Archive for मई, 2013

मई 31, 2013

समाजवाद और साम्यवाद : ओशो (नये समाज की खोज)

oshoसमाजवाद और साम्यवाद

वही फर्क करता हूं मैं जो टी.बी. की पहली स्टेज में और तीसरी स्टेज में होता है, और कोई फर्क नहीं करता हूं। समाजवाद थोड़ा सा फीका साम्यवाद है, वह पहली स्टेज है बीमारी की। और पहली स्टेज पर बीमारी साफ दिखाई नहीं पड़ती इसलिए पकड़ने में आसानी होती है। इसलिए सारी दुनिया में कम्युनिज्म ने सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया है। कम्युनिज्म शब्द बदनाम हो गया है। और कम्युनिज्म ने पिछले पचास सालों में दुनिया में जो किया है, उसके कारण उसका आदर क्षीण हुआ है। पचास वर्षों में कम्युनिज्म की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है। इसलिए अब कम्युनिज्म सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर किया है। अब वह समाजवाद की बात करता है और यह भी कोशिश कर सकता है कि हम समाजवाद से भिन्न हैं। लेकिन समाजवाद और साम्यवाद में कोई बुनियादी भेद नहीं है, सिर्फ शब्द का भेद है। लेकिन शब्द के भेद पड़ने से बहुत फर्क मालूम पड़ने लगते हैं। शब्द को भर बदल दें तो ऐसा लगता है कोई बदलाहट हो गई।

कोई बदलाहट नहीं हो गई है।

समाजवाद हो या साम्यवाद हो, सोशलिज्म हो या कम्युनिज्म हो, एक बात पक्की है कि व्यक्ति की हैसियत को मिटा देना है, व्यक्ति को पोंछ डालना है, व्यक्ति की स्वतंत्रता को  समाप्त कर देना है, संपत्ति का व्यक्तिगत अधिकार छीन लेना है और देश की सारी जीवन-व्यवस्था राज्य के हाथ में केंन्द्रित कर देनी है।

लेकिन हमारे जैसे मुल्क में, जहां कि राज्य निकम्मे से निकम्मा सिद्ध हो रहा है, वहां अगर हमने देश की सारी व्यवस्था राज्य के हाथ में सौंप दी, तो सिवाय देश के और गहरी गरीबी, और गहरी बीमारी में गिरने के कोई उपाय न रह जाएगा।

आज मेरे एक मित्र मुझे एक छोटी सी कहानी सुना रहे थे, वह मुझे बहुत प्रीतिकर लगी। वे मुझे एक कहानी सुना रहे थे कि एक आदमी ने रास्ते से गुजरते वक्त, एक खेत में एक बहुत मस्त और तगड़े बैल को काम करते हुए देखा। वह पानी खींच रहा है और बड़ी शान से दौड़ रहा है। उसकी शान देखने लायक है। और उसकी ताकत, उसका काम भी देखने लायक है। वह जो आदमी गुजर रहा था, बहुत प्रशंसा से भर गया, उसने किसान की बहुत तारीफ की और कहा कि बैल बहुत अदभुत है।

छह महीने बाद वह आदमी फिर वहां से गुजर रहा था, लेकिन बैल अब बहुत धीमे-धीमे चल रहा था। जो आदमी उसे चला रहा था, उससे उसने पूछा कि क्या हुआ? बैल बीमार हो गया? छह महीने पहले मैंने उसे बहुत फुर्ती और ताकत में देखा था! उस आदमी ने कहा कि उसकी फुर्ती और ताकत की खबर सरकार तक पहुंच गयी और बैल को सरकार ने खरीद लिया है। जब से सरकार ने खरीदा है तब से वह धीमा चलने लगा है, पता नहीं सरकारी हो गया है।

छह महीने और बीत जाने के बाद वह आदमी फिर उस जगह से निकला तो देखा कि बैल आराम कर रहा है। वह चलता भी नहीं, उठता भी नहीं, खड़ा भी नहीं होता। तो उसने पूछा कि क्या बैल बिलकुल बीमार पड़ गया, मामला क्या है? तो जो आदमी उसके पास खड़ा था उसने कहा, बीमार नहीं पड़ गया है, इसकी नौकरी कन्फर्म हो गई है, अब यह बिल्कुल पक्का सरकारी हो गया है, अब इसे काम करने की कोई भी जरूरत नहीं रह गई है।

बैल अगर ऐसा करे तब तो ठीक है, आदमी भी सरकार में प्रवेश करते ही ऐसे हो जाते हैं। उसके कारण हैं, क्योंकि व्यक्तिगत लाभ की जहां संभावना समाप्त हो जाती है  और  जहां  व्यक्तिगत लाभ निश्चित हो जाता है, वहां कार्य करने की इनसेंटिव, कार्य करने की प्रेरणा समाप्त हो जाती है। सारे सरकारी दफ्तर, सारा सरकारी कारोबार मक्खियां उड़ाने का कारोबार है। पूरे मुल्क की सरकार नीचे से ऊपर तक आराम से बैठी हुई है। और हम देश के सारे उद्योग भी इनको सौंप दें! ये जो कर रहे हैं, उसमें सिवाय हानि के कुछ भी नहीं होता।

मेरा अपना सुझाव तो यह है कि जो चीजें इनके हाथ में हैं वे भी वापस लौटा लेने योग्य है। अगर हिन्दुस्तान की रेलें हिन्दुस्तान की व्यक्तिगत कंपनियों के हाथ में आ जाएं, तो ज्यादा सुविधाएं देंगी, कम टिकट लेंगी, ज्यादा चलेंगी, ज्यादा आरामदायक होंगी और हानि नहीं होगी, लाभ होगा। जिस-जिस जगह सरकार ने बसें ले लीं अपने हाथ में, वहां बसों में नुकसान लगने लगा। जिस आदमी के पास दो बसें  थीं, वह लखपति हो गया। और सरकार  जिसके पास लाखों बसें हो जाती हैं, वह सिवाय नुकसान के कुछ भी नहीं करती। बहुत आश्चर्यजनक  मामला है!

मैं अभी मध्यप्रदेश में था, तो वहां मध्यप्रदेश ट्रांसपोर्टेशन, बसों की व्यवस्था के जो प्रधान हैं-अब तो वे सब सरकारी हो गई हैं-उन्होंने मुझे कहा कि पिछले वर्ष हमें तेईस लाख रुपये का नुकसान लगा है। उन्हीं बसों से दूसरे लोगों को लाखों रुपये का फायदा होता था, उन्हीं बसों से सरकार को लाखों का नुकसान होता है। लेकिन होगा ही, क्योंकि सरकार को कोई प्रयोजन नहीं है, कोई काम्पिटीशन नहीं है।

दूसरा सुझाव मैं यह भी देना चाहता हूं कि अगर सरकार बहुत ही उत्सुक है धंधे हाथ में लेने को, तो काम्पिटीशन में सीधा मैदान में उतरे और बाजार में उतरे। जो दुकान एक आदमी चला रहा है, ठीक उसके सामने सरकार भी अपनी दुकान चलाए और फिर बाजार में मुकाबला करे। एक कारखाना आदमी चला रहे है, ठीक दूसरा कारखाना खोले और दोनों के साथ समान व्यवहार करे और अपना कारखाना चला कर बताए। तब हमको पता चलेगा कि सरकार क्या कर सकती है।

सरकार कुछ भी नहीं कर सकती है। असल में सरकारी होते ही सारे काम से प्रेरणा विदा हो जाती है और जहां सरकार प्रवेश करती है वहां नुकसान लगने शुरू हो जाते हैं।

समाजवाद और साम्यवाद दोनों ही, जीवन की व्यवस्था को राज्य के हाथों में दे देने का उपाय हैं। जिसे हम आज पूंजीवाद कहते हैं, वह पीपुल्स कैपिटलिज्म है, वह जन-पूंजीवाद है। और जिसे समाजवाद और साम्यवाद कहा जाता है, वह स्टेट कैपिटलिज्म, राज्य-पूंजीवाद है। और कोई फर्क नहीं है। जो चुनाव करना है वह चुनाव यह है कि हम पूंजीवाद व्यक्तियों के हाथ में चाहते हैं कि राज्य के हाथ में चाहते हैं, यह सवाल है। व्यक्तियों के हाथ में पूंजीवाद बंटा हुआ है, डिसेंट्रलाइज्ड है। राज्य के हाथ में पूंजीवाद इकट्ठा हो जाएगा, एक जगह इकट्ठा हो जाएगा।

और ध्यान रहे, बीमारी है अगर पूंजीवाद, तो बंटा हुआ रखना ही अच्छा है। कनसनट्रेटेड बीमारी और खतरनाक हो जाएगी, और कुछ भी नहीं हो सकता।

[नये समाज की खोजओशो]

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मई 31, 2013

कम्युनिज्म : ‘सआदत हसन मंटो’ की दृष्टि में

वह अपने घर का तमाम जरूरी सामान एक ट्रक में लदवाकर दूसरे शहर जा रहा था कि रास्ते में लोगों ने उसे रोक लिया|
एक ने ट्रक के सामान पर नज़र डालते हुए कहा,” देखो यार, कितने मजे से अकेला इतना सामान उडाये चला जा रहा है|”
सामान के मालिक ने कहा.”जनाब माल मेरा है|”
दो तीन आदमी हँसे,” हम सब जानते हैं|”
एक आदमी चिल्लाया,” लूट लो! यह अमीर आदमी है, ट्रक लेकर चोरियां करता है|”

मई 28, 2013

आम तो आम खटास के भी दाम

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‘आम के आम गुठलियों के दाम’ और ‘आम फलों का राजा है’ इन दो कथनों से हरेक हिंदी भाषी भली-भांति परिचित रहता है| ये भी सच है कि मौसम में आम ही नहीं बौराते बल्कि आम की आमद होने पर इसके प्रशंसक भी बौरा जाते हैं| जैसे ही आम के वृक्षों पर बौर आने शुरू होते हैं और हवा के संग संग इनसे उठने वाली भीनी भीनी सुगंध इधर उधर तैरने लगती है, आम के चाहने वालों के दिमाग की घंटियाँ बजनी शुरू हो जाती हैं और भले ही वे दिन अब चले गये जब लोग ऐसी चाहतों का इजहार कर दिया करते थे, पर मन ही मन उस दिन का इन्तजार करने का समय तो अभी बीता नहीं है जब आम उनके मुंह के रास्ते दिमाग को शान्ति और आनंद प्रदान करेंगे| इतंजार की तीव्रता गहन होती जाती है डाल पर आमों को लटकता देख कर| आम के पेड़ों पर लदान करते ही एक भय यह भी समाने लगता है कि कहीं तोटे और अन्य पक्षी और बंदर कच्चे आमों को ही न नष्ट कर दें| या कही आंधी तूफ़ान ही आम के फसल को नष्ट न कर दे| इन सब भय को पार करके ही आनंदित करने वाले आम मिलने वाले होते हैं|
पर यह सब तो आम के उन भक्तों का आँखों देखा और खुद भुगता हाल है जो इतने सौभाग्यशाली हैं कि आमों को अपने आँखों से शून्य से प्रकट होते देखते हैं और अंत में उनका रस्सावादन करते हैं| अब तो तादाद उन भक्तों की ज्यादा है जो शहरों में कंक्रीट के जंगलों में वास करते हैं और ठेलों पर या सब्जी और फलों की दुकानों पर आम रखने होने से ही उन्हें आम की आमद का पता चल पाता है| इन भक्तों में ऐसे उत्सुक भी होते हैं जो अपने वाहन से कहीं की यात्रा करते हुए सड़क किनारे (ज्यादातर किसी आम के बाग-बगीचे के पास) लगे आम के ठेलों के पास रुकने और आम खरीद कर उन्हें खाने का मोह छोड़ नहीं पाते हैं|
पर मार्के की बात यह कि ताजा फसल वाला आम तो बहुत कम लोगों को नसीब हो पाता है| बागों के बाहर भी लोग वही आम बेचते पाए जाते हैं जो वे मंडी से खरीदते हैं और मंडी को नियंत्रित करते हैं व्यापारी और व्यापारी तो आम का भक्त है नहीं, वह तो भक्त है पैसे का और पैसा का मुरीद होने के नाते इतना रिस्क तो वह उठा नहीं सकता कि आम को पकने के लिए पेड़ों पर छोड़ दे और जब वे खाने लायक हो जाए तब उन्हें बेचे, या कम से कम अखबार और भूसे में कुछ दिन रख कर पकाने जैसे पुराने ग्रामीण और बहुत हद तक प्राकृतिक तरीके का इस्तेमाल करे| इतना धैर्य व्यापारी में कहाँ और इस विधि में उसका नियंत्रण बहुत रह नहीं पाता सो वह तो विश्वास करता है कच्चे आम को इकट्ठा करके रसायनों वाले कृत्रिम तरीके से पकाने में| इससे एक तो विधि पर उसका नियंत्रण रहता है और अब बाजार आम की पूर्ती और उसके मूल्य पर पूरा पूरा नियंत्रण रख सकता है और रखता है|
अब तो बिरले ही लोग हैं जो आम के प्राकृतिक स्वाद का आनंद ले सकते हैं| इन बिरलों में कुछ ऐसे हो सकते हैं जो बाग में काम कर रहे हैं वरना अधिकतर वे धनी लोग हैं जिनके पास आम के बाग हैं| अब धनी ही लोग ऐसे बचे हैं जो आम की भिन्न भिन्न किस्मों का आनंद उनके लिए अधिकृत विधि से ले सकते हैं| बाकी लोगों को तो अब बाजार से पिलपिले या एकदम ठोस किस्म के आम खरीद कर खाने पड़ते हैं और आम के हर टुकड़े के साथ निराश मन के साथ यह दोहराना पड़ता है –

क्यों तुझ संग प्रीत लगाईं बेवफा

बाजार में उपलब्ध ‘आम’ की हरेक किस्म का ऐसा ही बुरा हाल है| न केवल उनके रूप-रंग से बल्कि उनके स्वाद से भी खूबसूरती नदारद है|

कुछ ऐसे सब्जी और फल बेचने वाले समूह भी हैं जो दावे करते हैं कि उनके यहाँ फलों को रसायन या अन्य क्रत्रिम तरीकों से नहीं पकाया जाता पर क्या ये दावे वास्तविकता पर आधारित हैं? क्या संबधित सरकारी विभाग की जिम्मेवारी नहीं बनती कि ऐसे दावों की जांच करे?
ऐसे आउटलेट्स पर बिकने वाले आम खरीदिए उसे चाकू से काटिए, हो सकता है ऊपर से मीठा निकले पर जैसे जैसे आम खाने वाला गुठली की तरफ बढ़ेगा, आम के गुदे का रंग पीला होता जाएगा और स्वाद खट्टा और गुठली के एकदम ऊपर की परत तो एकदम पीली (कच्चे आम का रंग) और स्वाद में नींबू जैसी खटास लिए हो सकती है| प्राकृतिक तरीके से पकाए आम में ऐसे भेदभाव तो नहीं मिलते! फिर ये क्या गोरखधंधा है?
क्या यह भारत जैसे कृषि अर्थव्यस्था पर आधारित देश के लिए शर्मनाक बात नहेने है कि देशवासी ही अच्छा आम नहीं खा सकते| वैसे और बहुत सारी सब्जियों और और फलों की किस्मों की तरह अच्छे भारतीय आम पूरी शान से विदेशी बाजारों में उपलब्ध हो जायेंगे| मिट्टी पानी देश का और आम जैसे राष्ट्रीय फल आनंद दे विदेशियों को|
अब समय आ गया लगता है जब आम के बागों और आम की दुकानों के बाहर निर्देश पट्टिका लगा देना चाहिए

यह ‘आम’ रास्ता नहीं है| कृपया, ‘आम’ आदमी दफा हो जाए

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मई 26, 2013

मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई

Train to Pak

सादत हसन मंटो ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे और इससे उपजी हिंसा पर बेहद प्रभावशाली कहानियां लिखी हैं और नफ़रत के ऐसे माहौल में इंसानियत कितना गिर सकती है इस बात को अपनी कहानियों के जरिये दुनिया को बताया है| अज्ञेय ने भी पनी संवेदनशीलता के बलबूते बंटवारे के समय उपजे अमानवीय हालात में एक मनुष्य की विवशता और दूसरे मनुष्य के अहंकार के संघर्ष को बड़े प्रभावी तरीके से इस बेहतरीन कहानी – मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई, में दर्शाया है| सैधान्तिक रूप से भले ही इस्लाम कहता हो कि सभी इंसान (और कम से कम मुसलमान) बराबर हैं पर मनुष्य बेहद चालाक जीव है और वह ऐसे उपदेशों को सिर्फ बोलने के लिए मानता है, इन पर अमल नहीं करता| धनी मुसलमान औरतें और मर्द ही ही मजलूम मुस्लिम औरतों की मदद नहीं करते बल्कि उन्हें अपने पद, और धन के रसूख से उपजे अहंकार के कारण बेइज्जत भी करते हैं| मंटो लिखते तो शायद इसी कहानी में धनी पुरुष की लालची और वासनामयी दृष्टि गरीब औरतों के जिस्म को खंगाल कर उससे बलात्कार करने लगती पर अज्ञेय की लेखनी अलग ढंग से काम करती है और यहाँ धनी पुरुष गरीब स्त्री के चरित्र पर घटिया संवादों से आक्रमण करता है|

मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई

छूत की बीमारियाँ यों कई हैं; पर डर-जैसी कोई नहीं। इसलिए और भी अधिक, कि यह स्वयं कोई ऐसी बीमारी है भी नहीं-डर किसने नहीं जाना? – और मारती है तो स्वयं नहीं, दूसरी बीमारियों के ज़रिये। कह लीजिए कि वह बला नहीं, बलाओं की माँ है…

नहीं तो यह कैसे होता है कि जहाँ डर आता है, वहाँ तुरन्त घृणा और द्वेष, और कमीनापन आ घुसते हैं, और उनके पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन-कौन-सी दबी हुई व्याधियाँ!

वबा का पूरा थप्पड़ सरदारपुरे पर पड़ा। छूत को कोई-न-कोई वाहक लाता है; सरदारपुरे में इस छूत का लाया सर्वथा निर्दोष दीखनेवाला एक वाहक – रोज़ाना अखबार!

यों अखबार में मार-काट, दंगे-फ़साद, और भगदड़ की खबरें कई दिन से आ रही थीं, और कुछ शरणार्थी सरदारपुरे में आ भी चुके थे – दूसरे स्थानों से इधर और उधर जानेवाले काफ़िले कूच कर चुके थे। पर सरदारपुरा उस दिन तक बचा रहा था।

उस दिन अखबार में विशेष कुछ नहीं था। जाजों और मेवों के उपद्रवों की खबरें भी उस दिन कुछ विशेष न थीं – ‘पहले से चल रहे हत्या-व्यापारों का ही ताज़ा ब्यौरा था। कवेल एक नयी लाइन थी’, ‘अफ़वाह है कि जाटों के कुछ गिरोह इधर-उधर छापे मारने की तैयारियाँ कर रहे हैं।’

इन तनिक-से आधार को लेकर न जाने कहाँ से खबर उड़ी कि जाटों का एक बड़ा गिरोह हथियारों से लैस, बन्दूकों के गाजे-बाजे के साथ खुले हाथों मौत के नये खेल की पर्चियाँ लुटाता हुआ सरदारपुरे पर चढ़ा आ रहा है।

सवेरे की गाड़ी तब निकल चुकी थी। दूसरी गाड़ी रात को जाती थी; उसमें यों ही इतनी भीड़ रहती थी और आजकल तो कहने क्या… फिर भी तीसरे पहर तक स्टेशन खचाखच भर गया। लोगों के चेहरों के भावों की अनदेखी की जा सकती तो ही लगता कि किसी उर्स पर जानेवाले मुरीद इकट्ठे हैं…

गाड़ी आयी और लोग उस पर टूट पड़े। दरवाजों से, खिड़कियों से, जो जैसे घुस सका, भीतर घुसा। जो न घुस सके वे किवाड़ों पर लटक गये, छतों पर चढ़ गये या डिब्बों के बीच में धक्का सँभालनेवाली कमानियों पर काठी कसकर जम गये। जाना ही तो है, जैसे भी हुआ, और फिर कौन टिकट खरीदा है जो आराम से जाने का आग्रह हो…

गाड़ी चली गयी। कैसे चली और कैसे गयी, यह न जाने, पर जड़ धातु होने के भी लाभ हैं ही आखिर!

और उसके चले जाने पर, मेले की जूठन-से जहाँ-तहाँ पड़े रह गये कुछ एक छोटे-छोटे दल, जो किसी-न-किसी कारण उस ठेलमठेल में भाग न ले सके थे-कुछ बूढ़े, कुछ रोगी, कुछ स्त्रियाँ और तीन अधेड़ उम्र की स्त्रियों की वह टोली, जिस पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं।

सकीना ने कहा, ‘‘या अल्लाह, क्या जाने क्या होगा।’’

अमिना बोली, ‘‘सुना है एक ट्रेन आने वाली है – स्पेशल। दिल्ली से सीधी पाकिस्तान जाएगी – उसमें सरकारी मुलाज़िम जा रहे हैं न? उसी में क्यों न बैठे?’’

‘‘कब जाएगी?’’

‘‘अभी घंटे-डेढ़ घंटे बाद जाएगी शायद..’’

जमीला ने कहा, ‘‘उसमें हमें बैठने देंगे? अफ़सर होंगे सब…’’

‘‘आखिर तो मुसलमान होंगे – बैठने क्यों न देंगे?’’

‘‘हाँ, आखिर तो अपने भाई हैं।’’

धीरे-धीरे एक तन्द्रा छा गयी स्टेशन पर। अमिना, जमीला और सकीना चुपचाप बैठी हुई अपनी-अपनी बातें सोच रही थीं। उनमें एक बुनियादी समानता भी थी और सतह पर गहरे और हल्के रंगों की अलग-थलक छटा भी… तीनों के स्वामी बाहर थे – दो के फ़ौज में थे और वहीं फ्रंटियर में नौकरी पर थे – उन्होंने कुछ समय बाद आकर पत्नियों को लिवा ले जाने की बात लिखी थी; सकीना का पति कराची के बन्दरगाह में काम करता था और पत्र वैसे ही कम लिखता था, फिर इधर की गड़बड़ी में तो लिखता भी तो मिलने का क्या भरोसा! सकीना कुछ दिन के लिए मायके आयी थी सो उसे इतनी देर हो गयी थी, उसकी लड़की कराची में ननद के पास ही थी। अमिना के दो बच्चे होकर मर गये थे; जमीला का खाविन्द शादी के बाद से ही विदेशों में पलटन के साथ-साथ घूम रहा था और उसे घर पर आये ही चार बरस हो गये थे। अब… तीनों के जीवन उनके पतियों पर केन्द्रित थे, सन्तान पर नहीं, और इस गड़बड़ के जमाने में तो और भी अधिक… न जाने कब क्या हो – और अभी तो उन्हें दुनिया देखनी बाक़ी ही है, अभी उन्होंने देखा ही क्या है? सरदारपुरे में देखने को है भी क्या-यहाँ की खूबी यही थी कि हमेशा अमन रहता और चैन से कट जाती थी, सौ अब वह भी नहीं, न जाने कब क्या हो… अब तो खुदा यहाँ से सही-सलामत निकाल ले सही…

स्टेशन पर कुछ चलह-पहल हुई, और थोड़ी देर बाद गड़गड़ाती हुई ट्रेन आकर रुक गयी।

अमिना, सकीना और जमीला के पास सामान विशेष नहीं था, एक-एक छोटा ट्रंक एक-एक पोटली। जो कुछ गहना-छल्ला था, वह ट्रंक में अँट ही सकता था, और कपड़े-लतर का क्या है-फिर हो जाएँगे। और राशन के ज़माने में ऐसा बचा ही क्या है जिसकी माया हो।

ज़मीला ने कहा, ‘‘वह उधर ज़नाना है!’’ – और तीनों उसी ओर लपकीं।

ज़नाना तो था, पर सेकंड क्लास का। चारों बर्थों पर बिस्तर बिछे थे, नीचे की सीटों पर चार स्त्रियाँ थीं, दो की गोद में बच्चे थे। एक ने डपटकर कहा, ‘‘हटो, यहाँ जगह नहीं है।’’

अमिना आगे थी, झिड़की से कुछ सहम गयी। फिर कुछ साहस बटोरकर चढ़ने लगी और बोली, ‘‘बहिन, हम नीचे ही बैठ जाएँगे – मुसीबत में हैं…’’

‘‘मुसीबत का हमने ठेका लिया है? जाओ, आगे देखो…’’

जमीला ने कहा, ‘‘इतनी तेज़ क्यों होती हो बहिन? आखिर हमें भी तो जाना है।’’

‘‘जाना है तो जाओ, थर्ड में जगह देखो। बड़ी आयी हमें सिखानेवाली!’’ और कहनेवाली ने बच्चे को सीट पर धम्म से बिठाकर, उठकर भीतर की चिटकनी भी चढ़ा दी।

जमीला को बुरा लगा। बोली, ‘‘इतना गुमान ठीक नहीं है, बहिन! हम भी तो मुसलमान हैं…’’

इस पर गाड़ी के भीतर की चारों सवारियों ने गरम होकर एक साथ बोलना शुरू कर दिया। उससे अभिप्राय कुछ अधिक स्पष्ट हुआ हो सो तो नहीं, पर इतना जमीला की समझ में आया कि वह बढ़-बढ़कर बात न करे, नहीं तो गार्ड को बुला लिया जाएगा।

सकीना ने कहा, ‘‘तो बुला लो न गार्ड को। आखिर हमें भी कहीं बिठाएँगे।’’

‘‘जरूर बिठाएँगे, जाके कहो न! कह दिया कि यह स्पेशल है स्पेशल, ऐरे-ग़ैरों के लिए नहीं है, पर कम्बख्त क्या खोपड़ी है कि…’’ एकाएक बाहर झाँककर बग़ल के डिब्बे की ओर मुड़कर, ‘‘भैया! ओ अमजद भैया! देखो ज़रा, इन लोगों ने परेशान कर रखा है…’’

‘अमजद भैया’ चौड़ी धारी के रात के कपड़ों में लपकते हुए आये। चेहरे पर बरसों की अफ़सरी की चिकनी पपड़ी, आते ही दरवाज़े से अमिना को ठेलते हुए बोले, ‘‘क्या है?’’

‘‘देखो न, इनने तंग कर रखा है। कह दिया जगह नहीं है, पर यहीं घुसने पर तुली हुई हैं। कहा कि स्पेशल है, सेकंड है, पर सुनें तब न। और यह अगली तो…’’

‘‘क्यों जी, तुम लोग जाती क्यों नहीं? यहाँ जगह नहीं मिल सकती। कुछ अपनी हैसियत भी तो देखनी चाहिए-’’

जमीला ने कहा, ‘‘क्यों हमारी हैसियत को क्या हुआ है? हमारे घर के ईमान की कमाई खाते हैं। हम मुसलमान हैं, पाकिस्तान जाना चाहते हैं। और…’’

‘‘और टिकट?’’

‘‘और मामूली ट्रेन में क्यों नहीं जाती?’’

अमिना ने कहा, ‘‘मुसीबत के वक्त मदद न करे, तो कम से कम और तो न सताएँ! हमें स्पेशल ट्रेन से क्या मतलब? – हम तो यहाँ से जाना चाहते हैं जैसे भी हो। इस्लाम में तो सब बराबर हैं। इतना ग़रूर – या अल्लाह!’’

‘‘अच्छा, रहने दे। बराबरी करने चली है। मेरी जूतियों की बराबरी की है तैने?’’

किवाड़ की एक तरफ का हैंडल पकड़कर जमीला चढ़ी कि भीतर से हाथ डाल कर चिकटनी खोले, दूसरी तरफ़ का हैंडल पकड़कर अमजद मियाँ चढ़े कि उसे ठेल दें। जिधर जमीला थी, उधर ही सकीना ने भी हैंडल पकड़ा था।

भीतर से आवाज़ आयी, ‘‘खबरदार हाथ बढ़ाया तो बेशर्मो! हया-शर्म छू नहीं गयी इन निगोड़ियों को…

सकीना ने तड़पकर कहा, ‘‘कुछ तो खुदा का खौफ़ करो! हम ग़रीब सही, पर कोई गुनाह तो नहीं किया…’’

‘‘बड़ी पाक़-दामन बनती हो! अरे, हिन्दुओं के बीच में रहीं, और अब उनके बीच से भागकर जा रही हो, आखिर कैसे? उन्होंने क्या यों ही छोड़ दिया होगा? सौ-सौ हिन्दुओं से ऐसी-तैसी कराके पल्ला झाड़ के चली आयी पाक़दामानी का दम भरने…’’

जमीला ने हैंडल ऐसे छोड़ दिया मानो गरम लोहा हो! सकीना से बोली, ‘‘छोड़ो बहिन, हटो पीछे यहाँ से!’’

सकीना ने उतरकर माथा पकड़कर कहा, ‘‘या अल्लाह!’’

गाड़ी चल दी। अमजद मियाँ लपककर अपने डिब्बे में चढ़ गये।

जमीला थोड़ी देर सन्न-सी खड़ी रही। फिर उसने कुछ बोलना चाहा, आवाज़ न निकली। तब उसने ओंठ गोल करके ट्रेन की ओर कहा, ‘‘थूः!’’ और क्षण-भर बाद फिर, ‘‘थूः!’’

आमिना ने बड़ी लम्बी साँस लेकर कहा, ‘‘गयी पाकिस्तान स्पेशल। या परवरदिगार!’’

(इलाहाबाद, 1947)

मई 23, 2013

अमिताभ बच्चन का हिंदी प्रेम : असली नकली?

Amitabhलगता है भारत में लोगों के जीवन में वाकई बोरियत आ गयी है या कि भीषण गर्मी का असर है| जनता का एक तबका इसी बात पर न्यौछावर हुआ जा रहा है कि श्री अमिताभ बच्चन ने कान फेस्टीवल में हिंदी में अपना भाषण/संबोधन बोला/पढ़ा? अमिताभ बच्चन इलाहाबद में जन्मे, पिता उनके हिंदी के लेखक, और वे पढ़ाते भले ही अंगरेजी रहे हों, पर जीवन में सम्मान और उच्च पद उन्हें हिंदी की बदौलत ही प्राप्त हुए| प्रो. ड़ा हरिवंश राय बच्चन के पास इतना धन तो था हे कि वे अपने दो बेटों को शेरवुड जैसे पब्लिक स्कूल में पढवा पाए और उन्हें अंग्रेजी में भी पारंगत करवा दिया| अमिताभ को भी सारी धन-संपदा, मान- सम्मान हिंदी फिल्मों में काम करने से ही प्राप्त हुआ है पर वह वक्त बहुत पुराना नहीं हुआ है जब इस बात की चर्चा की जाती थी कि अमिताभ अंग्रेजी बहुत अच्छी बोलते हैं| यह समझ से परे है कि अमिताभ के कान में हिंदी बोलने पर इतना बवाल क्यों? अमिताभ ऐसे हिंदी प्रेमी भे नहीं हैं| अगर होते तो अस्सी के दशक में जब उन्होंने बिलियर्ड चैम्पियनशिप में (शायद गीत सेठी जिस साल चैम्पियन बने उस साल) हिंदी में बोलते, या जब कि बम्बई में उन्हें सीए एसोसियेशन ने बुलाया मुख्य अतिथि के तौर पर तब वे हिंदी में बोलते (बोफोर्स तब चल ही रहा था, और एक सज्जन की टिप्पणी छपी थी कि- अंग्रेजी में कितना जबरदस्त बोलता है यह आदमी, बेचारे को गलत फंसा दिया)| अस्सी और नब्बे के दशक के ज्यादातर पुराने कार्यक्रमों में अमिताभ अंग्रेजी में ही बोलते दिखाई देंगे| क्यों? क्या इसलिए कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर कलाकार हिंदी में ही बोलते थे उस समय और अमिताभ को अलग दिखना था, एक अलग कुलीन छवि बनाए रखनी थी? नब्बे के दशक में जब अमिताभ ने फिल्मों से अस्थायी अवकाश ले लिया था तब पत्र-पत्रिकाओं में उनके एक अंग्रेजी साक्षात्कार के बड़ी चर्चा थी क्योंकि उसमें उन्होंने अंग्रेजी डिक्शनरी में उपस्थित (उस वक्त) सबसे बड़ा शब्द- Floccinaucinihilipilification, प्रयुक्त किया था| उस वक्त अमिताभ के चर्चे ऐसे अभिनेता के रूप में ही थे जो हिंदी फिल्मों का बड़ा सितारा है और जो बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलता है|
नब्बे के दशक में जब हिंदी भाषी अभिनेताओं के अंग्रेजीदां पुत्र नायक बन हिंदी फिल्मों पर छ गये और पिछले बीस-पच्चीस सालों में ज्यादातर अभिनेता और अभिनेत्रियां अंग्रेजी ही बोलने, लिखने और पढ़ने वाले हो गये तो अमिताभ के हिंदी की चर्चा भी जोर पकड़ने लगी| क्या अब हिंदी पर उनका इतना जोर व्यवसायिक कारणों से नहीं है? अमिताभ के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिंदी में बोलने के ग्राफ का संबंध उनके जीवन में आर्थिक पतन (ऐ.बी.सी.एल के डूबने) और फिर के.बी.सी के कारण उत्थान से भी जोड़ा जा सकता है| के.बी.सी में जन-साधारण से हिंदी के कारण बार्तालाप से बढ़ी उनकी प्रसिद्धि का बहुत बड़ा हाथ है उनके हिंदी प्रेम के पीछे|

अगर वे इतने हिंदी प्रेमी होते तो उनके बेटे – अभिषेक और बेटी-श्वेता, हिंदी में तंग हाथ वाले न होते| अमिताभ के हिंदी प्रेम को हार पहनाकर उस दिन सम्मान देना उचित न होगा जिस दिन अभिषेक बच्चन बिना तैयारी के मौके पर ही धाराप्रवाह सही हिंदी में पांच मिनट बोल लें? क्या अमिताभ की जिम्मेवारी इतना कहने भर से खत्म हो जाती है कि वे तो अभिषेक से खूब कहते हैं कि हिंदी पर पकड़ मजबूत बनाओ – (कई सालों से अभिषेक कोशिश भी कर रहे हैं, और तरक्की भी की है उन्होंने)| पर इसके मूल में भी यही बात है कि अभिषेक को हिंदी फिल्मों में काम करके जीविकोपार्जन करना है इसलिए अमिताभ को इस बात कि चिंता है कि अभिषेक को सही हिंदी सीखनी चाहिए जिससे वह अपने साथी कलाकारों से आगे रह सके| अगर अमिताभ को हिंदी की चिंता होती तो वे बचपन से इस बात पर ध्यान देते (जैसे उनके पिता ने उन पर दिया होगा)| अभिनय को क्यों इतना तूल दिया जा रहा है? ज्यादातर दुनिया के सभी अभिनेता वैश्विक आयोजनों में अपनी भाषा में ही बोलते हैं| अमिताभ ने हिंदी में बोल दिया तो क्या गजब कर दिया| क्या हिन्दुस्तानी वेशभूषा भे उन्होंने पहनी अपना भाषण देते हुए?

वास्तव में पहले उन्होंने नफीस अंग्रेजी में अपनी बात कही और फिर हिन्दुस्तानियों के लिए वही बात हिंदी में भी बोली| या सारा मामला पी.आर गतिविधियों का है?


 

मई 21, 2013

मेरे गीत नहीं पाओगे

गीतों में ही रहा करोगे

शब्द-शब्द में बहा करोगे

मुझे तलाशोगे उनमें तुम

फिर भी मीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

तुमसे मैंने कब कुछ माँगा

फिर क्यों तोड़ दिया यह धागा

खोज खोज कर थक जाओगे

ऐसी प्रीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

तुम्हे एक संसार मिला है

और बहुत-सा प्यार मिला है

फिर भी ज़रा सोच कर देखो

यह मनमीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

भीतर-बाहर कितना रो लो

या फिर पारा-पारा हो लो

साँसों ने जो तुम्हे सुनाया

वह संगीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

{कृष्ण बिहारी}

मई 17, 2013

अस्पताल वहीं बनाएंगे

मैंने जन्म लिया था

एक आयुर्वेदिक अस्पताल में

मगर अब उसी इमारत की

नींव पर खड़ा है एक

एलोपेथिक अस्पताल

मेरा तो कर्तव्य है

कि मुझे गिराना है

वह एलोपेथिक अस्पताल

और खड़ा करना है

वही आयुर्वेदिक अस्पताल

हालांकि मुझे मालूम है

एलोपेथिक हो या आयुर्वेदिक

अस्पतालों का मकसद एक है

अस्वस्थ को स्वस्थ करना

पर सवाल तो है जन्म स्थल का

और हमारी भावनाओं का

एक सुझाव आया है

थोड़ा हटकर बना लूं

अपना आयुवेदिक अस्पताल

पर कैसे मान लूँ इसे

सुनना पड़ जाएगा ताना

कि देखो , इसका खून

खून नहीं, पानी है

अब पूछते हैं लोग

सबूत है जन्मस्थल का?

प्रमाण है कोई?

मेरा तो जवाब है

सीधा सच्चा, किन्तु करारा

सबूत तो बैसाखी है

अदालत की, कानून की

यहाँ तो प्रश्न है

आस्था का, भावना का

मेरा तो धर्म है

वहाँ फिर खड़ा करना

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

बुद्धिजीवी समझाते हैं

मुझे क्या मिलेगा

एक अस्पताल गिरा कर

दूसरा अस्पताल बनाने में

पर मैं क्यों अपनाऊं

तुष्टीकरण की नीति

मेरा प्रथम कर्तव्य है

आयुर्वेदिक अस्पताल बनाना

इतिहास की भूल मानकर

कैसे खड़ा रहने दूँ

एलोपेथिक अस्पताल

गलती, गलती है फिर वह

साढ़े चार वर्ष पहले हुई

या साढ़े चार सौ वर्ष पहले

मैं तो अडिग हूँ

अपने पथ पर

भले ही मरीजों की

संख्या बढ़ जाए

दुख बढ़ जाएँ

दर्द बढ़ जाएँ

लाशें बढ़ जाएँ

निरोगी रोगी हो जाएँ

क्योंकि इनसे बड़ा सवाल है

जन्म स्थल का

आयुर्वेदिक अस्पताल का

मैं अपील करता हूँ

आयुर्वेदिक अस्पताल में

जन्मे हरेक व्यक्ति से

कि गर्व से कहो

हमें बनाना है

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

आयुर्वेदिक अस्पताल

(अमिताभ बेहार)

मई 13, 2013

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं

हाँ वे मुसलमान थे

हम जैसे इंसान थे

लेकिन उनके सीनों में कुरआन था

और हाथों में तलवार

यकीनन वे पुकारते होंगे

हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

हिंद के वासियों को

वे हिन्दू ही कह सकते थे|

और हिंद के वासी

यानी बड़े नाम वाली नामवर जाति

बाएं बाजू की ताकत से बेखबर

दायें हाथ में तराजू लिए

अपना नफ़ा नुकसान तोल रही थी|

निम्न, अछूत, अनार्य इंधन पर

खौल रहा था

ब्राह्मणवाद का कढ़ाहा

और तली जा रही थीं

सत्ता और सुविधा की पूडियां |

पूडियां खाने के शौकीन

ब्राह्मण

उन्हें मलेच्छ कह सकते थे

पूडियां खाने का शौक और बनाने का फन

उन्हें निर्यात नहीं हुआ था

लेकिन

उनके दिलों में सफाई थी

वे ईमान की ताजगी लेकर निकले थे

तभी तो

दश्त क्या चीज है

दरिया भी उन्होंने नहीं छोड़े

जहां चाहा उतार दिए अपने घोड़े

हमलावर तो हमलावर होते हैं

घर लूटा और चलते बने

जैसे अंग्रेज आए और निकल भागे

वे कैसे हमलावर थे?

लूटने आए और लुटने वालों के होकर रह गये

सिर्फ तलवार के नहीं

वे विचार के धनी भी थे

जैसे ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

हाँ! वे मुसलमान थे

ठीक कहते हो

वे आसमान से नहीं उतरे थे

लेकिन आसमानी धूप लेकर आए थे

वे मसावात-मसावात चिल्लाते आए थे

नया इन्कलाब लाए थे

वे यकीनन यहीं कहीं दूर से आए थे

और आर्यों की तरह आए थे

फर्क बस इतना था

आर्यों ने खदेड़ा था अनार्यों को

विंध्याचल के उस पार तक

जो शेष रह गये थे वे सेवक बनाए गए

अर्थात भंगी, चमार, नाई, धोबी, वगैरह-वगैरह

लेकिन वे मुसलमान थे

अहले-कुरआन थे

उन्होंने मुसलमान बनाए

अपनी इबादतगाहों में ले आए|

भंगी जब सैयद के साथ मस्जिद में बैठा होगा

ज़रा सोचकर देखो कि क्या सोचा होगा?

तुम कहते हो कि वे मुसलमान थे

वे दरहकीकत मुसलमान हैं

इतिहास के गलियारों में,

अतीत के बाजारों में,

ताकने-झाँकने से फायदा?

वे मुसलमान हैं

और हमारी तरह वर्तमान हैं

वे समस्याग्रस्त इंसान हैं

उन्हें अतीत में जीवित रखने की ख्वाहिश

जख्मों पर नमक लगाकर जगाने की काविश

जागृति नहीं खून के आंसू लाएगी

नंगे सच को

लफ्जों का लिबास देने से क्या होगा

सच को सच की तरह सुना जाए

तो सुनो-

मुसलमान न होते तो

कबीलों, वर्णों, तबकों, और जातियों के जंगल में

घृणावाद की आग लगी होती

जंगल जल चुका होता

फिर आरक्षण की धूप में किसे सेकते

आरक्षण का विरोध कौन करता

जनतंत्र की मैना कहाँ चहचहाती

समता, संतुलन, समाज सुधार शब्दकोश में धरे रहते

ईंट-पत्थर की इमारत कोई भी बना सकता है

शहर बसते ही रहते हैं

वे न होते तो बहुत कुछ न होता

या कुछ न कुछ होता

वे हैं तो दिक्कत क्या है?

वे मुसलमान हैं

वे रथ या घोड़े पर सवार आतंक नहीं हैं

वे राम से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

राम नाम के सौदागरों से

वे मार्क्स से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

मार्क्स के नाफहम अनुयायियों से

वे वाकई नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

हुक्मे-इलाही में मिलावट करने वाले मुल्लाओं से

वे तैरना जानते हैं लेकिन

नदी किनारे बैठने को विवश हैं

उनके सिर्फ रिश्तेदार पाकिस्तान में हैं

आडवाणी जैसों को टटोलिए

जन्मभूमि का महत्व क्या है

अयोध्या से अधिक वे कराची में जीते हैं

हाँ! वे मुसलमान हैं

दो सौ बरस तक अंग्रेजों से लड़ते रहे

उन्होंने पाकिस्तान बनाया

वे पाकिस्तान के खिलाफ जंग में शहीद हुए

वे मुसलमान हैं

उनके पुरखों की हड्डियां दफ़न हैं यहीं

वे कहीं से नहीं आए

वे कहीं नहीं गए

वे कहीं नहीं जायेंगे

वे पाकिस्तान समेत फिर आयेंगे

क्योंकि वे मुसलमान हैं

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं |

(चन्द्रभान ‘खयाल’)

मई 10, 2013

मोहम्मद युसूफ खान : दिलीप कुमार क्यों बने?

Dilip_Kumarजनाब युसूफ खानउर्फ दिलीप कुमार साहब के साथ यह बड़ी विवादास्पद बात नहीं है कि वे  हाजी मस्तान, अब- मरहूम-पर-कभी बम्बई  में अपराध जगत के सरगना, के साथ बैठ कई आयोजनों में शिरकत कर चुके हैं, उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात के फोटो खिंचवा चुके हैं, या उसके दिखावटी समाजसेवी काम में उसकी मदद कर चुके हैं, (फोटो तो हाजी मस्तान के साथ उनके समकालीन और अभिनेताओं के भी हैं), या कि उन्होंने एक पत्नी-सायरा बानू, के रहते दूसरा निकाह ‘आस्मा बेगम‘ से कर लिया था, दूसरे कर्म के लिए तो सायरा बानू से भी उनकी सुलह हो ही गयी, और पहले कर्म की याद बहुत लोगों को है नहीं और तब से तो उनको ढेर सारे पुरस्कार मिल चुके हैं अतः सरकारों के लिए भी स्मगलर के साथ उनके फोटो की बात कोई ज्यादा मायने नहीं रखती होगी| ये दोनों ही गौण कारण है और भुलाए जा सकते हैं छोटी गलतियों के तौर पर|

DKHaji

उनका सबसे बड़ा गुनाह कुछ अलग किस्म का है| हालांकि वह उन्होंने  तब किया जब उनकी उम्र युवावस्था की दहलीज बस लांघ कर ही कुलांचे भरने लगी थी पर तब भी वह एक ऐसी गलती है जिसका खामियाजा हिन्दुस्तान को पिछले सात दशकों से भुगतना पड़ रहा है और न जाने आने वाले कितने दशकों तक शातिर दिमाग वाले फिरकापरस्त लोग उसका दुरूपयोग देश के खिलाफ एक हथियार के रूप में करते रहेंगे| शातिरों से अलग हटें तो मूर्ख किस्म के लोग भी उसे नासमझी में उपयोग में ले लेते हैं और बात को ऐसे बढ़ावा देते हैं जैसे बस सत्य वही हो जो वे जानते हैं|

DK Asma
ठीक है कि उनको फिल्मों में काम करना था, और संयोगपूर्ण गलती से उनका असली नाम ‘मोहम्मद युसूफ खान‘ काफी लंबा नाम था फिल्मों के लिहाज से,  पर, देविका रानी ने तो, भगवती चरण वर्मा की मार्फ़त उनको सुझाए थे कई नाम (वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार एवं कुछ अन्य विकल्प) और फैसला भी उनके ऊपर ही छोड़ दिया था कि किसी एक नाम का चुनाव कर लो|

फिर उन्हें किस किस्म के जीव ने काटा था, या किस हिन्दू जादूगर ने उन पर जादू कर रखा था कि उन्होंने ‘दिलीप कुमार‘ नाम छाँट लिया जो कि एक हिन्दू नाम है?

चलिए उन्होंने दिलीप कुमार नाम चुन भी लिया, पर ऐसा खतरनाक मिथक क्यों पनपने दिया कि उन्होंने दिलीप कुमार नाम इसलिए रखा कि एक मुसलमान कलाकार के लिए घनघोर रूप से साम्प्राद्यिक  (हिंदू बहुल) देश- भारत में जगह बनाना असंभव होता?

वे ‘जहाँगीर‘ नाम भी तो चुन सकते थे, उनके मुसलमान सम्प्रदाय में जन्म लेने के कारण वो ज्यादा ज़ेब देता उनके  व्यक्तित्व पर| उन जैसा जहीन फनकार किसी भी नाम से फ़िल्में करता ऐसे ही शोहरत पाता|

पर उनके द्वारा “दिलीप कुमार” नाम चुनने के पीछे साम्प्रदायिक भाव होने के मिथक को गढ़ने वाले  फिरकापरस्तों को एक हथियार मिल गया – कि चूँकि उस समय हिन्दू -मुसलमान संप्रदायों में तनाव था सो मुसलमान नाम रखना किसी नये फ़िल्मी कलाकार के लिए लाभदायक नहीं होता| पहले से परेशानियों से घिरे हिन्दुस्तान की परेशानियों में और इजाफा इस मुद्दे से हो जाता है|

चूँकि  यह मुद्दा ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी उस बैठक  के समय से आज तक हिन्दुस्तान के खिलाफ उपयोग में लाया जाता रहा है पर कभी ऐसा पढ़ने, सुनने और देखने में नहीं आया कि उन्होंने इस आरोप का खंडन सार्वजनिक तौर पर किया हो, जबकि उनका एक बयान ऐसी अलगाववादी ताकतों, जो देश में सदा ही हिन्दू मुसलमानों के बीच दरार बढाने में लगे रहते हैं, के कुत्सित प्रयासों पर लगाम लगाने में सहायक सिद्ध होता| पर उन्होंने ऐसा किया नहीं| आशा है कि शीघ्र प्रकाशित होने वाली आत्मकथा में वे इस मुद्दे को हमेशा के लिए दफ़न कर देंगे| पर अगर ऐसा नहीं करते तो कुछ बातों का खुलासा उनकी मार्फ़त ही हो जाए तो अच्छा है| उनके हिंदू सिनेमाई नाम के पीछे सांप्रदायिक तत्व ढूँढने वाले अलगावादी लोग इन बातों के उत्तर खोज लें तो अच्छा हो-

– उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा‘ आयी सन 1944 में, मतलब यह ठहरता है कि  ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी मुलाक़ात कम से कम एक बरस पूर्व 1943 में तो हुयी ही होगी| और सन बयालीस का भारत छोडो आन्दोलन शुरू हो हे चुका था पर पाकिस्तान तो न बना था कि उनके मुसलमान नाम से जगत को समस्या होने लगती और होती तो खुर्शीद कैसे उसी दौरान चर्चित गायिका-अभिनेत्री बन गयीं? उसी के कुछ समय पश्चात मुस्लिम सुरैया को किसने इतना बड़ा स्टार बना दिया?

– एक मुसलमान निर्देशक महबूब खान की ‘रोटी‘ भी सन बयालीस में आ गयी थी, जिसमें शेख मुख्तार, अख्तरी बाई फैजाबादी (बेगम अख्तर), और अशरफ खान तीन महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे और गीत लिखे थे ड़ा. सफ़दर आह ने, और फिल्म उस साल की उन फिल्मों में से एक थी जिन्होने चोटी की सफलता प्राप्त की| ये कैसे हो गया अगर माहौल मुस्लिम कलाकार विरोधी था?

कमाल अमरोही कैसे सफल निर्देशक बन गये उसी दौरान या कुछ बाद में?

नर्गिस ने कौन सा मेकअप किया कि उनकी मुस्लिम पहचान उनके बड़ा स्टार बनने की राह का रोड़ा न बनी?

वहीदा रहमान ने भी ऐसा क्या रूप धरा कि लोग उन्हें एक बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर बेइंतहा आदर देने लगे?

साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, और मजरूह सुल्नानपुरी आदि को तो नाम बदलने की जरुरत न पडी|

– और नौशाद? उन्हें क्यों दरकिनार करा जाये, उन्होंने तो दिलीप कुमार के फिल्मों में आने से पहले ही वहाँ अपने झंडे फहरा दिए थे| किसने उन्हें हर दिल अजीज़ संगीत निर्देशक बनाया?

मोहम्मद रफ़ी कैसे अपने मुस्लिम नाम के साथ भारत के सबसे बड़े गायकों में से एक बन गये?

तलत महमूद की मखमली आवाज को बुलंदियों की शोहरत क्या मुसलमानी नाम छोड़ कर मिली?

के. आसिफ की मुग़ल-ऐ-आज़म कैसे कालजयी फिल्म बन गयी?

– उनके बाद फिरोज खान, संजय खान, और अमजद खान आदि को क्यों नहीं जरुरत पडी नाम बदलने की? इन्हें कैसे सफलता मिल गयी?

– अगर ये सब और इनके जैसे और बहुत सारे मुस्लिम अपने मुस्लिम नाम के साथ ही स्टार बन गये तो उनके ही मुस्लिमपने में ऐसे क्या सींग लगे थे कि हिन्दुस्तान उनके नाम से भड़क जाता और वे स्टार न बन पाते?

मुद्दे की बात यह कि अगर उन्होंने खुद ही एक हिन्दू नाम अपने सिनेमाई काम के लिए चुना तो वे यह बात डंके की चोट पर दुनिया से कहते क्यों नहीं? और अगर उन को को इसके लिए विवश किया गया तो वे विवश हुए क्यों? और अगर हुए तो अपनी व्यक्तिगत कमजोरी को स्वीकार करना चाहिए| कितने ही उदाहरण उनसे पहले भी थे और उनके सिनेमा में पदार्पण के बाद भी हुए जहां मुस्लिम कलाकारों ने अपने वास्तविक नाम के साथ सफलता पायी|

भारतीय समाज में हिन्दू मुसलमान के बीच खाई जैसी राम मंदिर -बाबरी मस्जिद ढाँचे के टूटने और उसके बाद के दंगों के बाद बनी है ऐसी तो पिछले सात दशकों में कभी नहीं थी पर अभी भी हिन्दी फिल्म उधोग के तीन-चार सबसे बड़े और सफल सितारे – आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, सैफ अली खान, अपने वास्तविक मुस्लिम नामों के साथ ही यह सब कुछ नाम, शौहरत, सफलता और धन सम्पदा पा चुके हैं| उन्हें तो कोई अड़चन न आयी इतने खतरनाक ध्रुवीकरण वाले समय में बड़ा स्टार बनने में| तो युसूफ खान को ही क्या समस्या आनी थी?

मूल प्रश्न यह रहेगा ही कि जनाब युसूफ खान आप दिलीप कुमार क्यों बने?

अगर खाली फ़िल्मी कारणों से बने, (नाम बहुत लंबा था और बहुत सारे अभिनेता ऐसा करते रहे थे सो उन्होंने भी एक आकर्षक नाम छाँट लिया अपने लिए, और इसमें किसी किस्म की साम्प्रद्यिकता की कोई भूमिका न थी) तो भी, और अगर उनके ऊपर साम्प्रदायिक तनाव का दबाव था तब भी उनको स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए|

आशा है देश की इस उलझन का निवारण वे समय रहते कर जायेंगे और इस मुहीम पर जो उनको ढाल बनाकर भारत के खिलाफ चलाई जाती है उस पर वे अंकुश लगाएंगे|

यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि उनको उन श्रेष्ठ्तमों में भी श्रेष्ठ बहुमत मानता रहा है, उन्हें जो इज्जत इस देश में प्रदान की गयी है वह बिरले लोग ही कमा पाए गये हैं, अतः यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी बनाती है कि ऐसे विवादास्पद मुद्दे के गलत पहलुओं को हमेशा के लिए दफ़न कर दें, अपना स्पष्टीकरण देकर|

हीं भी यह जिक्र नहीं है कि साम्प्रदायक कारणों से उन्हें दिलीप कुमार- एक हिंदू नाम धारण करना पड़ा|

मई 9, 2013

यशोदा

तुझे मैं सुला लूंगी

अपनी छाती के कंटीले वन में ,

उलझे बालों को तेरे

संवार दूंगी,

रेगिस्तानों की हवा से

पहना दूंगी तुझे

समुद्र और पूरा आसमान

कहलने को दूंगी तुझे

निर्वासितों को उसाँसें|

चले जायेंगे हम दोनों

एक रोग-शून्य जगह,

जहां बच्चे खेलते होंगे

अस्पताल के खाली कमरों में

जहां मेरा भाग्यफल

अलग होगा और

तेरा भाग्यफल होगाहर रोज बंधा

मेरे आँचल से|

यहाँ तेरी ढूंढाई होती है

आंसुओं और आसक्ति भरी धुंध में,

तू तो बैठा मुस्कुरा रहा है

इतनी बड़ी लहर पर

कोई देख नहीं पाता,

रोते-रोते सूज जाता है मुंह

सभी देखते हैं

केवल गाय के झुण्ड को लौटते

उसके पीछे एक शून्य स्थान|

में तुझे देखती हूँ साफ़-साफ़

आग-सा दीखता है लप-लप

मेरे पागलपन का अति मनोरम स्वप्न

रात भर दिन भर दिखता रहे

तू तो एक नीलकंठ है

बैठा है मैदान के पेड़ पर

कोटि कोटि हैं रूप तेरे,

एक से बढ़कर एक सुंदरता में|

यहाँ के लिए कोई रास्ता-घाट नहीं,

फिर भी मैं कैसे आई यहाँ?

यहाँ पृथ्वी के सारे लोग, सारे पशु-पक्षी

मेरे और तेरे अंदर हैं ,

सारी नदियाँ, पेड़ और पर्वत

बन गये केवल एक नदी, पेड़ पर्वत

विश्राम कर रही हूँ मैं उस पेड़ तले

तुझे चिपकाए अपनी गीली छाती से

गा रही हूँ गीत तेरे लिए,

पर नहीं जानती

वह गीत सुनाई दे रहा है मेरे स्वर से या

मेरे बेटे के स्वर से|

(रमाकांत रथ)

अनुवाद – राधेश्याम मिश्र

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