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नवम्बर 24, 2013

अंतस के परिजन: एक डॉक्टर की डायरी

antasमनुष्य जीवित है तो उसका साथ शारीरिक और मानसिक कष्टों और रोगों से होता ही रहेगा और ऐसी परिस्थितियों में चिकित्सिक से दूरी तो रह नहीं सकती| किसी भी विधा में अभ्यास करता हो चिकित्सिक, चाहे वह वैध हो, हकीम हो, एलोपेथिक डॉक्टर हो या होमियोपैथी से इलाज करता हो, वह हर काल में समाज का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है|

जीने से मनुष्य का अगाध मोह है और एक ही नहीं हजारों भगवद गीता रच दी जाएँ, सामूहिक स्तर पर  मनुष्य जीवन से इस मोह को मिटाना संभव नहीं है और लाखों-करोड़ों में से कोई एक ही जीवन और शरीर के मोह से ऊपर उठ पाता है| जीने के प्रति इस गहरे भाव के कारण ही मनुष्य के लिए चिकित्सक ईश्वर का ही प्रतिनिधित्व करता है| वही है जो उसे मौत के मुँह में से भी खींच लाता है और उसकी काया से रोगों को दूर भगाने में उसकी सहायता करता है उसका पथ –प्रदर्शक बनता है| इस आदर के कारण मानव की चिकित्सिक से अपेक्षायें भी बहुत ज्यादा होती हैं| बीमारी की हालत में चिकित्सिक के वरदहस्त में पहुँचते ही रोगी को आशा बांधने लगती है कि अब शायद वह अच्छा हो जायेगा और फिर से जीवन की ओर वापस करेगा|

असल जीवन में नर्स बोलते ही मानव के मन मस्तिष्क में Florence Nightingale नाम तैरने लगता है| डा. कोटनिस एक त्यागमयी चिकित्सिक के रूप में मनुष्य को देवता स्वरूप लगते आए हैं|

साहित्य, नाटक और फ़िल्में जैसी विधाएं भी चिकित्सक के विभिन्न चरित्रों को मानव के सम्मुख प्रस्तुत करती रही हैं, उनमें से कुछ ऐसे चरित्र हैं जिनकी अच्छाइयों के कारण वे दर्शक के मनमानस में गहरे जाकर बैठ जाते हैं|

कौन भूल सकता है आनंद फिल्म के डा. भास्कर बनर्जी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपने बेहद अच्छे अभिनय से जीवंत किया था, को जो अपने पास आने वाले रोगियों को कभी भी गलत सलाह नहीं देता और चिकित्सीय पेशे की ईमानदारी उसके लिए खुद की कमाई से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उसी के साथी लोगों से छल करके धनी बनते रहते हैं वह ईमानदारी का दामन पकडे रखता है| खामोशी फिल्म की नर्स राधा (वहीदा रहमान) को क्या भुलाया जा सकता है जो अपने को नर्स होने के दायित्व के प्रति इस कदर समर्पित कर देती है कि मानसिक संतुलन खो बैठती है|

भारत जैसे विकासशील देश में तो चिकित्सक वाकई ईश्वर का ही एक रूप लगता है| लोगों की भावनाएं किस तरह चिकित्सक से जुडी रहती है इसके लिए कुछ वर्ष पूर्व प्रदर्शित हुयी हिंदी फिल्म- मुन्नाभाई एम्.बी.बी.एस, याद की जा सकती है| एक महाबली, पर सह्रदय गुंडे की भावनाओं से जनता की भावनाओं का मेल ज्यादा गहरे स्तर पर होता है न कि एक कठोर ह्रदय विशेषज्ञ डॉक्टर के अनुशासन से| धोखे से मेडिकल कालेज में प्रवेश लेकर पढ़ रहे गुंडे के वचन और दयालू कर्म जनता के अंतर्मन को भिगो देते हैं और बहुत पढ़ा लिखा, बहुत बड़ा डॉक्टर जो मेडिकल कालेज का प्रिंसिपल भी है खलनायक लगने लगता है क्योंकि उसके पास भावना नाम के चीज है ही नहीं| रोगी इंसान है ही नहीं उसके लिए|

मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह चिकित्सा के क्षेत्र में भी अच्छे और बुरे दोनों किस्म के व्यक्ति मिलते हैं पर मनुष्य की चिकित्सक पर निर्भरता कुछ इस कदर गहरी है कि चिकित्सा के क्षेत्र में हम सिर्फ और सिर्फ अच्छे मनुष्यों को ही देखना चाहते हैं| प्रेमचंद की कहानी “मंत्र” का डा. चड्ढा, घमंडी और रोगी के प्रति असंवेदनशीलता से भरा हुआ होने के कारण एक खलनायक है और जब मन्त्रों से सर्पदंश का इलाज करने वाला, डा. चड्ढा की असंवेदनशीलता और दुर्व्यवहार का शिकार होकर अपने इकलौते पुत्र को खोने वाला, बूढ़ा भगत, डा. चड्ढा के पुत्र को मौत के मुँह से निकाल लाता है और डा. चड्ढा भोर की हल्की रोशनी में बूढ़े भगत को पहचान कर शर्मिन्दा होते हैं तो जीवन में केवल अच्छे चिकित्सकों से ही मिलने की आस लगाए पाठक ही नहीं विजेता महसूस करते बल्कि पूरी मानवता जीतती हुयी प्रतीत होती है|

जीवन के अन्य क्षेत्रों की भांति भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में भी ईमानदारी और मूल्यों का बहुत बड़ी मात्रा में ह्रास हुआ है| ऐसे ऐसे किस्से मिल जाते हैं पढ़ने-देखने को जहां पैसे के लिए चिकित्सिक ने अपने व्यवसाय में उतरने से पहले ली गयी कसम को तो भुलाया ही मानवता को भी भुला दिया और अपनी आँखों के सामने मरीज को मर जाने दिया पर उसका इलाज करना शुरू न किया क्योंकि मरीज के परिवार वाले उसकी फीस भरने में असमर्थ थे| ऐसे भी मामले प्रकाश में आए हैं जहां चिकित्सिक मरीज के शरीर से अंग निकाल लिए हैं किसी और धनी मरीज को जीवनदान देने के लिए और गरीब मरीज गरीबी का शाप भोगने को विवश रहकर विकलांग जीवन जीने को भी विवश हो जाता है|

हालत ऐसी हो गयी है कि बीस-बीस साल के अनुभव के बाद भी चिकित्सक कहते पाए जा सकते हैं कि उन्होंने नई “दुकान” खोली है|

दुकान!

क्लीनिक और डिस्पेंसरी अब अनुभवी चिकित्सकों तक के लिए भी दुकान बन गये हैं|

साहित्य ने मरीजों की तरफ से लिखी गयी सामग्री प्रस्तुत की है, अगर साहित्यकार खुद मरीज बन गया है तो उसने अपने व्यक्तिगत अनुभव से अच्छा साहित्य दुनिया को दिया है| रशियन

Aleksandr Solzhenitsyn ने Cancer Ward जैसे कालजयी उपन्यास की भेंट दुनिया को दी| लेखकों ने दूर से देखे या पूर्णतया कल्पित चिकित्सक चरित्रों की रचना भी की है और उनमें से बहुत से विश्वसनीय भी लगते हैं| पर तब भी उन्होंने चरित्र के उन्ही भागों का वर्णन किया है जो उनके व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित है और उनके व्यवसाय से सतही सामग्री ही सामने आती रही है| ऐसे में ऐसा तो लगता ही है कि अगर किसी चिकित्सक में लेखकीय गुण भी हों तो उसका लेखन बेहद विश्वसनीय तरीके से इस क्षेत्र का गहराई से वर्णन कर पायेगा|

डा. भवान महाजन की स्व:अर्जित अनुभवों से सम्पन्न मराठी पुस्तक – मैत्र-जिवाचे, उस ओर एक कदम है|

अशोक बिंदल, जो अपनी तरह के एक अलग ही कला -दीवाने, कवि एवं लेखक हैं, ने मराठी मूल की पुस्तक को हिंदी में इस तरह प्रस्तुत किया है कि “अंतस के परिजन” कहीं से भी अनुवादित किताब होने का आभास नहीं देती|

मरीज, उनके नाते-रिश्तेदार, चिकित्सक का त्रिकोण रोगी और चिकित्सा के हर मामले से सम्बंधित पाया जाता है और “अंतस के परिजनतीनों प्रकार के चरित्रों को पाठक के सम्मुख लाती है|

एक उम्र होती है जब पाठक हर किस्म की पुस्तक पढ़ने के लिए लालायित रहता है क्योंकि उसमें नये से नया पढ़ने की भूख होती है और उतना पढ़ने की ऊर्जा और समय भी| उम्र के साथ पाठक चुनींदा साहित्य ही पढ़ने लग जाते हैं क्योंकि समय अन्य कामों में भी लगने लगता है, ऊर्जा में कमतरी होने लगती है| ऐसे में जब तक कोई बहुत ही किसी पुस्तक की चर्चा न करे, ऐसा संदेह रहता है कि हर पाठक हर किस्म की पुस्तक अपने आप पढ़ ही लेगा|

“अंतस के परिजन की चर्चा किसी तक न पहुंचे तो ऐसा नहीं कि पाठक दरिद्र रह जाएगा पर अगर वह इसे पढ़ ले तो जीवन में सवेदनशीलता के थोड़ा और नजदीक आएगा|

हरेक व्यक्ति कभी न कभी या तो स्वयं बीमार पड़ता है या किसी नजदीकी व्यक्ति की तीमारदारी करता है और इस नाते उसका पाला चिकित्सक से पड़ता ही पड़ता है और लगभग हरेक व्यक्ति को चिकित्सक से मुठभेड़ का कोई न कोई अनुभव जरुर ही होता है| अब यह अनुभव खट्टा भी हो सकता है, मीठा भी और कड़वा भी|

“अंतस के परिजन सब तरह के अनुभवों को समेटती है|

ये डा. भवान महाजन के चिकित्सीय जीवन के संस्मरण हैं जहां देहात के इलाकों में वे भिन्न-भिन्न किस्म के मरीजों से मिले, उनके नाते-रिश्तेदारों से मिले अलग अलग किस्म के रोगों से सीमित साधनों के बावजूद जूझे|

एक सरल, और सहज भाषा में अशोक बिंदल ने डा. महाजन के संस्मरण हिंदी में प्रस्तुत किये हैं| डा. महाजन ने न केवल मोती-माणिक सरीखे मरीजों का वर्णन किया है जिनसे मिलकर कोई भी अंदर से अच्छा महसूस करेगा बल्कि ऐसे मरीजों और उनके रिश्तेदारों का भी वर्णन किया है जो किसी भी चिकित्सक को भलमनसाहत का रास्ता छोड़ देने पर विवश कर दें| ऐसे चिकित्सक भी इस पुस्तक में हैं जो चिकित्सा के क्षेत्र की दैवीय छवि को दीमक की तरह से नष्ट कर रहे हैं और जो इस बात का लिहाज भी नहीं करते कि उनका मरीज उनके ही हमपेशा चिकित्सक का करीबी है| वे प्रेमचंद द्वारा रचित डा चड्ढा के आधुनिक अवतार ही लगते हैं, जिनके लिए उनके सुख और ऐश्वर्य मरीज के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण बन जाते हैं|

पुस्तक में शामिल संस्मरण पाठक को अंदर तक छू जाते हैं|

ऐसी पुस्तक को कम से कम छोटे परदे पर एक धारावाहिक के रूप में जरुर अवतरित होना चाहिए|

पुस्तक के बारे में अधिक जानकारी यहाँ प्राप्त की जा सकती है|

एक संस्मरण भोर को यहाँ पढ़ा जा सकता है|

अंतस के परिजन” के बारे में कुछ लेखों एवं कवियों के वचन|

गुलज़ार लिखते हैं –

अशोक बिन्दल ने कमाल किया। पढ़ कर ये नहीं लगता कि ये किसी और का अनुभव है जो वो अपनी ज़बान में बता रहे हैं।

विश्वनाथ सचदेव कहते हैं |

अनुवाद सृजन से कम महत्वपूर्ण और कम मुश्किल नहीं होता | पुस्तक पढ़कर लगता है जैसे अशोक बिंदल ने काम बड़ी आसानी से किया है | मराठी में इस पुस्तक की काफी प्रशंसा हुई है | मुझे विश्वास है हिंदी-जगत में ही वैसा ही स्नेह सम्मान मिलेगा…

बालकवि बैरागी लिखते हैं|

‘अंतस के परिजन’ मैं पढ़ गया | अच्छे संस्मरण यदि ऐसी सलिल भाषा में मिल जाएं तो मन भीग ही जाता है | डा. श्री भवान महाजन ने अशोक बिंदल के माध्यम से प्रभावित किया…

कवि नईम लिखते हैं|

अंतस के कई परिजनों ने रुला दिया | उनसे एक उनसियत हो गई जैसी डा. भवान महाजन को उनसे थी | लेखक की आत्मीयता के ये पात्र हैं बल्कि लेखक इतना आत्मीय अंतस का नहीं होता, तो इन्हें पुनर्जीवित नहीं कर सकता था| कमोबेश उसी भावावेश में हिचकोले खाते हुए अशोक ने भावानुवाद किया है…..

…[राकेश]

मई 10, 2013

मोहम्मद युसूफ खान : दिलीप कुमार क्यों बने?

Dilip_Kumarजनाब युसूफ खानउर्फ दिलीप कुमार साहब के साथ यह बड़ी विवादास्पद बात नहीं है कि वे  हाजी मस्तान, अब- मरहूम-पर-कभी बम्बई  में अपराध जगत के सरगना, के साथ बैठ कई आयोजनों में शिरकत कर चुके हैं, उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात के फोटो खिंचवा चुके हैं, या उसके दिखावटी समाजसेवी काम में उसकी मदद कर चुके हैं, (फोटो तो हाजी मस्तान के साथ उनके समकालीन और अभिनेताओं के भी हैं), या कि उन्होंने एक पत्नी-सायरा बानू, के रहते दूसरा निकाह ‘आस्मा बेगम‘ से कर लिया था, दूसरे कर्म के लिए तो सायरा बानू से भी उनकी सुलह हो ही गयी, और पहले कर्म की याद बहुत लोगों को है नहीं और तब से तो उनको ढेर सारे पुरस्कार मिल चुके हैं अतः सरकारों के लिए भी स्मगलर के साथ उनके फोटो की बात कोई ज्यादा मायने नहीं रखती होगी| ये दोनों ही गौण कारण है और भुलाए जा सकते हैं छोटी गलतियों के तौर पर|

DKHaji

उनका सबसे बड़ा गुनाह कुछ अलग किस्म का है| हालांकि वह उन्होंने  तब किया जब उनकी उम्र युवावस्था की दहलीज बस लांघ कर ही कुलांचे भरने लगी थी पर तब भी वह एक ऐसी गलती है जिसका खामियाजा हिन्दुस्तान को पिछले सात दशकों से भुगतना पड़ रहा है और न जाने आने वाले कितने दशकों तक शातिर दिमाग वाले फिरकापरस्त लोग उसका दुरूपयोग देश के खिलाफ एक हथियार के रूप में करते रहेंगे| शातिरों से अलग हटें तो मूर्ख किस्म के लोग भी उसे नासमझी में उपयोग में ले लेते हैं और बात को ऐसे बढ़ावा देते हैं जैसे बस सत्य वही हो जो वे जानते हैं|

DK Asma
ठीक है कि उनको फिल्मों में काम करना था, और संयोगपूर्ण गलती से उनका असली नाम ‘मोहम्मद युसूफ खान‘ काफी लंबा नाम था फिल्मों के लिहाज से,  पर, देविका रानी ने तो, भगवती चरण वर्मा की मार्फ़त उनको सुझाए थे कई नाम (वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार एवं कुछ अन्य विकल्प) और फैसला भी उनके ऊपर ही छोड़ दिया था कि किसी एक नाम का चुनाव कर लो|

फिर उन्हें किस किस्म के जीव ने काटा था, या किस हिन्दू जादूगर ने उन पर जादू कर रखा था कि उन्होंने ‘दिलीप कुमार‘ नाम छाँट लिया जो कि एक हिन्दू नाम है?

चलिए उन्होंने दिलीप कुमार नाम चुन भी लिया, पर ऐसा खतरनाक मिथक क्यों पनपने दिया कि उन्होंने दिलीप कुमार नाम इसलिए रखा कि एक मुसलमान कलाकार के लिए घनघोर रूप से साम्प्राद्यिक  (हिंदू बहुल) देश- भारत में जगह बनाना असंभव होता?

वे ‘जहाँगीर‘ नाम भी तो चुन सकते थे, उनके मुसलमान सम्प्रदाय में जन्म लेने के कारण वो ज्यादा ज़ेब देता उनके  व्यक्तित्व पर| उन जैसा जहीन फनकार किसी भी नाम से फ़िल्में करता ऐसे ही शोहरत पाता|

पर उनके द्वारा “दिलीप कुमार” नाम चुनने के पीछे साम्प्रदायिक भाव होने के मिथक को गढ़ने वाले  फिरकापरस्तों को एक हथियार मिल गया – कि चूँकि उस समय हिन्दू -मुसलमान संप्रदायों में तनाव था सो मुसलमान नाम रखना किसी नये फ़िल्मी कलाकार के लिए लाभदायक नहीं होता| पहले से परेशानियों से घिरे हिन्दुस्तान की परेशानियों में और इजाफा इस मुद्दे से हो जाता है|

चूँकि  यह मुद्दा ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी उस बैठक  के समय से आज तक हिन्दुस्तान के खिलाफ उपयोग में लाया जाता रहा है पर कभी ऐसा पढ़ने, सुनने और देखने में नहीं आया कि उन्होंने इस आरोप का खंडन सार्वजनिक तौर पर किया हो, जबकि उनका एक बयान ऐसी अलगाववादी ताकतों, जो देश में सदा ही हिन्दू मुसलमानों के बीच दरार बढाने में लगे रहते हैं, के कुत्सित प्रयासों पर लगाम लगाने में सहायक सिद्ध होता| पर उन्होंने ऐसा किया नहीं| आशा है कि शीघ्र प्रकाशित होने वाली आत्मकथा में वे इस मुद्दे को हमेशा के लिए दफ़न कर देंगे| पर अगर ऐसा नहीं करते तो कुछ बातों का खुलासा उनकी मार्फ़त ही हो जाए तो अच्छा है| उनके हिंदू सिनेमाई नाम के पीछे सांप्रदायिक तत्व ढूँढने वाले अलगावादी लोग इन बातों के उत्तर खोज लें तो अच्छा हो-

– उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा‘ आयी सन 1944 में, मतलब यह ठहरता है कि  ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी मुलाक़ात कम से कम एक बरस पूर्व 1943 में तो हुयी ही होगी| और सन बयालीस का भारत छोडो आन्दोलन शुरू हो हे चुका था पर पाकिस्तान तो न बना था कि उनके मुसलमान नाम से जगत को समस्या होने लगती और होती तो खुर्शीद कैसे उसी दौरान चर्चित गायिका-अभिनेत्री बन गयीं? उसी के कुछ समय पश्चात मुस्लिम सुरैया को किसने इतना बड़ा स्टार बना दिया?

– एक मुसलमान निर्देशक महबूब खान की ‘रोटी‘ भी सन बयालीस में आ गयी थी, जिसमें शेख मुख्तार, अख्तरी बाई फैजाबादी (बेगम अख्तर), और अशरफ खान तीन महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे और गीत लिखे थे ड़ा. सफ़दर आह ने, और फिल्म उस साल की उन फिल्मों में से एक थी जिन्होने चोटी की सफलता प्राप्त की| ये कैसे हो गया अगर माहौल मुस्लिम कलाकार विरोधी था?

कमाल अमरोही कैसे सफल निर्देशक बन गये उसी दौरान या कुछ बाद में?

नर्गिस ने कौन सा मेकअप किया कि उनकी मुस्लिम पहचान उनके बड़ा स्टार बनने की राह का रोड़ा न बनी?

वहीदा रहमान ने भी ऐसा क्या रूप धरा कि लोग उन्हें एक बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर बेइंतहा आदर देने लगे?

साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, और मजरूह सुल्नानपुरी आदि को तो नाम बदलने की जरुरत न पडी|

– और नौशाद? उन्हें क्यों दरकिनार करा जाये, उन्होंने तो दिलीप कुमार के फिल्मों में आने से पहले ही वहाँ अपने झंडे फहरा दिए थे| किसने उन्हें हर दिल अजीज़ संगीत निर्देशक बनाया?

मोहम्मद रफ़ी कैसे अपने मुस्लिम नाम के साथ भारत के सबसे बड़े गायकों में से एक बन गये?

तलत महमूद की मखमली आवाज को बुलंदियों की शोहरत क्या मुसलमानी नाम छोड़ कर मिली?

के. आसिफ की मुग़ल-ऐ-आज़म कैसे कालजयी फिल्म बन गयी?

– उनके बाद फिरोज खान, संजय खान, और अमजद खान आदि को क्यों नहीं जरुरत पडी नाम बदलने की? इन्हें कैसे सफलता मिल गयी?

– अगर ये सब और इनके जैसे और बहुत सारे मुस्लिम अपने मुस्लिम नाम के साथ ही स्टार बन गये तो उनके ही मुस्लिमपने में ऐसे क्या सींग लगे थे कि हिन्दुस्तान उनके नाम से भड़क जाता और वे स्टार न बन पाते?

मुद्दे की बात यह कि अगर उन्होंने खुद ही एक हिन्दू नाम अपने सिनेमाई काम के लिए चुना तो वे यह बात डंके की चोट पर दुनिया से कहते क्यों नहीं? और अगर उन को को इसके लिए विवश किया गया तो वे विवश हुए क्यों? और अगर हुए तो अपनी व्यक्तिगत कमजोरी को स्वीकार करना चाहिए| कितने ही उदाहरण उनसे पहले भी थे और उनके सिनेमा में पदार्पण के बाद भी हुए जहां मुस्लिम कलाकारों ने अपने वास्तविक नाम के साथ सफलता पायी|

भारतीय समाज में हिन्दू मुसलमान के बीच खाई जैसी राम मंदिर -बाबरी मस्जिद ढाँचे के टूटने और उसके बाद के दंगों के बाद बनी है ऐसी तो पिछले सात दशकों में कभी नहीं थी पर अभी भी हिन्दी फिल्म उधोग के तीन-चार सबसे बड़े और सफल सितारे – आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, सैफ अली खान, अपने वास्तविक मुस्लिम नामों के साथ ही यह सब कुछ नाम, शौहरत, सफलता और धन सम्पदा पा चुके हैं| उन्हें तो कोई अड़चन न आयी इतने खतरनाक ध्रुवीकरण वाले समय में बड़ा स्टार बनने में| तो युसूफ खान को ही क्या समस्या आनी थी?

मूल प्रश्न यह रहेगा ही कि जनाब युसूफ खान आप दिलीप कुमार क्यों बने?

अगर खाली फ़िल्मी कारणों से बने, (नाम बहुत लंबा था और बहुत सारे अभिनेता ऐसा करते रहे थे सो उन्होंने भी एक आकर्षक नाम छाँट लिया अपने लिए, और इसमें किसी किस्म की साम्प्रद्यिकता की कोई भूमिका न थी) तो भी, और अगर उनके ऊपर साम्प्रदायिक तनाव का दबाव था तब भी उनको स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए|

आशा है देश की इस उलझन का निवारण वे समय रहते कर जायेंगे और इस मुहीम पर जो उनको ढाल बनाकर भारत के खिलाफ चलाई जाती है उस पर वे अंकुश लगाएंगे|

यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि उनको उन श्रेष्ठ्तमों में भी श्रेष्ठ बहुमत मानता रहा है, उन्हें जो इज्जत इस देश में प्रदान की गयी है वह बिरले लोग ही कमा पाए गये हैं, अतः यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी बनाती है कि ऐसे विवादास्पद मुद्दे के गलत पहलुओं को हमेशा के लिए दफ़न कर दें, अपना स्पष्टीकरण देकर|

हीं भी यह जिक्र नहीं है कि साम्प्रदायक कारणों से उन्हें दिलीप कुमार- एक हिंदू नाम धारण करना पड़ा|

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