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मई 10, 2013

मोहम्मद युसूफ खान : दिलीप कुमार क्यों बने?

Dilip_Kumarजनाब युसूफ खानउर्फ दिलीप कुमार साहब के साथ यह बड़ी विवादास्पद बात नहीं है कि वे  हाजी मस्तान, अब- मरहूम-पर-कभी बम्बई  में अपराध जगत के सरगना, के साथ बैठ कई आयोजनों में शिरकत कर चुके हैं, उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात के फोटो खिंचवा चुके हैं, या उसके दिखावटी समाजसेवी काम में उसकी मदद कर चुके हैं, (फोटो तो हाजी मस्तान के साथ उनके समकालीन और अभिनेताओं के भी हैं), या कि उन्होंने एक पत्नी-सायरा बानू, के रहते दूसरा निकाह ‘आस्मा बेगम‘ से कर लिया था, दूसरे कर्म के लिए तो सायरा बानू से भी उनकी सुलह हो ही गयी, और पहले कर्म की याद बहुत लोगों को है नहीं और तब से तो उनको ढेर सारे पुरस्कार मिल चुके हैं अतः सरकारों के लिए भी स्मगलर के साथ उनके फोटो की बात कोई ज्यादा मायने नहीं रखती होगी| ये दोनों ही गौण कारण है और भुलाए जा सकते हैं छोटी गलतियों के तौर पर|

DKHaji

उनका सबसे बड़ा गुनाह कुछ अलग किस्म का है| हालांकि वह उन्होंने  तब किया जब उनकी उम्र युवावस्था की दहलीज बस लांघ कर ही कुलांचे भरने लगी थी पर तब भी वह एक ऐसी गलती है जिसका खामियाजा हिन्दुस्तान को पिछले सात दशकों से भुगतना पड़ रहा है और न जाने आने वाले कितने दशकों तक शातिर दिमाग वाले फिरकापरस्त लोग उसका दुरूपयोग देश के खिलाफ एक हथियार के रूप में करते रहेंगे| शातिरों से अलग हटें तो मूर्ख किस्म के लोग भी उसे नासमझी में उपयोग में ले लेते हैं और बात को ऐसे बढ़ावा देते हैं जैसे बस सत्य वही हो जो वे जानते हैं|

DK Asma
ठीक है कि उनको फिल्मों में काम करना था, और संयोगपूर्ण गलती से उनका असली नाम ‘मोहम्मद युसूफ खान‘ काफी लंबा नाम था फिल्मों के लिहाज से,  पर, देविका रानी ने तो, भगवती चरण वर्मा की मार्फ़त उनको सुझाए थे कई नाम (वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार एवं कुछ अन्य विकल्प) और फैसला भी उनके ऊपर ही छोड़ दिया था कि किसी एक नाम का चुनाव कर लो|

फिर उन्हें किस किस्म के जीव ने काटा था, या किस हिन्दू जादूगर ने उन पर जादू कर रखा था कि उन्होंने ‘दिलीप कुमार‘ नाम छाँट लिया जो कि एक हिन्दू नाम है?

चलिए उन्होंने दिलीप कुमार नाम चुन भी लिया, पर ऐसा खतरनाक मिथक क्यों पनपने दिया कि उन्होंने दिलीप कुमार नाम इसलिए रखा कि एक मुसलमान कलाकार के लिए घनघोर रूप से साम्प्राद्यिक  (हिंदू बहुल) देश- भारत में जगह बनाना असंभव होता?

वे ‘जहाँगीर‘ नाम भी तो चुन सकते थे, उनके मुसलमान सम्प्रदाय में जन्म लेने के कारण वो ज्यादा ज़ेब देता उनके  व्यक्तित्व पर| उन जैसा जहीन फनकार किसी भी नाम से फ़िल्में करता ऐसे ही शोहरत पाता|

पर उनके द्वारा “दिलीप कुमार” नाम चुनने के पीछे साम्प्रदायिक भाव होने के मिथक को गढ़ने वाले  फिरकापरस्तों को एक हथियार मिल गया – कि चूँकि उस समय हिन्दू -मुसलमान संप्रदायों में तनाव था सो मुसलमान नाम रखना किसी नये फ़िल्मी कलाकार के लिए लाभदायक नहीं होता| पहले से परेशानियों से घिरे हिन्दुस्तान की परेशानियों में और इजाफा इस मुद्दे से हो जाता है|

चूँकि  यह मुद्दा ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी उस बैठक  के समय से आज तक हिन्दुस्तान के खिलाफ उपयोग में लाया जाता रहा है पर कभी ऐसा पढ़ने, सुनने और देखने में नहीं आया कि उन्होंने इस आरोप का खंडन सार्वजनिक तौर पर किया हो, जबकि उनका एक बयान ऐसी अलगाववादी ताकतों, जो देश में सदा ही हिन्दू मुसलमानों के बीच दरार बढाने में लगे रहते हैं, के कुत्सित प्रयासों पर लगाम लगाने में सहायक सिद्ध होता| पर उन्होंने ऐसा किया नहीं| आशा है कि शीघ्र प्रकाशित होने वाली आत्मकथा में वे इस मुद्दे को हमेशा के लिए दफ़न कर देंगे| पर अगर ऐसा नहीं करते तो कुछ बातों का खुलासा उनकी मार्फ़त ही हो जाए तो अच्छा है| उनके हिंदू सिनेमाई नाम के पीछे सांप्रदायिक तत्व ढूँढने वाले अलगावादी लोग इन बातों के उत्तर खोज लें तो अच्छा हो-

– उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा‘ आयी सन 1944 में, मतलब यह ठहरता है कि  ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी मुलाक़ात कम से कम एक बरस पूर्व 1943 में तो हुयी ही होगी| और सन बयालीस का भारत छोडो आन्दोलन शुरू हो हे चुका था पर पाकिस्तान तो न बना था कि उनके मुसलमान नाम से जगत को समस्या होने लगती और होती तो खुर्शीद कैसे उसी दौरान चर्चित गायिका-अभिनेत्री बन गयीं? उसी के कुछ समय पश्चात मुस्लिम सुरैया को किसने इतना बड़ा स्टार बना दिया?

– एक मुसलमान निर्देशक महबूब खान की ‘रोटी‘ भी सन बयालीस में आ गयी थी, जिसमें शेख मुख्तार, अख्तरी बाई फैजाबादी (बेगम अख्तर), और अशरफ खान तीन महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे और गीत लिखे थे ड़ा. सफ़दर आह ने, और फिल्म उस साल की उन फिल्मों में से एक थी जिन्होने चोटी की सफलता प्राप्त की| ये कैसे हो गया अगर माहौल मुस्लिम कलाकार विरोधी था?

कमाल अमरोही कैसे सफल निर्देशक बन गये उसी दौरान या कुछ बाद में?

नर्गिस ने कौन सा मेकअप किया कि उनकी मुस्लिम पहचान उनके बड़ा स्टार बनने की राह का रोड़ा न बनी?

वहीदा रहमान ने भी ऐसा क्या रूप धरा कि लोग उन्हें एक बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर बेइंतहा आदर देने लगे?

साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, और मजरूह सुल्नानपुरी आदि को तो नाम बदलने की जरुरत न पडी|

– और नौशाद? उन्हें क्यों दरकिनार करा जाये, उन्होंने तो दिलीप कुमार के फिल्मों में आने से पहले ही वहाँ अपने झंडे फहरा दिए थे| किसने उन्हें हर दिल अजीज़ संगीत निर्देशक बनाया?

मोहम्मद रफ़ी कैसे अपने मुस्लिम नाम के साथ भारत के सबसे बड़े गायकों में से एक बन गये?

तलत महमूद की मखमली आवाज को बुलंदियों की शोहरत क्या मुसलमानी नाम छोड़ कर मिली?

के. आसिफ की मुग़ल-ऐ-आज़म कैसे कालजयी फिल्म बन गयी?

– उनके बाद फिरोज खान, संजय खान, और अमजद खान आदि को क्यों नहीं जरुरत पडी नाम बदलने की? इन्हें कैसे सफलता मिल गयी?

– अगर ये सब और इनके जैसे और बहुत सारे मुस्लिम अपने मुस्लिम नाम के साथ ही स्टार बन गये तो उनके ही मुस्लिमपने में ऐसे क्या सींग लगे थे कि हिन्दुस्तान उनके नाम से भड़क जाता और वे स्टार न बन पाते?

मुद्दे की बात यह कि अगर उन्होंने खुद ही एक हिन्दू नाम अपने सिनेमाई काम के लिए चुना तो वे यह बात डंके की चोट पर दुनिया से कहते क्यों नहीं? और अगर उन को को इसके लिए विवश किया गया तो वे विवश हुए क्यों? और अगर हुए तो अपनी व्यक्तिगत कमजोरी को स्वीकार करना चाहिए| कितने ही उदाहरण उनसे पहले भी थे और उनके सिनेमा में पदार्पण के बाद भी हुए जहां मुस्लिम कलाकारों ने अपने वास्तविक नाम के साथ सफलता पायी|

भारतीय समाज में हिन्दू मुसलमान के बीच खाई जैसी राम मंदिर -बाबरी मस्जिद ढाँचे के टूटने और उसके बाद के दंगों के बाद बनी है ऐसी तो पिछले सात दशकों में कभी नहीं थी पर अभी भी हिन्दी फिल्म उधोग के तीन-चार सबसे बड़े और सफल सितारे – आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, सैफ अली खान, अपने वास्तविक मुस्लिम नामों के साथ ही यह सब कुछ नाम, शौहरत, सफलता और धन सम्पदा पा चुके हैं| उन्हें तो कोई अड़चन न आयी इतने खतरनाक ध्रुवीकरण वाले समय में बड़ा स्टार बनने में| तो युसूफ खान को ही क्या समस्या आनी थी?

मूल प्रश्न यह रहेगा ही कि जनाब युसूफ खान आप दिलीप कुमार क्यों बने?

अगर खाली फ़िल्मी कारणों से बने, (नाम बहुत लंबा था और बहुत सारे अभिनेता ऐसा करते रहे थे सो उन्होंने भी एक आकर्षक नाम छाँट लिया अपने लिए, और इसमें किसी किस्म की साम्प्रद्यिकता की कोई भूमिका न थी) तो भी, और अगर उनके ऊपर साम्प्रदायिक तनाव का दबाव था तब भी उनको स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए|

आशा है देश की इस उलझन का निवारण वे समय रहते कर जायेंगे और इस मुहीम पर जो उनको ढाल बनाकर भारत के खिलाफ चलाई जाती है उस पर वे अंकुश लगाएंगे|

यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि उनको उन श्रेष्ठ्तमों में भी श्रेष्ठ बहुमत मानता रहा है, उन्हें जो इज्जत इस देश में प्रदान की गयी है वह बिरले लोग ही कमा पाए गये हैं, अतः यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी बनाती है कि ऐसे विवादास्पद मुद्दे के गलत पहलुओं को हमेशा के लिए दफ़न कर दें, अपना स्पष्टीकरण देकर|

हीं भी यह जिक्र नहीं है कि साम्प्रदायक कारणों से उन्हें दिलीप कुमार- एक हिंदू नाम धारण करना पड़ा|

अप्रैल 21, 2011

ईमानदारी-भ्रष्टाचार के बीच झूलता मानस

रमेश ज़रूरी काम से गांव जाने के लिये सपत्नीक स्टेशन पहुँचा तो पाया कि पहले से ही मुसाफिरों की लंबी लाइन टिकट खिडकी पर लगी थी।

पत्नी बोली,” हे राम! टिकट कैसे मिलेगा, गाड़ी की रवानगी में बीस मिनट ही बचे हैं”।

रमेश मुस्करा कर बोला,” अभी मिलता है”।

और वह कुली के पास जा पंहुचा,” भाई! टिकट का इंतज़ाम हो जायगा क्या?”

“हाँ साब,  सौ रुपये अधिक लगेंगे”।

“कोई बात नहीं यार! तू टिकट तो दिला”।

यह बेईमानी की जीत थी!
….

पत्नी की बहुत मिन्नत के बाद रमेश सिनेमाघर गया था। टिकट खरीदारों की लंबी लाइन आगे सरक ही नहीं रही थी। बीच-बीच में एक दबंग टिकट खिडकी पर पहुँच कर इकट्ठे बहुत सारे टिकट लेता और वापिस भीड़ में टिकट ब्लैक करने आ जाता।

कतार तोड़ कर लोग स्वयं ही उसके साथ हो रहे थे।

रमेश सोच रहा था कैसे लोग हैं, जरा भी सब्र नहीं कर रहे। यूँ ही तो बेईमानी को बढ़ावा मिलाता है।
अचानक भडाक की आवाज़ के साथ टिकट खिडकी बंद हो गयी और दबंग की आवाज़ का सुर और भी तेज हो गया।

पत्नी बोली,” कुछ ही रुपये और लगेंगे, ले लो न टिकट”

कुछ तो टिकट नहीं मिलने की खीज थी और कुछ पत्नी द्वारा बेईमानी कराने की सलाह पर गुस्सा।

रमेश पत्नी का हाथ पकड कर घसीटता सा सिनेमाहॉल के बाहर निकल आया।

कारण कोई भी रहा हो पर यह ईमानदारी की तरफ उठा एक कदम था!

(रफत आलम)

जून 11, 2010

हिन्दी सिनेमा के अभिनेता : क्विज

[1] नायक के रुप में अपनी पहली ही फिल्म में इन्हे उत्कृष्ट अभिनय के लिये
राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया परन्तु इन्होने सत्तर के दशक के एक सुपर स्टार
की एक फिल्म में दो मिनट से भी कम समय का एक शराबी का रोल भी
किया था, बाद में ये भी सुपर स्टार रहे। ये कौन हैं? चाहें तो उपरोक्त्त
दोनों फिल्मों के नाम भी याद कर लें।

[2] इन्होने अधिकतर हास्य उत्पन्न करने वाले रोल्स ही किये परन्तु निजी जीवन
में ये हॉरर फिल्मों के दीवाने थे। इन्होने फिल्में बनायी भीं और निर्देशित भी
कीं, इन्होने एकाधिक शादियाँ कीं और कुछ फिल्मों में इन्होने अपनी पत्नी के
साथ भी काम किया। इन्होने एक ऐसी फिल्म में काम किया था जिसमें फिल्म
का नायक इन्हे जिस नाम से पुकारता था वह नाम बाद में इनका एक
निकनेम बन गया। बाद में एक भारतीय विश्व सुंदरी को लेकर इस नाम
के शीर्षक वाली एक फिल्म बनी।

[3] इन्होने लगभग पाँच साल की अवधि के अंदर ही एक ही अभिनेत्री के पति,
प्रेमी, पिता और ससुर का रोल अलग अलग फिल्मों में किया।

[4] इन अभिनेता ने अपनी पहली फिल्म में कुछ मिनटों की अवधि वाली भूमिका
निभाई। इस फिल्म की अभिनेत्री को अभिनय तो नहीं परन्तु एक दूसरे ही
क्षेत्र में किये कार्य के कारण अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का पुरस्कार मिला और और
अब ये और अभिनेता दोनों ही अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शख्सियत हैं।

[5] इन अभिनेता को एक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति वाले व्यक्ति की
भूमिका, ऑडिशन देने के बावजूद निभाने को नहीं मिली पर ड्रामा और फिल्म
स्कूल में ट्रेनिंग के समय से ही वे दिल्ली के रहने वाले एक प्रसिद्ध
ऐतिहासिक व्यक्ति का रोल करना चाहते थे और उन्हे वह रोल मिल ही गया
हालाँकि वह रोल एक प्रसिद्ध टीवी सीरियल में निभाने को मिला। बाद में एक
फिल्म में उन्हे वह रोल भी करने को मिल गया जो उन्हे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म में
नहीं मिल पाया था।

[6] इन्होने और देव आनंद की एक फिल्म से शुरुआत करने वाले एक
अभिनेता ने एक ही शीर्षक और विषय वाली दो फिल्मों में एक जैसा चरित्र
निभाया। इन्होने सिर्फ एक ही फिल्म का निर्देशन किया और उस फिल्म को
अमिताभ बच्चन और हेमा मालिनी अभिनीत एक हिट फिल्म के लिये एक
प्रेरणा स्त्रोत माना जा सकता है।

[7] ये अकेले ऐसे भारतीय अभिनेता रहे जिन्हे अंतर्राष्ट्रीय स्तर का एक पुरस्कार
एक रोचक श्रेणी में दिया गया। वैसे इन्होने एक बार ऐसा काम भी किया जो
दिवंगत अमजद खान द्वारा किये गये एक प्रसिद्ध काम से सम्बंध रखता था।

[8] इनमें और हॉलीवुड के एक एक्शन फिल्म स्टार, जिनकी लिखी एक फिल्म
का ऑस्कर में नामांकन हुआ था, में एक समानता है। इनके माता पिता,
मामा और जीजा भी फिल्मों से सम्बंधित रहे हैं।

[9] इन अभिनेता के फिल्मी जीवन में और हॉलीवुड के स्टार्स मार्लन ब्रांडो,
डस्टिन हॉफमैन के फिल्मी जीवन में कुछ एक जैसा है।

[10] इन्होने भारत के एक जाने माने अभिनेता के साथ सिर्फ दो ही फिल्मों में
काम किया। पहली फिल्म में वे प्रसिद्ध अभिनेता के भाई बने और दूसरी में
दोस्त और दुश्मन दोनों बने। इन्होने मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर बनी एक
फिल्म में भी काम किया।

[11] सालों एक मशहूर अभिनेता रहने के बाद इन्होने अपने द्वारा निर्देशित पहली
फिल्म में भारत की एक दुश्मन देश के साथ लड़ाई को पृष्ठभूमि में रखा और
उसमें नायक की भूमिका भी निभाई। एक निर्माता और निर्देशक के रुप में ये
समसामायिक विषयों पर फिल्में बनाने के लिये प्रसिद्ध रहे। अपने द्वारा
निर्मित दो फिल्मों में इन्होने गेरुये वस्त्र धारण किये।

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