आम तो आम खटास के भी दाम

mangoes

‘आम के आम गुठलियों के दाम’ और ‘आम फलों का राजा है’ इन दो कथनों से हरेक हिंदी भाषी भली-भांति परिचित रहता है| ये भी सच है कि मौसम में आम ही नहीं बौराते बल्कि आम की आमद होने पर इसके प्रशंसक भी बौरा जाते हैं| जैसे ही आम के वृक्षों पर बौर आने शुरू होते हैं और हवा के संग संग इनसे उठने वाली भीनी भीनी सुगंध इधर उधर तैरने लगती है, आम के चाहने वालों के दिमाग की घंटियाँ बजनी शुरू हो जाती हैं और भले ही वे दिन अब चले गये जब लोग ऐसी चाहतों का इजहार कर दिया करते थे, पर मन ही मन उस दिन का इन्तजार करने का समय तो अभी बीता नहीं है जब आम उनके मुंह के रास्ते दिमाग को शान्ति और आनंद प्रदान करेंगे| इतंजार की तीव्रता गहन होती जाती है डाल पर आमों को लटकता देख कर| आम के पेड़ों पर लदान करते ही एक भय यह भी समाने लगता है कि कहीं तोटे और अन्य पक्षी और बंदर कच्चे आमों को ही न नष्ट कर दें| या कही आंधी तूफ़ान ही आम के फसल को नष्ट न कर दे| इन सब भय को पार करके ही आनंदित करने वाले आम मिलने वाले होते हैं|
पर यह सब तो आम के उन भक्तों का आँखों देखा और खुद भुगता हाल है जो इतने सौभाग्यशाली हैं कि आमों को अपने आँखों से शून्य से प्रकट होते देखते हैं और अंत में उनका रस्सावादन करते हैं| अब तो तादाद उन भक्तों की ज्यादा है जो शहरों में कंक्रीट के जंगलों में वास करते हैं और ठेलों पर या सब्जी और फलों की दुकानों पर आम रखने होने से ही उन्हें आम की आमद का पता चल पाता है| इन भक्तों में ऐसे उत्सुक भी होते हैं जो अपने वाहन से कहीं की यात्रा करते हुए सड़क किनारे (ज्यादातर किसी आम के बाग-बगीचे के पास) लगे आम के ठेलों के पास रुकने और आम खरीद कर उन्हें खाने का मोह छोड़ नहीं पाते हैं|
पर मार्के की बात यह कि ताजा फसल वाला आम तो बहुत कम लोगों को नसीब हो पाता है| बागों के बाहर भी लोग वही आम बेचते पाए जाते हैं जो वे मंडी से खरीदते हैं और मंडी को नियंत्रित करते हैं व्यापारी और व्यापारी तो आम का भक्त है नहीं, वह तो भक्त है पैसे का और पैसा का मुरीद होने के नाते इतना रिस्क तो वह उठा नहीं सकता कि आम को पकने के लिए पेड़ों पर छोड़ दे और जब वे खाने लायक हो जाए तब उन्हें बेचे, या कम से कम अखबार और भूसे में कुछ दिन रख कर पकाने जैसे पुराने ग्रामीण और बहुत हद तक प्राकृतिक तरीके का इस्तेमाल करे| इतना धैर्य व्यापारी में कहाँ और इस विधि में उसका नियंत्रण बहुत रह नहीं पाता सो वह तो विश्वास करता है कच्चे आम को इकट्ठा करके रसायनों वाले कृत्रिम तरीके से पकाने में| इससे एक तो विधि पर उसका नियंत्रण रहता है और अब बाजार आम की पूर्ती और उसके मूल्य पर पूरा पूरा नियंत्रण रख सकता है और रखता है|
अब तो बिरले ही लोग हैं जो आम के प्राकृतिक स्वाद का आनंद ले सकते हैं| इन बिरलों में कुछ ऐसे हो सकते हैं जो बाग में काम कर रहे हैं वरना अधिकतर वे धनी लोग हैं जिनके पास आम के बाग हैं| अब धनी ही लोग ऐसे बचे हैं जो आम की भिन्न भिन्न किस्मों का आनंद उनके लिए अधिकृत विधि से ले सकते हैं| बाकी लोगों को तो अब बाजार से पिलपिले या एकदम ठोस किस्म के आम खरीद कर खाने पड़ते हैं और आम के हर टुकड़े के साथ निराश मन के साथ यह दोहराना पड़ता है –

क्यों तुझ संग प्रीत लगाईं बेवफा

बाजार में उपलब्ध ‘आम’ की हरेक किस्म का ऐसा ही बुरा हाल है| न केवल उनके रूप-रंग से बल्कि उनके स्वाद से भी खूबसूरती नदारद है|

कुछ ऐसे सब्जी और फल बेचने वाले समूह भी हैं जो दावे करते हैं कि उनके यहाँ फलों को रसायन या अन्य क्रत्रिम तरीकों से नहीं पकाया जाता पर क्या ये दावे वास्तविकता पर आधारित हैं? क्या संबधित सरकारी विभाग की जिम्मेवारी नहीं बनती कि ऐसे दावों की जांच करे?
ऐसे आउटलेट्स पर बिकने वाले आम खरीदिए उसे चाकू से काटिए, हो सकता है ऊपर से मीठा निकले पर जैसे जैसे आम खाने वाला गुठली की तरफ बढ़ेगा, आम के गुदे का रंग पीला होता जाएगा और स्वाद खट्टा और गुठली के एकदम ऊपर की परत तो एकदम पीली (कच्चे आम का रंग) और स्वाद में नींबू जैसी खटास लिए हो सकती है| प्राकृतिक तरीके से पकाए आम में ऐसे भेदभाव तो नहीं मिलते! फिर ये क्या गोरखधंधा है?
क्या यह भारत जैसे कृषि अर्थव्यस्था पर आधारित देश के लिए शर्मनाक बात नहेने है कि देशवासी ही अच्छा आम नहीं खा सकते| वैसे और बहुत सारी सब्जियों और और फलों की किस्मों की तरह अच्छे भारतीय आम पूरी शान से विदेशी बाजारों में उपलब्ध हो जायेंगे| मिट्टी पानी देश का और आम जैसे राष्ट्रीय फल आनंद दे विदेशियों को|
अब समय आ गया लगता है जब आम के बागों और आम की दुकानों के बाहर निर्देश पट्टिका लगा देना चाहिए

यह ‘आम’ रास्ता नहीं है| कृपया, ‘आम’ आदमी दफा हो जाए

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