Posts tagged ‘Para’

जुलाई 16, 2014

वे बेचते भुट्टे…

BoyGirlCorn-001बला की गर्मी… पारा डिग्री सेल्सियस में अर्द्ध शतक लगाने के एकदम करीब था…सूरज की किरणों की तीव्रता से लग रहा था कि मानो आज अपनी सारी ऊष्मा उड़ेल कर ही दम लेगा| धूप सिर को तपाये दे रहे ही, शरीर को जलाए दे रही थी|
ऐसे में कुछ दूर धूप में पैदल चलना पड़े तो लगे मानों जीते जी भट्टी में झुलस रहे हैं|

पर कई बार वे सब काम करने पड़ते हैं जो व्यक्ति मौजूदा परिस्थितियों में करना नहीं चाहता|

न  काम होता न तपती धूप में पैदल चलना पड़ता|

प्यास से कंठ सूख रहा था|

जहां पहुंचना अथा वह इमारत अभी भी कम से कम आधा किमी दूर थी| सड़क पार करके फुटपाथ पर चलना हुआ तो देखा कि दूर दूर तक छाया का निशां नहेने था और नंगा तपा हुआ फुटपाथ मुँह चिड़ा रहा था|

थोड़ी दूर चलने पर ही देखा तपती धूप में दो बालक भुट्टे बेचते फुटपाथ पर बैठे थे| सात-आठ साल की लड़की भुट्टे भून रही थी और उससे छोटा बालक, जो उसका भाई ही होगा, भुट्टे अपने पास चटाई पर रख बेच रहा था|

उनके थोड़ा पीछे एक छोटा सा पेड़ अवश्य था पर वहाँ एक टेम्पो वाले ने दुपहर को सोने के लिए कब्जा जमा लिया था वरना बच्चे वहाँ जो भी थोड़ी बहुत छाया थी उसी में अपना डेरा जमा सकते थे|

सामने ही एक प्रसिद्द पब्लिक स्कूल का में गेट चमचमा रहा था| इन् निर्धन बच्चों को रोजाना ही अंदर प्रवेश करते अमीर बच्चे दिखाई देते होंगे और वे यहाँ फुटपाथ पर भुट्टे बेचने को अभिशप्त थे| उनके लिए तो अभी से इस देश में दो देश बन गये थे, एक उनका देश था जो बचपन से ही कठोर मेहनत करके उत्पाद उगा रहा था, बना रहा था और बेच रहा अथा और एक दूसरा देश था जिसके बाशिंदें उनसे समां कभी कभी खरीद भी लेते थे वरना दूसरे देश के लिए बाजार भी और ही किस्म के थे, चमचमाते हुए, रोशनी और चकाचौंध से भरपूर|

प्यास से कंठ सूख रहा अथा| पानी भी साथ नहीं लिया था| मन में विचार आया कि क्यों न भुट्टा खा लिया जाए|

पर उससे तो प्यास और बढ़ेगी!

तो क्या, अब मंजिल नजदीक ही है जाकर और ज्यादा पानी पी लिया जायेगा|

पर बच्चों से भुट्टे लेना क्या बाल-मजदूरी का समर्थन नहीं?

पर अगर भुट्टा ना लिया तो क्या उनकी स्थिति में कोई सुधार होगा?

अगर भुट्टा ले भी लिया तो एक भुट्टे से या कुछ भुट्टे खरीदने से क्या सुधार होगा उनकी स्थिति में?

उनके माता-पिता उन्हें मजदूरी से हटा स्कूल भेजने लगेंगे?

थोड़ी देर ऐसे ही उलझन में घिरा खड़ा रहा|

फिर बच्चों की तरफ देख दो भुट्टे देने को कहा|

कम से कम इस तपती धूप में उन्हें दो भुट्टे बेच पाने का संतोष तो मिलेगा शायद उन्हें खुशी भी हो|

इनका अच्छा भविष्य तो सरकारों के हाथ में है| वे चाहें तो ये बच्चे भी पढ़ लें और भविष्य बना लें|

भुट्टा खाते चलते हुए और बच्चों के बारे में सोचते हुए मंजिल भी आ गई|

उनके बारे में सोच सकने वाले मंत्री बनेंगे नहीं और मंत्री ऐसे बच्चों के पास समय व्यतीत करके उनके बारे में सोचेंगे नहीं|

तो ऐसे बाल-मजदूरों का क्या भविष्य है इस देश में|

क्या ये भुट्टे बेचते और ऐसे अन्य काम करते ही रह जायेंगे?

 

…[राकेश]

 

Advertisements
मई 21, 2013

मेरे गीत नहीं पाओगे

गीतों में ही रहा करोगे

शब्द-शब्द में बहा करोगे

मुझे तलाशोगे उनमें तुम

फिर भी मीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

तुमसे मैंने कब कुछ माँगा

फिर क्यों तोड़ दिया यह धागा

खोज खोज कर थक जाओगे

ऐसी प्रीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

तुम्हे एक संसार मिला है

और बहुत-सा प्यार मिला है

फिर भी ज़रा सोच कर देखो

यह मनमीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

भीतर-बाहर कितना रो लो

या फिर पारा-पारा हो लो

साँसों ने जो तुम्हे सुनाया

वह संगीत नहीं पाओगे

मेरे गीत नहीं पाओगे…

{कृष्ण बिहारी}

%d bloggers like this: