समाजवाद और साम्यवाद : ओशो (नये समाज की खोज)

oshoसमाजवाद और साम्यवाद

वही फर्क करता हूं मैं जो टी.बी. की पहली स्टेज में और तीसरी स्टेज में होता है, और कोई फर्क नहीं करता हूं। समाजवाद थोड़ा सा फीका साम्यवाद है, वह पहली स्टेज है बीमारी की। और पहली स्टेज पर बीमारी साफ दिखाई नहीं पड़ती इसलिए पकड़ने में आसानी होती है। इसलिए सारी दुनिया में कम्युनिज्म ने सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया है। कम्युनिज्म शब्द बदनाम हो गया है। और कम्युनिज्म ने पिछले पचास सालों में दुनिया में जो किया है, उसके कारण उसका आदर क्षीण हुआ है। पचास वर्षों में कम्युनिज्म की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है। इसलिए अब कम्युनिज्म सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर किया है। अब वह समाजवाद की बात करता है और यह भी कोशिश कर सकता है कि हम समाजवाद से भिन्न हैं। लेकिन समाजवाद और साम्यवाद में कोई बुनियादी भेद नहीं है, सिर्फ शब्द का भेद है। लेकिन शब्द के भेद पड़ने से बहुत फर्क मालूम पड़ने लगते हैं। शब्द को भर बदल दें तो ऐसा लगता है कोई बदलाहट हो गई।

कोई बदलाहट नहीं हो गई है।

समाजवाद हो या साम्यवाद हो, सोशलिज्म हो या कम्युनिज्म हो, एक बात पक्की है कि व्यक्ति की हैसियत को मिटा देना है, व्यक्ति को पोंछ डालना है, व्यक्ति की स्वतंत्रता को  समाप्त कर देना है, संपत्ति का व्यक्तिगत अधिकार छीन लेना है और देश की सारी जीवन-व्यवस्था राज्य के हाथ में केंन्द्रित कर देनी है।

लेकिन हमारे जैसे मुल्क में, जहां कि राज्य निकम्मे से निकम्मा सिद्ध हो रहा है, वहां अगर हमने देश की सारी व्यवस्था राज्य के हाथ में सौंप दी, तो सिवाय देश के और गहरी गरीबी, और गहरी बीमारी में गिरने के कोई उपाय न रह जाएगा।

आज मेरे एक मित्र मुझे एक छोटी सी कहानी सुना रहे थे, वह मुझे बहुत प्रीतिकर लगी। वे मुझे एक कहानी सुना रहे थे कि एक आदमी ने रास्ते से गुजरते वक्त, एक खेत में एक बहुत मस्त और तगड़े बैल को काम करते हुए देखा। वह पानी खींच रहा है और बड़ी शान से दौड़ रहा है। उसकी शान देखने लायक है। और उसकी ताकत, उसका काम भी देखने लायक है। वह जो आदमी गुजर रहा था, बहुत प्रशंसा से भर गया, उसने किसान की बहुत तारीफ की और कहा कि बैल बहुत अदभुत है।

छह महीने बाद वह आदमी फिर वहां से गुजर रहा था, लेकिन बैल अब बहुत धीमे-धीमे चल रहा था। जो आदमी उसे चला रहा था, उससे उसने पूछा कि क्या हुआ? बैल बीमार हो गया? छह महीने पहले मैंने उसे बहुत फुर्ती और ताकत में देखा था! उस आदमी ने कहा कि उसकी फुर्ती और ताकत की खबर सरकार तक पहुंच गयी और बैल को सरकार ने खरीद लिया है। जब से सरकार ने खरीदा है तब से वह धीमा चलने लगा है, पता नहीं सरकारी हो गया है।

छह महीने और बीत जाने के बाद वह आदमी फिर उस जगह से निकला तो देखा कि बैल आराम कर रहा है। वह चलता भी नहीं, उठता भी नहीं, खड़ा भी नहीं होता। तो उसने पूछा कि क्या बैल बिलकुल बीमार पड़ गया, मामला क्या है? तो जो आदमी उसके पास खड़ा था उसने कहा, बीमार नहीं पड़ गया है, इसकी नौकरी कन्फर्म हो गई है, अब यह बिल्कुल पक्का सरकारी हो गया है, अब इसे काम करने की कोई भी जरूरत नहीं रह गई है।

बैल अगर ऐसा करे तब तो ठीक है, आदमी भी सरकार में प्रवेश करते ही ऐसे हो जाते हैं। उसके कारण हैं, क्योंकि व्यक्तिगत लाभ की जहां संभावना समाप्त हो जाती है  और  जहां  व्यक्तिगत लाभ निश्चित हो जाता है, वहां कार्य करने की इनसेंटिव, कार्य करने की प्रेरणा समाप्त हो जाती है। सारे सरकारी दफ्तर, सारा सरकारी कारोबार मक्खियां उड़ाने का कारोबार है। पूरे मुल्क की सरकार नीचे से ऊपर तक आराम से बैठी हुई है। और हम देश के सारे उद्योग भी इनको सौंप दें! ये जो कर रहे हैं, उसमें सिवाय हानि के कुछ भी नहीं होता।

मेरा अपना सुझाव तो यह है कि जो चीजें इनके हाथ में हैं वे भी वापस लौटा लेने योग्य है। अगर हिन्दुस्तान की रेलें हिन्दुस्तान की व्यक्तिगत कंपनियों के हाथ में आ जाएं, तो ज्यादा सुविधाएं देंगी, कम टिकट लेंगी, ज्यादा चलेंगी, ज्यादा आरामदायक होंगी और हानि नहीं होगी, लाभ होगा। जिस-जिस जगह सरकार ने बसें ले लीं अपने हाथ में, वहां बसों में नुकसान लगने लगा। जिस आदमी के पास दो बसें  थीं, वह लखपति हो गया। और सरकार  जिसके पास लाखों बसें हो जाती हैं, वह सिवाय नुकसान के कुछ भी नहीं करती। बहुत आश्चर्यजनक  मामला है!

मैं अभी मध्यप्रदेश में था, तो वहां मध्यप्रदेश ट्रांसपोर्टेशन, बसों की व्यवस्था के जो प्रधान हैं-अब तो वे सब सरकारी हो गई हैं-उन्होंने मुझे कहा कि पिछले वर्ष हमें तेईस लाख रुपये का नुकसान लगा है। उन्हीं बसों से दूसरे लोगों को लाखों रुपये का फायदा होता था, उन्हीं बसों से सरकार को लाखों का नुकसान होता है। लेकिन होगा ही, क्योंकि सरकार को कोई प्रयोजन नहीं है, कोई काम्पिटीशन नहीं है।

दूसरा सुझाव मैं यह भी देना चाहता हूं कि अगर सरकार बहुत ही उत्सुक है धंधे हाथ में लेने को, तो काम्पिटीशन में सीधा मैदान में उतरे और बाजार में उतरे। जो दुकान एक आदमी चला रहा है, ठीक उसके सामने सरकार भी अपनी दुकान चलाए और फिर बाजार में मुकाबला करे। एक कारखाना आदमी चला रहे है, ठीक दूसरा कारखाना खोले और दोनों के साथ समान व्यवहार करे और अपना कारखाना चला कर बताए। तब हमको पता चलेगा कि सरकार क्या कर सकती है।

सरकार कुछ भी नहीं कर सकती है। असल में सरकारी होते ही सारे काम से प्रेरणा विदा हो जाती है और जहां सरकार प्रवेश करती है वहां नुकसान लगने शुरू हो जाते हैं।

समाजवाद और साम्यवाद दोनों ही, जीवन की व्यवस्था को राज्य के हाथों में दे देने का उपाय हैं। जिसे हम आज पूंजीवाद कहते हैं, वह पीपुल्स कैपिटलिज्म है, वह जन-पूंजीवाद है। और जिसे समाजवाद और साम्यवाद कहा जाता है, वह स्टेट कैपिटलिज्म, राज्य-पूंजीवाद है। और कोई फर्क नहीं है। जो चुनाव करना है वह चुनाव यह है कि हम पूंजीवाद व्यक्तियों के हाथ में चाहते हैं कि राज्य के हाथ में चाहते हैं, यह सवाल है। व्यक्तियों के हाथ में पूंजीवाद बंटा हुआ है, डिसेंट्रलाइज्ड है। राज्य के हाथ में पूंजीवाद इकट्ठा हो जाएगा, एक जगह इकट्ठा हो जाएगा।

और ध्यान रहे, बीमारी है अगर पूंजीवाद, तो बंटा हुआ रखना ही अच्छा है। कनसनट्रेटेड बीमारी और खतरनाक हो जाएगी, और कुछ भी नहीं हो सकता।

[नये समाज की खोजओशो]

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One Comment to “समाजवाद और साम्यवाद : ओशो (नये समाज की खोज)”

  1. ओशो के ये विचार भारत के ‘समाजवाद ‘ के संदर्भ में ठीक नहीं है . आधुनिक भारत में समाजवाद महात्मा गाँधी और डा राम मनोहर लोहिया के विचारो से प्रेरित है . डा लोहिया ने खुद कहा था . यूरोपीय समाजवाद सजावट की दूकान के काम आ सकता है . भारत में डा लोहिया समाजवाद के जनक कहे जाते है , उन्होंने अपने समाजवाद में समानता व् बंधुत्व को प्रमुख स्थान दिया है . बागैर समानता के समाज का समग्र विकास नहीं हो सकता है .

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