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नवम्बर 25, 2010

सच्चे मित्र सच्ची मित्रता … (संत सिद्धार्थ)

संत सिद्धार्थ ने कमरे में प्रवेश करते ही वहाँ पहले से मौजूद लोगों का हाथ जोड़कर अभिवादन किया और अपने लिये नियत स्थान पर बैठ गये।

उन्होने लोगों से पूछा कि वे किस विषय पर चर्चा करना चाहते हैं?

एक सज्जन ने कहा,” महात्मन, कुछ मित्रता पर बताने का कष्ट करें। क्यों ऐसा होता है कि जिन लोगों को हम मित्र समझते हैं वही हमें धोखा देते हैं, हमें दुख पहुँचाते हैं। दुनिया में मित्रता के नाम पर इतनी धोखाधड़ी क्यों है?

संत सिद्धार्थ ने कहा,” ठीक है आज मित्रता और मित्र पर बात कर लेते हैं। सबसे पहला प्रश्न उठता है कि मित्र कौन है? आप लोग बतायें आप लोगों के लिये मित्र की परिभाषा क्या है?

महात्मन, जो सुख दुख में साथ रहे वही मित्र है।
जो संकट में साथ दे, सहायता करे वही मित्र है।
जो दुनिया के लाख विरोध के बाद भी साथ दे वही सच्चा मित्र है।
जो दिल से आपका भला चाहे वही मित्र है।
जो ईमानदारी से दोस्ती का रिश्ता निभाये वही सच्चा मित्र है।

लोगों ने अपनी समझ से मित्रता की भिन्न-भिन्न परिभाषायें कह दीं।

संत सिद्धार्थ ने कहा,” ठीक है, मित्र होने के कई लक्षण आप लोगों ने गिना दिये। आप लोगों ने कहा कि जो संकट में साथ दे वह सच्चा मित्र है, पर ऐसा देखा गया है कि सहायता करने वाले व्यक्ति के साथ कालांतर में सम्बंध ठीक नहीं रहते, कहीं न कहीं विगत में की गयी सहायता का अहसान ही तथाकथित मित्रों के मध्य दरार पड़ने का माध्यम बन जाता है। क्या ऐसा भी कहा जा सकता है कि यदि कोई व्यक्ति संकट में सहायता करता है वह मित्र बन सकता है? तब समाज सेवियों को क्या कहियेगा?

थोड़ा रुककर उन्होने अपनी बात आगे बढ़ाई,” मित्र और मित्रता की बात को यूँ समझते हैं… आपकी तरफ से कौन आपका मित्र हो सकता है? आप किस व्यक्ति के सच्चे मित्र हो सकते हैं? मित्रता एक तरफ से नहीं हो सकती। आपके विचार और भावनायें आदि भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

उन्होने नजर सामने बैठे लोगों पर दौड़ाई और कहा,” मोटे तौर पर एक बात तय कर लें कि वह क्या भाव है जिसके पार करने पर सच्ची मित्रता की बुनियाद मजबूत हो जाती है? आप लोगों में मित्रता को लेकर निराशा है तो स्पष्ट है कि जितनी भी कसौटियाँ हैं आप लोगों के सामने मित्रता को परखने के लिये वे खरी नहीं उतरतीं क्योंकि अंत में आपको मित्रों से ठेस ही लगती है।

लोगों को चुप देखकर उन्होने कहा,” आप सबसे ज्यादा परेशान होते हैं उस मित्र से जो आपके अहं को ठेस पहुँचाता है। यह अंतिम और सबसे बड़ी कसौटी है जिसे पार करने के बाद ही सच्ची मित्रता की बुनियाद पड़ती है। इसे पार करे बगैर मित्रता में कोई सच्चाई उत्पन्न नहीं होती। इससे पहले सारी तथाकथित मित्रतायें भुरभुरे महल ही हैं जो जल्दी ही गिर जाते हैं। अगर आपके तथाकथित मित्रों में ऐसा कोई है जिसके सामने आपका अहं पिघल जाता है, वही आपकी तरफ से आपका मित्र बन सकता है।

इस अवस्था से पहले यदि कोई आपकी सहायता करता है तो गहरे में आपके अहं को ठेस लगती है। यदि आप ही किसी की सहायता कर रहे हैं तो आपके अंदर भी यह भावना जन्म लेती है कि आपने उस व्यक्ति के ऊपर अहसान किया है। अगर वह आपसे कुछ गलत व्यवहार करता है या आपकी उपेक्षा करता है तो आपको लगता है कि आपने तो उस पर अहसान किया और वह आपको ही उपेक्षित समझ रहा है। आप चाहते हैं कि वह आपके द्वारा की गयी सहायता को हमेशा याद रखे, पर यही बात आप तब लागू नहीं करना चाहते जब कोई आपकी सहायता करता है।

साधारण रिश्तों में व्यक्ति का अहंकार मौजूद रहता है अतः रिश्ते गहरायी नहीं पा पाते।

सच्चा मित्र आपके अहंकार की परवाह किये बगैर आपको टोकेगा जरुर जब भी आपको गलत राह पर चलता हुआ पायेगा। सच्चा मित्र कभी आपके साथ उस कर्म में खड़ा हुआ नहीं दिखायी देगा जो कर्म मानवता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ जाते हों। आपको चाहे कितना बुरा लगे, वह इस बात की परवाह किये बिना ही आपको सत्य मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करेगा। वह आपको गलत कर्म को करने के लिये साथ होने की ऊर्जा नहीं देगा। सच्चा मित्र तो बहुत बार आपके विरोध में खड़ा दिखायी देगा क्योंकि वह कटिबद्ध है आपको गलत मार्ग पर चलने से रोकने के लिये।

जो हर कर्म में, चाहे वे गलत ही क्यों न हों, साथ देते दिखायी देते हैं वे चापलूस होते हैं, सच्चे मित्र नहीं। सच्चा मित्र कैसे आपको पाप के मार्ग पर चलने देगा?

सच्चा मित्र वही है, जो भरपूर ईमानदारी से आपके अहंकार को ठेस पहुँचाये और तब भी आप उसके साथ के लिये अपने अंतर्मन में इच्छा को जिंदा पायें। बाकी सब तरह की मित्रतायें अवसरवादी हैं, सतही हैं, कम आयु की हैं।

कभी ऐसा ईमानदार मित्र मिल जाये जो मित्रता निभाने में भी उतना ही ईमानदार हो तो ऐसे सच्चे मित्र की मित्रता पाने के लिये अपने को भाग्यशाली समझना और उस मित्रता की रक्षा हर हाल में करना। और स्वयं भी ऐसा ही ईमानदार मित्र बनने की चेष्टा करना, बल्कि आपकी पहल ही ज्यादा महत्वपूर्ण है, आप स्वयं की ही दिशा तो संचालित कर सकते हैं। इस अवस्था के बाद मित्रता दुख नहीं देगी, ठेस नहीं पहुँचायेगी।

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