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जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time (A Novel) …कुछ झलकियां

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‘सर, मुझे लगता है वह आदमी अभी जिंदा होगा’| मेजर शैलेन्द्र रावत ने कहा|

‘रावत, तुम ऐसा दावे के साथ कैसे कह सकते हो’? कर्नल सिंह ने कहा|

‘सर, मैं एक गढवाली हूँ| मैंने हिमालय में बहुत सी ऐसी गुफाएं देखी हैं जहां योगी और साधू अभी भी साधना किया करते हैं| यह गुफा भी प्राकृतिक गुफा नहीं थी वरन मानव निर्मित थी| यह अवश्य ही साधुओं और तपस्वियों की किसी परम्परा दवारा विकसित गुफा है जो अभी भी साधना के लिए उपयोग में ली जाती है| संन्यासी सदियों से ऐसी गुफाओं का इस्तेमाल करते रहे हैं| हजारों हजार तपस्वियों की साधना से ऐसी गुफाएं ऊर्जा से लबरेज रहती हैं| साधना के इच्छुक साधुओं और योगियों को यहाँ भेजा जाता है ताकि वे एकांत में साधना कर सकें| यदि वह आदमी इस गुफा में कुछ दिन रुका तो ऐसा नहीं हो सकता कि जिस परम्परा की यह गुफा है, उस परम्परा के संन्यासियों को इस बात का पता न चला हो| हो न हो संन्यासी उस व्यक्ति को अपने साथ ले गये होंगे और वह सांसारिक बंधनों से मुक्त्त होकर स्वयं भी संन्यासी बन गया होगा|’

‘शैलेन्द्र, कैसे तुम इतना ठोस दावा कर सकते हो?|

‘सर, मैंने गुफा में धूप बत्ती की राख देखी और लोबान की सुगंध को महसूस किया और मुझे पूरा विश्वास है कि वह आदमी तो अपने साथ धूप लेकर गया नहीं होगा| संन्यासी धूप का प्रयोग करते हैं गुफा के अंदर रोशनी के लिए और यह अंदर की वायु को भी शुद्ध करती है| सूबेदार दीक्षित ने इन् बातों पर ध्यान नहीं दिया किन्तु मैंने ऐसे छोटे छोटे संकेतों पर ध्यान केंद्रित किया| केवल एक बात मेरी समझ में नहीं आई और जो मुझे उसी समय से परेशान कर रहे एही जबसे मैंने गुफा के अंदर पैर रखा था| मेजर रावत ने खोये खोये से स्वर में कहा|

सब लोग शांत होकर मेजर रावत की बात सुन रहे थे, उन सभी को अपनी ओर देखते हुए पाकर, मेजर ने कहा,”सर, गुफा के गीले पथरीले फर्श पर मैंने दो जोड़ी पांवों के निशान देखे| हालांकि गुफा के बाहर पैरों के बहुत सारे निशान थे, पर अंदर केवल दो ही जोड़ी थे| और एक जोड़ी पाँव के निशान असामान्य थे और आकार में काफी बड़े थे| इतने बड़े पैरों के निशान सामान्य मनुष्य के नहीं हो सकते”|

‘तो, तुम कहना क्या चाहते हो?”

‘पता नहीं सर, मैं खुद इस गुत्थी को नहीं सुलझा पा रहा हूँ’|

‘क्या वे किसी जानवर के पंजों के निशान थे?’

‘नहीं सर, जानवर के पंजे के निशान तो बिल्कुल भी नहीं थे| थे इंसानी पाँव के निशान ही, परन्तु बहुत ही बड़े पैरों के निशान थे, और निशान की स्पष्ट छाप बता रही थी कि वे किसी बहुत भारी मनुष्य के पैरों के निशान थे’|

‘ह्म्म्म’|

कुछ देर की खामोशी के बाद जवान मधुकर श्रेष्ठ ने आगे बढ़कर हिचक के साथ कहा,”साहब अनुमति हो तो मैं भी कुछ कहूँ?”

‘जरुर’|

‘साहब, उत्तराखंड और नेपाल में ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी अमर हैं और वे अभी तक हिमालय में विचरण करते हैं| सर, ऐसा कहा जाता है कि जो भी उन्हें देख लेता है वह या तो पागल हो जाता है या मर जाता है| कृपया इसे एक बुढाते व्यक्ति का अंध-विश्वास मान कर नकारिये मत| मुझे विश्वास है कि वे असामान्य पांवों के निशान अवश्य ही हनुमान जी के थे| आज के दौर के मनुष्यों के पांवों के निशान वैसे हो ही नहीं सकते|”

‘क्या ऊलजलूल बात कर रहे हो?’

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‘आह पवित्र वेदों के ज्ञान को मौखिक रूप से अगली पीढ़ी को सौंपने के लिए श्रुति की परम्परा को सुरक्षित करने के लिए एक और शिष्य! लेकिन परिश्रमी मनुष्यों के कठोर परिश्रम को पार्श्व में ढकेल कर देवताओं और उनसे सम्बंधित सर्वथा कर्महीन राजाओं की झूठी महानता का वर्णन क्यों? कथाओं में राजाओं का संबंध ईश्वर से स्थापित करके उन्हें आम जनता की निगाहों में अजेय और अमर बनाकर राजवंशों को अमरता प्रदान करने का षड्यंत्र कब तक चलेगा?’ विश्वामित्र ने क्षुब्ध होकर सोचा|

विश्वामित्र ने धीमे स्वर में पूछा,”चारुदत्त, तुमने यह कहानी कहाँ सुनी?”

“भगवन, ब्रह्म-ऋषि वशिष्ठ के गुरुकुल में”|

विश्वामित्र अपनी निराशा छिपा नहीं पाए और सयंत लेकिन दबे हुए क्रोधित स्वर में बोले,” चारुदत्त, मुझे नहीं पता, वहाँ क्या पढ़ाया जाता है| राज्यों के कोष से चलने वाली शिक्षण संस्थाएं इतिहास का पुनर्लेखन एवं पुनर्पाठ करती हैं क्योंकि यह उनके आश्रयदाता के हितों के अनुकूल होता है| भगीरथ की असली कहानी क्या है, कोई नहीं जनता लेकिन जिसमें मैं विश्वास रखता हूँ , मैं तुम लोगों को वह सुनाता हूँ”|

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“रानी सुमित्रा के दो जुड़वा बेटे हैं, लक्ष्मण और शत्रुघ्न| लक्ष्मण अपनी माँ की तरह है, लाग-लपट से दूर, सीधे सच्चे बोंल बोलने वाला| शत्रुघ्न को राजमहल की ऐश्वर्यपूर्ण जीवन शैली पसंद है पर लक्ष्मण को महल से बाहर का जीवन भाता है| वह तीव्र बुद्धि वाला मेहंताकश इंसान है| अपनी माँ की तरह उसे भी राजा दशरथ की महिलाओं के प्रति कमजोरी, राजा की चापलूसों से घिरे रहने की आदत, और सबसे छोटी रानी कैकेयी के सामने घुटने टेक कर रहने की प्रवृति सख्त नापसंद है| लक्ष्मण के पास सूचना एकत्रित करने का तंत्र विकसित करने की विलक्षण प्रतिभा है| राजसी सेवकों में लक्ष्मण बेहद लोकप्रिय है और वे उसके प्रति बेहद निष्ठावान हैं| एक बार मैंने लक्ष्मण से पूछा कि वे कैसे सेवकों से एकदम सही सूचना निकलवा पाने में सफल रहते हैं, सेवक उनको क्यों इतना पसंद करते हैं ?”|

विनम्र लक्ष्मण ने हँस कर उत्तर दिया,” शायद वे महसूस करते हैं कि मैं उनमें से एक हूँ”|

“मैंने सुना है राम कैकेयी को पसंद नहीं करते”| विशालक्ष ने अँधेरे में तीर छोड़ा|

धरमरुचि ने उसकी ओर ऐसे देखा मानों अनुमान लगा रहा हो कि यह प्रश्न अज्ञानता का फल है या मूर्खता का|

‘नहीं, ऐसा नहीं है| लक्ष्मण से उलट, राम के कैकेयी के साथ अच्छे संबंध हैं| कैकेयी के शुरुआती मानसिक द्वंद को छोड़कर, वे आसानी से राम के ह्रदय में प्रवेश कर गयीं| कैकेयी बेहद सुंदर थीं और उनकी उम्र भी बहुत नहीं थी, राम से हो सकता है छह सात साल ही बड़ी हों, मुझे निश्चित नहीं पता”|

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‘मुनिवर, इसमें क्या हानि है अगर किसी ने पुराना और व्यर्थ पड़ा धनुष तोड़ दिया’? लक्ष्मण ने लापरवाह अंदाज़ में कहा|

क्रोध से उबल कर परशुराम ने अपने विशाल फरसे से वार किया किन्तु लक्ष्मण ने उतनी ही शीघ्रता से फरसे के वार से अपना बचाव कर लिया|

यह सब देख, विश्वामित्र ने आगे बढ़कर परशुराम को चेताया|

‘भार्गव, यह युद्ध स्थल नहीं है| यह राज दरबार है| कृपया इसकी मर्यादा का सम्मान करें| एक बालक के ऊपर फरसे से वार करना आपको शोभा नहीं देता’|

‘पितामह, यदि परम्परा का सम्मान नहीं होगा तो मेरा फरसा हर व्यक्ति को समुचित उत्तर देगा चाहे वह राजा जनक हो या दशरथ का यह युवा पुत्र| आप कृपया मेरे मामले में न पड़ें’|

विश्वामित्र ने परशुराम को शांत करके समझाने का प्रयत्न किया|

राम, आपने यहाँ आने का कष्ट किया| मैं आपके गुस्से को समझ पाने में असमर्थ हूँ| आप एक पुराने धनुष की तुलना परम्परा तोड़ने से कर रहे हैं| क्यों? कृपया इस आयोजन की मूल भावना को समझने का प्रयत्न करें| मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप अपने फरसे का उपयोग धर्म की रक्षा के लिए करें’|

‘कौशिक, जिस किसी ने शिव के महान पिनाकी का अपमान किया है, मैं उसे नहीं छोडूंगा| प्रतीकों की अपनी गरिमा होती है| अगर आप मेरे दुश्मनों के साथ खड़े होंगें तो मैं भूल जाउंगा कि आप मेरे पितामह हैं’|

‘भार्गव आपके दुश्मन कौन हैं? राजर्षि जनक या राम, जिसने कि राक्षसों का संहार किया है कमजोर लोगों की सहायता करने के लिए? ऐसा क्यों है कि रावण जैसे आतंकवादी आपके दुश्मन नहीं हैं?’|

‘कौशिक मेरा ध्यान बंटाने की चेष्टा मत कीजिये| मैं रावण को अपना दुश्मन क्यों मानूं?’

‘क्यों नहीं? आपके लिए शिव भक्ति ज्यादा महत्वपूर्ण है, मासूमों और निर्दोषों के हत्यारों को सजा देने से| क्षमा कीजिये परन्तु आप छिलके की रक्षा कर रहे हैं और फल को सड़ने दे रहे हैं!’

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रात्री में लक्ष्मण ने राम से पूछा,”हनुमान औरों से अलग कैसे हैं, विशेषकर अंगद से? क्या किसी साधारण मानव दवारा ऐसा चमत्कारिक कर्म करना संभव है”?

‘जब एक साधारण मनुष्य चमत्कार करता है तभी वह महान बनता है| लक्ष्मण, हमारा दृष्टिकोण हमें अलग बनाता है| दृष्टिकोण ही हमें प्रेरित करता है, जोखिम उठाने के लिए तैयार करता है, और हमारे निश्चय को दृढ बनाकर, हमें प्रतिबद्ध बनाता है ताकि हम अपने धर्म को जी सकें, अपना कर्म को पूर्णता प्रदान कर सकें|’

अंगद और अन्यों ने क्यों समुद्र पार करने से इंकार कर दिया?’ लक्ष्मण ने पूछा|

‘केवल हनुमान ने असफल होने के भय को किनारे करके आगे बढ़ने का जोखिम उठाया| हरेक के लिए यह कहना आसान था कि वे समुद्र किनारे तक गये पर सीता का कोई सूत्र उन्हें नहीं मिला| कोई भी उनसे प्रश्न नहीं करता| परन्तु लक्ष्मण, लक्ष्य था सीता को ढूँढना| वह थी प्रतिबद्धता| जोखिम उठाने वाला दृष्टिकोण हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाता है| इससे असीमित ऊर्जा और संभावनाओं का प्रस्फुटन होता है| इसके लिए, फले हमको अपने अंदर से असफल होने की लज्जा बाहर निकालना पड़ता है|

‘क्या सीता को ढूँढने के अभियान के वक्त अंगद का व्यवहार अजीब नहीं था?’

‘कैसे?’ राम ने पूछा|

‘अपने दल के सदस्यों को प्रेरित करने के स्थान पर उसने उन्हें निराश करने की कोशिश की| इसके अलावा उसने सुग्रीव को अपशब्द कहे और युवराज जैसे पद से न कहने वाले वचन कहे|’

‘लक्ष्मण, अंगद के भय असुरक्षा की भावना से उपजे हैं| ऐसा युवा जो कि अपनी संभावनाओं के प्रति शंकालू हो और जो जोखिम लेने में रूचि न रखता हो, वह असफलता से घबराएगा ही| हमें उसे मजबूती प्रदान करनी होगी और उसे आत्मविश्वास से भरना होगा| मैं युद्ध से पहले यह काम करूँगा|’

लक्ष्मण को अपनी ओर देखता पाकर राम ने कहा,”लक्ष्मण, असफलता का भय हमें अपनी पूरी शक्ति से काम करने से रोकता है| एक बात बताओ, क्यों कोई भी वानर इस अभियान पर जाने के लिए तैयार नहीं था? वे सब असफलता से डरे हुए थे, उन्हें शर्म आ रही थी कि अगर वे असफल हो गये तो वे सुग्रीव का या मेरा सामना कैसे करेंगे|’

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मेघनाद ने अपने रथ पर हाथ-पैर बांध कर खड़ी की गई स्त्री को दिखाते हुए गरज कर कहा,” राम यही वह स्त्री है न जिसके लिए तुम युद्ध कर रहे हो| आज मैं तुम्हारे सामने इसका अंत कर देता हूँ”|

ऐसी घोषणा करके मेघनाद ने अपनी तलवार स्त्री के सीने में घोंप दी और दूसरे वार में स्त्री का सिर धड़ से अलग कर दिया| इस वीभात्स्कारी कृत्य ने सभी को स्तब्ध कर दिया| हनुमान ने कूदकर स्त्री के मृत शरीर को हथियाना चाहा पर मेघनाद हनुमान की उम्मीद से ज्यादा तेज गति से अपने रथ को युद्धभूमि से दूर ले गया|

दुखी हनुमान और कुछ अन्य सैनिक रोते हुए राम के पास पहुंचे| कुछ पल के लिए राम भ्रमित हो गये और फिर धीरे से धरा पर बैठ गये|

‘क्या तुम्हे विश्वास है वह सीता ही थी?’ राम ने मंद स्वर में पूछा|

स्तब्ध हनुमान के कंठ से स्वर न निकला पर उसने सिर हिलाकर अनुमोदन किया|

राम को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ|

विभीषण भाग कर आया और कहा,” राम, यह सब माया का खेल है, इसके जाल में मत फंसना| युद्ध के बीच में हारते हुए दुश्मन पर क्यों भरोसा किया जाए? राम, रावण और उसका पुत्र दोनों मायाजाल के स्वामी हैं| हनुमान भी घटना का अनुमोदन करें तो भी मैं विश्वास नहीं कर सकता कि सीता को ऐसे मारा जा सकता है| राम, भावनाओं को अलग रख कर सोचो, रावण सीता को क्यों मारेगा?”

लक्ष्मण को विभीषण की बात पर भरोसा नहीं हुआ,” विभीषण, वह क्यों ऐसा नहीं करेगा? रावण पहले ही अपनी आधी से ज्यादा सेना, अपने भाई और बहुत सारे करीबी रिश्तेदारों की आहुति इस युद्ध में दे चुका है| यह बदला है| यदि वह हार भी गया तो वह हमें सीता को वापिस क्यों करेगा?”

लक्ष्मण, मैं रावण को आपसे ज्यादा जानता हूँ| रावण एक अहंकारी राजा है और उसके अहं को जो पोषित करे उसे वही काम और रास्ते भाते हैं| सीता को मारने का विकल्प उसके लिए कभी मायने नहीं रख सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसके दिमाग में उसके अपने बारे में सर्वश्रेष्ठ योद्धा, सर्वश्रेष्ठ राजा, और धरती पर जन्में सर्वश्रेष्ठ पुरुष की छवि खंडित हो जायेगी| राम, ऐसा आदमी मेघनाद को सीता को युद्धस्थली पर लेकर आने की अनुमति क्यों देगा? और मेघनाद रावण से जुड़े किसी भी मामले में अपनी तरफ से कोई भी निर्णय नहीं लेगा|

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(मूल अंग्रेजी से अनुवादित)

जनवरी 1, 2015

Ram : The Soul of Time

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मानव जाति का इतिहास गवाह है कि अच्छाई और बुराई एक साथ नहीं रह सकते, स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद एक साथ नहीं रह सकते, अच्छी और बुराइयों से ग्रस्त सभ्यताओं में टकराव अवश्यंभावी है, इसे कोई कभी नहीं टाल सका और कभी कोई टाल भी नहीं सकेगा| हमेशा ही अच्छाई और बुराई आपस में टकराये हैं| बुराई कुछ समय के लिए जगत पर छा गयी प्रतीत होती है पर उसे हराने के लिए अच्छाई पनप ही जाती है| साधारण मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण है और जीवन भर उसके अपने अंदर इन् दो प्रवृत्तियों के टकराव चलते ही रहते हैं| ऐसे महापुरुष भी हर काल में होते आए हैं जिन्होने बहुत कम आयु में ही अपने अंदर अच्छाई को बढ़ावा दिया और जो अपने अंदर की बुराई को पराजित करते रहे|

इन् महामानवों में भी सर्वश्रेष्ठ किस्म के मनुष्य हुए जिन्होने अपने अंदर की बुराई पर ही विजय प्राप्त नहीं की वरन जगत भर के मनुष्यों को अच्छाई की राह दिखाने के लिए बाहरी जगत में बेहद शक्तिशाली बुरी शक्तियों से टक्कर ली, नाना प्रकार के कष्ट सहे पर वे मनुष्यों के सामने अच्छाई को स्थापित करके ही माने| इन् सर्वश्रेष्ठ महामानवों में कुछ को ईश्वर का अवतार भी मनुष्य जाति ने माना| इनमें से जिन महामानवों ने ध्येय की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता पर विशेष जोर दिया उनमें राम का नाम बहुत महत्व रखता है| इसी नाते उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम कह कर भी पुकारा जाता है|

सदियों से हर काल में राम-कथा मनुष्य को आकर्षित करती रही है और भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने रामकथा को अपने नजरिये से जांचा परखा और प्रस्तुत किया है| राम को ईश्वर मान लो और रामकथा को सार रूप में ग्रहण कर लो तो बात आसान हो जाती है कि राम तो ईश्वर के अवतार थे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था और तब राम के जीवन से एक दूरी बन जाती है क्योंकि जन्म के क्षण से ही वे अन्य मनुष्यों से अलग समझ लिए जाते हैं और केवल भक्ति भाव से ही मनुष्य उनके जीवन के बारे में जानते हैं पर इन सबमें राम की वास्तविक संघर्ष यात्रा अनछुई और अनजानी ही रह जाती है|

पर वास्तविकता तो यह नहीं है, मनुष्य रूप में जन्मे राम को जीवनपर्यंत विकट संघर्षों और कष्टों से गुजरना पड़ा| किसी भी काल में सत्ता निर्ममता, क्रूरता और तमाम तरह के हथकंडों के बलबूते चलाई जाती रही है और जहां सत्ता के दावेदार एक से ज्यादा हों वहाँ हमेशा षड्यंत्र होते ही रहते हैं| राम के पिता दशरथ ने अपने जीवन को और अपने राज्य को जटिल समस्याओं में उसी वक्त बांध दिया था जब उन्होंने तीन विवाह किये और तीसरा विवाह अपने से बेहद कम उम्र की कैकेयी के साथ किया| इन् परिस्थितियों में अयोध्या का राजमहल षड्यंत्रों से परे रहा होगा यह मानना नासमझी का सबब ही बन सकता है|

राम कोई एक दिन में नहीं बन जाता, बचपन से उनका जीवन तमाम तरह के संघर्षों से गुजरकर निखरता रहा| अपनी खूबियों को निखारते हुए वे कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके ऐसे बने जिस रूप में कि दुनिया उन्हें जानती है|

राम के जीवन पर आधारित हाल ही में अंग्रेजी में प्रकाशित नया उपन्यास “Ram The Soul Of Timeरामकथा को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है और रामकथा के कई अनछुए पहलुओं को प्रकाश में लाता है| यह उपन्यास “राम” की सर्वकालिक प्रासंगिकता को स्थापित करता है| आधुनिक काल में अँधेरे की ओर तेजी से अग्रसर मानवता को राम जैसे एक प्रेरणादायक वैश्विक नेता के मार्गदर्शन की ही जरुरत है जो हर मुसीबत का सामना वीरता, संकल्प और बुद्धिमानी के साथ करे और जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता से समझौते न करे और आदर्श के सच्चे और पवित्र रूप को स्थापित करे|

उपन्यास में “रामकथा” बड़े ही रोमांचक माहौल में जन्मती है| कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में मनुष्य की लोलुपता ने प्रकृति को इतना परेशान किया कि ऊपर पहाड़ों पर चहुँ ओर विनाश बरपने लगा| विनाश के तांडव में घिरे हुए एक अकेले पड़ चुके मनुष्य का, जिसे नहीं पता कि वह जीवित रहेगा या नहीं और अगर जीवित रहा भी तो कितने दिन, विज़न है यह रामकथा| मृत्यु के सामने खड़े इस मनुष्य की अंतरात्मा की आवाज है यह रामकथा|

भ्रष्ट और उपभोक्तावादी राक्षसी सभ्यता को दुनिया भर की सिरमौर सभ्यता बनाने का संकल्प रखने वाले राक्षसराज रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया इसलिए राम ने रावण के साथ युद्ध किया, ऐसी धारणा बहुत से लोग रखते हैं| यह उपन्यास इस धारणा को पूरी तरह से नकारता है और स्थापित करता है कि अच्छाई की तलाश कर रहे राम का संघर्ष बुराई को जगत में स्थापित करते जा रहे रावण से होना ही था, चाहे वह किसी भी तरीके से होता| वनवास के तेरह सालों में “राम” एक एक कदम बुराई के खिलाफ उठा आगे बढ़ रहे थे| रावण का साम्राज्यवाद पनप ही नहीं सकता था राम के रहते| रावण को राम को अपने रास्ते से हटाना ही था अगर उसे पूरी दुनिया पर अपना राज कायम करना था|

उपन्यास दर्शाता है कि ऋषि विश्वामित्र पृथ्वी पर अच्छाई और, और अच्छी, मानवीय और विकास वाली सभ्यता की स्थापना करने के अपने यज्ञ में कर्म की आहुति डालने के लिए पृथ्वी पर सर्वथा योग्य राम का चयन करते हैं और उनका सपना राम की प्राकृतिक प्रवृति से मिलकर राम के लिए एक ध्येय बन जाता है|

राम के जीवन पर सीता की अग्नि परीक्षा, गर्भवती सीता को वनवास और एक शम्बूक नामक शूद्र को वेद सुनने पर दण्डित करने के आरोप लगाए जाते हैं|

यह उपन्यास सीता की अग्नि परीक्षा को बिल्कुल नये तरीके से संभालता है और जो ज्यादा वाजिब लगता है और यह भाग किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि भी कहा जा सकता है| यह उपन्यास राम दवारा विभीषण को लंका का राजा बनाने के साथ समाप्त हो जाता है|

आशा है लेखक अपने अंदाज वाली “रामकथा” का दूसरा भाग लिखेंगे और उसमें सीता को वनवास और शम्बूक प्रकरण की व्याख्या अपने अनुसार करेंगे|

रामकथा” में इच्छुक लोगों को यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए|

Novel – Ram The Soul Of Time

Author – Yugal Joshi

Pages – 479

Publisher – Har Anand Publications Pvt. Ltd (Delhi)

info@haranandbooks.com, haranand@rediffmail.com

अक्टूबर 28, 2014

राजा रावण हो या राम…कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा रावण हो या राम
जनता तो बेचारी सीता है
रावण राजा हुआ तो वनवास से
चोरी चली जाएगी
और राम राजा हुआ तो
अग्नि परीक्षा के बाद फिर वनवास में भेज
दी जाएगी।


कोई फर्क नहीं पड़ता इस देश में राजा कौरव
हो या पांडव
जनता तो बेचारी द्रौपदी है
कौरव राजा हुए तो चीर हरण के काम
आयेगी
और पांडव राजा हुए तो जुए में हार
दी जाएगी।


कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा हिन्दू हो या मुसमान
जनता तो बेचारी लाश है
हिन्दू राजा हुआ तो जला दी जाएगी
और मुसलमान राजा हुआ
तो दफना दी जाएगी

(सुरेन्द्र शर्मा)

नवम्बर 7, 2013

ढूंढोगे तो राम मिलेगा…

सौ मुंह हों औ’ सौ सौ बात ram-001

वहाँ मनुज की क्या औकात

अगर खुदा भी वहाँ आ गया तो

वह भी बदनाम मिलेगा

ढूंढोगे तो राम मिलेगा…

तुम मानो न अजूबा हूँ मैं

अभी अकेला डूबा हूँ मैं

कुछ ही दिनों में इसमें डूबा

हरेक खासोआम मिलेगा

ढूंढोगे तो राम मिलेगा…

तुम मुझको इल्जाम न देना

मेरी बात मान तो लेना

जिस दिन मैं खुद को बेचूंगा

मुंह मांगा हर दाम मिलेगा

ढूंढोगे तो राम मिलेगा…

सच से फिर किसलिए डरूं मैं

लो, यह वादा आज करूँ मैं

जो भी मेरे साथ दिखेगा

दुनिया में सरनाम मिलेगा

ढूंढोगे तो राम मिलेगा…

{कृष्ण बिहारी}

मई 17, 2013

अस्पताल वहीं बनाएंगे

मैंने जन्म लिया था

एक आयुर्वेदिक अस्पताल में

मगर अब उसी इमारत की

नींव पर खड़ा है एक

एलोपेथिक अस्पताल

मेरा तो कर्तव्य है

कि मुझे गिराना है

वह एलोपेथिक अस्पताल

और खड़ा करना है

वही आयुर्वेदिक अस्पताल

हालांकि मुझे मालूम है

एलोपेथिक हो या आयुर्वेदिक

अस्पतालों का मकसद एक है

अस्वस्थ को स्वस्थ करना

पर सवाल तो है जन्म स्थल का

और हमारी भावनाओं का

एक सुझाव आया है

थोड़ा हटकर बना लूं

अपना आयुवेदिक अस्पताल

पर कैसे मान लूँ इसे

सुनना पड़ जाएगा ताना

कि देखो , इसका खून

खून नहीं, पानी है

अब पूछते हैं लोग

सबूत है जन्मस्थल का?

प्रमाण है कोई?

मेरा तो जवाब है

सीधा सच्चा, किन्तु करारा

सबूत तो बैसाखी है

अदालत की, कानून की

यहाँ तो प्रश्न है

आस्था का, भावना का

मेरा तो धर्म है

वहाँ फिर खड़ा करना

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

बुद्धिजीवी समझाते हैं

मुझे क्या मिलेगा

एक अस्पताल गिरा कर

दूसरा अस्पताल बनाने में

पर मैं क्यों अपनाऊं

तुष्टीकरण की नीति

मेरा प्रथम कर्तव्य है

आयुर्वेदिक अस्पताल बनाना

इतिहास की भूल मानकर

कैसे खड़ा रहने दूँ

एलोपेथिक अस्पताल

गलती, गलती है फिर वह

साढ़े चार वर्ष पहले हुई

या साढ़े चार सौ वर्ष पहले

मैं तो अडिग हूँ

अपने पथ पर

भले ही मरीजों की

संख्या बढ़ जाए

दुख बढ़ जाएँ

दर्द बढ़ जाएँ

लाशें बढ़ जाएँ

निरोगी रोगी हो जाएँ

क्योंकि इनसे बड़ा सवाल है

जन्म स्थल का

आयुर्वेदिक अस्पताल का

मैं अपील करता हूँ

आयुर्वेदिक अस्पताल में

जन्मे हरेक व्यक्ति से

कि गर्व से कहो

हमें बनाना है

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

आयुर्वेदिक अस्पताल

(अमिताभ बेहार)

मई 13, 2013

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं

हाँ वे मुसलमान थे

हम जैसे इंसान थे

लेकिन उनके सीनों में कुरआन था

और हाथों में तलवार

यकीनन वे पुकारते होंगे

हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

हिंद के वासियों को

वे हिन्दू ही कह सकते थे|

और हिंद के वासी

यानी बड़े नाम वाली नामवर जाति

बाएं बाजू की ताकत से बेखबर

दायें हाथ में तराजू लिए

अपना नफ़ा नुकसान तोल रही थी|

निम्न, अछूत, अनार्य इंधन पर

खौल रहा था

ब्राह्मणवाद का कढ़ाहा

और तली जा रही थीं

सत्ता और सुविधा की पूडियां |

पूडियां खाने के शौकीन

ब्राह्मण

उन्हें मलेच्छ कह सकते थे

पूडियां खाने का शौक और बनाने का फन

उन्हें निर्यात नहीं हुआ था

लेकिन

उनके दिलों में सफाई थी

वे ईमान की ताजगी लेकर निकले थे

तभी तो

दश्त क्या चीज है

दरिया भी उन्होंने नहीं छोड़े

जहां चाहा उतार दिए अपने घोड़े

हमलावर तो हमलावर होते हैं

घर लूटा और चलते बने

जैसे अंग्रेज आए और निकल भागे

वे कैसे हमलावर थे?

लूटने आए और लुटने वालों के होकर रह गये

सिर्फ तलवार के नहीं

वे विचार के धनी भी थे

जैसे ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

हाँ! वे मुसलमान थे

ठीक कहते हो

वे आसमान से नहीं उतरे थे

लेकिन आसमानी धूप लेकर आए थे

वे मसावात-मसावात चिल्लाते आए थे

नया इन्कलाब लाए थे

वे यकीनन यहीं कहीं दूर से आए थे

और आर्यों की तरह आए थे

फर्क बस इतना था

आर्यों ने खदेड़ा था अनार्यों को

विंध्याचल के उस पार तक

जो शेष रह गये थे वे सेवक बनाए गए

अर्थात भंगी, चमार, नाई, धोबी, वगैरह-वगैरह

लेकिन वे मुसलमान थे

अहले-कुरआन थे

उन्होंने मुसलमान बनाए

अपनी इबादतगाहों में ले आए|

भंगी जब सैयद के साथ मस्जिद में बैठा होगा

ज़रा सोचकर देखो कि क्या सोचा होगा?

तुम कहते हो कि वे मुसलमान थे

वे दरहकीकत मुसलमान हैं

इतिहास के गलियारों में,

अतीत के बाजारों में,

ताकने-झाँकने से फायदा?

वे मुसलमान हैं

और हमारी तरह वर्तमान हैं

वे समस्याग्रस्त इंसान हैं

उन्हें अतीत में जीवित रखने की ख्वाहिश

जख्मों पर नमक लगाकर जगाने की काविश

जागृति नहीं खून के आंसू लाएगी

नंगे सच को

लफ्जों का लिबास देने से क्या होगा

सच को सच की तरह सुना जाए

तो सुनो-

मुसलमान न होते तो

कबीलों, वर्णों, तबकों, और जातियों के जंगल में

घृणावाद की आग लगी होती

जंगल जल चुका होता

फिर आरक्षण की धूप में किसे सेकते

आरक्षण का विरोध कौन करता

जनतंत्र की मैना कहाँ चहचहाती

समता, संतुलन, समाज सुधार शब्दकोश में धरे रहते

ईंट-पत्थर की इमारत कोई भी बना सकता है

शहर बसते ही रहते हैं

वे न होते तो बहुत कुछ न होता

या कुछ न कुछ होता

वे हैं तो दिक्कत क्या है?

वे मुसलमान हैं

वे रथ या घोड़े पर सवार आतंक नहीं हैं

वे राम से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

राम नाम के सौदागरों से

वे मार्क्स से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

मार्क्स के नाफहम अनुयायियों से

वे वाकई नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

हुक्मे-इलाही में मिलावट करने वाले मुल्लाओं से

वे तैरना जानते हैं लेकिन

नदी किनारे बैठने को विवश हैं

उनके सिर्फ रिश्तेदार पाकिस्तान में हैं

आडवाणी जैसों को टटोलिए

जन्मभूमि का महत्व क्या है

अयोध्या से अधिक वे कराची में जीते हैं

हाँ! वे मुसलमान हैं

दो सौ बरस तक अंग्रेजों से लड़ते रहे

उन्होंने पाकिस्तान बनाया

वे पाकिस्तान के खिलाफ जंग में शहीद हुए

वे मुसलमान हैं

उनके पुरखों की हड्डियां दफ़न हैं यहीं

वे कहीं से नहीं आए

वे कहीं नहीं गए

वे कहीं नहीं जायेंगे

वे पाकिस्तान समेत फिर आयेंगे

क्योंकि वे मुसलमान हैं

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं |

(चन्द्रभान ‘खयाल’)

मार्च 21, 2013

तब तुम मुझको याद करोगे…

अभी तुम्हारा ध्यान कहीं है

पीड़ा का अनुमान नहीं है

जिस दिन ठोकर लग जायेगी

उस दिन तुम फ़रियाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

बालू की दीवार खड़ा कर

ताशों के तुम महल बना कर

अपने दिल की इस बस्ती को

जिस दिन तुम खुद बर्बाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

मैं संयम का नहीं पुजारी

लंगडी नैतिकता लाचारी

मुझ बैरागी का दुनिया में

अनुरागी जब नाम धरोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

देखो तुम्हे बता देता हूँ

मैं सबको अपना लेता हूँ

सच कहता हूँ रुक न सकूंगा

जिस दिन लंबी सांस भरोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

सीता राम रटा डाला है

पंखों पर भी ताला जड़ा है

पिंजरे के पंछी को आखिर

एक दिन तो आज़ाद करोगे

तब तुम मुझको याद करोगे…

{कृष्ण बिहारी}

अप्रैल 19, 2011

बगुलाभगत आये रे!

वो जो बेचते थे
जहर अब तक,
सुना है
पहने झक सफेद कपड़े
डाले गले में आला
महामारी भगाने की
अपनी क्षमता का
विज्ञापन करते
घूम रहे हैं।

भटका दिये गये थे
बहुरुपिये के स्वर्ण मृग रुपी कौशल से राम
हर ली गयी थी
साधु वेश में आये रावण के छल से सीता
दौ सौ साल लूटा
दास बनाकर भारत को
झुककर व्यापार करने की
इजाज़त लेने आये लूटेरों ने।

विदेशी लूटेरे चले गये
विशालकाय तिजोरियाँ खाली छोड़कर
पर उन पर जल्द कब्जे हो गये
वे फिर से भरी रहने लगीं
देश फिर से लूटा जाने लगा,
लूटा जाता रहा है दशकों से।

डाकुओं के खिलाफ आवाज़ें उठी
तो
छलिये रुप बदल सामने आ गये हैं
जो कहते न थकते थे
“पैसा खुदा तो नहीं
पर खुदा की कसम
खुदा से कम भी नहीं”
वे कस्में खा रहे हैं
रुखी सूखी खायेंगे
पानी पीकर
देश का स्वास्थ्य ठीक करेंगे,
भ्रष्ट हो गया है
यह देश
इसे ठीक करेंगे!

होशियार
सियार हैं ये
शेर की खाल ओढ़े हुये
सामने से नहीं
आदतन फिर से
लोगों की
पीठ में ही खंजर भोकेंगे
लोगों की
मिट्टी की
गुल्लकें
ले भागेंगे
हजारों मील दूर रखी
अपनी तिजोरियाँ भरने के लिये।

जाग जाओ
वरना ये फिर ठगेंगे
इंतजार बेकार है
किसी भगीरथ का
जो लाकर दे पावन गंगा
अब तो हरेक को
अपने ही अंदर एक भगीरथ
जन्माना होगा
जो खुद को भी श्वेत धवल बनाये
और आसपास की गंदगी भी
दूर बहा दे।

पहचान लो इस बात को
डर गये हैं कुटिल भ्रष्टाचारी
धूर्तता दिखा रहे हैं
इनके झांसे में न आ जाना
इनका सिर्फ ऊपरी चोला ही सफेद है
ये हंस नहीं
जो दूध और पानी को अलग कर दें
बल्कि ये तो बगुलेभगत हैं
जो गिद्ध दृष्टि गड़ाये हुये हैं
देश की विरासत पर।

सावधान ये करेंगे
हर संभव प्रयास
जनता को बरगलाने का
ताकि बनी रहे इनकी सत्ता
आने वाले कई दशकों तक
दबा-कुचला रहे
आम आदमी इनकी
जूतियों तले
साँस भी ले
तो इनके रहमोकरम
का शुक्रिया अदा करके।

वक्त्त आ गया है जब
इन्हे जाल में फँसा कर
सीमित करनी होगी इनकी उड़ान
तभी लौट पायेगा
इस देश का आत्म सम्मान
असमंजस की घड़ियाँ गिनने का वक्त चला गया
यह अवसर है
धर्म युद्ध में हिस्सा लेने का
जीत हासिल कर
एक नये युग का सूत्रपात करने का।

…[राकेश]

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