वे अहले-हिन्दुस्तान हैं

हाँ वे मुसलमान थे

हम जैसे इंसान थे

लेकिन उनके सीनों में कुरआन था

और हाथों में तलवार

यकीनन वे पुकारते होंगे

हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

हिंद के वासियों को

वे हिन्दू ही कह सकते थे|

और हिंद के वासी

यानी बड़े नाम वाली नामवर जाति

बाएं बाजू की ताकत से बेखबर

दायें हाथ में तराजू लिए

अपना नफ़ा नुकसान तोल रही थी|

निम्न, अछूत, अनार्य इंधन पर

खौल रहा था

ब्राह्मणवाद का कढ़ाहा

और तली जा रही थीं

सत्ता और सुविधा की पूडियां |

पूडियां खाने के शौकीन

ब्राह्मण

उन्हें मलेच्छ कह सकते थे

पूडियां खाने का शौक और बनाने का फन

उन्हें निर्यात नहीं हुआ था

लेकिन

उनके दिलों में सफाई थी

वे ईमान की ताजगी लेकर निकले थे

तभी तो

दश्त क्या चीज है

दरिया भी उन्होंने नहीं छोड़े

जहां चाहा उतार दिए अपने घोड़े

हमलावर तो हमलावर होते हैं

घर लूटा और चलते बने

जैसे अंग्रेज आए और निकल भागे

वे कैसे हमलावर थे?

लूटने आए और लुटने वालों के होकर रह गये

सिर्फ तलवार के नहीं

वे विचार के धनी भी थे

जैसे ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

हाँ! वे मुसलमान थे

ठीक कहते हो

वे आसमान से नहीं उतरे थे

लेकिन आसमानी धूप लेकर आए थे

वे मसावात-मसावात चिल्लाते आए थे

नया इन्कलाब लाए थे

वे यकीनन यहीं कहीं दूर से आए थे

और आर्यों की तरह आए थे

फर्क बस इतना था

आर्यों ने खदेड़ा था अनार्यों को

विंध्याचल के उस पार तक

जो शेष रह गये थे वे सेवक बनाए गए

अर्थात भंगी, चमार, नाई, धोबी, वगैरह-वगैरह

लेकिन वे मुसलमान थे

अहले-कुरआन थे

उन्होंने मुसलमान बनाए

अपनी इबादतगाहों में ले आए|

भंगी जब सैयद के साथ मस्जिद में बैठा होगा

ज़रा सोचकर देखो कि क्या सोचा होगा?

तुम कहते हो कि वे मुसलमान थे

वे दरहकीकत मुसलमान हैं

इतिहास के गलियारों में,

अतीत के बाजारों में,

ताकने-झाँकने से फायदा?

वे मुसलमान हैं

और हमारी तरह वर्तमान हैं

वे समस्याग्रस्त इंसान हैं

उन्हें अतीत में जीवित रखने की ख्वाहिश

जख्मों पर नमक लगाकर जगाने की काविश

जागृति नहीं खून के आंसू लाएगी

नंगे सच को

लफ्जों का लिबास देने से क्या होगा

सच को सच की तरह सुना जाए

तो सुनो-

मुसलमान न होते तो

कबीलों, वर्णों, तबकों, और जातियों के जंगल में

घृणावाद की आग लगी होती

जंगल जल चुका होता

फिर आरक्षण की धूप में किसे सेकते

आरक्षण का विरोध कौन करता

जनतंत्र की मैना कहाँ चहचहाती

समता, संतुलन, समाज सुधार शब्दकोश में धरे रहते

ईंट-पत्थर की इमारत कोई भी बना सकता है

शहर बसते ही रहते हैं

वे न होते तो बहुत कुछ न होता

या कुछ न कुछ होता

वे हैं तो दिक्कत क्या है?

वे मुसलमान हैं

वे रथ या घोड़े पर सवार आतंक नहीं हैं

वे राम से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

राम नाम के सौदागरों से

वे मार्क्स से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

मार्क्स के नाफहम अनुयायियों से

वे वाकई नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

हुक्मे-इलाही में मिलावट करने वाले मुल्लाओं से

वे तैरना जानते हैं लेकिन

नदी किनारे बैठने को विवश हैं

उनके सिर्फ रिश्तेदार पाकिस्तान में हैं

आडवाणी जैसों को टटोलिए

जन्मभूमि का महत्व क्या है

अयोध्या से अधिक वे कराची में जीते हैं

हाँ! वे मुसलमान हैं

दो सौ बरस तक अंग्रेजों से लड़ते रहे

उन्होंने पाकिस्तान बनाया

वे पाकिस्तान के खिलाफ जंग में शहीद हुए

वे मुसलमान हैं

उनके पुरखों की हड्डियां दफ़न हैं यहीं

वे कहीं से नहीं आए

वे कहीं नहीं गए

वे कहीं नहीं जायेंगे

वे पाकिस्तान समेत फिर आयेंगे

क्योंकि वे मुसलमान हैं

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं |

(चन्द्रभान ‘खयाल’)

Advertisements

One Comment to “वे अहले-हिन्दुस्तान हैं”

  1. I wish I could stand up and clap for this awesome read !! This is what you call patriotism !! This is what you call Humanity !
    This is what you call truth and this what which makes sense !!
    AWESOME READ !! I will share this awesome poem !!

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: