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दिसम्बर 2, 2014

आज मैंने … अज्ञेय

आज मैंने पर्वत को नई आँखों से देखाagyeya
आज मैंने नदी को नई आँखों से देखा
आज मैंने पेड़ को नई आँखों से देखा
आज मैंने पर्वत पेड़ नदी निर्झर चिड़िया को
नई आँखों से देखते हुए
देखा कि मैंने उन्हें तुम्हारी आँखों से देखा है
कविता का आखिरी छोर है
आज मैंने तुम्हारा एक आमूल नए प्यार से अभिषेक किया
जिसमें मेरा, तुम्हारा और स्वयं प्यार का
न होना भी है वैसा ही अशेष प्रभामंडित
आज मैंने तुम्हें प्यार किया प्यार किया प्यार किया….

(अज्ञेय)

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मई 9, 2013

यशोदा

तुझे मैं सुला लूंगी

अपनी छाती के कंटीले वन में ,

उलझे बालों को तेरे

संवार दूंगी,

रेगिस्तानों की हवा से

पहना दूंगी तुझे

समुद्र और पूरा आसमान

कहलने को दूंगी तुझे

निर्वासितों को उसाँसें|

चले जायेंगे हम दोनों

एक रोग-शून्य जगह,

जहां बच्चे खेलते होंगे

अस्पताल के खाली कमरों में

जहां मेरा भाग्यफल

अलग होगा और

तेरा भाग्यफल होगाहर रोज बंधा

मेरे आँचल से|

यहाँ तेरी ढूंढाई होती है

आंसुओं और आसक्ति भरी धुंध में,

तू तो बैठा मुस्कुरा रहा है

इतनी बड़ी लहर पर

कोई देख नहीं पाता,

रोते-रोते सूज जाता है मुंह

सभी देखते हैं

केवल गाय के झुण्ड को लौटते

उसके पीछे एक शून्य स्थान|

में तुझे देखती हूँ साफ़-साफ़

आग-सा दीखता है लप-लप

मेरे पागलपन का अति मनोरम स्वप्न

रात भर दिन भर दिखता रहे

तू तो एक नीलकंठ है

बैठा है मैदान के पेड़ पर

कोटि कोटि हैं रूप तेरे,

एक से बढ़कर एक सुंदरता में|

यहाँ के लिए कोई रास्ता-घाट नहीं,

फिर भी मैं कैसे आई यहाँ?

यहाँ पृथ्वी के सारे लोग, सारे पशु-पक्षी

मेरे और तेरे अंदर हैं ,

सारी नदियाँ, पेड़ और पर्वत

बन गये केवल एक नदी, पेड़ पर्वत

विश्राम कर रही हूँ मैं उस पेड़ तले

तुझे चिपकाए अपनी गीली छाती से

गा रही हूँ गीत तेरे लिए,

पर नहीं जानती

वह गीत सुनाई दे रहा है मेरे स्वर से या

मेरे बेटे के स्वर से|

(रमाकांत रथ)

अनुवाद – राधेश्याम मिश्र

मई 27, 2010

कौन तो लिखता है, कौन तो रचता है

प्रतीत तो ऐसा ही होता है
कि यह लिखा मेरे द्वारा ही जा रहा है
पर क्या लिखने वाला वास्तव में “मैं” ही हूँ ?
मेरे देखे मेरे समझे तो,
कभी एक तीन से तेरह साल का बाल मन,
कभी चौदह से उन्नीस साल का किशोर मन,
कभी बीस से पचास साल का युवा मन,
कभी पचास से साठ साल का प्रौढ़ मन,
और कभी साठ से सौ साल का वृद्ध मन
यह सब लिखता है।
क्या यह वही “मैं” हूँ जो कि “मैं” वास्तव में हूँ?

आयु की बात को छोड़ भी दें तो
क्या यह जो मन जिसके द्वारा सब कुछ लिखा जा रहा है,
वह स्त्री है या पुरुष?
या कि वह निरपेक्ष है
इन दोनों ही जैविक अंतरों से,
इन दोनों ही भावों से,
या कि वह ऊपर उठ चुका है ऐसे किसी भी अंतर से?

यदि सब कुछ “मैं” के द्वारा ही लिखा जाता है
तो क्यों श्रद्धा भाव उमड़ता है प्रकृति के प्रति,
इस पूरी सृष्टि के प्रति
तब तब
जब जब कुछ भी बहुत अच्छा लिखा जा सकना संभव हो जाता है
और ऐसा लगता है कि मेरा तो
सारा अस्तित्व ही एक खोखली बासुंरी समान हो गया है
जिसमें कोई और ही फूँक भर कर
सुरीली तान छेड़ रहा है।

यदि सब “मैं” का भाव ही रचता है तो क्यों
एक अदभुत कृति की रचना के समय
शिल्प और शिल्पकार के बीच स्थित
द्वैत खो जाता है
और रह जाता है केवल
“एक” का भाव।
इस अद्वैत के भाव को या तो “मैं” कह लो या
“वह” कह लो
पर इस “मैं” में “वह” भी है
बल्कि “वह” ही महत्वपूर्ण है
और उस “वह” में “मैं” का भी समावेश है

पर एक बात विनीत भाव से सामने आती है
यह “मैं” वही नहीं है
जो कि यह बताता चलता है
कि अरे सब तुमने ही तो किया है।

बहुत कुछ ऐसा रचा जाता है
जो जन्म तो लेता है
पर उसे जन्माया नहीं जाता
उसे जन्माया नहीं जा सकता
वह तो बस ऐसे ही उतरता है
मानस की शुद्धतम अवस्था में
जैसे कि बाकी सब रचनायें उतर रही हैं
प्रकृति में
प्रकृति के द्वारा ही
यहाँ वहाँ
जल में, थल में, नभ में,
धूप में छाया में।

…[राकेश]

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