यह है कि क्या ऐसे लोगों को टिकट देकर भाजपा लोकतंत्र को मजबूत बना रही है? आज सीटे जीतने के लिये आप जनता की भावनाओं को भड़काने के लिये कैसे ही लोगों को टिकट दे दो पर इतिहास गवाह है कि अन्त में मुसीबत आपकी भी आनी है। आखिर छह साल सत्ता में रहते हुये भाजपा ने झेला ही था विहिप आदि के तानों को। ये तो भाजपा को सोचना है कि वह परिपक्व राजनीति करना चाहती है या ​सिर्फ सत्ता पाने के लिये शार्टकट इस्तेमाल करना चाहती है।

आप ये बताओ विजय जी कि ये नेहरू–गांधी परिवार और बच्चन परिवार में ऐसा क्या झगड़ा हो गया? अखबार तो ये लिखते हैं कि अब दोनो परिवार एक दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलते और कहाँ तो ऐसी निकट की दोस्ती थी कि राजीव गांधी छुट्टियाँ तक अमिताभ बच्चन के साथ बिताते थे। हमने तो सुना है कि जब अमिताभ बच्चन को चोट लगी थी सन बयासी में तो इन्दिरा गांधी विदेश से अपनी सरकारी यात्रा अधूरी छोड़कर वापिस आ गयीं थीं और राजीव गांधी भी अमेरिका से तुरन्त आ गये थे और सीथे अस्पताल पहुँचे थे। हमने तो ये तक सुना है कि शुरू में सोनिया गांधी बच्चन परिवार के यहाँ ही ठहरी थी जब राजीव गांधी से शादी हुयी थी। अब ऐसा क्या हो गया? आप ये न कह देना कि इन दोनों परिवारों में अलगाव भी भाजपा का कराया हुआ है। अशोक बाबू हँसकर विषय बदलते हुये बोले।

अजी बड़े लोग हैं। क्यों मनमुटाव हो गया क्या हो गया ये सब बातें तो उन लोगों का आपसी मामला है। फिर सोनिया गांधी ने तो कभी कुछ कहा नहीं सार्वजनिक रूप से। या तो अमिताभ ने कहा था कि हम रंक हैं और नेहरू–गांधी परिवार राजा है और सम्बंध रखना न रखना तो राजा के हाथ में होता है। अब ये पत्रकार लोग भी तो हलक में माइक डाले खड़े रहते हैं। अब क्या पता है कि जया बच्चन ने चुनाव सभा में कहा कि नहीं कहा कि नेहरू–गांधी परिवार ने संकट में बच्चन परिवार का साथ छोड़ दिया। अब पत्रकारिता तो सेंसेशन वाली हो गयी है। पत्रकार लोग तुरन्त राहुल गांधी के पास पहुँच गये पूछने कि जया बच्चन तो उनके परिवार को धोखा देने वाला बता रहीं हैं। राहुल गाँधी का कहा भी सुर्खियाँ बन गया कि लोग जानते हैं कि किसने अपनी वफादारी बदली है और उनका परिवार कभी किसी का साथ नहीं छोड़ता।

विजय बाबू जया बच्चन ने कहा तो था ही कि नेहरू–गांधी परिवार ने बच्चन परिवार को मझदार में छोड़ दिया जब हम मुसीबतों से गुजर रहे थे और अमर ​सिंह और मुलायम ​सिंह ने उनका साथ दिया और ये लोग भरोसे वाले लोग हैं। हरेक अखबार में छपा था। बाद में राहुल गांधी ने कड़ा बयान दिया था। और अमिताभ ने भी कुछ कहा था।

अमिताभ बच्चन ने जो कहा था कि यदि जया ने ऐसा कोई बयान दिया है तो गलत किया है और नेहरू–गांधी परिवार तथा बच्चन परिवार की दोस्ती जया और सोनिया के इन परिवारों में आने से बहुत पहले की है तो वह एक संवेदनशील बात कह रहे थे और ऐसी बयानबाजी के कारण उनको हुआ दुख स्पष्ट पता चल रहा था। आप देखो कि उनके बयान के बाद कोई भी बयान इस ​सिलसिले में नहीं आया किसी का भी। अब अन्दर की बात तो वे लोग ही जाने पर हमें एक बात तो लगती ही है कि जितने खुले रूप में बच्चन परिवार अमर ​सिंह या सपा के साथ खड़ा दिखा दिखायी देता है उतने खुले रूप में वे लोग सोनिया गांधी के साथ खड़े दिखायी नहीं दिये राजीव गांधी की हत्या के बाद। या ये कह लो कि समय ही खराब था दोनो परिवारों के लिये कि जब दोनो परिवारों को एक दूसरे के साथ की जरूरत थी तब दोनो ही मुश्किलों में फंसे हुये थे। या शायद बच्चन परिवार को लगा हो कि गांधी परिवार तो हर तरह से सक्षम है उन्हे सहायता की क्या जरूरत है ? कुछ न कुछ गलतफहमी तो जरूर रही होगी। पर कोई भी बात एकतरफा नहीं हो सकती चाहे दोस्ती हो या दुश्मनी। अमिताभ हैं कलाकार और कलाकार बेहद भावुक होते हैं। बोफोर्स के आरोपों से त्रस्त होकर अमिताभ ने राजनीति से तौबा कर ली थी। जबकि हमारे विचार में राजीव गांधी उनसे कहीं ज्यादा परेशानी में थे बोफोर्स के कारण और उन्हे भी मित्रों के साथ की जरूरत थी पर अमिताभ राजनीति का ताप न सह पाये और मैदान छोड़ गये। लन्दन में भी तो उन्होने केस लड़ा अपने को निर्दोष साबित करने के लिये। ये काम वे सांसद बने रहकर भी कर सकते थे। उनका उस समय इस्तीफा देना मित्रधर्म नहीं था। बाद में भले ही वे राजनीति से हट जाते पर तब उन्हे राजीव के साथ मजबूती से खड़ा होना था। बोफोर्स मामले में राजीव को उनके मित्रों के ऐसे कदम पीछे हटाने से बहुत नुकसान उठाना पड़ा। अरूण ​सिंह का मसला भी ऐसा ही था। राजीव के जाने के बाद भी अमिताभ समय समय पर राजनीति से दूर रहने कि बात दोहराते रहे तो फिर सपा के केस में ऐसा क्या हो गया? भले ही समाज सेवा के बहाने से अमिताभ ने सपा के लिये समर्थन माँगा पर माँगा तो है ही। अब पता नहीं सच है कि नहीं पर अखबार में ही पढ़ा हमने कि अमिताभ ने एक निर्देशक की फिल्म साइन करने के बाद छोड़ दी ये कहकर कि उस निर्देशक को उनके पारिवारिक मित्र अमर ​सिंह से समस्यायें थीं और वे ऐसे निर्देशक के साथ कैसे काम कर सकते हैं। यदि इतनी दृढ़ता अमिताभ ने नेहरू–गांधी परिवार के प्रति भी दिखायी होती तो शायद दोनो परिवारों की दोस्ती बनी रहती। और एक राजनीतिक सच ये भी है कि उ.प्र. में यदि कांग्रेस मजबूत होती है तो सपा को राजनीतिक हानी होनी ही है । सपा परोक्ष रूप से कई बार सोनिया गांधी का विरोध कर चुकी है विदेशी मूल के मामले में। तो बच्चन परिवार तो धर्म संकट में रहता ही कि कैसे दो राजनीतिक रूप से प्रतिद्वन्द्वी दलों के मुखियाओं से दोस्ती निभाये। फिर कांग्रेस में कितने ही ऐसे होंगे जो कभी नहीं चाहेंगे कि बच्चन परिवार नेहरू–गांधी परिवार के पास आये ताकि वे सोनिया गांधी के नजदीक जा सकें। समय तो चलायमान है। चीजें बनती बिगड़ती रहती हैं।

अशोक बाबू लम्बा व्याख्यान सुनकर बोले अजी हमें क्या मतलब है इन लोगों की मित्रता से कल टूटती तो आज टूट जाये। न इनकी मित्रता से देश का भला हो रहा और ना ही मित्रता के न रहने से देश गर्त में जा रहा। सब ड्रामा है। और आप अमिताभ बच्चन की क्या बात करते हो। कांग्रेस ने इन साहब को इलाहाबाद से खड़ा किया हेमवती नन्दन बहुगुणा जैसे वरिष्ठ राजनेता को हराने के लिये। अमिताभ ने फिल्मी लटकों झटकों से उन्हे हराया होगा। बेचारे बहुगुणा जी का राजनीतिक जीवन ही खत्म हो गया उस हार से। ये ठीक लगता है आपको?

अशोक जी बहुगुणा जी तो हैं नहीं सो कुछ कहना ठीक नहीं पर जब आपने बात छेड़ी है तो आपको बताना जरूरी है कि उस चुनाव में बहुगुणा जी ने किन्नरों को किराये पर बुलाकर सारे लोकसभा क्षेत्र में घुमाया था और जगह जगह किन्नर अमिताभ की खिल्ली उड़ाते घूमते थे गाना गाकर कि मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है। ये अलग बात है कि इस सबके बावजूद अमिताभ ने बहुगुणा जी को अच्छी शिकस्त दी। हमारे ख्याल से तो बहुगुणा जी जैसे वरिष्ठ राजनेता को अपने प्रतिद्वन्द्वी उम्मीदवार की इस तरह से खिल्ली उड़ाना शोभा नहीं देता था। अमिताभ का फिल्मों में काम करना उसमें गीत गाना या गाने पर नाचना उनके प्रोफेशन का हिस्सा थे और किसी को भी हक नहीं कि दूसरे के व्यवसाय का मजाक बनाये। यही सब कुछ पिछले चुनाव में गोविन्दा की जीत में सहायक रहा होगा। जनता इतनी मूर्ख नहीं होती जितना कि राजनेता समझ लेते हैं। और फिर आप यह क्यों भूल जाते हैं कि अगर कांग्रेस से इतनी ही दिक्कत थी या है तो बहुगुणा जी के बेटे और बेटी क्यों कांग्रेस में बने हुये हैं? उन्हे तो आपसे और हमसे ज्यादा अपने पिता के मान-सम्मान या अपमान की चिंता होगी।

अजी हमारी समझ में तो आता नहीं कि कैसे हमारे देश के लोग एक विदेशी महिला को समर्थन देते हैं। कहाँ भाजपा की प्रचंड देशभक्ति और कहाँ सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस का ढ़ुलमुलपन। कहीं कोई मुकाबला है भला। दो मिनट तो सोनिया लगातार बोल नहीं सकती यदि लिखकर न दिया जाये। अशोक बाबू तैश में आकर बोले।

अशोक बाबू ने अपनी बात पूरी की ही थी कि हरि बाबू वहाँ पँहुच गये और उनकी बात लपकते हुये बोले,” कौन दो मिनट नहीं बोल सकता बिना लिखे हुये को पढ़े? जरूर आप सोनिया गांधी को गरिया रहे होगे। अरे कभी तो बेचारी को बख्श दिया करो। अब जनता ने भाजपा को फिर से सत्ता नहीं दी तो इसमें सोनिया का क्या कसूर। आपके प्रमोद महाजन के हिसाब से तो सोनिया से माफिक कोई भी नेता विपक्ष नहीं हो सकता था भाजपा के लिये। अपनी काबिलियत से ज्यादा महाजन को सोनिया की नाकाबिलियत पर भरोसा था। कहते थे कि जब तक सोनिया विपक्ष की नेता हैं भाजपा को कोई खतरा नहीं और भाजपा सत्ता में बनी रहेगी। पर हाय री भारत की जनता उसे भाजपा की शुद्ध हिन्दी के बजाय सोनिया की टूटी फूटी इटेलियन टोन वाली हिन्दी ही पसन्द आयी।

देखो जी समर्थन तो कांग्रेस को भी नहीं दिया जनता ने फिर क्यों लपक कर सरकार बना ली और रोज़ गाना गाया जा रहा है कि सोनिया ने ये त्याग किया वो त्याग किया। इतना बड़ा त्याग किया और ऐसे त्याग की मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। त्याग मेरी जूती। अजी जब काबिल ही नहीं थी तो पद ग्रहण न करने का नाटक किया। आपने पढ़ा नहीं था बाल ठाकरे का बयान कि राष्ट्रपति ने सोनिया को बुलाकर साफ कह दिया था कि उनके पी.एम. बनने से जटिलतायें खड़ी हो सकती हैं और हो सकता है कि सेना उनका आदेश न माने। सुषमा स्वराज और उमा भारती ने ताल ठोक ही रखी थी आंदोलन करने की। इन्ही सब बातों से घबराकर इस महिला ने कुर्सी छोड़ने का नाटक किया। अजी बहुत चतुर नारी है। अशोक बाबू आवेश में आकर बोले।

बुरा न मानना अशोक बाबू पर कुछ बातों में संघ परिवार से जुड़े घटकों की बातों पर विश्वास कर पाना मुश्किल होता है। ये लोग कैसी भी बातें फैलाते रहते हैं। हमें तो इतना पता है कि बाल ठाकरे की बात जो आप कर रहे हो खुद राष्ट्रपति महोदय ने ऐसी बातों का खंडन ​किया कि उन्होने सोनिया गांधी से इस तरह की कोई चेतावनीयुक्त बात कही थी। हमारे पास तो ऐसा कोई कारण है नहीं कि राष्ट्रपति की बात पर भरोसा न किया जाये। एक तो ऐसा एक भी व्यक्तित्व वर्तमान राजनीति में नहीं है जो देशहित में ही सब बातें सोचता कहता और करता हो। इतना ऊर्जावान राष्ट्रपति हमने तो पहले देखा नहीं कोई भी। साहब हमें तो तो पहली बार कोई राष्ट्रपति पसन्द आया है।

सही बात है हरि बाबू उन्हे पता है कि देश की जरूरत क्या है और आज की वास्तविकता क्या है। तभी उन्होने अपना सारा ध्यान बच्चों पर केन्द्रित किया है। कैसे वे बच्चों में उत्साह जगा रहे हैं। ये सब कुछ सालों में नजर आयेगा। विजय बाबू ने समर्थन किया।

ये बात तो सही कह रहे हो आप आदमी तो प्रोग्रे​सिव है भाजपा बड़ा अच्छा काम कर गयी डा. कलाम को राष्ट्रपति बनाकर। अशोक बाबू ने भी समर्थन करते हुये कहा।

अरे आप दोनो कहाँ चारदिवारी से घिरे बैठे हो। चलकर पार्क में बैठा जाये कुछ घूमना भी हो जायेगा। हरि बाबू ने प्रस्ताव रखा।

हाँ ये ठीक रहेगा बातें वहीं होंगीं अब। अशोक बाबू ने कुर्सी से उठकर अंगड़ायी लेते हुये कहा।

ठीक है मैं जरा अन्दर घर में बता कर आ जाऊँ। विजय बाबू ने कहा और घर के अन्दर चले गये।

कुछ ही देर में विजय बाबू बाहर आ गये और बोले कि चलो सुनील जी को भी देख लिया जाये कहाँ रह गये?

तीनो लोग सड़क पर आ गये। पार्क के रास्ते में सुधीर बाबू का घर पड़ा तो विजय बाबू ने गेट से ही अन्दर खेलते बच्चे से पूछा बेटा बाबा आ गये बाजार से वापिस?

बच्चे ने ना में गरदन हिलायी। तब तक आवाज सुनकर सुनील जी का छोटा बेटा बाहर आया और सबको नमस्ते करके बोला कि अभी तो पापा आये नहीं हैं ।

अरे तुम तो इस बार दो तीन हफ्तों के बाद आ रहे हो। कहाँ अटक गये थे? विजय बाबू ने पूछा।

बस जी काम के चक्कर में आना हो नहीं पाया पहले। फिर सुबह और रात को इतना कोहरा हो जाता है कि ज्यादा शाम को उधर से इधर आने की हिम्मत हुयी और ये भी पता था कि शनिवार की रात को किसी तरह आ भी गया तो सोमवार की सुबह सुबह जाना मुश्किल हो जायेगा और यदि रविवार की शाम को ही वापिस जाना पड़े तो अच्छा नहीं लगता।

सही बात है इतनी भागदौड़ से क्या फायदा। अब कोहरा कम होता जायेगा तो फिर से हर हफ्ते चक्कर लगने लगेंगे। हरि बाबू बोले।

अच्छा बेटा पापा आ जायें तो बोलना कि हम लोग पार्क में बैठे हैं वहीं आ जायें। अशोक बाबू ने कहा।

…जारी…

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