Posts tagged ‘Pt. Nehru’

अगस्त 30, 2016

‘प. नेहरु’ का पत्र ‘डा. राम मनोहर लोहिया’ के नाम

NehruLohiaसमाजवादी चिन्तक और राजनेता डा. राम मनोहर लोहिया, ब्रिटिश राज से स्वतंत्रता पाए भारत में, इसके प्रथम प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरु के घनघोर राजनीतिक आलोचक रहे| परन्तु ब्रिटिश राज से आजादी से पूर्व दोनों बड़े नेताओं के मध्य कैसे संबंध थे यह डा. लोहिया को लिखे प. नेहरु के व्यक्तिगत पत्र से पता लगता है|

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मई 23, 2013

अमिताभ बच्चन का हिंदी प्रेम : असली नकली?

Amitabhलगता है भारत में लोगों के जीवन में वाकई बोरियत आ गयी है या कि भीषण गर्मी का असर है| जनता का एक तबका इसी बात पर न्यौछावर हुआ जा रहा है कि श्री अमिताभ बच्चन ने कान फेस्टीवल में हिंदी में अपना भाषण/संबोधन बोला/पढ़ा? अमिताभ बच्चन इलाहाबद में जन्मे, पिता उनके हिंदी के लेखक, और वे पढ़ाते भले ही अंगरेजी रहे हों, पर जीवन में सम्मान और उच्च पद उन्हें हिंदी की बदौलत ही प्राप्त हुए| प्रो. ड़ा हरिवंश राय बच्चन के पास इतना धन तो था हे कि वे अपने दो बेटों को शेरवुड जैसे पब्लिक स्कूल में पढवा पाए और उन्हें अंग्रेजी में भी पारंगत करवा दिया| अमिताभ को भी सारी धन-संपदा, मान- सम्मान हिंदी फिल्मों में काम करने से ही प्राप्त हुआ है पर वह वक्त बहुत पुराना नहीं हुआ है जब इस बात की चर्चा की जाती थी कि अमिताभ अंग्रेजी बहुत अच्छी बोलते हैं| यह समझ से परे है कि अमिताभ के कान में हिंदी बोलने पर इतना बवाल क्यों? अमिताभ ऐसे हिंदी प्रेमी भे नहीं हैं| अगर होते तो अस्सी के दशक में जब उन्होंने बिलियर्ड चैम्पियनशिप में (शायद गीत सेठी जिस साल चैम्पियन बने उस साल) हिंदी में बोलते, या जब कि बम्बई में उन्हें सीए एसोसियेशन ने बुलाया मुख्य अतिथि के तौर पर तब वे हिंदी में बोलते (बोफोर्स तब चल ही रहा था, और एक सज्जन की टिप्पणी छपी थी कि- अंग्रेजी में कितना जबरदस्त बोलता है यह आदमी, बेचारे को गलत फंसा दिया)| अस्सी और नब्बे के दशक के ज्यादातर पुराने कार्यक्रमों में अमिताभ अंग्रेजी में ही बोलते दिखाई देंगे| क्यों? क्या इसलिए कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर कलाकार हिंदी में ही बोलते थे उस समय और अमिताभ को अलग दिखना था, एक अलग कुलीन छवि बनाए रखनी थी? नब्बे के दशक में जब अमिताभ ने फिल्मों से अस्थायी अवकाश ले लिया था तब पत्र-पत्रिकाओं में उनके एक अंग्रेजी साक्षात्कार के बड़ी चर्चा थी क्योंकि उसमें उन्होंने अंग्रेजी डिक्शनरी में उपस्थित (उस वक्त) सबसे बड़ा शब्द- Floccinaucinihilipilification, प्रयुक्त किया था| उस वक्त अमिताभ के चर्चे ऐसे अभिनेता के रूप में ही थे जो हिंदी फिल्मों का बड़ा सितारा है और जो बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलता है|
नब्बे के दशक में जब हिंदी भाषी अभिनेताओं के अंग्रेजीदां पुत्र नायक बन हिंदी फिल्मों पर छ गये और पिछले बीस-पच्चीस सालों में ज्यादातर अभिनेता और अभिनेत्रियां अंग्रेजी ही बोलने, लिखने और पढ़ने वाले हो गये तो अमिताभ के हिंदी की चर्चा भी जोर पकड़ने लगी| क्या अब हिंदी पर उनका इतना जोर व्यवसायिक कारणों से नहीं है? अमिताभ के सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिंदी में बोलने के ग्राफ का संबंध उनके जीवन में आर्थिक पतन (ऐ.बी.सी.एल के डूबने) और फिर के.बी.सी के कारण उत्थान से भी जोड़ा जा सकता है| के.बी.सी में जन-साधारण से हिंदी के कारण बार्तालाप से बढ़ी उनकी प्रसिद्धि का बहुत बड़ा हाथ है उनके हिंदी प्रेम के पीछे|

अगर वे इतने हिंदी प्रेमी होते तो उनके बेटे – अभिषेक और बेटी-श्वेता, हिंदी में तंग हाथ वाले न होते| अमिताभ के हिंदी प्रेम को हार पहनाकर उस दिन सम्मान देना उचित न होगा जिस दिन अभिषेक बच्चन बिना तैयारी के मौके पर ही धाराप्रवाह सही हिंदी में पांच मिनट बोल लें? क्या अमिताभ की जिम्मेवारी इतना कहने भर से खत्म हो जाती है कि वे तो अभिषेक से खूब कहते हैं कि हिंदी पर पकड़ मजबूत बनाओ – (कई सालों से अभिषेक कोशिश भी कर रहे हैं, और तरक्की भी की है उन्होंने)| पर इसके मूल में भी यही बात है कि अभिषेक को हिंदी फिल्मों में काम करके जीविकोपार्जन करना है इसलिए अमिताभ को इस बात कि चिंता है कि अभिषेक को सही हिंदी सीखनी चाहिए जिससे वह अपने साथी कलाकारों से आगे रह सके| अगर अमिताभ को हिंदी की चिंता होती तो वे बचपन से इस बात पर ध्यान देते (जैसे उनके पिता ने उन पर दिया होगा)| अभिनय को क्यों इतना तूल दिया जा रहा है? ज्यादातर दुनिया के सभी अभिनेता वैश्विक आयोजनों में अपनी भाषा में ही बोलते हैं| अमिताभ ने हिंदी में बोल दिया तो क्या गजब कर दिया| क्या हिन्दुस्तानी वेशभूषा भे उन्होंने पहनी अपना भाषण देते हुए?

वास्तव में पहले उन्होंने नफीस अंग्रेजी में अपनी बात कही और फिर हिन्दुस्तानियों के लिए वही बात हिंदी में भी बोली| या सारा मामला पी.आर गतिविधियों का है?


 

अगस्त 14, 2011

तिरंगा : किस मुँह से फहराओगे, किस मुँह से देखोगे?

केसरिया रंग

हमारे तिरंगे का मुकुट
कट्टरता का प्रतीक बन गया है
पार्कों-स्कूल के मैदानों पर
तिरंगे का काम ही क्या?

भगवा झंडों के साये में
अस्त्र-शस्त्र चालन प्रक्षिक्षण शिविर
गवाह हैं जगाई जाती नफरतों के
जहाँ से केसर की खुशबु फैलनी चाहिये थी
बमों के विस्फोट हो रहे हैं
स्वर्ग को नरक बना दिया है नफरतों ने।

सफेद रंग

हमारे तिरंगे का ह्रदय
काले को सफ़ेद करने का जादू भर है आज
मोती तोंद वाले सफेदपोश
सिल्क खादी की जगमगाहट के पीछे
अपनी तमाम काली करतूतें
आसानी से छिपाए हुए हैं
सफेद वो सियाही है
जिसके लिखे स्विस खातों के नम्बर
किसी से नहीं पढ़े जाते
हाँ,

बीच का चक्कर

ज़रूर घूम रहा है
दलाली, कमीशन और घोटालों की
पहचान बन कर
दरसल आज़ादी के ये ही रसफल
हमसे चुनाव लड़वाते हैं
हिस्ट्रीशीटरों को नेता बनवाते हैं।

हरा रंग

हमारे तिरंगे की बुनियाद
गाँवों से लाता था हरियाली की मजबूती
खेतों में मासूमियत की खाद से
गहराती थी अपने पाक संस्कारों की जड़ें
उस विशाल वृक्ष तले अपनत्व की शीतल छाँव थी
शहरियत के कंक्रीट जंगल ने
मशीनी धुंआं फेंकते दानवों का
शोर उगा दिया है
पक्षियों की कलरव के स्थान पर
अपने-अपने सीमेंट के दडबों में बंद हुआ आदमी
भूल चला है सभी संवेदनाए
राजा हरीश चन्द्र का किस्सा अब किसे लुभाता है
आज नए  दौर के हीरो राजा–राडिया-कलमाड़ी-रेड्डी-येद्दयुरप्पा हैं
बेईमानी के हमाम में सभी नंगे
घोटालों–घूसखोरी की फसलें काट रहे हैं
रूपये-डालर-मार्क–येन-मार्क-पौंड का हिसाब
स्विस बैंको में है दफन।

एक बूढ़ा नैतिकता की बात कर रहा है
नूराकुश्ती में मग्न पक्ष भी, विपक्ष भी
सब होंठों तले हंस रहे हैं।

मेरे दोस्तों! स्वतत्रता दिवस बहुत मुबारक
क्या तुम्हे कल ज़रा भी ख्याल आएगा
किस मुँह से पी.एम.फहरायेंगे तिरंगा?
किस मुँह से तुम देखोगे तिरंगे को?

(रफत आलम)

मई 27, 2011

नेहरु, ओशो और हिंदी फिल्में

आज भारत के पहले प्रधानमंत्री प. जवाहर लाल नेहरु की पुण्यतिथि है। 1948 की 30 जनवरी को गाँधी की हत्या के बाद भारत के लिये प. नेहरु का चले जाना बहुत बड़ा आघात था। गाँधी के बाद सरदार पटेल भी जल्दी ही धरा छोड़ गये और बहुत सारे अन्य स्वतंत्रता सेनानी भी पचास के दशक में जीवन का त्याग कर गये परंतु देश में नेहरु की उपस्थिति ने एक आशामायी मोर्चा संभाला हुआ था। वे निरंतर भारत को लोकतांत्रिक, आधुनिक, प्रगतिवादी, और स्वावलम्बी बनाने की ओर प्रयासरत थे और उनके द्वारा निर्मित की गयी नीवों पर बाद में विशाल इमारतें खड़ी हो गयीं और आज बहुत सारे क्षेत्रों में भारत समर्थ दिखायी देता है तो उसका बहुत सारा श्रेय प. नेहरु की दूरदृष्टि को भी जाता है।

जब एक बहुत बड़े कद का नेता सक्रिय राजनीति के कारण प्रशासन में सीधे सीधे बड़ा पद ग्रहण करता है तो स्वाभाविक रुप से उसके चारों तरफ उसके विरोधी भी उत्पन्न हो जायेंगे। प. नेहरु भी इस प्रतिक्रिया से अछूते नहीं रहे। उनके प्रधानमंत्री बनते ही उनके विरोधी गुट भी सक्रिय हो गये थे। लोकतंत्र में ऐसा होना भी चाहिये। पर जैसा विश्वास भारत की जनता को प. नेहरु पर था वैसा किसी अन्य प्रधानमंत्री पर कभी नहीं बन पाया। कश्मीर और चीन के भारत पर आक्रमण के मुद्दे को लेकर बहुत सारे लोग और संगठन नेहरु को हमेशा से ही निशाना बनाते रहे हैं और कई बार तो इन मुद्दों को लेकर कुछ अतिवादी संगठन हद पार करके असंसदीय और अलोकतांत्रिक किस्म की बातें नेहरु के बारे में फैलाते रहे हैं। लघु काल के लिये वे अपने दुष्प्रचार में सफलता पाते भी दिखायी देते रहे हैं पर भारत प. नेहरु से दूर नहीं जा सकता। प. नेहरु का न तो व्यक्तित्व ही इतना हल्का था और न ही उनका दृष्टिकोण इतना छोटा था कि उनकी प्रासंगिकता भारत से खत्म हो जाये।

आज जब चारों तरफ आदिवासी इलाके जल रहे हैं तब भी नेहरु की नीति की याद हो आती है। उनके जैसा प्रधानमंत्री भारत में 90 के दशक में होता, जबकि भारत आर्थिक, साम्प्रदायिक और जातीय आधार पर उथल-पुथल से गुजरकर लड़खड़ा रहा था, तो भारत में एकता और अखण्डता इस तरह से विखण्डित न नज़र आती जैसी कि आज के दौर में नज़र आ रही है।

ओशो बुनियादी तौर पर ही राजनीतिज्ञों के खिलाफ थे और सारी उम्र वे उनके खिलाफ बोलते ही रहे। उन्हे निशाना बनाते रहे। उनके ऊपर चुटकले बनाकर लोगों को शासकों की इस जाति के सामने मानव को आँखें मूँद कर समर्पण न कर देने के लिये चेताते रहे। अगर दुनिया में किसी एक राजेनीतिज्ञ को ओशो ने पसंद किया तो वे प. नेहरु ही थे।

अपने संस्मरणों में प. नेहरु के बारे में ओशो कहते हैं –

… जीवन में पहली बार मैं हैरान रह गया। क्‍योंकि मैं तो एक राजनीतिज्ञ से मिलने गया था। और जिसे मैं मिला वह राजनीतिज्ञ नहीं वरन कवि था। जवाहर लाल राजनीतिज्ञ नहीं थे। अफसोस है कि वह अपने सपनों को साकार नहीं कर सके। किंतु चाहे कोई खेद प्रकट करे, चाहे कोई वाह-वाह कहे, कवि सदा असफल ही रहता है यहां तक कि अपनी कविता में भी वह असफल होता है। असफल होना ही उसकी नियति है। क्‍योंकि वह तारों को पाने की इच्‍छा करता है। वह क्षुद्र चीजों से संतुष्‍ट नहीं हो सकता। वह समूचे आकाश को अपने हाथों में लेना चाहता है।…

…एक क्षण के लिए हमने एक दूसरे की आंखों में देखा। आँख से आँख मिली और हम दोनों हंस पड़े। और उनकी हंसी किसी बूढ़े आदमी की हंसी नहीं थी। वह एक बच्‍चे की हंसी थी। वे अत्यंत सुदंर थे, और मैं जो कह रहा हूं वही इसका तात्‍पर्य है। मैंने हजारों सुंदर लोगो को देखा है किंतु बिना किसी झिझक के मैं यह कह सकता हूं कि वह उनमें से सबसे अधिक सुंदर थे। केवल शरीर ही सुंदर नहीं था उनका।…

…अभी भी मैं विश्‍वास नहीं कर सकता कि एक प्रधानमंत्री उस तरह से बातचीत कर सकते है। वे सिर्फ ध्‍यान से सुन रहे थे और बीच-बीच में प्रश्न पूछ कर उस चर्चा को और आगे बढा रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे चर्चा को सदा के लिए जारी रखना चाहते थे। कई बार प्रधानमंत्री के सैक्रेटरी ने दरवाजा खोल कर अंदर झाँका। परंतु जवाहरलाल समझदार व्‍यक्‍ति थे। उन्‍होंने जान बूझ कर दरवाजे की ओर पीठ की हुई थी। सैक्रेटरी को केवल उनकी पीठ ही दिखाई पड़ती थी।

परंतु उस समय जवाहरलाल को किसी की भी परवाह नहीं थी। उस समय तो वे केवल विपस्‍सना ध्‍यान के बारे में जानना चाहते थे।…

…जवाहरलाल तो इतने हंसे कि उनकी आंखों में आंसू आ गए। सच्‍चे कवि का यही गुण है। साधारण कवि ऐसा नहीं होता। साधारण कवियों को तो आसानी से खरीदा जा सकता है। शायद पश्‍चिम में इनकी कीमत अधिक हो अन्‍यथा एक डालर में एक दर्जन मिल जाते है। जवाहरलाल इस प्रकार के कवि नहीं थे—एक डालर में एक दर्जन, वे तो सच में उन दुर्लभ आत्माओं में से एक थे जिनको बुद्ध ने बोधिसत्‍व कहा है। मैं उन्‍हें बोधिसत्‍व कहूंगा।…

…मुझे आश्‍चर्य था और आज भी है कि वे प्रधानमंत्री कैसे बन गए। भारत का यह प्रथम प्रधानमंत्री बाद के प्रधानमंत्रियों से बिलकुल ही अलग था। वे लोगों की भीड़ द्वारा निर्वाचित नहीं किए गए थे, वे निर्वाचित उम्मीदवार नहीं थे—उन्‍हें महात्‍मा गांधी ने चुना था। वे महात्‍मा गांधी की पंसद थे।

और इस प्रकार एक कवि प्रधानमंत्री बन गया। नहीं तो एक कवि का प्रधानमंत्री बनना असंभव है। परंतु एक प्रधानमंत्री का कवि बनना भी संभव है जब वह पागल हो जाए। किंतु यह वही बात नहीं है।

तो मैं ने सोचा था कि जवाहरलाल तो केवल राजनीति के बारे में ही बात करेंगे, किंतु वे तो चर्चा कर रहे थे काव्‍य की और काव्यात्मक अनुभूति की।…

पचास और साठ के दशक तक हिंदी सिनेमा भी नेहरु के विशाल व्यक्तित्व के प्रभाव से अछूता नहीं रहा और हिंदी फिल्मों के नायकों का चरित्र भारत को लेकर नेहरुवियन दृष्टिकोण से प्रभावित रहा और उसमें चारित्रिक आदर्श की मात्रा डाली जाती रही।

उन सालों में भारतीय लोगों और बच्चों में प. नेहरु के लिये कितना आकर्षण था इस बात को भी अब दिल्ली दूर नहीं (1957) और नौनिहाल (1967) फिल्म में दिखाया गया है।

नौनिहाल में तो प. नेहरु की मृत्यु के बाद उनकी शवयात्रा पर उमड़े जन-सैलाब की असली फुटेज इस्तेमाल की गयी थी। गाँधी की मृत्यु के बाद नेहरु की मौत पर ही इतना व्यापक जन समूह जुटा था और शोक की ऐसी विश्वव्यापी लहर उठी थी।

आज भारत में बहुत कुछ जो विकसित हुआ है और बहुत कुछ जो अच्छा दिखायी देता है, उसमें बहुत बड़ा योगदान प्रथम प्रधानमंत्री नेहरु के प्रगतिवादी दृष्टिकोण का भी है। प्रशासन चला रहा व्यक्ति कुछ ऐसे निर्णय भी लेगा जो शायद उतने लाभकारी न सिद्ध हो पायें जितने कि लोगों ने सोच रखे थे और फिर नेहरु जैसे बड़े नेताओं से लोगों की अपेक्षायें भी साधारण नहीं रहतीं।

किसी भी कोण से और किसी भी कसौटी पर रखकर, मगर ईमानदारी और निष्पक्षता से, परखा जाये, प. नेहरु भारत के सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री रहे हैं। वे भारत के इतिहास के एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति बन चुके हैं।

उनके द्वारा किये गये कार्यों से लोकतांत्रिक भारत को जो लाभ पहुँचे हैं उनके लिये नमन है ऐसी विभूति को।

अप्रैल 7, 2011

प्राण जाये मगर अब तो लड़ जायेंगे

ऊबी आँखों में टूटी हुयी नींद है
रंग अलग सा अलग सी है जीवन की लय
बेहिची, बेदिली, बेकली औसतन
सड़ते गलते हुये सूखे बदन
हँस लिये रो लिये
पी लिये लड़ लिये
ज़िंदा रहना था
करके रहे सौ जतन।

साँस लेना था खूँ को पसीना किया
हाथ शर हो गये, पाँव घिसते रहे
रोशनी के लिये, ज़िंदगी के लिये
रात दिन एक चक्की में पिसते रहे।

आग उगलती हुयी जलती बंजर जमीं
जनम से अब तक जल रहे हैं शरीर
नर्क क्या है कहाँ है कौन जाने है ये
नर्क जैसी जगह पर पल रहे हैं शरीर।

जीने मरने के चक्कर का अंजाम क्या
ये समय क्या, सवेरा क्या शाम क्या
रीत कैसी है ये, क्या तमाशा है ये
कैसा सिद्धांत, कैसा ये इंसाफ है
कितने दिल हैं कि जिनमें है चिंगारियाँ
देखने को सभी कुछ बहुत शांत है।

सिर छुपाने को छाया नहीं न सही
बस ही जायेगी बस्ती कोई फिर नयी
अपने हाथों में चक्की है बाकी अभी
ज़ुल्म के काले डेरे उखड़ जायेंगे
सह चुके हम बहुत अब न सह पायेंगे
न सह पायेंगे
प्राण जाये मगर अब तो लड़ जायेंगे।

काली रातों के पीछे सवेरा भी है
कोई सुंदर भविष्य तेरा मेरा भी है

(मदहोश बिलग्रामी)

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