Posts tagged ‘Aanchal’

दिसम्बर 3, 2013

बंद का समय

सूखी पत्तियों की फिसलन भरी डगर के पारblueumb-002

हरियाली के आँचल में

झुरमुटों के पास से

शाम का धुआँ निकल रहा है

कोई माँ, खाना बना रही है

छौनों के घर लौटने का समय हो गया है|

सड़क के किनारे बनीं छोटी-छोटी फड़ें

बाहर सजा सामान अब समेटा जा रहा है

मैले से सफ़ेद कुर्ते-पाजामे में

कैद छुटा बच्चा

पिता को सामान पकड़ा रहा है

दुकान को बंद करने का समय हो गया है|

Yugalsign1

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नवम्बर 28, 2013

तुमने मुझे पुकारा जब था…

आँचल दांतों में दबाकर suhasini-002

पलकें थोड़ी सी झुकाकर

तुमने मुझे निहारा जब था,

धरती सारी घूम गई थी

आखें, आँखें चूम गई थीं…

कंघी बालों में चलाकर

साँसें कंधे पर टिकाकर

तुमने दिया सहारा जब था,

किस्मत मेरी झूम गई थी

आखें, आँखें चूम गई थीं…

खुद को दुल्हन सा सजा कर

साथी मन ही मन लजाकर

तुमने मुझे पुकारा जब था,

आखें, आँखें चूम गई थीं

आखें, आँखें चूम गई थीं…

(कृष्ण बिहारी)

 

मई 9, 2013

यशोदा

तुझे मैं सुला लूंगी

अपनी छाती के कंटीले वन में ,

उलझे बालों को तेरे

संवार दूंगी,

रेगिस्तानों की हवा से

पहना दूंगी तुझे

समुद्र और पूरा आसमान

कहलने को दूंगी तुझे

निर्वासितों को उसाँसें|

चले जायेंगे हम दोनों

एक रोग-शून्य जगह,

जहां बच्चे खेलते होंगे

अस्पताल के खाली कमरों में

जहां मेरा भाग्यफल

अलग होगा और

तेरा भाग्यफल होगाहर रोज बंधा

मेरे आँचल से|

यहाँ तेरी ढूंढाई होती है

आंसुओं और आसक्ति भरी धुंध में,

तू तो बैठा मुस्कुरा रहा है

इतनी बड़ी लहर पर

कोई देख नहीं पाता,

रोते-रोते सूज जाता है मुंह

सभी देखते हैं

केवल गाय के झुण्ड को लौटते

उसके पीछे एक शून्य स्थान|

में तुझे देखती हूँ साफ़-साफ़

आग-सा दीखता है लप-लप

मेरे पागलपन का अति मनोरम स्वप्न

रात भर दिन भर दिखता रहे

तू तो एक नीलकंठ है

बैठा है मैदान के पेड़ पर

कोटि कोटि हैं रूप तेरे,

एक से बढ़कर एक सुंदरता में|

यहाँ के लिए कोई रास्ता-घाट नहीं,

फिर भी मैं कैसे आई यहाँ?

यहाँ पृथ्वी के सारे लोग, सारे पशु-पक्षी

मेरे और तेरे अंदर हैं ,

सारी नदियाँ, पेड़ और पर्वत

बन गये केवल एक नदी, पेड़ पर्वत

विश्राम कर रही हूँ मैं उस पेड़ तले

तुझे चिपकाए अपनी गीली छाती से

गा रही हूँ गीत तेरे लिए,

पर नहीं जानती

वह गीत सुनाई दे रहा है मेरे स्वर से या

मेरे बेटे के स्वर से|

(रमाकांत रथ)

अनुवाद – राधेश्याम मिश्र

फ़रवरी 17, 2013

सारा सावन पिघल न जाए

वही कहानी मत दुहराओ

मेरा मन हो विकल न जाए

भावुकता की बात और है

प्रीत निभाना बहुत कठिन है

यौवन का उन्माद और है

जनम बिताना बहुत कठिन है

आँचल फिर तुम मत लहराओ

पागल मन है मचल न जाए

दर्पण जैसा था मन मेरा

जिसमें तुमने रूप संवारा

तुम्हे जिताने की खातिर में

जीती बाजी हरदम हारा

मेघ नयन में मत लहराओ

सारा सावन पिघल न जाए

तोड़ा तुमने ऐसे मन को

पुरवा जैसे तोड़े तन को

सोचो मौसम का क्या होगा

बादल यदि छोड़े सावन को

मन चंचल है मत ठहराओ

अमरित ही हो गरल न जाए

कदम कदम पर वंदन करके

यदि में तुमको जीत न पाया

कमी रही होगी कुछ मुझमे

जो तुमने संगीत न पाया

तान मगर अब मत गहराओ

जीवन हो फिर तरल न जाए

{कृष्ण बिहारी}

अक्टूबर 13, 2011

मुक्त हो अर्थहीन काया

कभी आँखों से गिरे होंगे अश्रु
पानी की बहती बूंदे थाम लेने के वास्ते
तब, एक रेशमी आँचल था।

आसान था धूप का सफर भी
घनेरी जुल्फ के साये में
जिंदगी सुस्ता लेती थी।

फिर चल पड़ता था आशाओं का कारवां
मरीचिकाएं भी उन दिनो
मंजिलों के निशान हुआ करती थीं
हर प्यास का इलाज थे
अमृत भरे होठ किसी के।

समय के घने कोहरे पीछे
छिप गए सायों का ज़िक्र ही क्या?
खुद अपना अस्तित्व तक
बेबसी के अँधकार के पास गिरवी है
ना राह, ना सफर, ना मंजिल की आरजू
बस सोचता है शून्य सा दिमाग
किसी तरह साँसों का क़र्ज़ कटे
किसी तरह हाड-माँस की केद से
मुक्त हो अर्थहीन काया

(रफत आलम)

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