Archive for मार्च, 2013

मार्च 29, 2013

नामपट्टी…

एक नामपट्टी के बारे में सोच रहा

कि कैसी हो,

फिर घर के बारे में सोचूंगा

कि कैसा हो,

फिर उनके बारे में

जो रह चुके रहे जा चुके घरों में |

अंत में

किसी नए कोण से

सोचना शुरू करूंगा

कि कैसी हो

मेरे घर की नयी नामपट्टी|

सफ़ेद संगमरमर पर काले अक्षर

धीरे-धीरे सफ़ेद हो जाते,

काले पर सफ़ेद लिखावट

धीरे धीरे काली…

(संगमरमर मुझे मकबरों की याद दिलाते)

लकड़ी की तख्ती साल भर भी नहीं चलती,

तांबा

पीतल

लोहा

देखते देखते बदरंग और भद्दे हो जाते|

कैसी मुश्किल है

कि एक साधारण-से नाम को

दुनिया की कोई धातु

पूरी तरह धारण नहीं कर पा रही,

जब कि वह जो

ऐसी न जाने कितनी

दुनियाओं को धारण किये हैं

केवल एक नाम है|

(कुंवर नारायण)

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मार्च 22, 2013

बताओ तो, क्या गुलाब नग्न है? : पाब्लो नेरुदा

मुझे बताओ,

क्या गुलाब नग्न है?

या कि उसकी वेशभूषा ही ऐसी है?

वृक्ष क्यों छिपाते हैं,

अपनी जड़ों की भव्यता को?

कौन सुनता है दुखडा?

चोरी हो चुके वाहन का|

क्या दुनिया में कोई भी दुखी होगा,

बरसात में खड़ी रेल से ज्यादा ?

(पाब्लो नेरुदा)

मार्च 21, 2013

तब तुम मुझको याद करोगे…

अभी तुम्हारा ध्यान कहीं है

पीड़ा का अनुमान नहीं है

जिस दिन ठोकर लग जायेगी

उस दिन तुम फ़रियाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

बालू की दीवार खड़ा कर

ताशों के तुम महल बना कर

अपने दिल की इस बस्ती को

जिस दिन तुम खुद बर्बाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

मैं संयम का नहीं पुजारी

लंगडी नैतिकता लाचारी

मुझ बैरागी का दुनिया में

अनुरागी जब नाम धरोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

देखो तुम्हे बता देता हूँ

मैं सबको अपना लेता हूँ

सच कहता हूँ रुक न सकूंगा

जिस दिन लंबी सांस भरोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

सीता राम रटा डाला है

पंखों पर भी ताला जड़ा है

पिंजरे के पंछी को आखिर

एक दिन तो आज़ाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 17, 2013

तुम्हारी हँसी … Pablo Neruda

रोटी मुझसे ले लो,

अगर तुम चाहो तो,

हवा दूर ले जाओ,

लेकिन मुझसे

अपनी हँसी दूर मत ले जाना|

दूर मत ले जाना,

वो गुलाब,

वो लंबा, नुकीला फूल, जो तुमने तोड़ा है,

वो खुशी, जो जल के झरने की तरह

एकदम से फूट पड़ता है

वो चांदी जैसी चमक

जो अनायास जगमगा उठती है

तुम्हारे अंदर|

मेरा संघर्ष कठिन है,

और मैं वापस आता हूँ,

थकी आँखों के साथ,

और कभी-कभी बदलाव न ला पाने की निराशा के साथ

लेकिन जब तुम्हारी हँसी

देखता हूँ तो

यह मुझे अहसास कराती है

कि अभी आकाश की ऊँचाइया

बाकी हैं छू पाने को

तुम्हारी हँसी खोल देती है

जीवन में आशा के सब द्वार|

मेरे प्रिय!

जब तुम हंसती हो तो

जीवन के सबसे अंधकार भरे समय में

भी मुझे संबल मिलता है,

और यदि कभी अचानक तुम

देखो कि मेरा रक्त सडकों

को रंग रहा है,

तो तुम हंसना,

क्योंकि तुम्हारी हँसी

मुझे लड़ने के लिए वही ताजगी देगी

जैसे शस्त्रहीन हो चुके किसी सैनिक

को अचानक से एक नयी धारदार तलवार

मिल जाए|

पतझड़ में

तुम्हारी हँसी

समुद्र से लगातार आती झागदार लहरों को

ऊँचा उठा देती है,

और बसंत में बढ़ा देती है प्यार को,

मुझे तुम्हारी हँसी का इतंजार ऐसे ही रहता है

जैसे कि मैं इंतजार करता हूँ

खिलने का अपने पसंदीदा फूलों के,

नीले फूल,

यादों में बसे मेरे देश के गुलाब|

तुम हंसना रात पर,

दिन पर,

या चाँद पर,

हंसना

इस द्वीप की टेढी-मेढ़ी गलियों पर,

या इस अनगढ़ लड़के पर जो तुमसे प्रेम करता है,

पर जब में अपनी आँखें खोलूं

और बंद करूँ,

जब मैं जाऊं,

जब मैं वापस आऊँ,

मुझे भले ही

रोटी, हवा, प्रकाश,

बसंत,

मत देना,

पर कभी भी मुझे अपनी

हँसी देने से इनकार मत करना,

क्योंकि तुम्हारी हँसी के

लिए मैं मर सकता हूँ|

(Your LaughterPablo Neruda)

हिंदी अनुवाद – …[राकेश]

मार्च 16, 2013

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

चाहे यह ज़िंदगी खंगालो

या तुम इसकी रूह निकालो

ठंडी आहें नहीं भरूँगा

सब कुछ चुपचाप सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

मैंने कभी विरोध न माना

हर अनुरोध तुम्हारा माना

मान तुम्हारा रख पाऊं

मैं यह कोशिश दिन रात करूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

दुख से मेरा वैर नहीं है

कोई रिश्ता गैर नहीं हैं

यदि वह मेरा साथ निभाए

तो मैं उसके साथ रहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

बहुत मौत से डरते होंगे

वे जीते-जी मरते होंगे

मैं उनमे से नहीं बंधु !

जो समझौतों की मार सहूंगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

तुम भटको तो वापस आना

मन में कोई बात न लाना

दरवाजे पर जब पहुंचोगे

तुम्हे द्वार पर खड़ा मिलूंगा

तब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा

अब मैं तुमसे कुछ न कहूँगा…

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 14, 2013

यदि तुम मुझसे दूर न जाते …

मुझे, अकेलेपन में साथी

याद तुम्हारी कैसे आती

आंसू रहकर इन आँखों में अपना नीड़ कैसे बनाते?

यदि तुम मुझसे दूर न जाते|

तुम हो सूरज-चाँद जमीन पर

किसका क्या अधिकार किसी पर

मेरा मन रखने की खातिर

तुम जग को कैसे ठुकराते?

यदि तुम मुझसे दूर न जाते|

आँख आज भी इतनी नम है

जैसे अभी अभी का गम है

ताजा सा यह घाव न होता,

मित्र तुम्हे हम गीत सुनाते

यदि तुम मुझसे दूर न जाते|

पल भर तुमने प्यार किया है

यही बहुत उपकार किया है

इस दौलत के आगे साथी किस दौलत को गले लगाते?

तू आये तो सेज सजाऊं

तेरे संग भैरवी गाऊँ

यह मिलने की चाह न होती तो मरघट का साथ निभाते!

यदि तुम मुझसे दूर न जाते|

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 12, 2013

गीत गुनगुनाने दो

 

सपने हैं शीशे से साफ़ करो इनको

सपनों की गलती क्या माफ करो इनको |

मन में कुछ आने दो कुछ मन से आने दो

गीत गुनगुनाने दो …|

मोहक हर दर्पण था मोह गया मन को

आकर्षण बंधन का तोड़ गया तन को |

सुख को तुम माने दो दुख में कुछ गाने दो

गीत गुनगुनादे दो…|

मन को तो रोक लिया मिलने से उनको

भीतर के जग में अब रोकोगे किनको |

सृष्टि है लुभाने दो दो दृश्य हैं रमाने दो

गीत गुनगुनाने दो…|

दूर जा चुके हैं सब जाना था जिनको

अब किसे पुकारें हम आना है किनको |

अब दिया बुझाने दो दर्द को सुलाने दो

गीत गुनगुनाने दो…|

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 9, 2013

अद्भुत औरत

Maya Angelou की प्रसिद्द कविता Phenomenal Woman का हिन्दी अनुवाद

औरतें उत्सुक रहती हैं  

जानने को कि कहाँ छिपे हैं

मेरे चुम्बकीय व्यक्तित्व के रहस्य?

 

खूबसूरती की उनकी परिभाषा की समझ से

मैं किसी भी हिसाब से खूबसूरत नहीं हूँ

न ही मैं फैशन माडल्स जैसे आकार प्रकार वाली हूँ

लेकिन जब में उन्हें अपनी गोपनीयता बताना शुरू करती हूँ

तो वे सोचती हैं

मैं झूठ बोल रही हूँ |

 

मैं कहती हूँ

रहस्य मेरी बाहों के घेरे में है

मेरे नितंबों के फैलाव में है

लंबे-लंबे डग भरती मेरी चाल में है

मेरे होठों के घुमावों और कटावों में है|

  

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

मैं प्रवेश करती हूँ किसी कक्ष में

जैसी मैं हूँ

अपने सारे वजूद को साथ लिए

और पुरुष,

वे सब खड़े हो जाते हैं

या अपने घुटनों के बल बैठ जाते हैं

वे मेरे इर्द गिर्द

ऐसे एकत्रित हो जाते हैं

जैसे छत्ते के करीब मधुमक्खियाँ

मैं कहती हूँ

रहस्य छिपा है

मेरी आँखों में बसी आग में

मेरे दांतों की चमक में

मेरी कमर की लचक में

मेरे पैरों के जोश में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

पुरुष खुद अचरज करते हैं

कि वे क्या देखते हैं मुझमे

वे कोशिश तो बहुत करते हैं

पर कभी छू नहीं पाते

मेरे अंदुरनी रहस्य को

जब मैं उन्हें दिखाने की कोशिश करती हूँ

वे कहते हैं –

वे देख नहीं पा रहे अभी भी|

मैं कहती हूँ,

रहस्य तो छिपा है

मेरी रीढ़ की चाप में

मेरी मुस्कान के सूरज में

मेरे वक्षों के उठान में

मेरे मनोहरी सलीके में|

 

मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत

हाँ वह हूँ मैं |

 

अब तुम्हे समझ में आ गया होगा

क्यों मेरा सिर झुका हुआ नहीं रहता है

मैं शोर नहीं मचाती,

कूद-फांद नहीं मचाती

अपने को जाहिर करने के लिए

मुझे प्रयास नहीं करने पड़ते

पर जब तुम मुझे देखो

पास से जाते हुए

तुम्हारे अंदर मुझे लेकर गर्व का भाव जगना चाहिए|

 

मैं कहती हूँ,

मेरे चुम्बक का रहस्य  

छिपा है –

मेरे जूते की हील की खट-खट में

मेरे बालों की घुंघराली लटों में

मेरे हाथों की हथेलियों में

मेरी देखरेख की जरुरत में,

‘क्योंकि’ मैं एक औरत हूँ

असाधारण रूप से

अद्भुत औरत,

हाँ वह हूँ मैं |

[Maya Angelou]

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