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दिसम्बर 13, 2013

सफाई बाबा…

safai baba 2-001चौंकना स्वाभाविक बात है जब सुबह उठकर हमेशा गंदी रहने वाली सड़क साफ़ दिखाई दे| ऐसा नहीं कि पहले बहुत साफ़ सुथरे रहते थे भारत के शहर और गाँव-कस्बों के गली-कूचे और मोहल्ले, पर पौलीथीन बैग्स के आगमन के बाद और लगभग हर सामान छोटे छोटे प्लास्टिक पाउच में मिलना आरम्भ होने के बाद तो हिन्दुस्तान की हर जगह की हर सड़क सिर्फ कूड़े से लबलबाती नज़र आती है|

ऊपर से भारतीयों का कुत्ते पालने का शौक| रहने को फ़्लैट भी मुश्किल से मयस्सर हो पा रहे हैं पर बंगलों में रहने वाले अंग्रेजों के शौक हम भारतीयों ने पोषित कर लिए हैं| और फिर दिक्कत क्या है – कुत्तों से गंदा करवाने के लिए सड़कें तो हैं ही| कुत्ते को सड़क पर लेकर निकल आइये और इधर उधर देख जब कोई न देख रहा हो तब कुत्ते को कहीं हल्का होने दीजिए| पुरुष तो पहले ही कहीं भी हल्के होने के लिए खड़े हो ही जाते हैं, उनके लिए ( और शायद सरकारों के लिए भी, जो इस ओर ध्यान नहीं देती और जन-सुविधाएँ नहीं बनवातीं) तो पूरा देश शायद मूत्रालय ही है|

कुत्तों के लिक्विड यूरिया के वेस्ट ट्रीटमेंट का जिम्मा सड़क पर खड़े वाहनों का होता है और कुत्तों के सौलिड वेस्ट मैनेजमेंट का भार सड़क, सड़क किनारे की कच्ची-पक्की जमीन (फुटपाथ) और नीचे देख न चल पाने वाले लोगों के जूतों और चप्पलों पर रहता है|

भांति भांति के कूड़े घरों से निकल सड़कों की शोभा बढाते रहते हैं| किसी राज्य में किसी की सरकार हो, नगर निगम किसी दल का हो या निर्दलियों से भरा हो, सफाई अब इनके कर्तव्यों से बाहर की वस्तु है| इनके पुनीत कर्तव्य क्या हैं इसे उनके मतदाता भी नहीं जानते जो इन्हें चुनते हैं| ऐसे ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जिनकी सात पुश्तों में किसी ने कभी झाडू को हाथ नहीं लगाया पर उनके निठल्ले रिश्तेदारों के नाम सफाई कर्मचारियों को निर्धारित वेतन हर माह आ जाता है| सफाई तो किन्ही और लोगों का काम है|

नवम्बर के अंत और दिसम्बर के शुरू में ठण्ड न इतनी अधिक होती है कि रात या सुबह घर में अंदर ही दुबक कर बैठे रहें और न ही इतनी कम होती है कि सड़क पर ही चहलकदमी करते रहें|

हर आदमी की अपनी सनक होती है और उसका दिमाग किसी किसी मामले में औरों से ज्यादा चलता है| एक सुबह ऐसा पाया कि घर के सामने वाली सड़क अपेक्षाकृत साफ़ लग रही है तो हल्का आश्चर्य हुआ| कालोनी वाले तो चौकीदार तक के लिए चन्दा देने को तैयार नहीं सफाई कर्मचारी रखने के लिए कौन जेब ढीली करेगा?

जब अगली सुबह पहले से भी ज्यादा साफ़ सड़क नज़र आयी तो आश्चर्य की मात्रा भी बढ़ गई|

अडोस पड़ोस में एक दो से पूछा तो उन्होएँ साफ़ सड़क देख संतोष जाहिर किया और मामले में रूचि न ली| एक सज्जन ने सोचा और विचार प्रकट किया कि हो सकता है हर व्यक्ति ने अपने घर के बाहर सफाई की हो या करवाई हो| उनसे पूछा कि क्या उन्होंने ऐसा किया अपने घर के सामने तो उन्हें अपने सिद्धांत की सच्चाई पर सौ प्रतिशत संदेह हो आया| वे भी जानते थे कि इस कालोनी के लोग वे हस्ती हैं जो  मौक़ा मिले तो एक हफ्ते में ग्रीस का गाजीपुर डेरी बना डालें|

लगातार तीन सुबह जगह जगह कूड़े से सजी गली अगर साफ़ दिखाई दे तो आँखों से जिसे सही दिखता हो और दिमाग की खिड़की जिसकी खुली हो उसे तो बात की गंभीरता दिखाई देगी ही|

इन सफाई हादसों की चौथी रात, कोई पौने बारह बजे का समय होगा, कम्प्यूटर पर पढते पढते और काम करते करते आँखें भी थक गई थीं और हाथ की मासपेशियाँ भी एक खुली अंगड़ाई का खिंचाव मांगती थीं| हर ओर लगभग सन्नाटा सा पसरा था|

उठकर पानी पीया और मध्यम  आवाज में एफ.एम रेडियो चालू किया तो प्रस्तोता अपनी लगातार बकबक से कूड़ा बिखेर रहा था पर अच्छी बात यही कि ऐसे कूड़े में फेंक देने के हकदार कार्यक्रम में भी बीच बीच में अच्छे गीत  सुनने को मिल जाते हैं|

प्रस्तोता की तथ्यहीन बकवास बंद हुयी तो गीत शुरू हुआ…  श्री 420 फिल्म का शैलेन्द्र लिखित, मुकेश द्वारा गाया  गीत शुरू हुआ|…

मेरा जूता है जापानी ये पतलून इंग्लिस्तानी

सर पे लाल टोपी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी

….

गीत के सौंदर्य में मन खोया ही था कि इसकी एक पंक्ति  ‘निकल पड़े हैं खुली सड़क पे अपना सीना ताने’ सुनकर दिमाग की चेतना के दरवाजे खुलो गये और सड़क की सफाई की बात याद आ गयी|

इच्छा हुयी कि जाकर सड़क को देखा जाए| कमरे से बाहर निकल पाया कि अच्छा अन्धेरा था| मेन गेट खोल कर सड़क पर पहुंचना हुआ तो  देखा कि घर के सामने ही नहीं अगल बगल तीन चार स्ट्रीट बल्ब नहीं जल रहे थे| गली के इस छोर से उस छोर तक कोई हलचल न दिखाई दी| मेन गेट बंद करके गली के घर के पास वाले मुहाने तक पहुँच अगली गली के सामने बने छोटे से पार्क तक जाने की इच्छा हुयी| पार्क भी सुनसान पड़ा प्रतीत होता था| पार्क न बहुत बड़ा था और न ही छोटा| चारों कोनों में एक एक स्ट्रीट लाईट जाली हुयी थी जो पार्क में थोड़ा थोडा प्रकाश बिखेर रही थीं| पार्क में बनी एक बैंच पर बैठना हुआ तो उसकी ठंडक ने सूचित किया कि मौसम में ठण्ड बढ़ती ही जायेगी दिन प्रति दिन|

बैठे बैठे आँखें बंद हो गयीं| कुछ समय बाद एकदम से चेतना लौटी तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो कुछ ही पलों के लिए सही पर एक गहन निद्रा छा गई थी मन-मस्तिष्क पर| आँखें खोलीं तो पार्क के सामने वाले हिस्से पर पैदल चलने के लिए बने पक्के रास्ते पर एक साया हिलता डुलता दिखाई दिया| पहले तो वहीं बैठे बैठे देखने, जानने और पहचानने की कोशिश की कि इस वक्त कौन हो सकता है पार्क में| दूरी और सर्द रात के अँधेरे के कारण कुछ साफ़ साफ़ दिखाई नहीं दिया तो उत्सुकतावश उस ओर बढ़ चला|

साये से थोड़ा दूरी तक पहुँच रुक कर उसे देखा तो पाया कि वह झाडू से रास्ते को बुहार रहा था और रास्ते में पड़े कूड़े को उठा एक थैले में डाल  रहा था| इस ओर उसकी पीठ थी सो उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था पर उसके शरीर से ऐसा अनुमान लगाना मुश्किल न था कि साया किसी बुजुर्ग का था|

और पास पहुंचना हुआ तो आहट पाकर साया पलटा| वे वाकई एक बुजुर्गवार थे जो श्वेत वस्त्र धारण किये हुए पार्क की सफाई कर रहे थे| उनका चेहरा शान्ति के नूर से कांतिमान था|

अपने आप ही मुँह से निकला,”बाबा!… इतनी रात को आप यहाँ सफाई कर रहे हैं?”

बुजुर्ग ने मुस्कराकर देखा और काम में मशगूल रहे|

क्या आपने ही इस कालोनी की सड़कें पिछले दिनों साफ़ की थीं?

हाँ, बेटा!

आप अगर बुरां न माने, तो क्या आपसे पूछ सकता हूँ कि आप क्यों इस सफाई के काम में लगे हुए हैं और वह भी रात को?

वे रुक गये, और अपनी गहरी आँखों से देखते रहे| शायद उन्हें उत्सुकता सच्ची लगी हो, वे बोले आओ बेंच पर बैठते हैं|

बेंच पर बैठ कर वे बोले,”सीधे मुद्दे की बात करें तो इर्द-गिर्द सफाई हो तो अच्छा लगता है कि नहीं”|

जी, बिलकुल मन प्रसन्न हो जाता है सफाई देख कर और अगर सुबह सबह सफाई ही रहे आँखों के सामने तो दिन भर एक खुशनुमा एहसास छाया रहता है मन पर|

सफाई तो हरेक आदमी ओ अच्छी लगती होगी पर क्या कारण है कि हमारा देश एक कूड़ेदान में परिवर्तित होता जा रहा है|

जी, आपने सही कहा| चारों तरफ गन्दगी का ही साम्राज्य ही दिखाई देता है| शायद हम लोग खुद सफाई रखते नहीं है और इस काम के लिए जिम्मेदार विभागों के पास या तो कर्मचारी नहीं है, या अगर वे हैं तो वे काम करना नहीं चाहते या विभागों के पास पैसा नहीं है| या शायद नये दौर के कूड़े से निबटने के लिए हमारे पास न तो तकनीकी योग्यता है न ही दूरदृष्टि| अतः हमने अपने को कूड़े के साथ रहने के लिए अभिशप्त मान लिया है| घर के बाहर नालियां अत जाती हैं, बड़े नाले सडांध मारते रहते हैं,  पर हम घर बैठे सिर्फ इस बारे में नाक मुँह सिकोड़ कर शिकायत करते रहते हैं| करते कुछ नहीं| फिर एक बात और भी है कि हरेक आदमी के पास वक्त की कमी है और लगभग हरेक व्यक्ति सोचता है कि वही क्यों गंदगी में हाथ डाले|

मेरे अंदर शायद इस समस्या को लेकर बहुत कुछ दबा हुआ था इसलिए बुजुर्ग के पूछने पर वह लावे की तरह बह निकला|

अच्छा बेटा, एक बात बताओ| क्या किसी को अपने आप को साफ़ करना गंदा लगता है?

नहीं, हर आदमी अपने शरीर को स्वच्छ रखना चाहता है और इस ओर प्रयास करता ही है|

माता-पिता को क्या गंदा लगता है अपने बच्चे को साफ़ करना? या दूसरे शब्दों में कहें तो क्या गंदा हुआ बच्चा क्या माता-पिता को खराब लगता है? क्या उन्हें अच्छा महसूस नहीं होता अपने बच्चे को साफ़ करके? क्या माता-पिता का वात्सल्य भाव महत्वपूर्ण नहीं होता|

जी हाँ, आपने एकदम सही कहा|

बस बेटा, एक तो मुझे ऐसा लगा कि हमारा देश बेहद गंदा होता जा रहा है और इस काम की शुरुआत लोगों को खुद ही करनी पड़ेगी| मैं किससे कहता, किसे साथ लेता, मैंने अपने आप जो मुझसे हो सकता था उसे करने निकल पड़ा| दूसरे अब इस काम को करते करते मुझे इतना अरसा हो गया है कि मेरे अंदर ऐसी भावनाएं जन्म ले चुकी हैं जहां मुझे ऐसा ही लगता है कि मैं अपने बच्चों को ही साफ़ कर रहा हूँ| मेरे अंदर वात्सल्य भाव घर कर चुका है| मैं दिन-रात कभी भी समय पाकर किसी न किसी जगह सफाई में लग जाता हूँ| अब यही मेरे बचे जीवन का लक्ष्य है|

पर आप अकेले क्या क्या कर सकते हैं?

जितना कर सकता हूँ उतना तो करूँगा ही मरते दम तक| फिर मुझे लगता है कि जैसे गंदगी में रहने की आदत हो गयी है ऐसे ही जहां भी मैं कुछ दिन सफाई करता हूँ वहाँ रहने वाले लोगों को सफाई में रहने की आदत हो जायेगी और शायद किसी के अंदर सफाई करने की ज्योति जाग्रत हो जाए| शायद इस जगह तुम ही इस विरासत को आगे ले जाओ|

वे चुप हो गये|

मेरे मन ने प्रण किया कि उनका सफाई का यह अभियान अब रुकना नहीं चाहिए| क्या समिति बनाकर पूरी कालोनी की सफाई का जिम्मा लिया जाए?

वहीं खड़े खड़े प्रण ये भी किये कि जल,थल और वायु तीनों में से किसी को भी अपनी ओर से गंदा और दूषित नहीं करूँगा और ‘सफाई बाबा’ के इस मिशन को और आगे बढाने और ज्यादा लोगों में फैलाने का कार्य करूँगा|

मुझे मौन विचारों में मग्न देख, वे बोले|

अच्छा बेटा अब मैं अपना काम खत्म कर लूँ| उम्र हो चली है, बाद में कल को जीने के लिए ऊर्जा पाने के लिए आराम भी करना है|

वे उठे और सफाई के काम में लग गये|

समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूँ? क्या उनका हाथ बटाऊँ? पर सब कुछ इतना अप्रत्याशित ढंग से घटित हुआ था कि किंकर्तव्यविमूढ़ ही खड़ा रहा|

कुछ पल बाद होश आया तो देखा वे पार्क से जा चुके थे|

घर आकर सो गया|

सुबह सोकर उठा तो लगा कि रात शायद कोई सपना देखा था| भागकर पार्क गया तो पार्क का फुटपाथ वाकई साफ़-सुथरा था|

महसूस हुआ सपना तो नहीं था|

रात को फिर से पार्क, और आसपास की सड़कों पर उन्हें खोजा पर वे दिखाई नहीं दिए| अगली रात फिर से जाकर देखा पर उनसे मुलाक़ात न हो पायी|

शायद किसी और जगह अलख जगा रहे होंगे| मेरी तरह उन्हें कई और लोग मिलते रहे होंगे और मिलते रहेंगे और वे सबको अपने इरादों से स्वच्छ करते ही रहेंगे|

…[राकेश]

मई 10, 2013

मोहम्मद युसूफ खान : दिलीप कुमार क्यों बने?

Dilip_Kumarजनाब युसूफ खानउर्फ दिलीप कुमार साहब के साथ यह बड़ी विवादास्पद बात नहीं है कि वे  हाजी मस्तान, अब- मरहूम-पर-कभी बम्बई  में अपराध जगत के सरगना, के साथ बैठ कई आयोजनों में शिरकत कर चुके हैं, उसके साथ व्यक्तिगत मुलाक़ात के फोटो खिंचवा चुके हैं, या उसके दिखावटी समाजसेवी काम में उसकी मदद कर चुके हैं, (फोटो तो हाजी मस्तान के साथ उनके समकालीन और अभिनेताओं के भी हैं), या कि उन्होंने एक पत्नी-सायरा बानू, के रहते दूसरा निकाह ‘आस्मा बेगम‘ से कर लिया था, दूसरे कर्म के लिए तो सायरा बानू से भी उनकी सुलह हो ही गयी, और पहले कर्म की याद बहुत लोगों को है नहीं और तब से तो उनको ढेर सारे पुरस्कार मिल चुके हैं अतः सरकारों के लिए भी स्मगलर के साथ उनके फोटो की बात कोई ज्यादा मायने नहीं रखती होगी| ये दोनों ही गौण कारण है और भुलाए जा सकते हैं छोटी गलतियों के तौर पर|

DKHaji

उनका सबसे बड़ा गुनाह कुछ अलग किस्म का है| हालांकि वह उन्होंने  तब किया जब उनकी उम्र युवावस्था की दहलीज बस लांघ कर ही कुलांचे भरने लगी थी पर तब भी वह एक ऐसी गलती है जिसका खामियाजा हिन्दुस्तान को पिछले सात दशकों से भुगतना पड़ रहा है और न जाने आने वाले कितने दशकों तक शातिर दिमाग वाले फिरकापरस्त लोग उसका दुरूपयोग देश के खिलाफ एक हथियार के रूप में करते रहेंगे| शातिरों से अलग हटें तो मूर्ख किस्म के लोग भी उसे नासमझी में उपयोग में ले लेते हैं और बात को ऐसे बढ़ावा देते हैं जैसे बस सत्य वही हो जो वे जानते हैं|

DK Asma
ठीक है कि उनको फिल्मों में काम करना था, और संयोगपूर्ण गलती से उनका असली नाम ‘मोहम्मद युसूफ खान‘ काफी लंबा नाम था फिल्मों के लिहाज से,  पर, देविका रानी ने तो, भगवती चरण वर्मा की मार्फ़त उनको सुझाए थे कई नाम (वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार एवं कुछ अन्य विकल्प) और फैसला भी उनके ऊपर ही छोड़ दिया था कि किसी एक नाम का चुनाव कर लो|

फिर उन्हें किस किस्म के जीव ने काटा था, या किस हिन्दू जादूगर ने उन पर जादू कर रखा था कि उन्होंने ‘दिलीप कुमार‘ नाम छाँट लिया जो कि एक हिन्दू नाम है?

चलिए उन्होंने दिलीप कुमार नाम चुन भी लिया, पर ऐसा खतरनाक मिथक क्यों पनपने दिया कि उन्होंने दिलीप कुमार नाम इसलिए रखा कि एक मुसलमान कलाकार के लिए घनघोर रूप से साम्प्राद्यिक  (हिंदू बहुल) देश- भारत में जगह बनाना असंभव होता?

वे ‘जहाँगीर‘ नाम भी तो चुन सकते थे, उनके मुसलमान सम्प्रदाय में जन्म लेने के कारण वो ज्यादा ज़ेब देता उनके  व्यक्तित्व पर| उन जैसा जहीन फनकार किसी भी नाम से फ़िल्में करता ऐसे ही शोहरत पाता|

पर उनके द्वारा “दिलीप कुमार” नाम चुनने के पीछे साम्प्रदायिक भाव होने के मिथक को गढ़ने वाले  फिरकापरस्तों को एक हथियार मिल गया – कि चूँकि उस समय हिन्दू -मुसलमान संप्रदायों में तनाव था सो मुसलमान नाम रखना किसी नये फ़िल्मी कलाकार के लिए लाभदायक नहीं होता| पहले से परेशानियों से घिरे हिन्दुस्तान की परेशानियों में और इजाफा इस मुद्दे से हो जाता है|

चूँकि  यह मुद्दा ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी उस बैठक  के समय से आज तक हिन्दुस्तान के खिलाफ उपयोग में लाया जाता रहा है पर कभी ऐसा पढ़ने, सुनने और देखने में नहीं आया कि उन्होंने इस आरोप का खंडन सार्वजनिक तौर पर किया हो, जबकि उनका एक बयान ऐसी अलगाववादी ताकतों, जो देश में सदा ही हिन्दू मुसलमानों के बीच दरार बढाने में लगे रहते हैं, के कुत्सित प्रयासों पर लगाम लगाने में सहायक सिद्ध होता| पर उन्होंने ऐसा किया नहीं| आशा है कि शीघ्र प्रकाशित होने वाली आत्मकथा में वे इस मुद्दे को हमेशा के लिए दफ़न कर देंगे| पर अगर ऐसा नहीं करते तो कुछ बातों का खुलासा उनकी मार्फ़त ही हो जाए तो अच्छा है| उनके हिंदू सिनेमाई नाम के पीछे सांप्रदायिक तत्व ढूँढने वाले अलगावादी लोग इन बातों के उत्तर खोज लें तो अच्छा हो-

– उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा‘ आयी सन 1944 में, मतलब यह ठहरता है कि  ‘देविका रानी‘ के साथ उनकी मुलाक़ात कम से कम एक बरस पूर्व 1943 में तो हुयी ही होगी| और सन बयालीस का भारत छोडो आन्दोलन शुरू हो हे चुका था पर पाकिस्तान तो न बना था कि उनके मुसलमान नाम से जगत को समस्या होने लगती और होती तो खुर्शीद कैसे उसी दौरान चर्चित गायिका-अभिनेत्री बन गयीं? उसी के कुछ समय पश्चात मुस्लिम सुरैया को किसने इतना बड़ा स्टार बना दिया?

– एक मुसलमान निर्देशक महबूब खान की ‘रोटी‘ भी सन बयालीस में आ गयी थी, जिसमें शेख मुख्तार, अख्तरी बाई फैजाबादी (बेगम अख्तर), और अशरफ खान तीन महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे और गीत लिखे थे ड़ा. सफ़दर आह ने, और फिल्म उस साल की उन फिल्मों में से एक थी जिन्होने चोटी की सफलता प्राप्त की| ये कैसे हो गया अगर माहौल मुस्लिम कलाकार विरोधी था?

कमाल अमरोही कैसे सफल निर्देशक बन गये उसी दौरान या कुछ बाद में?

नर्गिस ने कौन सा मेकअप किया कि उनकी मुस्लिम पहचान उनके बड़ा स्टार बनने की राह का रोड़ा न बनी?

वहीदा रहमान ने भी ऐसा क्या रूप धरा कि लोग उन्हें एक बेहतरीन अभिनेत्री के तौर पर बेइंतहा आदर देने लगे?

साहिर लुधियानवी, हसरत जयपुरी, और मजरूह सुल्नानपुरी आदि को तो नाम बदलने की जरुरत न पडी|

– और नौशाद? उन्हें क्यों दरकिनार करा जाये, उन्होंने तो दिलीप कुमार के फिल्मों में आने से पहले ही वहाँ अपने झंडे फहरा दिए थे| किसने उन्हें हर दिल अजीज़ संगीत निर्देशक बनाया?

मोहम्मद रफ़ी कैसे अपने मुस्लिम नाम के साथ भारत के सबसे बड़े गायकों में से एक बन गये?

तलत महमूद की मखमली आवाज को बुलंदियों की शोहरत क्या मुसलमानी नाम छोड़ कर मिली?

के. आसिफ की मुग़ल-ऐ-आज़म कैसे कालजयी फिल्म बन गयी?

– उनके बाद फिरोज खान, संजय खान, और अमजद खान आदि को क्यों नहीं जरुरत पडी नाम बदलने की? इन्हें कैसे सफलता मिल गयी?

– अगर ये सब और इनके जैसे और बहुत सारे मुस्लिम अपने मुस्लिम नाम के साथ ही स्टार बन गये तो उनके ही मुस्लिमपने में ऐसे क्या सींग लगे थे कि हिन्दुस्तान उनके नाम से भड़क जाता और वे स्टार न बन पाते?

मुद्दे की बात यह कि अगर उन्होंने खुद ही एक हिन्दू नाम अपने सिनेमाई काम के लिए चुना तो वे यह बात डंके की चोट पर दुनिया से कहते क्यों नहीं? और अगर उन को को इसके लिए विवश किया गया तो वे विवश हुए क्यों? और अगर हुए तो अपनी व्यक्तिगत कमजोरी को स्वीकार करना चाहिए| कितने ही उदाहरण उनसे पहले भी थे और उनके सिनेमा में पदार्पण के बाद भी हुए जहां मुस्लिम कलाकारों ने अपने वास्तविक नाम के साथ सफलता पायी|

भारतीय समाज में हिन्दू मुसलमान के बीच खाई जैसी राम मंदिर -बाबरी मस्जिद ढाँचे के टूटने और उसके बाद के दंगों के बाद बनी है ऐसी तो पिछले सात दशकों में कभी नहीं थी पर अभी भी हिन्दी फिल्म उधोग के तीन-चार सबसे बड़े और सफल सितारे – आमिर खान, सलमान खान, शाहरुख खान, सैफ अली खान, अपने वास्तविक मुस्लिम नामों के साथ ही यह सब कुछ नाम, शौहरत, सफलता और धन सम्पदा पा चुके हैं| उन्हें तो कोई अड़चन न आयी इतने खतरनाक ध्रुवीकरण वाले समय में बड़ा स्टार बनने में| तो युसूफ खान को ही क्या समस्या आनी थी?

मूल प्रश्न यह रहेगा ही कि जनाब युसूफ खान आप दिलीप कुमार क्यों बने?

अगर खाली फ़िल्मी कारणों से बने, (नाम बहुत लंबा था और बहुत सारे अभिनेता ऐसा करते रहे थे सो उन्होंने भी एक आकर्षक नाम छाँट लिया अपने लिए, और इसमें किसी किस्म की साम्प्रद्यिकता की कोई भूमिका न थी) तो भी, और अगर उनके ऊपर साम्प्रदायिक तनाव का दबाव था तब भी उनको स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए|

आशा है देश की इस उलझन का निवारण वे समय रहते कर जायेंगे और इस मुहीम पर जो उनको ढाल बनाकर भारत के खिलाफ चलाई जाती है उस पर वे अंकुश लगाएंगे|

यह तो सर्वत्र स्वीकृत बात है कि हिन्दी सिनेमा में नायक की भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेताओं में वे चुनींदा सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे हैं बल्कि उनको उन श्रेष्ठ्तमों में भी श्रेष्ठ बहुमत मानता रहा है, उन्हें जो इज्जत इस देश में प्रदान की गयी है वह बिरले लोग ही कमा पाए गये हैं, अतः यह उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी बनाती है कि ऐसे विवादास्पद मुद्दे के गलत पहलुओं को हमेशा के लिए दफ़न कर दें, अपना स्पष्टीकरण देकर|

हीं भी यह जिक्र नहीं है कि साम्प्रदायक कारणों से उन्हें दिलीप कुमार- एक हिंदू नाम धारण करना पड़ा|

फ़रवरी 11, 2011

रेगिस्तान में हिमपात : कविराज की पहली पुस्तक

और अंततः कविराज, जैसे कि पढ़ाई के जमाने से ही वे मित्रों में पुकारे जाते थे, की पहली पुस्तक प्रकाशित हो ही गयी। बीसियों साल लगे हैं इस पुण्य कार्य को फलीभूत होने में पर न होने से देर से होना बेहतर!

पहले कम्प्यूटर इंजीनियरिंग और बाद में मैनेजमेंट की पढ़ाई करके प्रबंधन के क्षेत्र में झण्डे गाड़ने की व्यस्तता के कारण उन्हे ऐसा मौका नहीं मिल पाया कि वे किताब प्रकाशित करा पाते । पर एक दिन किताब छपवाने का ख्याल फिर से आ गया तो उसने जाने का नाम ही नहीं लिया। सर पर चढ़ कर बैठ गया विचार कि इससे पहले की तुम और गंजे हो जाओ उससे पहले किताब छपवा लो। बस विचार के आगे समर्पण करके उन्होने अपने पुराने हस्तलिखित कागज ढूँढे। हिन्दी में टाइप करना सीखा और युद्ध स्तर पर कम्प्यूटर में अपनी पुरानी कवितायें टाइप करके संग्रहित कर दीं।

विरोधाभासी बातें एक ही कविता में कहना उनका एक खास गुण रहा है और इसीलिये उन्होने अपनी किताब का शीर्षक भी ’रेगिस्तान में हिमपात’ रखा है।

तब हॉस्टल के समय वे बैठे बैठे, चलते चलते, नहाते नहाते, खाते खाते  कवितायें उवाचते रहते थे, बल्कि उनके रुम मेट तो कहा करते थे कि यह बंदा नींद में भी कवितायें गढ़ता रहता है। एक बार तो ऐसे ही मित्रों ने किसी अवसर पर खुद खाना बनाने का आयोजन किया तो प्याज काटते काटते कविराज के मुख से सुर झड़ने लगे।

नैनों में अश्रु आये प्याज जो काटी हाये
ऐसे में कोई आके मोहे चश्मा लगा दे

कविता में कैसी भी तुकबंदी कर दें पर कविराज गाते बहुत अच्छा थे। किशोर के गीत को उनके जैसी आवाज में खुले गले से गाने की कोशिश करते और मुकेश के गीत को उनके जैसी विधा में।

वैसे तुकबंदी की प्रेरणा उन्हे अभिनेता प्राण से मिली। हुआ यूँ कि उन्होने दिल दिया दर्द लिया फिल्म देखी और प्राण के बचपन की भूमिका निभाने वाले बाल कलाकार के मुख से निकले एक  काव्यात्मक नारे ने उन्हे बहुत लुभाया था। वह पात्र दूध लेकर आये नौकर से गाकर कहा करता था

दूध नहीं पीना तेरा खून पीना है

कविराज को भी बचपन से ही दूध नापसंद था सो स्पष्ट है कि उन्हे उपरोक्त्त नारा पसंद आना था। हाँ खून पीने की बात उन्हे पसंद न आयी थी। सो उन्होने उसकी जगह चाय रख दी थी और अक्सर वे गुनगुनाते थे।

दूध नहीं पीना मुझे चाय पीनी है

और भी तमाम फिल्मों में प्राण कुछ न कुछ काव्यात्मक तकियाकलाम बोला करते थे और उनके अभिनय की यही बात कविराज को लुभा गयी। बाद में उन्होने प्राण के तरीके से ही बड़े अभ्यास के बाद सिगरेट के धुंये से हवा में छल्ले बनाना सीख लिया। हालाँकि वे धुम्रपान नहीं करते थे पर ऐसा करने वाले साथियों से कहते थे कि जब थोड़ी सी सिगरेट रह जाये तो मुझे छल्लों की प्रेक्टिस के लिये दे देना।

बकौल खुद उनके, कविता रचने के प्रति उनका प्रेम जीवन के पहले पहले प्रेम के कारण ही पनपा। आठवीं कक्षा में पढ़ते थे और साइकिल पर स्कूल जाते हुये उन्हे एक अन्य स्कूल की छात्रा से प्रेम हो गया। उनकी साइकिल बिल्कुल उसी गति और तरीके से चलने लगी जैसे कि उस लड़की की साइकिल के पहिये चलते।

घर में कविराज के पिता भी आरामकुर्सी पर आँखें बंद करके  देखा देखी बलम हुयी जाये गाती हुयी बेग़म अख्तर की आवाज में घंटों खोये रहते थे।

प्रेम का जीन तो पक्का पीढ़ी दर पीढ़ी जिंदा रहता है।

कविराज का प्रेम जब देखादेखी की हदों में सिमटने से इंकार करने लगा और पढ़ते हुये कॉपी किताबों के पन्नों में भी तथाकथित प्रेमिका का चेहरा दिखायी देने लगा और बैठे बैठे वे उसके ख्याल में खो जाने लगे तो उन्हे प्रेरणा मिली प्रेम पत्र लिखने की। कायदे से यही उनकी पहली रचना थी। दुनिया के बहुत बड़े बड़े लेखकों के लेखन की शुरुआत प्रेम पत्र लिखने से ही हुयी है।

तो शुरुआत उनकी गद्य से हुयी। करुण हास्य का बोध उन्हे इस प्रेम गाथा से गुजरने के बाद ही हुआ। बाद में वे खुद ही चटकारे लेकर अपने पहले प्यार की पहली चिट्ठी का हाथों लिखा और आँखों देखा हाल सुनाया करते थे।

कुछ पंक्त्तियाँ तो अभी भी याद आती हैं। उस जमाने में उन्हे लड़की की नाक बहुत पसंद थी। मुमताज़ उनकी पसंदीदा नायिका थीं और उनके जैसी ही नाक उस लड़की की भी थी। पत्र में उसके प्रति प्रेम को विस्तार से स्वीकारने की औपचारिकता के बाद उन्होने अपनी कल्पनाओं को प्रदर्शित करते हुये लिखा था कि वे उसकी नाक को अपनी नाक से छूना चाहते हैं

तब तो उन्हे पता न था कि संसार के बहुत सारे कबीले ऐसे हैं जहाँ नाक से नाक छुआकर प्रेम को प्रदर्शित किया जाता है।

हंसते हुये लड़की के गाल सुर्ख लाल हो जाया करते थे और उनके अनुसार उन्हे लाल अमरुद याद आ जाते थे। दुनिया के बहुत सारे लोगों की तरह उन्हे भी बचपन में सफेद से ज्यादा लाल रंग वाले अमरुद बहुत ज्यादा आकर्षित करते थे। लाल अमरुद उनके अंदर सौंदर्य बोध जगाता था जैसे कि बसंत में टेसू के फूल भी उन्हे आह्लादित कर जाते थे। नदी किनारे लगे अमलतास के पेड़ तो उन्हे इतना आकर्षित करते थे कि वे बहुत बार पेड़ से लटकी फूलों की झालरें तोड़ने के लिये नीचे नदी में गिर चुके थे। तैरना उन्हे थोड़ा बहुत आता था पर तैरने में कुशलता तो उन्होने अपनी इसी हरकत से हासिल की।

कहने का तात्पर्य यह है कि बचपन से ही वे कुदरती तौर पर एक प्रेमी थे। जिसे अंग्रेजी में कहा जाता है,” Ohh! By nature he was a romantic person”, ऐसे वे हुआ करते थे। अभी भी हैं।

प्रेम करना या प्रेम में होना उनके लिये बहुत जरुरी था। वे भी कहते थे और बहुत सारे मित्र इस बात से इत्तेफाक रखते थे कि भारत नामक देश में, खासकर हिन्दी भाषी प्रदेशों में, युवा लोग दो इच्छाओं का तहेदिल से पीछा करते हैं- एक थी किसी लड़की से प्रेम करना और दूसरी आई.ए.एस बनना। दूसरी इच्छा बहुत कठिन श्रम माँगती है तो उसे सम्भालने के लिये और जीवन की अन्य कठिनाइयों से उत्पन्न ऋणात्मक ऊर्जा को सम्भालने के लिये युवा प्रेम में आसरा खोजा करते थे। आजकल भी खोजा करते होंगे बस प्रेम अब कागजी और हवाई न रहकर देह से ज्यादा जुड़ गया है और अब जैसे भी हो जल्दी से जल्दी देह-सम्बंध बनाने की इच्छा कुलबुलाती रहती है।

बहरहाल कविराज ने कॉपी से पन्ने फाड़कर एक लम्बा सा रुक्का लिखा जिसमें उन्होने अपने पहले प्यार की सारी भावनायें बहा दीं और कई दिनों तक मौका तलाशते रहे कि लड़की उन्हे मिनट भर को भी अकेली मिल जाये। एक दिन सुबह स्कूल जाते हुये उन्हे ऐसा मौका मिल भी गया और उन्होने शीघ्रता से साइकिल लड़की की साइकिल के नजदीक लाकर रेलगाड़ी की रफतार से धड़कते दिल के साथ पत्र जेब से निकाला और हकलाते हुये लड़की से कहा,” तुम्हारे लिये है पढ़ लेना“।

चेहरा उनका डर के मारे लाल हो चुका था। पत्र को उसके हाथों में थमाकर उन्होने सरपट साइकिल दौड़ा दी।

दोपहर बाद स्कूल से लौटते हुये उसी जगह जहाँ उन्होने लड़की को पत्र सौंपा था एक बलिष्ठ युवक ने उन्हे रोका।

संयोग की बात कि इस घटना से पहले दिन उनके अंग्रेजी के अध्यापक ने सबको Aftermath शब्द का अर्थ समझाया था पर कविराज उसे समझ नहीं पाये थे। हो सकता है कि उनका अंतर्मन प्रेमिका के ख्यालों में गुम हो और उनकी इंद्रियाँ ज्ञान ग्रहण न कर पायीं। पर उस युवक के रोके जाने के बाद हुयी घटना और उसके बाद मन में उठने वाले भावों ने उन्हे अंग्रेजी के शब्द का अर्थ बखूबी समझा दिया। कहते भी हैं कि जीवन में स्व: अनुभव का बड़ा महत्व है।

उस शाम उनके विचलित मन में प्रथम बार काव्य का प्रस्फुटन हुआ और उन्हे कक्षा में पढ़ी काव्य पंक्तियों के अर्थ ऐसे समझ में आने लगे जैसे उनकी कुंडलिनी जाग्रत हो गयी हो।

वियोगी होगा पहला कवि विरह से उपजा होगा गान

जैसी पंक्त्तियों ने उनसे कहलवाया

वियोगी ही बन पाते हैं कवि विरह से ही उपजता है ज्ञान

तो उपरोक्त्त पंक्ति उनके द्वारा रची गयी पहली काव्यात्मक पंक्त्ति थी। पूरे चौबीस घंटे उनका दिमाग किसी और ही दुनिया में विचरण करता रहा। फिर जाने क्या हुआ कि उन्हे करुण – हास्य जैसे  मिश्रित भाव का बोध होने लगा। अगली रात के करीब दो बजे होंगे, जब पूरे मोहल्ले में शायद वे ही जाग रहे थे, उन्होने सिनेमा के परदे पर भावनात्मक रुप से लुटने-पिटने के बाद एक अजीब सी मुस्कान फेंकने वाले राज कपूर की भांति एक मुस्कान अपने चेहरे पर महसूस की और उनके हाथों में थमी कलम सामने मेज पर रखी कॉपी के पन्ने पर चलने लगी।

कलम रुकी तो उन्होने पढ़ा कि कुछ पंक्तियाँ पन्ने पर ठहाका मार रही थीं। उन्होने उन पंक्तियों को ऐसे पढ़ा जैसे कि इनका अस्तित्व उनके लिये अजनबी हो।

समझते रहे हम आज तक जिसे अपनी कविता
वह तो निकली सूरज पहलवान की बहन सविता
अब कभी न होने वाले साले ने, घुमा के थप्पड़ ऐसे मारे
लाल कर दिये गाल हमारे, आंखों में नचा दिये तारे

तो हास्य मिश्रित करुण भाव से यह उनका पहला साक्षात्कार था। पहले प्यार में खाये थप्पड़ों ने उन्हे यह साहस न करने दिया कि वे यह राज जान पाते कि कैसे लड़की के भाई को उनके प्रेम पत्र के बारे में पता चला। यह राज राज ही बना रहा और उन्हे सालों तक सालता रहा।

पहले प्यार ने उन्हे कवि बना दिया। बाद में उनकी लेखन प्रतिभा उन लोगों के बड़ी काम आयी जो प्रेम करने की जुर्रत तो कर बैठते थे पर प्रेम पत्र तो छोड़िये घर वालों को कुशल क्षेम का पत्र भी नहीं लिख पाते थे ऐसे सारे साक्षर अनपढ़ तथाकथित प्रेमियों के लिये प्रेम पत्र कविराज ही लिखा करते थे।

कविराज की काव्य रचने की क्षमता में सबसे खास बात थी कि जब ’बस दो मिनट’ जैसे विज्ञापन नूडल्स को भारतीयों पर थोप रहे थे वे मिनट भर में ही लुभाने वाली पंक्तियाँ लेकर हाजिर हो जाते थे। नारे बनाने में उनका कोई सानी न था।

सीनियर बुश ने इराक पर हमला किया और सैटेलाइट टी.वी की बदौलत जब दुनिया ने युद्ध का लाइव कवरेज देखा और भारत में बुश और सद्दाम हुसैन के पक्ष और विपक्ष में ध्रुवीकरण होने लगा तो उन्हे सद्दाम हुसैन से व्यक्तिगत कोई लगाव न था पर कविराज बुश की साम्राज्यवादी नीतियों के सख्त खिलाफ थे। एक रोज सुबह जब कुछ लोग जॉगिंग करते हुये नवाबगंज की दीवार के पास से गुजरे तो उन्होने बड़े बड़े अक्षरों में लिखा पाया

सद्दाम उतरे खाड़ी में बुश घुस गये झाड़ी में

बीती रात कविराज खाना खाने के बाद से कुछ घंटों के लिये गायब थे। लौटने पर उन्होने बताया था कि वे पास के सिनेमा हॉल में नाइट शो देखने गये थे।
पहले तो कभी वे अकेले फिल्म देखने न गये थे। उन्होने कभी स्वीकार न किया परंतु मित्रों को संदेह था कि बुश और सद्दाम हुसैन के ऊपर बनाया गया नारा उन्होने ही गढ़ा था।

ऐसा नहीं कि वे केवल तुकबंदी वाली कवितायें ही रचते थे। वे बेहद ज़हीन और संवेदनशील कवितायें भी रचते थे। बस उन्हे देख पाने का सौभाग्य उनके केवल दो मित्रों को ही मिला था और वह भी इस आश्वासन के बाद कि उनके इस संवेदनशील रुप की बात जाहिर न की जाये। वे अमिताभ बच्चन के चरित्रों जैसी दिलजलों वाली धीर-गम्भीर छवि ही बनाये रखना चाहते थे, ऐसा दिलजला जो कॉमेडी का सहारा तो लेता है पर अंदर से अकेला है।

कितने ही साथियों के प्रेम सम्बंध कविराज की लेखनी के कारण मजबूती के जोड़ से जीवित रहे। कितनों के प्रेम सम्बंध शादी की परिणति पा गये। यह संदेहास्पद है कि किसी भी साथी ने अपनी पत्नी पर कभी यह राज खोला होगा कि उसे लिखे जाने वाले उच्च कोटि के प्रेम पत्रों में उसका योगदान बस इतना था कि वह कविराज के लिये चाय, फिल्म और खाने का इंतजाम करता था।

कविराज की कवितायें कॉपियों, रजिस्टरों एवम डायरियों के पन्नों में बंद होती गयीं।

सालों बीत गये। साथी दुनिया में इधर उधर बिखर गये। ईमेल का पर्दापण हुआ तो सम्बंध फिर से स्थापित हुये और फिर ऊर्जा जाती रही तो त्योहारों और नव वर्ष आदि के अवसरों पर शुभकामनायें भेजने तक संवाद बने रहे। यादें तो यादें हैं कभी जाया नहीं करतीं, जीवन कितनी ही और कैसी ही व्यस्तताओं में क्यों न उलझा ले पर ऐसे मौके आते हैं जब बीते हुये की स्मृतियाँ पास आकर बैठ जाती हैं।

और जब एक रोज़ सूचना मिले कि आखिरकार कविराज की कवितायें छप ही गयीं और पुस्तक डाक से पहुँचने वाली है तो प्रसन्नता तो होती है भाई!

प्रसन्नता होनी लाजिमी है।

…[राकेश]

जून 30, 2010

मुल्ला नसरुद्दीन लुट गये राम नाम की लूट के फेर में

जैसे विचित्र मुल्ला नसरुदीन वैसे विचित्र उनके साथ होने वाली घटनायें। एक झोंक में काम करने वाले व्यक्ति ठहरे नसरुद्दीन। अगर कुछ करने की सोच लें तो न आगा देखें न पीछा बस जुट जाते थे उस काम को पूरा करने में। दूसरों से सीखने का तो मतलब ही नहीं उठा कभी उनके जीवन में। वे तो सेल्फ मेड व्यक्ति थे वैसे ये बात दीगर है कि कितना निर्माण उनके द्वारा किये कामों से होता था और कितना विध्वंस उनकी हरकतों की वजह से हो जाता था। करने के बाद सोचना उनकी फितरत में था।

खैर घरवाले उन्हे उलहाना दिये रखते कि वे घर के किसी काम से मतलब नहीं रखते और मोहल्ले के बाकी लोग अपने परिवार के साथ घुमने जाते हैं उन्हे मेला दिखाने ले जाते हैं, सिनेमा दिखाने ले जाते हैं पर नसरुद्दीन हमेशा घर और परिवार को नजरअंदाज किये रखते हैं।

नसरुद्दीन इन रोज रोज के वाद विवादों से परेशान होकर वादा कर बैठे कि वे भी परिवार को कहीं न कहीं बाहर ले जाकर सबका मनोरंजन करायेंगे पर स्थान आदि उनकी अपनी मर्जी का होगा।

उनके परिवार वाले ऐसा कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते थे सो उन्होने झट से हाँ कर दी।

नसरुद्दीन ने सोचा कि मेरी शांति के दुश्मन इन लोगों को कहीं भी ले जाना बिना मतलब की परेशानी को मोल लेना है और सबसे अच्छा इन सबको फिल्म दिखाने ले जाना रहेगा, कम से कम सिनेमा हॉल के अंधेरे में मैं सो तो सकता हूँ।

नसरुद्दीन ने परिवार में क्या बच्चे, क्या बूढ़े, क्या स्त्री और क्या पुरुष सबको कह दिया कि अगामी रविवार को सब लोग तैयार रहें और वे उन सबको फिल्म दिखाने ले जायेंगे। चाहें तो वे लोग अपने अपने मित्रों को भी आमंत्रित कर सकते हैं।

पूरे मोहल्ले के लिये चर्चा का विषय बन गया नसरुददीन जैसे आदमी द्वारा परिवार और मित्रों को फिल्म दिखाने ले जाने का कर्यक्रम। रविवार तक पूरी फौज तैयार हो गयी फिल्म देखने जाने के लिये।

नसरुद्दीन उन दिनों तुलसी की राम चरित मानस का अध्ययन कर रहे थे। मुकेश द्वारा गायी राम चरित मानस की कैसेट्स तो उनके साथ ही रहती थीं और वे उनके वॉकमैन में बजती ही रहती थीं।

फिल्में उन्होने बहुत कम देखी थीं पर कुछ फिल्मी लोगों के नाम से वे परिचित थे। अपने रशियन दोस्तों से उन्होने राज कपूर और उनकी फिल्मों की रुस में लोकप्रियता के बारे में भी सुन रखा था।

शुक्रवार को ही राज कपूर की “राम तेरी गंगा मैली” प्रदर्शित हुयी थी। नसरुद्दीन ने फिल्म का नाम पढ़ा और सोचा कि धार्मिक फिल्म लगती है और राम का नाम शीर्षक में मौजूद है तो उनके जीवन के प्रसंग भी इसमें होंगे और हो सकता है कि मेरी रुचि से मिलती जुलती बातें भी फिल्म में मिल जायें। फिल्म के गाने चारों तरफ कुछ दिनों पहले से बजने लगे थे और नसरुद्दीन भी उन गानों से वाकिफ हो चले थे। लता मंगेशकर द्वारा गाया एक गीत “एक राधा एक मीरा” तो उन्हे इतना भाया कि उन्होने एक सज्जन से पूछ ही लिया कि किस फिल्म का गाना है और फिल्म का नाम जानकर उन्हे पूरी तसल्ली हो गयी कि वे एक धार्मिक फिल्म देखने जा रहे हैं। उन्होने तकरीबन दो दर्जन टिकट रविवार के मैटिनी शो के खरीद लिये।

रविवार आया। नसरुददीन सबको सिनेमा हाल ले गये।

सभी समझ गये होंगे कि नसरुद्दीन गये तो थे रामायण देखने और दिखाने पर वहाँ से लेकर आये महाभारत होने के बीज और कल्पना ही की जा सकती है कि कैसी फसल उगी होगी उन बीजों से। फिल्म शुरु होने के एक घंटे के अंदर ही सब लोग वापिस घर पर थे। नसरुद्दीन रास्ते से ही गायब हो गये।

विचित्रताओं के सम्राट नसरुद्दीन ऐसे घटनाचक्रों से दो चार तो होते ही रहते थे। ऐसा ही उन्होने कुछ बरस बाद फिर से किया। पर दूसरा किस्सा किसी और दिन।

…[ राकेश]

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