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मई 10, 2013

मोहम्मद युसूफ खान : दिलीप कुमार क्यों बने?

Dilip_Kumarजनाब युसूफ खानउर्फ दिलीप कुमार साहब के साथ यह बड़ी विवादास्पद बात नहीं है कि वे  हाजी मस्तान, अब- मरहूम-पर-कभी बम्बई  में अपराध जगत के सरगना, के साथ बैठ कई आयोजनों में शिरकत कर चुके हैं, उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात के फोटो खिंचवा चुके हैं, या उसके दिखावटी समाजसेवी काम में उसकी मदद कर चुके हैं, (फोटो तो हाजी मस्तान के साथ उनके समकालीन और अभिनेताओं के भी हैं), या कि उन्होंने एक पत्नी-सायरा बानू, के रहते दूसरा निकाह ‘आस्मा बेगम‘ से कर लिया था, दूसरे कर्म के लिए तो सायरा बानू से भी उनकी सुलह हो ही गयी, और पहले कर्म की याद बहुत लोगों को है नहीं और तब से तो उनको ढेर सारे पुरस्कार मिल चुके हैं अतः सरकारों के लिए भी स्मगलर के साथ उनके फोटो की बात कोई ज्यादा मायने नहीं रखती होगी| ये दोनों ही गौण कारण है और भुलाए जा सकते हैं छोटी गलतियों के तौर पर|

DKHaji

उनका सबसे बड़ा गुनाह कुछ अलग किस्म का है| हालांकि वह उन्होंने  तब किया जब उनकी उम्र युवावस्था की दहलीज बस लांघ कर ही कुलांचे भरने लगी थी पर तब भी वह एक ऐसी गलती है जिसका खामियाजा हिन्दुस्तान को पिछले सात दशकों से भुगतना पड़ रहा है और न जाने आने वाले कितने दशकों तक शातिर दिमाग वाले फिरकापरस्त लोग उसका दुरूपयोग देश के खिलाफ एक हथियार के रूप में करते रहेंगे| शातिरों से अलग हटें तो मूर्ख किस्म के लोग भी उसे नासमझी में उपयोग में ले लेते हैं और बात को ऐसे बढ़ावा देते हैं जैसे बस सत्य वही हो जो वे जानते हैं|

DK Asma
ठीक है कि उनको फिल्मों में काम करना था, और संयोगपूर्ण गलती से उनका असली नाम ‘मोहम्मद युसूफ खान‘ काफी लंबा नाम था फिल्मों के लिहाज से,  पर, देविका रानी ने तो, भगवती चरण वर्मा की मार्फ़त उनको सुझाए थे कई नाम (वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार एवं कुछ अन्य विकल्प) और फैसला भी उनके ऊपर ही छोड़ दिया था कि किसी एक नाम का चुनाव कर लो|

फिर उन्हें किस किस्म के जीव ने काटा था, या किस हिन्दू जादूगर ने उन पर जादू कर रखा था कि उन्होंने ‘दिलीप कुमार‘ नाम छाँट लिया जो कि एक हिन्दू नाम है?

चलिए उन्होंने दिलीप कुमार नाम चुन भी लिया, पर ऐसा खतरनाक मिथक क्यों पनपने दिया कि उन्होंने दिलीप कुमार नाम इसलिए रखा कि एक मुसलमान कलाकार के लिए घनघोर रूप से साम्प्राद्यिक  (हिंदू बहुल) देश- भारत में जगह बनाना असंभव होता?

वे ‘जहाँगीर‘ नाम भी तो चुन सकते थे, उनके मुसलमान सम्प्रदाय में जन्म लेने के कारण वो ज्यादा ज़ेब देता उनके  व्यक्तित्व पर| उन जैसा जहीन फनकार किसी भी नाम से फ़िल्में करता ऐसे ही शोहरत पाता|

पर उनके द्वारा “दिलीप कुमार” नाम चुनने के पीछे साम्प्रदायिक भाव होने के मिथक को गढ़ने वाले  फिरकापरस्तों को एक हथियार मिल गया – कि चूँकि उस समय हिन्दू -मुसलमान संप्रदायों में तनाव था सो मुसलमान नाम रखना किसी नये फ़िल्मी कलाकार के लिए लाभदायक नहीं होता| पहले से परेशानियों से घिरे हिन्दुस्तान की परेशानियों में और इजाफा इस मुद्दे से हो जाता है|

चूँकि  यह मुद्दा ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी उस बैठक  के समय से आज तक हिन्दुस्तान के खिलाफ उपयोग में लाया जाता रहा है पर कभी ऐसा पढ़ने, सुनने और देखने में नहीं आया कि उन्होंने इस आरोप का खंडन सार्वजनिक तौर पर किया हो, जबकि उनका एक बयान ऐसी अलगाववादी ताकतों, जो देश में सदा ही हिन्दू मुसलमानों के बीच दरार बढाने में लगे रहते हैं, के कुत्सित प्रयासों पर लगाम लगाने में सहायक सिद्ध होता| पर उन्होंने ऐसा किया नहीं| आशा है कि शीघ्र प्रकाशित होने वाली आत्मकथा में वे इस मुद्दे को हमेशा के लिए दफ़न कर देंगे| पर अगर ऐसा नहीं करते तो कुछ बातों का खुलासा उनकी मार्फ़त ही हो जाए तो अच्छा है| उनके हिंदू सिनेमाई नाम के पीछे सांप्रदायिक तत्व ढूँढने वाले अलगावादी लोग इन बातों के उत्तर खोज लें तो अच्छा हो-

– उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा‘ आयी सन 1944 में, मतलब यह ठहरता है कि  ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी मुलाक़ात कम से कम एक बरस पूर्व 1943 में तो हुयी ही होगी| और सन बयालीस का भारत छोडो आन्दोलन शुरू हो हे चुका था पर पाकिस्तान तो न बना था कि उनके मुसलमान नाम से जगत को समस्या होने लगती और होती तो खुर्शीद कैसे उसी दौरान चर्चित गायिका-अभिनेत्री बन गयीं? उसी के कुछ समय पश्चात मुस्लिम सुरैया को किसने इतना बड़ा स्टार बना दिया?

– एक मुसलमान निर्देशक महबूब खान की ‘रोटी‘ भी सन बयालीस में आ गयी थी, जिसमें शेख मुख्तार, अख्तरी बाई फैजाबादी (बेगम अख्तर), और अशरफ खान तीन महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे और गीत लिखे थे ड़ा. सफ़दर आह ने, और फिल्म उस साल की उन फिल्मों में से एक थी जिन्होने चोटी की सफलता प्राप्त की| ये कैसे हो गया अगर माहौल मुस्लिम कलाकार विरोधी था?

कमाल अमरोही कैसे सफल निर्देशक बन गये उसी दौरान या कुछ बाद में?

नर्गिस ने कौन सा मेकअप किया कि उनकी मुस्लिम पहचान उनके बड़ा स्टार बनने की राह का रोड़ा न बनी?

वहीदा रहमान ने भी ऐसा क्या रूप धरा कि लोग उन्हें एक बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर बेइंतहा आदर देने लगे?

साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, और मजरूह सुल्नानपुरी आदि को तो नाम बदलने की जरुरत न पडी|

– और नौशाद? उन्हें क्यों दरकिनार करा जाये, उन्होंने तो दिलीप कुमार के फिल्मों में आने से पहले ही वहाँ अपने झंडे फहरा दिए थे| किसने उन्हें हर दिल अजीज़ संगीत निर्देशक बनाया?

मोहम्मद रफ़ी कैसे अपने मुस्लिम नाम के साथ भारत के सबसे बड़े गायकों में से एक बन गये?

तलत महमूद की मखमली आवाज को बुलंदियों की शोहरत क्या मुसलमानी नाम छोड़ कर मिली?

के. आसिफ की मुग़ल-ऐ-आज़म कैसे कालजयी फिल्म बन गयी?

– उनके बाद फिरोज खान, संजय खान, और अमजद खान आदि को क्यों नहीं जरुरत पडी नाम बदलने की? इन्हें कैसे सफलता मिल गयी?

– अगर ये सब और इनके जैसे और बहुत सारे मुस्लिम अपने मुस्लिम नाम के साथ ही स्टार बन गये तो उनके ही मुस्लिमपने में ऐसे क्या सींग लगे थे कि हिन्दुस्तान उनके नाम से भड़क जाता और वे स्टार न बन पाते?

मुद्दे की बात यह कि अगर उन्होंने खुद ही एक हिन्दू नाम अपने सिनेमाई काम के लिए चुना तो वे यह बात डंके की चोट पर दुनिया से कहते क्यों नहीं? और अगर उन को को इसके लिए विवश किया गया तो वे विवश हुए क्यों? और अगर हुए तो अपनी व्यक्तिगत कमजोरी को स्वीकार करना चाहिए| कितने ही उदाहरण उनसे पहले भी थे और उनके सिनेमा में पदार्पण के बाद भी हुए जहां मुस्लिम कलाकारों ने अपने वास्तविक नाम के साथ सफलता पायी|

भारतीय समाज में हिन्दू मुसलमान के बीच खाई जैसी राम मंदिर -बाबरी मस्जिद ढाँचे के टूटने और उसके बाद के दंगों के बाद बनी है ऐसी तो पिछले सात दशकों में कभी नहीं थी पर अभी भी हिन्दी फिल्म उधोग के तीन-चार सबसे बड़े और सफल सितारे – आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, सैफ अली खान, अपने वास्तविक मुस्लिम नामों के साथ ही यह सब कुछ नाम, शौहरत, सफलता और धन सम्पदा पा चुके हैं| उन्हें तो कोई अड़चन न आयी इतने खतरनाक ध्रुवीकरण वाले समय में बड़ा स्टार बनने में| तो युसूफ खान को ही क्या समस्या आनी थी?

मूल प्रश्न यह रहेगा ही कि जनाब युसूफ खान आप दिलीप कुमार क्यों बने?

अगर खाली फ़िल्मी कारणों से बने, (नाम बहुत लंबा था और बहुत सारे अभिनेता ऐसा करते रहे थे सो उन्होंने भी एक आकर्षक नाम छाँट लिया अपने लिए, और इसमें किसी किस्म की साम्प्रद्यिकता की कोई भूमिका न थी) तो भी, और अगर उनके ऊपर साम्प्रदायिक तनाव का दबाव था तब भी उनको स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए|

आशा है देश की इस उलझन का निवारण वे समय रहते कर जायेंगे और इस मुहीम पर जो उनको ढाल बनाकर भारत के खिलाफ चलाई जाती है उस पर वे अंकुश लगाएंगे|

यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि उनको उन श्रेष्ठ्तमों में भी श्रेष्ठ बहुमत मानता रहा है, उन्हें जो इज्जत इस देश में प्रदान की गयी है वह बिरले लोग ही कमा पाए गये हैं, अतः यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी बनाती है कि ऐसे विवादास्पद मुद्दे के गलत पहलुओं को हमेशा के लिए दफ़न कर दें, अपना स्पष्टीकरण देकर|

हीं भी यह जिक्र नहीं है कि साम्प्रदायक कारणों से उन्हें दिलीप कुमार- एक हिंदू नाम धारण करना पड़ा|

अगस्त 5, 2011

नरेश कुमार “शाद” : परिचय उस महान शायर से

हर शब्द का अर्थ ज़रूर होता है, फिर शब्द अगर शब्दों के जादूगरों की कलम की पैदाइश हों तो  तो क्या कहिये! यूँ सभी श्रद्धेय हैं पर मुझे आधुनिक युग के ये हजरात – जैसे साहिर साहिब, नूर साहिब, जॉन एलिया साहिब, फैज़ साब और शाद साहिब बहुत भाते हैं। नरेश शाद साहिब पर बहुत कम लिखा गया है सो एक छोटी सी कोशिश पेश है।

उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर नरेश कुमार “शाद” का जन्म वर्ष 1928 में पंजाब राज्य के जिला जालंधर के निकट ग्राम नकोदर में साधारण से परिवार में हुआ था। इनके पिता नोहरा राम की माली हालत बहुत खराब थी, रोज़गार के रूप में वे एक लोकल साप्तहिक में काम करते थे जहां से नाम-मात्र पगार मिलती थी। शाद साब के पिता ‘दर्द’ के उपनाम से शायरी भी करते थे तथा उनके सुरापान करने की आदत के कारण से परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद शोचनीय थी। शाद साब की माँ सीधी-सादी देहाती महिला थी, जो किसी तरह घर चला रही थी। इस तरह शाद के पास शायरी विरासत में आई और दो वक्त रोटी का जुगाड ना होने जेसा माहौल घर में मिला। बाद के जीवन की नाकामियों, विषमताओं और नाउम्मीदी ने उन्हें भी शराबी बना दिया, जो कालान्तर में उनकी जवान उम्र में ही मौत का कारण भी बना। अजीब बात है नरेश केवल नाम के नरेश थे साथ ही शाद (प्रसन्न) उपनाम भी रख लिया था, कौन जाने शाद ने ऐसा गरीबी से उपजी कुंठा और उसका मजाक उड़ाने के लिए किया हो, अन्यथा तो दरिद्रता, नाकामी और उदासी का शाद साब से चोली दामन का साथ रहा। वे अपने परिवेश से इस कद्र तंग आ गये के निकल पड़े घर से एक आवारा सफर पर। पेट की भूख और तबियत की बैचेनी लाहौर, रावलपिंडी, पटियाला, दिल्ली, कानपुर, मुम्बई, और लखनऊ, कहाँ नही ले गयी उन्हें।

ऐसी ही कैफियत में शायद गज़ल के ये शेर निकले है :-

 

हाय! मेरी मासूम उम्मीदें, वाय! मेरे नाकाम इरादे
मरने की तदबीर न सूझी जीने के अंदाज़ न आये
शाद वही आवारा शायर जिसने तुझे प्यार किया था
नगर-नगर में घूम रहा है अरमानों  की लाश उठाये।

 

शाद साब, चाहे शायरी हो कि निजी जीवन में वे जो कुछ भी बने अपने बलबूते और कड़ी मेहनती के के कारण बने थे। अन्यथा तो हाल यह था कि पैसे नहीं होने के कारण उन्हें अपना कलाम तक भी बेचना पडा। एक साहब ने मात्र साठ रूपये में उनकी 60 गज़लों का सौदा अपने नाम से छापने के किया और बेहयाई ये के वे पैसे भी नकद नहीं मिले। ऐसे हालात का दर्द उनके इस कलाम में साफ़ नज़र आरहा है:-

आप गुमनाम आदमी हैं अभी
इस लिए आपका ये मजमूआ
अजसर-ए-नो दुरस्त करवाकर
अपने ही नाम से मैं छापूंगा
रह गया अब मुआवज़े का सवाल
नकद लेना कोई ज़रूर नहीं
शाम के वक्त आप आ जाएँ
मयकदा इस जगह से दूर नहीं

(मजमूआ : कवितासंकलन, अजसर-ए-नो : नए सिरे से, दुरस्त : ठीक)

 

उर्दू के प्रसिद्ध व्यंगकार फिक्र तौस्वी ने शाद साब के उस उलट-पलट जीवन का बेहतरीन खाका खींचा है। उनके शब्दों में…

 

“यह हकीकत है कि शाद ने अपनी मौजूदा जिंदगी की टूटी फूटी इमारत भी सिर्फ अपने ही बलबूते पर खड़ी की है। प्रतिभा की चिंगारी उसके नसीब में थी, उसने उसे बुझने नहीं दिया… उसके इस संघर्ष की कहानी न सिर्फ लंबी है, बल्कि तेज रफ़्तार भी। यूँ लगता है, जैसे उसने पैदल ही 100-100 मील का फासला एक–एक घंटे में तय कर लिया है। इस सफर में यद्यपि उसके चेहरे पर गर्द अट गयी, उसकी हड्डियां चटक गयी… उसके पाँव टूट गए…’’

 

जिंदगी के छोटे आवारा और परेशान सफर में नरेश शाद साब ने उर्दू कविता की तमाम बारीकियां बहुत परिपक्वता व गहराई के साथ अपने कलाम में पेश की हैं। गज़ल, नज़्म, कते और रुबाई सभी बेहतरीन अंदाज़ में पेश की हैं, परन्तु कते और गज़ल से आपको अधिक लगाव था।

शाद साब के कालाम के बारे में समकालीन बड़े शायर जोश मलीहाबादी, जिन्हें क्रान्तिकारी विचारों के कारण शायर-ए-इंकेलाब भी कहा जाता है, ने लिखा है:-

 

‘’नरेश कुमार शाद  आजकल के नौजवान शायरों से एक दम भिन्न हैं, वे दिल के तकाजों से मजबूर होकर शेर लिखते हैं, सोच समझ के शेर कहते हैं… इसी कारण उनके शेरों में प्रभाव और प्रभाव में वह विशेषता होती है जो शब्दों के बंधन में नहीं आ सकती’’।

शाद साब को निर्मोही काल चक्र ने सन 1928 से 1969 अर्थात मात्र 41 बहारों का समय ही दिया और वे बहारें भी काँटों द्वारा अहसास अजमाइश के सिवा कुछ नहीं थ॥ बहुत उदासी, दर्द और शराब के ज़हर में डूब कर इस लोकप्रिय और हर दिल अज़ीज़ शायर ने दुनिया से मुँह मोड़ लिया। पर उनका लेखन कद्रदानों को तो कयामत तक मोहता रहेगा।

प्रस्तुति : रफत आलम

 

…जारी

जुलाई 14, 2010

गालिब छुटी शराब : मयखाने से होशियार लौटते रवीन्द्र कालिया

बात सूफियों की हो तो उनकी मधुशाला तो भिन्न होती है, उनकी मधु ही कुछ अलग होती है और वहाँ ऐसा आदमी तो बेकार है जो इतनी न पी ले कि होश खो जाये। वे तो कहते हैं

वही है बेखुदे-नाकाम तुम समझ लेना
शराबखाने से जो होशियार आयेगा।

पर आम जीवन में जो मयखाने से होशियार लौट आये उसे भाग्यशाली ही समझा जायेगा। आम जन जीवन वाला मयखाना तो एक ही रास्ते पर भेजता है और मयकशी के रास्ते पर अत्यंत रुचि के साथ चलने वाले के लिये ही किसी ने कहा है कि

कारवां खड़ा रहा
और वे अपनी दुकान बढ़ा चले।

जीवन के कितने कामों को अधूरा छोड़कर, अति प्रिय सपनों को पूरा करने का प्रयास करे बगैर ही आदमी कूच कर जाता है। मयगोशी के ऐसे ही वन वे ट्रैफिक वाले रास्ते से वरिष्ठ साहित्यकार श्री रवीन्द्र कालिया न केवल वापिस घर आ गये बल्कि उन्होने वापसी के इस सफर में गुजारे क्षणों में, जब वे लगभग अकेले ही यात्रा कर रहे थे, सबको अकेले ही करनी पड़ती है ऐसी यात्रा, एक बहुत ही जीवंत किताब की रचना भी कर दी। किताब की अवधारणा तो तभी बन गयी होगी जब वे वापिस जीवन की ओर आने के लिये प्रयासरत रहे होंगे, किताब को लिखा भले ही कुछ समय बाद हो उन्होने।

गालिब छुटी शराब” एक जीवंत आत्मकथा है। यह शुरु से अंत तक रोचक है और कितने ही पाठक इसे एक ही बार में पढ़ गये होंगे और जिन्होने नहीं पढ़ी है वे एक ही बार में पढ़ जाने के लिये विवश हो जायेंगे, जब भी पुस्तक उनके हाथ पड़ेगी। आत्मकथाओं के साथ ऐसा कम ही होता है और ज्यादातर पाठक इन्हे किस्तों में पढ़ते हैं क्योंकि भले ही बहुत अच्छी सामग्री इन किताबों में हो पर कहीं न कहीं वे बोझिल हो उठती हैं और लगातार पढ़ना थोड़ा भारी लगता है पाठकों को।

गालिब छुटी शराब” के साथ ऐसा नहीं है। हास्य तो हर पन्ने पर बिखरा पड़ा है और केवल दूसरों की ही खिंचाई रवीन्द्र कालिया जी ने इस हास्य बोध के द्वारा नहीं की है बल्कि बहुत निर्ममता से अपना और अपनी आदतों का पोस्ट-मार्टम भी किया है। इंसान का दिल तो दुखता ही दुखता है पर इस दुख को भी लेखक ने हास्य के आवरण में लपेट कर पेश किया है और अपनी तरफ से भरकस कोशिश की है कि सब कुछ पाठक हँसते हँसते हुये ही समझ जाये।

गालिब छुटी शराब” को पढ़ना “चार्ली चैप्लिन” की बेहतरीन मूक फिल्में देखने जैसा है जहाँ दर्शक उनके द्वारा घटनाओं को दर्शाने के तौर तरीकों पर हँसता भी रहता है और उनके द्वारा निभाये गये पात्र के दुखों को महसूस भी करता रहता है। ऐसा संतुलन बनाये रखना अत्यंत कठिन काम है। इस तरह की शैली में लिखी दूसरी आत्मकथा हिन्दी साहित्य में याद नहीं पड़ती हाँ मराठी में जरुर रामनगरकर की आत्मकथा रामनगरी ऐसी ही शैली में लिखी गयी थी जहाँ जीवन के मार्मिक प्रसंगों को भी हास्यबोध के मुलम्मे से ढ़क कर प्रस्तुत किया गया था।

पुस्तक पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी सपाट चेहरे से हास्य उत्पन्न करने वाली बातें कहने में पारंगत होंगे। दिल्ली में अपने मित्र के साथ माता के दरबार में हाजिरी लगाने वाले प्रसंग में उनकी यह प्रतिभा अपने विकट रुप में सामने आती है। ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ पाठक पढ़ते पढ़ते हँसी से लोट पोट हो सकते है।

कन्हैया लाल नंदन जी के साथ इलाहाबाद पहुँचने वाला प्रसंग भी रवीन्द्र जी की कलम की श्रेष्ठता हास्य के क्षेत्र में दर्शाता है।

गालिब छुटी शराब” में सिर्फ हास्य ही नहीं है बल्कि जीवन के और भी दूसरे रंग अपनी छटा बिखेरते हुये सामने आते हैं। ग़ालिब का नाम शीर्षक में शामिल है तो शायरी की मौजूदगी पुस्तक में मौजूद होना भरपूर वाजिब है और मौकों पर बड़े माकूल शे’र सामने आते रहते हैं। पिछले पाँच दशकों में हिन्दी साहित्य में उभरे कितने ही नाम जीवंत होकर उभरते रहते हैं। एक ही व्यक्ति का अलग अलग व्यक्तियों से अलग अलग किस्म का सम्बंध हो सकता है और अब जब रवीन्द्र कालिया जी की पीढ़ी के रचनाकार आत्मकथायें लिखने की ओर अग्रसर हैं तो अलग अलग रचनाकार इन रचनाओं में अलग अलग रुपों में नजर आयेंगे। कितनी बातें प्रभावित करती हैं किसी भी व्यक्ति का रेखाचित्र लिखने में।

एक तो रचनाकार को उसकी रचनाओं के जरिये जानना होता है, और एक होता है उसे व्यक्तिगत रुप से जानना और दोनों रुप काफी हद तक अलग हो सकते हैं और होते हैं अगर ऐसा न होता तो प्रेमकहानियों की रचना करने वाले रचनाकारों के अपनी पत्नी या प्रेमिका/ओं से अलगाव न हुआ करते। व्यक्तिगत सम्बंध रचनाकार की समझ, दृष्टिकोण और कलम को भी कहीं न कहीं किसी न किसी रुप में प्रभावित करते ही हैं।

गालिब छुटी शराब” पढ़कर ऐसा भी प्रतीत होता है कि रवीन्द्र जी की याददाश्त बहुत अच्छी होनी चाहिये या फिर हो सकता है कि वे अपने कालेज के दिनों से ही डायरी लिखते रहे हों क्योंकि बहुत पहले के प्रसंग भी अपनी पूरी जीवंतता के साथ सामने आते हैं और एक अन्य खासियत इस पुस्तक की यह लगती है कि रवीन्द्र जी ने अपनी वर्तमान आयु की समझदारी का मुलम्मा पुराने प्रसंगों और काफी पहले जीवन में आये व्यक्तियों की छवि पर नहीं चढ़ाया है और जैसा तब सोचते होंगे उन लोगों के बारे में या जैसा उन्हे देखा होगा वैसा ही उनके बारे में लिखा है। चाहे पंजाब में गुजारे हुये साल हों या बम्बई, दिल्ली और इलाहाबाद में गुजारे साल, यह बात सब जगह दिखायी देती है।

केवल व्यक्ति ही नहीं वरन वे सब जगहें भी, जहाँ रवीन्द्र जी ने अपने जीवन का कुछ समय व्यतीत किया, अपने पूरे जीवंत रुप में किताब के द्वारा पाठक के सामने आती हैं। खासकर इलाहाबाद के मिजाज को लेखक ने खास तवज्जो दी है। अमरकांत जी और राजेन्द्र यादव जी जैसे प्रसंगों के जरिये उन्होने इलाहाबादी माहौल और हिन्दी साहित्य के पिछले चालीस-पचास सालों के धुरंधर नामों के बीच बिछी, अदृष्य शतरंज की झलक भी दिखायी है। हर काल में समकालीनों के मध्य ऐसा ही होता है।

किताब में केवल शराब, लेखन, पार्टियाँ और धमाल आदि ही नहीं है वरन रवीन्द्र जी ज्योतिष और होम्योपैथी चिकित्सा शैली से अपनी मुठभेड़ और स्वाध्याय के आधार पर दोनों ही क्षेत्रों में कुछ समय तक डूबकर इन विधाओं के प्रति उत्पन्न अपने लगाव की भी चर्चा करते हैं। उनके जीवन में भविष्यवाणियों ने असर दिखाया, इस बात की पुष्टि उन्होने कुछ प्रसंगों द्वारा की है। संजय गाँधी की असमय मृत्यु की भविष्यवाणी हो या दिवंगत राजनेता चन्द्रशेखर द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने की घोषणा सत्तर के दशक में ही करने वाला प्रसंग हो या चेहरा देख कर ही व्यक्ति का भूत-वर्तमान और भविष्य बता सकने के प्रसंग हों, रहस्यवाद का जीवन में स्थान है यह बात आत्मकथा दर्शाती है।

आत्मकथा इस बात को स्थापित करती है कि जवानी में रवीन्द्र जी यारों के यार वाले ढ़ांचे में रहे होंगे और कुछ हद तक आदर्शवाद भी उनके मन मस्तिष्क पर छाया रहता होगा वरना डा. धर्मवीर भारती से जुड़े प्रसंग उनकी किताब में इस तरह से उभर कर न आते आखिरकार पुस्तक यही बताती है कि व्यक्तिगत रुप से डा भारती हमेशा अच्छे ही रहे रवीन्द्र जी के लिये परन्तु रवीन्द्र जी ने उनका विरोध उनकी सामान्य छवि के आधार पर किया।

किताब रवीन्द्र जी के जीवन में आये साहित्यकारों, राजनेताओं और अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन की कुछ झलकियाँ प्रस्तुत करती है।

यह बात जरुर गौर करने वाली है कि क्या कोई भी साहित्यकार बिल्कुल निरपेक्ष रह पाता है जब वह अपने जीवन में आये लोगों और खासकर प्रसिद्ध व्यक्तियों के बारे में लिखता है?

क्या लेखक की कलम भेदभाव करती है मित्रों, गहरे मित्रों, परिचितों और व्यक्तिगत रुप से अपरिचित लोगों के प्रति?

गालिब छुटी शराब में भी कहीं कहीं इस अंतर को महसूस किया जा सकता है।

आशा की जा सकती है कि पूर्ण रुप से स्वास्थ्य लाभ करके पुनः साहित्य की दुनिया में पुरजोर सक्रिय होने वाले श्री रवीन्द्र कालिया इस बाद के जीवन पर भी अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लिखंगे।

जिसने न पढ़ी हो वे अवश्य पढ़ें इस बेहद रोचक ढ़ंग से लिखी आत्मकथा को।

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