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मई 17, 2013

अस्पताल वहीं बनाएंगे

मैंने जन्म लिया था

एक आयुर्वेदिक अस्पताल में

मगर अब उसी इमारत की

नींव पर खड़ा है एक

एलोपेथिक अस्पताल

मेरा तो कर्तव्य है

कि मुझे गिराना है

वह एलोपेथिक अस्पताल

और खड़ा करना है

वही आयुर्वेदिक अस्पताल

हालांकि मुझे मालूम है

एलोपेथिक हो या आयुर्वेदिक

अस्पतालों का मकसद एक है

अस्वस्थ को स्वस्थ करना

पर सवाल तो है जन्म स्थल का

और हमारी भावनाओं का

एक सुझाव आया है

थोड़ा हटकर बना लूं

अपना आयुवेदिक अस्पताल

पर कैसे मान लूँ इसे

सुनना पड़ जाएगा ताना

कि देखो , इसका खून

खून नहीं, पानी है

अब पूछते हैं लोग

सबूत है जन्मस्थल का?

प्रमाण है कोई?

मेरा तो जवाब है

सीधा सच्चा, किन्तु करारा

सबूत तो बैसाखी है

अदालत की, कानून की

यहाँ तो प्रश्न है

आस्था का, भावना का

मेरा तो धर्म है

वहाँ फिर खड़ा करना

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

बुद्धिजीवी समझाते हैं

मुझे क्या मिलेगा

एक अस्पताल गिरा कर

दूसरा अस्पताल बनाने में

पर मैं क्यों अपनाऊं

तुष्टीकरण की नीति

मेरा प्रथम कर्तव्य है

आयुर्वेदिक अस्पताल बनाना

इतिहास की भूल मानकर

कैसे खड़ा रहने दूँ

एलोपेथिक अस्पताल

गलती, गलती है फिर वह

साढ़े चार वर्ष पहले हुई

या साढ़े चार सौ वर्ष पहले

मैं तो अडिग हूँ

अपने पथ पर

भले ही मरीजों की

संख्या बढ़ जाए

दुख बढ़ जाएँ

दर्द बढ़ जाएँ

लाशें बढ़ जाएँ

निरोगी रोगी हो जाएँ

क्योंकि इनसे बड़ा सवाल है

जन्म स्थल का

आयुर्वेदिक अस्पताल का

मैं अपील करता हूँ

आयुर्वेदिक अस्पताल में

जन्मे हरेक व्यक्ति से

कि गर्व से कहो

हमें बनाना है

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

आयुर्वेदिक अस्पताल

(अमिताभ बेहार)

मई 13, 2013

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं

हाँ वे मुसलमान थे

हम जैसे इंसान थे

लेकिन उनके सीनों में कुरआन था

और हाथों में तलवार

यकीनन वे पुकारते होंगे

हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

हिंद के वासियों को

वे हिन्दू ही कह सकते थे|

और हिंद के वासी

यानी बड़े नाम वाली नामवर जाति

बाएं बाजू की ताकत से बेखबर

दायें हाथ में तराजू लिए

अपना नफ़ा नुकसान तोल रही थी|

निम्न, अछूत, अनार्य इंधन पर

खौल रहा था

ब्राह्मणवाद का कढ़ाहा

और तली जा रही थीं

सत्ता और सुविधा की पूडियां |

पूडियां खाने के शौकीन

ब्राह्मण

उन्हें मलेच्छ कह सकते थे

पूडियां खाने का शौक और बनाने का फन

उन्हें निर्यात नहीं हुआ था

लेकिन

उनके दिलों में सफाई थी

वे ईमान की ताजगी लेकर निकले थे

तभी तो

दश्त क्या चीज है

दरिया भी उन्होंने नहीं छोड़े

जहां चाहा उतार दिए अपने घोड़े

हमलावर तो हमलावर होते हैं

घर लूटा और चलते बने

जैसे अंग्रेज आए और निकल भागे

वे कैसे हमलावर थे?

लूटने आए और लुटने वालों के होकर रह गये

सिर्फ तलवार के नहीं

वे विचार के धनी भी थे

जैसे ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

हाँ! वे मुसलमान थे

ठीक कहते हो

वे आसमान से नहीं उतरे थे

लेकिन आसमानी धूप लेकर आए थे

वे मसावात-मसावात चिल्लाते आए थे

नया इन्कलाब लाए थे

वे यकीनन यहीं कहीं दूर से आए थे

और आर्यों की तरह आए थे

फर्क बस इतना था

आर्यों ने खदेड़ा था अनार्यों को

विंध्याचल के उस पार तक

जो शेष रह गये थे वे सेवक बनाए गए

अर्थात भंगी, चमार, नाई, धोबी, वगैरह-वगैरह

लेकिन वे मुसलमान थे

अहले-कुरआन थे

उन्होंने मुसलमान बनाए

अपनी इबादतगाहों में ले आए|

भंगी जब सैयद के साथ मस्जिद में बैठा होगा

ज़रा सोचकर देखो कि क्या सोचा होगा?

तुम कहते हो कि वे मुसलमान थे

वे दरहकीकत मुसलमान हैं

इतिहास के गलियारों में,

अतीत के बाजारों में,

ताकने-झाँकने से फायदा?

वे मुसलमान हैं

और हमारी तरह वर्तमान हैं

वे समस्याग्रस्त इंसान हैं

उन्हें अतीत में जीवित रखने की ख्वाहिश

जख्मों पर नमक लगाकर जगाने की काविश

जागृति नहीं खून के आंसू लाएगी

नंगे सच को

लफ्जों का लिबास देने से क्या होगा

सच को सच की तरह सुना जाए

तो सुनो-

मुसलमान न होते तो

कबीलों, वर्णों, तबकों, और जातियों के जंगल में

घृणावाद की आग लगी होती

जंगल जल चुका होता

फिर आरक्षण की धूप में किसे सेकते

आरक्षण का विरोध कौन करता

जनतंत्र की मैना कहाँ चहचहाती

समता, संतुलन, समाज सुधार शब्दकोश में धरे रहते

ईंट-पत्थर की इमारत कोई भी बना सकता है

शहर बसते ही रहते हैं

वे न होते तो बहुत कुछ न होता

या कुछ न कुछ होता

वे हैं तो दिक्कत क्या है?

वे मुसलमान हैं

वे रथ या घोड़े पर सवार आतंक नहीं हैं

वे राम से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

राम नाम के सौदागरों से

वे मार्क्स से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

मार्क्स के नाफहम अनुयायियों से

वे वाकई नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

हुक्मे-इलाही में मिलावट करने वाले मुल्लाओं से

वे तैरना जानते हैं लेकिन

नदी किनारे बैठने को विवश हैं

उनके सिर्फ रिश्तेदार पाकिस्तान में हैं

आडवाणी जैसों को टटोलिए

जन्मभूमि का महत्व क्या है

अयोध्या से अधिक वे कराची में जीते हैं

हाँ! वे मुसलमान हैं

दो सौ बरस तक अंग्रेजों से लड़ते रहे

उन्होंने पाकिस्तान बनाया

वे पाकिस्तान के खिलाफ जंग में शहीद हुए

वे मुसलमान हैं

उनके पुरखों की हड्डियां दफ़न हैं यहीं

वे कहीं से नहीं आए

वे कहीं नहीं गए

वे कहीं नहीं जायेंगे

वे पाकिस्तान समेत फिर आयेंगे

क्योंकि वे मुसलमान हैं

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं |

(चन्द्रभान ‘खयाल’)

सितम्बर 30, 2010

जरुरत है जरुरत है कबीर की

आज के भारत की सबसे बड़ी कमजोरी है किसी भी ऐसी शख्सियत की गैर-मौजूदगी, जो कि पूरे भारत के जन-मानस को प्रभावित कर सके। जो किसी भी पक्ष का न हो बस मानवता का हो। राजनीति के क्षेत्र से तो आशा करना ही मूर्खता है कि ऐसा कोई व्यक्तित्व उपज पायेगा अगले दस बीस सालों में भी क्योंकि राजनीतिक रुप से तो देश अगले कम से कम पच्चीस सालों तक बँटा हुआ रहेगा।

अध्यात्म के क्षेत्र से ही किसी ऐसी भरपूर धार्मिक शख्सियत उभर सकती है जो देश को और मानवता को दिशा दे सके।

अयोध्या पर कोर्ट ने ऐसा निर्णय दिया है जो लगभग सभी पक्षों की राजनीति खत्म कर देगा। कितना ही तड़पड़ायें अयोध्या के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले पर अब बहुत बड़ी राजनीति इस मुद्दे पर कोई भी नहीं चला पायेगा। वे माहौल को बिगाड़ना चाहेंगे आखिरकार उनके रुतबे का साम्राज्य खत्म होने जा रहा है।

पर अयोध्या या ऐसे मुद्दे तो बहुत छोटे सरोकार हैं और भारत में धार्मिक सदभाव और सामजिक एकता बनाये रखने के लिये ऐसे नेतृत्व का होना बहुत जरुरी है जो हर धर्म के मानने वालों को समान अधिकार से दिशा दे सकें और अगर लोग गलत राह पर जा रहे हों तो उन्हे डाँट सकें। ऐसे नेतृत्व की जरुरत है जो सभी धर्मों की कमजोरियों की तरफ बिना किसी भय या पक्षपात के इशारा कर सकें।
भारतीय इतिहास में समय समय पर ऐसे सामाजिक नेता हुये हैं। कबीर ऐसे महान व्यक्तियों में बहुत ऊँचे स्थान पर विराजते हैं।

उनके वचनों को पढ़कर, सुनकर लगता है कि हिन्दू-मुस्लिम तनाव उनके समय में भी अस्तित्व में आता रहता था और दोनों वर्ग एक दूसरे पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने में लगे रहते थे।
कबीर ने दोनों वर्गों को उनकी कमजोरियाँ दिखायी हैं। वे दोनों वर्गों को डाँटते हुये कहते हैं।

अरे इन दोऊन राह न पाई
हिन्दू अपने करै बड़ाई गागर छुअन न देई।
वेश्या के पायन तर सौवे, यह देखो हिन्दुआई।
मुसलमान के पीर औलया, मुरगी मुरगा खाई।
खाला केरी बेटी ब्याहे घरहि में करहिं सगाई।

कबीर समय समय पर हिन्दू और मुसलमान, दोनों वर्गों को चेताते रहे और बताते रहे कि दोनों धर्मों के लोग कर्मकांड के घेरे में फँसे हुये हैं और धर्म के नाम पर पाखंड अपनाते हैं।

हिन्दुओं को उन्होने चेताया कह कर

पाहन पूजे हरि मिले
तो मैं पूजौ पहार

और मुसलमानों को शीशा दिखाना चाहा कह कर

काँकर पाथर जोरि के मस्जिद लई चुनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दै, बहरा हुआ खुदाय।

कबीर ने अपने जीवन से और अपने ज्ञान से बखूबी सिद्ध किया है कि धार्मिक होने का, अध्यात्मिक होने का धर्म के पाखंड के सामने दंडवत होने से कोई सम्बंध नहीं है। एक व्यक्ति पूरी तरह धार्मिक और अध्यात्मिक हो सकता है और वह जीवन भर मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा और सिनेगॉग आदि से पीठ करे रह सकता है।

कबीर कटाक्ष करते हैं हिन्दू और इस्लाम धर्म के स्वयंभू ठेकेदारों पर।

न जाने तेरा साहब कैसा?
मस्जिद भीतर मुल्ला पुकारे, क्या साहब तेरा बहरा है?
चींटी के पग नेबर बाजै, सो भी साहब सुनता है।
बहुतै देखे पीर औलिया, पढ़े किताब कुराना
कह हिन्दू मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहमाना।

आधुनिक दौर में कबीर जैसे ही किसी अस्तित्व की जरुरत है।

यह कबीर का ही माद्दा था कि वे राजतंत्र में राजा के ऊपर भी कटाक्ष करने से नहीं हिचकिचाये।

राजा देश बड़ौ परपंची, रैयत रहत उजारी,
इतते उत, उतते इत रहु, यम की सौढ़ सवारी,
घर के खसम बधिक वे राजा,
परजा क्या छोंकौ, विचारा।

भारत ने सब कुछ राजनीति (धार्मिक और सामाजिक) से अपनी जीविका चलाने वालों के हाथों में छोड़ दिया है और इस व्यवस्था ने भारत की बहुत बड़ी हानि की है। भारत के लोग केवल अपना और अपने परिवार का हित देखने वाले नेताओं के पिछलग्गू बन कर रह गये हैं। राजनीतिक गुटबंदियों के कारण लोग गहन और सच्चे मित्रों से भी अलगाव करने से नहीं बाज आते।

भारत को पुनर्जागरण की जरुरत है और जनता को यह काम खुद ही करना होगा। बुद्धिमान, ईमानदार और चेतन जनता के प्रतिनिधि नेता भी बुद्धिमान, ईमानदार और चेतनाशील होंगे। मूर्ख, दुष्ट, भ्रष्ट नेता तब अपने आप हाशिये पर चले जायेंगे।

भारत की सांस्कृति और अध्यात्मिक चेतना की विरासत बुद्ध, कबीर, जैसी मेधाओं के हाथों में रही है। बहुत पतन हो चुका है भारत का और इसके लोगों का। अब तो यही कहा जा सकता है

अपने ही हाथों में पतवार सँभाली जाये
तब तो मुमकिन है कि ये नाव बचा ली जाये।

और एक एक व्यक्ति जाग जाये इस जागरण के लिये कबीर जैसे प्रकाश पुंज की जरुरत आज के समय को है।

…[राकेश]

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