Posts tagged ‘Muslim’

फ़रवरी 13, 2017

कैसे मुसलमां हो भाई…

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अक्टूबर 19, 2015

सेक्युलरिज्म : भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड (योगन्द्र यादव)

YY1सेक्युलरवाद हमारे देश का सबसे बड़ा सिद्धांत है। सेकुलरवाद हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा पाखण्ड भी है। सेकुलरवाद अग्निपरीक्षा से गुज़र रहा है।

सेक्युलर राजनीति की दुर्दशा देखनी हो तो बिहार आईये। यहाँ तमाम नैतिक, राजनैतिक, जातीय और संयोग के चलते भाजपा की विरोधी सभी ताकतें सेकुलरवाद की चादर ओढ़ कर चुनाव लड़ रही हैं। उधर लोकसभा चुनाव जीतकर अहंकार में चूर भाजपा और उसके बौने सहयोगी सेक्युलर भारत की जड़ खोदने में लगे हैं। एक तरफ बहुसंख्यकवाद का नंगा नाच है, दूसरी तरफ थके हारे सेकुलरवादियों की कवायद।
सेकुलरवाद कोई नया सिद्धांत नहीं है। सर्वधर्म समभाव इस देश की बुनियाद में है। यह शब्द भले ही नया हो, लेकिन जिसे हमारा संविधान सेक्युलर कहता है, उसकी इबारत सम्राट अशोक के खम्बों पर पढ़ी जा सकती है। पाषान्डो, यानी मतभिन्नता रखने वाले समुदायों के प्रति सहिष्णुता की नीति हमारे सेकुलरवाद की बुनियाद है। इस नीति की बुनियाद सम्राट अकबर के सर्वधर्म समभाव में है। इसकी बुनियाद आजादी के आन्दोलन के संघर्ष में है। इसकी बुनियाद एक सनातनी हिन्दू, महात्मा गाँधी, के बलिदान में है। हमारे संविधान का सेकुलरवाद कोई विदेश से इम्पोर्टेड माल नहीं है। जब संविधान किसी एक धर्म को राजधर्म बनाने से इनकार करता है और सभी धर्मावलम्बियों को अपने धर्म, अपने मत को मानने और उसका प्रचार-प्रसार करने की पूरी आजादी देता है, तो वह हमारे देश की मिट्टी में रचे बसे इस विचार को मान्यता देता है।

लेकिन पिछले ६५ साल में सेकुलरवाद इस देश की मिट्टी की भाषा छोड़कर अंग्रेजी बोलने लग गया। सेकुलरवादियों ने मान लिया कि संविधान में लिखी गयी गारंटी से देश में सेकुलरवाद स्थापित हो गया। उन्होंने अशोक, अकबर और गाँधी की भाषा छोड़कर विदेशी भाषा बोलनी शुरू कर दी। कानून, कचहरी और राज्य सत्ता के सहारे सेकुलरवाद का डंडा चलाने की कोशिश की। धीरे धीरे देश की औसत नागरिकों के दिलो दिमाग को सेक्युलर बनाने की ज़िम्मेदारी से बेखबर हो गए। उधर सेकुलरवाद की जड़ खोदने वालों ने परंपरा, आस्था और कर्म की भाषा पर कब्ज़ा कर लिया। इस लापरवाही के चलते धीरे धीरे बहुसंख्यक समाज के एक तबके को महसूस होने लगा कि हो न हो, इस सेकुलरवाद में कुछ गड़बड़ है। उन्हें इसमें अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की बू आने लगी। इस देश के सबसे पवित्र सिद्धांत में देश के आम जन की आस्था घटने लगी।
बहुसंख्यक समाज के मन को जोड़ने में नाकाम सेक्यूलर राजनीति अल्पसंख्यकों की जोड़ तोड़ में लग गयी। व्यवहार में सेक्युलर राजनीति का मतलब हो गया अल्पसंख्यक समाज, खासतौर पर मुस्लिम समाज, के हितों की रक्षा। पहले जायज़ हितों की रक्षा से शुरुआत हुई, धीरे धीरे जायज़ नाजायज़ हर तरह की तरफदारी को सेकुलरवाद कहा जाने लगा। इधर मुस्लिम समाज उपेक्षा का शिकार था, पिछड़ा हुआ था, और सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक दृष्टि से भेदभाव झेल रहा था, उधर सेक्युलर राजनीति फल फूल रही थी। नतीजा यह हुआ कि सेक्युलर राजनीति मुसलमानों को बंधक बनाने की राजनीति हो गयी। मुसलामानों को डराए रखो, हिंसा और दंगों का डर दिखाते जाओ और उनके वोट लेते जाओ। मुस्लिम अल्पसंख्यक समाज को न शिक्षा, न रोज़गार, न बेहतर मोहल्लों में मकान। बस मुस्लिम राजनीति केवल कुछ धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इर्द-गिर्द घूमती रहे, और औसत मुसलमान डर के मारे सेक्युलर पार्टियों को वोट देता रहे – यह ढकोसला देश में सेकुलरवाद कहलाने लगा।

सेक्युलर वाद के सिद्धांत और वोट बैंक की राजनीति के बीच की खाई का भांडा फूटना ही था। बहुसंख्यक समाज सोचता था कि सेकुलरवाद उसे दबाने और अल्पसंख्यक समाज के तुष्टिकरण का औज़ार है। अल्पसंख्यक समाज समझता कि सेकुलरवाद उन्हें बंधक बनाए रखने का षड़यंत्र है। यह खाई सबसे पहले अयोध्या आन्दोलन में दिखाई दी, जिसकी परिणीती बाबरी मस्जिद के ध्वंस में हुई। २००२ गुजरात के नरसंहार में सेकुलरवाद फिर हारा। इस राजनैतिक प्रक्रिया की परिणीती २०१४ चुनाव में हुई।

आज सेक्युलर राजनीति थकी हारी और घबराई हुई है। नरेन्द्र मोदी की अभूतपूर्व विजय और उसके बाद से देश भर में सांप्रदायिक राजनीति के सिर उठाने से घबराई हुई है। पिछले २५ साल में छोटे बड़े लड़ाई हार कर आज मन से हारी हुई है। देश के सामान्य जन को सेक्युलर विचार से दुबारा जोड़ने की बड़ी चुनौती का सामना करने से पहले ही थकी हुई है। इसलिए आज सेक्युलर राजनीति शॉर्ट-कट हो गयी है, किसी जादू की तलाश में है, किसी भी तिकड़म का सहारा लेने को मजबूर है।

बिहार का चुनाव किसी थकी हारी घबराई सेक्युलर राजनीति का नमूना है। जब सेक्युलर राजनीति जन चेतना बनाने में असमर्थ हो जाती है, जब उसे लोकमानस का भरोसा नहीं रहता, तब वो किसी भी तरह से भाजपा को हराने का नारा देती है। इस रणनीति के तहत भ्रष्टाचार क्षम्य है, जातिवाद गठबंधन क्षम्य है और राज काज की असफलता भी क्षम्य है। बस जो भाजपा के खिलाफ खड़ा है, वो सही है, सेक्युलर है। बिहार के चुनाव परिणाम बताएँगे की यह रणनीति सफल होती है या नहीं। अभी से चुनावी भविष्यवाणी करना बेकार है। संभव है कि नितीश-लालू की रणनीति कामयाब हो भी जाए। यह भी संभव है सेकुलरवाद के नाम पर भानुमती का कुनबा जोड़ने की यह कवायद बिहार की जनता नामंज़ूर कर दे। यह तो तय है कि इस गठबंधन के पीछे मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हो जाएगा। लेकिन यह ही तो भाजपा भी चाहती है, ताकि उसके मुकाबले हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। अगर ऐसा हुआ तो पासा उल्टा पड़ जाएगा। चुनाव का परिणाम जो भी हो, इस चुनाव में बिहार हारेगा, सेक्युलर राजनीति हारेगी।

अगर देश के पवित्र सेक्युलर सिद्धांत को बचाना है तो सेक्युलर राजनीति को पुनर्जन्म लेना होगा, सेक्युलर राजनीति को दोबारा लोकमानस से सम्बन्ध बनाना होगा, अल्पसंख्यकों से केवल सुरक्षा की राजनीती छोड़कर शिक्षा, रोज़गार और प्रगति की राजनीती शुरू करनी होगी। शायद अशोक का प्रदेश बिहार एक अच्छी जगह है इस राजनीति की शुरुआत के लिए।

(योगेन्द्र यादव)

अगस्त 9, 2015

जो भारत को जोड़ता है…

कुछ तो बात है कि मिटती नहीं हस्ती हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा

बाहरी ताकतों की तो बात ही क्या, भारतीय ही, चाहे वे सता प्रतिष्ठान से जुड़े लोग ही क्यों न हों, भारत को नुकसान पहुंचाने वाली बातें कहते और कृत्य करते ही रहते हैं| उनके वचन और कर्म ऐसे होते हैं जिनसे भारत की एकता हमेशा ही कसौटी पर टंगी रहती है पर कहीं न कहीं कोई न कोई कुछ ऐसा कहता और कर जाता है जो कि दर्शा देता है कि क्यों इतने विशाल देश, जो दुनिया में सबसे ज्यादा विभिन्नताओं को अपने में समेटे हुए है, की एकता बनी रहती है|

अनेकता में एकता की बात हवाई नहीं है, इसकी जड़ें भारत में बेहद गहरी हैं| तोड़ने वाले अगर जन्म लेते रहते हैं तो इसे एकता के सूत्र में पिरोने वाले भी जन्म लेते रहते हैं|

जब देश में हर जगह हिंदू मुसलमान के मध्य अविश्वास की खाई गहरी करने के कृत्य हर जगह हो रहे हैं, ऐसी जादू की झप्पी ही ऐसी साजिशों का जवाब हो सकती थी और है…

फ़रवरी 26, 2015

ओशो : मदर टेरेसा और उनके कार्यों का विश्लेषण

Osho kidमदर टेरेसा को नोबल पुरस्कार मिलने पर ओशो ने मदर टेरेसा के कार्यों का विश्लेषण किया था, जिससे मदर टेरेसा और उनके समर्थक नाराज हो गये थे| मदर ने दिसम्बर 1980 के दिसंबर माह के अंत में ओशो को पत्र लिखा| उस पर ओशो का प्रवचन :-

राजनेता और पादरी हमेशा से मनुष्यों को बांटने की साजिश करते आए हैं| राजनेता बाह्य जगत पर राज जमाने की कोशिश करता है और पादरी मनुष्य के अंदुरनी जगत पर|   इन् दोनों ने मानवता के खिलाफ गहरी साजिशें मिलकर की हैं| कई बार तो अपने अंजाने ही इन् लोगों ने ऐसे कार्य किये हैं| इन्हे खुद नहीं पता होता ये क्या कर रहे हैं| कई बार इनकी नियत नहीं होती गलत करने की पर चेतना से रहित उनके दिमाग क्या सुझा सकते हैं?

अभी हाल में मदर टेरेसा ने मुझे एक पत्र लिख भेजा| मुझे उनके पत्र की गंभीरता पर कुछ नहीं कहना,  उन्होंने निष्ठा से भरे शब्दों से पत्र लिखा है, पर यह चेतना रहित दिमाग की उपज है| उन्हें स्वयं नहीं ज्ञात है कि वे क्या लिख रही हैं| उनका लिखना यांत्रिक है, जैसे रोबोट ने लिख दिया हो|

वे लिखती हैं,” मुझे अभी आपके भाषण की कटिंग मिली| मुझे आपके लिए बेहद खेद हुआ कि आप ने ऐसा कहा (सन्दर्भ – नोबल पुरस्कार)| आपने मेरे नाम के साथ जो विशेषण इस्तेमाल किये उनके लिए मैं पूरे प्रेम से आपको क्षमा करती हूँ|”

वे मेरे प्रति खेद महसूस कर रही हैं…मुझे उनका पत्र पढकर आनंद आया! उन्होंने मेरे दवारा उपयोग में लाये गये विशेषणों को समझा ही नहीं| लेकिन वे चेतन नहीं हैं वरना वे अपने प्रति खेद महसूस करतीं मेरे प्रति नहीं|

उन्होंने मेरे भाषण की कटिंग भी अपने पत्र के साथ भेजी है मैंने जो विशेषण इस्तेमाल किये थे, वे थे –  धोखेबाज ( deceiver), कपटी (charlatan) और पाखंडी या ढोंगी (hypocrite)….

मैंने उनकी आलोचना की थी और कहा था कि उन्हें नोबल पुरस्कार नहीं दिया जाना चाहिए था| और इस बात को उन्होंने अन्यथा ले लिया| अपने पत्र में वे लिखती हैं “सन्दर्भ : नोबल पुरस्कार”|

यह आदमी, नोबल, दुनिया के सबसे बड़े अपराधियों में से एक था| पहला विश्वयुद्ध उसके हथियारों से लड़ा गया था, वह हथियारों का बहुत बड़ा निर्माता था…

मदर टेरेसा नोबल पुरस्कार को मना नहीं कर सकीं| प्रशंसा पाने की चाह, सारे विश्व में सम्मान पाने की चाह, नोबल पुरस्कार तुम्हे सम्मान दिलवाता है, सो उन्होंने पुरस्कार सहर्ष स्वीकार किया…

इसलिए मैंने मदर टेरेसा जैसे व्यक्तियों को धोखेबाज (deceivers) कहा| वे जानबूझ धोखा नहीं देते, निश्चित ही उनकी नियत धोखा देने की नहीं है, लेकिन यह बात महत्वपूर्ण नहीं है, अंतिम परिणाम स्पष्ट है| ऐसे लोग समाज में लुब्रीकेंट का कार्य करते हैं ताकि समाज के पहिये, शोषण का पहिया, अत्याचार का पहिया यूँ ही आसानी से घूमता रहे| ये लोग न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी धोखा दे रहे हैं|

और मैं ऐसे लोगों को कपटी (charlatans) भी कहता हूँ, क्योंकि एक सच्चा धार्मिक आदमी, जीसस जैसा आदमी, नोबल पुरस्कार पायेगा?  असंभव है यह! क्या तुम कल्पना कर सकते हो कि सुकरात को नोबल पुरस्कार दिया जाए, या कि अल-हिलाज मंसूर को इस पुरस्कार से नवाजे सत्ता? अगर जीसस को नोबल नहीं मिल सकता, और सुकरात को नोबल नहीं मिल सकता, और ये लोग सच्चे धार्मिक, चेतन मनुष्य हैं, तब मदर टेरेसा कौन हैं? …

सच्चा धार्मिक व्यक्ति विद्रोही होता है, समाज उसकी आलोचना करता है, निंदा करता है|जीसस को समाज ने अपराधी करार दिया और मदर टेरेसा को संत कह रहा है| यह बात विचारणीय है, अगर मदर टेरेसा सही हैं तो जीसस अपराधी हैं और अगर जीसस सही हैं तो मदर टेरेसा एक कपटी मात्र हैं उससे ज्यादा कुछ नहीं| कपटी लोगों को समाज बहुत सराहता है क्योंकि ये लोग समाज के लिए सहायक सिद्ध होते हैं, समाज की जैसी भ्रष्ट व्यवस्था चली आ रहे एहोती है उसे वैसे ही चलने देने में ये लोग बड़ी भूमिका निभाते हैं|

Mother Teresa मैंने जो भी विशेषण इस्तेमाल किये वे सोच समझ कर इस्तेमाल किये| मैंने बिना विचारे कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करता| और मैंने पाखंडी या ढोंगी (hypocrites) शब्द का इस्तेमाल किया| ऐसे लोग पाखंडी हैं क्योंकि इनकी आधारभूत जीवन शैली बंटी हुयी है, सतह पर एक रूप और अंदर कुछ और रूप|

वे लिखती हैं,” ‘प्रोटेस्टेंट परिवार को बच्चा गोद लेने से इसलिए नहीं रोका गया था कि वे प्रोटेस्टेंट थे बल्कि इसलिए कि उस समय हमारे पास कोई बच्चा नहीं था जो हम उन्हें गोद दे सकते थे”|

अब उन्हें नोबल पुरस्कार इसलिए दिया गया है कि वे हजारों अनाथों की सहायता करती हैं और उनकी संस्था में हजारों अनाथालय हैं| अचानक उनके अनाथालय में एक भी बच्चा उपलब्ध नहीं रहता? और भारत में कभी ऐसा हो सकता है कि अनाथ बच्चों का अकाल पड़ जाए? भारतीय तो जितने चाहो उतने अनाथ बच्चे जन्मा सकते हैं बल्कि जितने तुम चाहो उससे भी कहीं ज्यादा!

और उस प्रोटेस्टेंट परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था| यदि एक भी अनाथ बच्चा उपलब्ध नहीं था और उनके सारे अनाथालय खाली हो गये थे तो मदर टेरेसा सात सौ ननों का क्या कर रही हैं? इन ननों का काम क्या है? सात सौ ननें? वे किसकी माताओं की भूमिका निभा रही हैं? एक भी अनाथ बच्चा नहीं – अजीब बात है! – और वो भी कलकत्ता में!  सड़क पर कहीं भी तुम्हे अनाथ बच्चे दिखाई दे जायेंगे – तुम्हे कूड़ेदान तक में बच्चे मिल सकते हैं| उन्हें सिर्फ बाहर देखने की जरुरत थी और उन्हें बहुत से अनाथ बच्चे मिल जाते| तुम आश्रम से बाहर जाकर देखना, अनाथ बच्चे मिल जायेंगें| तुम्हे खोजने की भी जरुरत नहीं, वे अपने आप आ जायेंगें!

अचानक उनके अनाथालय में अनाथ बच्चे नहीं मिलते|… और अगर उस परिवार को एकदम से इंकार किया जाता तब भी बात अलग हो जाती| लेकिन परिवार को एकदम से इंकार नहीं किया गया था, उनसे कहा गया था,”हाँ, आपको बच्चा मिल सकता है, आवेदन पत्र भर दीजिए”|  आवेदन पत्र भरा गया था| जब तक कि परिवार ने अपने सम्प्रदाय का नाम जाहिर नहीं किया था तब तक उनके लिए बच्चा उपलब्ध था पर जैसे ही उन्होने आवेदन पत्र में लिखा कि वे प्रोटेस्टेंट चर्च को माने वाले मत के हैं, अचानक से मदर टेरेसा की संस्था के अनाथालयों में अनाथ बच्चों की किल्लत हो गयी, बल्कि अनुपस्थिति हो गयी|

और असली कारण प्रोटेस्टेंट परिवार को बताया पर कैसे? अब यही पाखण्ड है! यही धोखेबाजी है| यह गन्दगी से भरा है|  कारण भी उन्हें इसलिए बताना पड़ता है क्योंकि बच्चे वहाँ थे अनाथालयों में| कैसे कहते कि अनाथ बच्चे नहीं हैं? उनकी तो हरदम प्रदर्शनी लगी रहती है वहाँ|

उन्होंने मुझे भी आमंत्रित किया है: आप किसी भी समय आ सकते हैं और आपका स्वागत है हमारे अनाथालय और हमारी संस्था देखने आने के लिए| उनका सदैव ही प्रदर्शन किया जाता है|

बल्कि, उस प्रोटेस्टेंट परिवार ने पहले ही एक अनाथ बच्चे का चुनाव कर लिया था| अतः वे कह नहीं पायीं ,” हमें खेद है, बच्चे नहीं हैं अनाथालय में”|

उन्होंने परिवार से कहा.” इन अनाथ बच्चों को रोमन कैथोलिक चर्च के रीति रिवाजों और विधि विधान के मुताबिक़ पाला पोसा गया है, और इनके मनोवैज्ञानिक विकास के लिए यह बहुत बुरा होगा अगर उन्हें इस परम्परा से अलग हटाया गया| आपको उन्हें गोद देने का असर उन पर यह पड़ेगा कि उनके विकास की गति  छिन्न भिन्न हो जायेगी| हम उन्हें आपको गोद नहीं दे सकते क्योंकि आप प्रोटेस्टेंट हैं|”

वही असली कारण था| और बच्चा गोद लेने का इच्छुक परिवार कोई मूर्ख नहीं था| पति यूरोपियन यूनिवर्सिटी में प्रोफसर है – और वह स्तब्ध रह गया, उसकी पत्नी स्तब्ध रह गयी| वे इतनी दूर से बच्चा गोद लेने आए थे पर उन्हें इंकार कर दिया गया क्योंकि वे प्रोटेस्टेंट थे| यदि उन्होंने आवेदन पत्र में ‘कैथोलिक’ लिखा होता तो उन्हें तुरंत बच्चा मिल जाता| परिवार

एक और बात समझ लेने की है : ये बच्चे मूलभूत रूप से हिंदू हैं| अगर मदर टेरेसा को इन बच्चों के मनोवैज्ञानिक विकास और हित की इतनी चिंता है तो इन बच्चों का पालन पोषण हिंदू धर्म के अनुसार करना चाहिए| पर उन्हें कैथोलिक चर्च के अनुसार पाला गया है| और इस सबके बद उन्हें प्रोटेस्टेंट परिवार को गोद देना, और प्रोटेस्टेंट कोई बहुत अलग नहीं है कैथोलिक लोगों से| क्या अंतर है कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट में? केवल कुछ मूर्खतापूर्ण अंतर… !

कुछ ही रोज पहले भारतीय संसद में धर्म की स्वतंत्रता के ऊपर एक बिल प्रस्तुत किया गया| बिल प्रस्तुत करने के पीछे उद्देश्य था कि किसी को भी अन्यों का धर्म बदलने की अनुमति नहीं होनी चाहिए : जब तक कि कोई अपनी मर्जी से अपना धर्म छोड़ कर किसी अन्य धर्म को अपनाना न चाहे| और मदर टेरेसा पहली थीं जिन्होने इस बिल का विरोध किया| अब तक के अपने पूरे जीवन में उन्होंने कभी किसी बात का विरोध नहीं किया, यह पहली बार था और शायद अंतिम बार भी| उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और उनके और प्रधानमंत्री के बीच एक विवाद उत्पन्न हो गया| उन्होंने कहा,” यह बिल किसी भी हालत में पास नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से हमारे काम के खिलाफ जाता है| हम लोगों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और लोग केवल तभी बचाए जा सकते हैं जब वे रोमन कैथोलिक बन जाएँ”|

उन्होंने सारे देश में इतना हल्ला मचाया – और राजनेता तो वोट की फिराक में रहते ही हैं, वे ईसाई मतदाताओं को नाराज करने का ख़तरा नहीं उठा सकते थे – सो बिल को गिर जाने दिया गया| बिल को भुला दिया गया…

यदि मदर टेरेसा सच में ही ईमानदार हैं और वे यह विश्वास रखती हैं कि किसी व्यक्ति का मत परिवर्तन करने से उसका मनोवैज्ञानिक ढांचा छिन्न भिन्न हो जाता है तो उन्हें मूलभूत रूप में मत-परिवर्तन के खिलाफ होना चाहिए| कोई अपनी इच्छा से अपना मत बदल ले तो बात अलग है|

अब उदाहरण के लिए तुम स्वयं मेरे पास आए हो, मैं तुम्हारे पास नहीं गया| मैं तो अपने दरवाजे से बाहर भी नहीं जाता…

मैं किसी के पास नहीं गया, तुम स्वयं मेरे पास आए हो| और मैं तुम्हे किसी और मत में परिवर्तित भी नहीं कर रहा हूँ| मैं यहाँ कोई विचारधारा भी स्थापित नहीं कर रहा हूँ| मैं तुम्हे कैथोलिक चर्च के catechism के एतारह धार्मिक शिक्षा की प्रश्नोत्तरी भी नहीं दे रहा,  किसी किस्म का कोई वाद नहीं दे रहा| मैं तो सिर्फ मौन हो सकने में सहायता प्रदान कर रहा हूँ| अब, मौन न तो ईसाई है, न मुस्लिम, और न ही हिंदू ; मौन तो केवल मौन है| मैं तो तुम्हे प्रेममयी होना सिखा रहा हूँ, प्रेम न ईसाई है न हिंदू, और न ही मुस्लिम| मैं तुम्हे जाग्रत होना सिखा रहा हूँ| चेतनता सिर्फ चेतनता ही है इसके अलावा और कुछ नहीं और यह किसी की बपौती नहीं है| चेतनता को ही मैं सच्ची धार्मिकता कहता हूँ|

मेरे लिए मदर टेरेसा और उनके जैसे लोग पाखंडी हैं, क्योंकि वे कहते एक बात हैं, पर यह सिर्फ बाहरी मुखौटा होता है क्योंकि वे करते दूसरी बात हैं| यह पूरा राजनीति का खेल है – संख्याबल की राजनीति|

और वे कहती हैं,” मेरे नाम के साथ आपने जो विशेषण इस्तेमाल किये हैं उनके लिए मैं आपको प्रेम भरे ह्रदय के साथ क्षमा करती हूँ”| पहले तो प्रेम को क्षमा की जरुरत नहीं पड़ती क्योंकि प्रेम क्रोधित होता ही नहीं| किसी को क्षमा करने के लिए तुम्हारा पहले उस पर क्रोधित होना जरूरी है|

मैं मदर टेरेसा को क्षमा नहीं करता, क्योंकि मैं उनसे नाराज नहीं हूँ| मैं उन्हें क्षमा क्यों करूँ? वे भीतर से नाराज होंगीं…| इसीलिये मैं तुमको इन बातों पर ध्यान लगाने के लिए कहना चाहता हूँ| कहते हैं, बुद्ध ने कभी किसी को क्षमा नहीं किया, क्योंकि साधारण सी बात है कि वे किसी से कभी भी नाराज ही नहीं हुए| क्रोधित हुए बिना तुम कैसे किसी को क्षमा कर सकते हो? यह असंभव बात है| वे क्रोधित हुए होंगीं| इसी को मैं अचेतनता कहता हूँ, उन्हें इस बात का बोध ही नहीं कि वे असल में लिख क्या रही हैं…उन्हें भान भी नहीं है कि मैं उनके पत्र के साथ क्या करने वाला हूँ!

वे कहती हैं,” ‘मैं महान प्रेम के साथ आपको क्षमा करती हूँ’ – जैसे कि प्रेम भी छोटा और महान होता है| प्रेम तो प्रेम है, यह न तो तुच्छ हो सकता है और न ही महान| तुम्हे क्या लगता है कि प्रेम गणनात्मक है? यह कोई मापने वाली मुद्रा है?- एक किलो प्रेम, दो किलो प्रेम| कितने किलो का प्रेम महान प्रेम हो जाता है? या कि टनों प्रेम चाहिए?

प्रेम गणनात्मक नहीं वरन गुणात्मक है और गुणात्मक को मापा नहीं जा सकता| न यह गौण है न ही महान| अगर कोई तुमसे कहे, “ मैं तुमसे बड़ा महान प्रेम करता हूँ|” तो सावधान हो जाना| प्रेम तो बस प्रेम है, न उससे कम न उससे ज्यादा|

और मैंने कौन सा अपराध किया है कि वे मुझे क्षमादान दे रही हैं? कैथोलिक्स की मूर्खतापूर्ण पुरानी परम्परा- और वे क्षमा करे चली जाती हैं! मैंने तो किसी अपराध को स्वीकार नहीं किया फिर उन्हें मुझे क्यों क्षमा करना चाहिए?

मैं इस्तेमाल किये गये विशेषणों पर कायम हूँ, बल्कि मैं कुछ और विशेषण उनके नाम के साथ जोड़ना पसंद करूँगा – कि वे मंद और औसत बुद्धि की मालकिन हैं, बेतुकी हैं| और अगर किसी को क्षमा ही करना है तो उन्हे ही क्षमा किया जाना चाहिए क्योंकि वे एक बहुत बड़ा पाप कर रही हैं| अपने पत्र में वे कहती हैं,” मैं गोद लेने की परम्परा को अपना कर गर्भपात के पाप से लड़ रही हूँ”| अब आबादी के बढते स्तर से त्रस्त काल में गर्भपात पाप नहीं है बल्कि सहायक है आबादी नियंत्रित रखने में| और अगर गर्भपात पाप है तो पोलोक पोप और मदर टेरेसा और उनके संगठन उसके लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि ये लोग गर्भ-निरोधक संसाधनों के खिलाफ हैं, वे जन्म दर नियंत्रित करने के हर तरीके के खिलाफ हैं, वे गर्भ-निरोधक पिल्स के खिलाफ हैं| असल में यही वे लोग हैं जो गर्भपात के लिए जिम्मेदार हैं| गर्भपात की स्थिति लाने के सबसे बड़े कारण ऐसे लोग ही हैं| मैं इन्हे बहुत बड़ा अपराधी मानता हूँ!

बढ़ती आबादी से ग्रस्त धरती पर जहां लोग भूख से मर रहे हों, वहाँ गर्भ-निरोधक पिल का विरोध करना अक्षम्य है| यह पिल आधुनिक विज्ञान का अक बहुत बड़ा तोहफा है आज के मानव के लिए| यह पिल धरती को सुखी बनाने में सहायता कर सकती है|

मैं गरीब लोगों की सेवा नहीं करना चाहता, मैं उनकी मैं गरीबी को समाप्त करके उन्हें समर्थ बनाना चाहूँगा| बहुत हो चुकीं ऐसी बेतुकी बातें| मेरी रूचि उन्हें गरीब बनाए रखने में नहीं है जिससे कि मैं उनकी सेवा करके लोगों की निगाह में पुण्य कमाऊं| उनकी गरीबी दूर होना मेरे लिए ज्यादा आनंद का विषय है| दस हजार सालों से मूर्ख गरीब लोगों की सेवा करते आए हैं पर इससे कुछ नहीं बदला| अब हमारे पास समर्थ टैक्नोलौजी हैं जिससे हम गरीबी समाप्त करने में सफलता पा सकें|

तो अगर किसी को क्षमा किया जाना चाहिए तो इसके पात्र ये लोग हैं| पोप, मदर टेरेसा, आदि इत्यादी लोगों को क्षमा किया जाना चाहिए| ये लोग अपराधी हैं पर इनका अपराध देखने समझने के लिए तुम्हे बहुत बड़ी मेधा और सूक्ष्म बुद्धि चाहिए|

और ज़रा इनका अहंकार देखिये, दूसरों से बड़ा होने का अहं| वे कहती हैं,”मैं तुम्हे क्षमा करती हूँ, मुझे तुम्हारे लिए बड़ा खेद है”| और वे प्रार्थना करती हैं,” ईश्वर की अनुकम्पा आपके साथ हो और आपका ह्रदय प्रेम से भर जाए”|

बकवास है यह सब!

मैं किसी ऐसे ईश्वर में विश्वास नहीं करता जो मानव जैसा होगा, जब ऐसा ईश्वर है ही नहीं तो वह कृपा कैसे करेगा मुझ पर या किसी और पर? ईश्वरत्व को केवल महसूस किया जा सकता है, ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है जिसे पाया जा सके या जीता जा सके| यह तुम्हारी ही शुद्धतम चेतनता है| और ईश्वर को मुझ पर कृपा क्यों करनी चाहिए? मैं ही तुम्हारी कल्पना के सारे ईश्वरों पर कृपा बरसा सकता हूँ| मुझे किसी की कृपा के लिए प्रार्थना क्यों करनी चाहिए? मैं पूर्ण आनंद में हूँ मुझे किसी कृपा की आवश्यकता है ही नहीं| मुझे विश्वास ही नहीं है कि कहीं कोई ईश्वर है| मैंने तो हर जगह देख लिया मुझे कहीं ईश्वर के होने के लक्षण नजर नहीं आए| यह ईश्वर केवल सत्य से अंजान लोगों के दिमाग में वास करता है| ध्यान रखना मैं नास्तिक नहीं हूँ, पर मैं आस्तिक भी नहीं हूँ|

ईश्वर मेरे लिए कोई व्यक्ति नहीं बल्कि एक उपस्थिति है, जिसे केवल ध्यान की उच्चतम और सबसे गहरी अवस्था में ही महसूस किया जा सकता है| उन्ही क्षणों में तुम्हे सारे अस्तित्व में बहता ईश्वरत्व महसूस होता है| कोई ईश्वर कहीं नहीं है लेकिन ईश्वरत्व है!

मैं गौतम बुद्ध के बारे में कहे गये H. G. Wells के बयान को प्रेम करता हूँ| उसने कहा था,” गौतम बुद्ध सबसे बड़े ईश्वररहित व्यक्ति हैं लेकिन साथ ही वे सबसे बड़े ईश्वरीय व्यक्ति हैं|

यही बात तुम मेरे बारे में कह सकते हो: मैं इश्वर्राहित व्यक्ति हूँ लेकिन मैं ईश्वरीयता को जानता हूँ|

ईश्वरीयता एक सुगंध जैसी है, परम आनंद का अनुभव, परम स्वतंत्रता का अनुभव| तुम ईश्वरीयता के सामने प्रार्थना नहीं कर सकते| तुम इसका चित्र नहीं बना सकते| तुम यह नहीं कह सकते – कि ईश्वर तुम्हारा भला करे- और ऐसा तो खास तौर पर नहीं कह सकते – कि ईश्वर की कृपा तुम्हारे साथ रहें पूरे 1981 के दौरान! तब 1982 का क्या होगा?

महान साहस! महान साझेदारी! ऐसी उदारता!

“…और तुम्हारा ह्रदय प्रेम से भर जाए”| मेरा ह्रदय प्रेम के अतिरेक से पहले ही भरा हुआ है| इसमें किसी और के प्रेम के लिए जगह बची ही नहीं| और मेरा ह्रदय किसी और के प्रेम से क्यों भरे? उधार का प्रेम किसी काम का नहीं| ह्रदय की अपनी सुगंध होती है|

लेकिन इस तरह की बकवास को बहुत धार्मिक माना जाता है| वे इस आशा से यह सब लिख रही हैं कि मैं उन्हें बहुत बड़ी धार्मिक मानूंगा| लेकिन जो मैं देख पा रहा हूँ वे एक बेहद साधारण, औसत इंसान हैं जो कि आप कहीं भी पा सकते हैं| औसत लोगों से अटी पड़ी है धरती|

मैं उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारता रहा हूँ पर मुझे उन्हें मदर टेरेसा कह कर पुकारना बंद करना चाहिए क्योंकि हालांकि मैं कतई सज्जन नहीं हूँ पर मुझे समुचित जवाब तो देना ही चाहिए| उन्होंने मुझे लिखा है- मि. रजनीश, तो अब से मुझे भी उन्हें मिस टेरेसा कह कर संबोधित करना चाहिए| यही सज्जनता भरा व्यवहार होगा|

अहंकार पिछले दरवाजे से आ जाता है| इसे बाहर निकाल फेंकने का प्रयत्न मत करो|

कलकत्ते से मुझे एक न्यूज-कटिंग मिली है| पत्रकार ने बताया कि वह मदर टेरेसा के बारे में मेरे बयान – कि वे बेतुकी हैं- की कटिंग लेकर मदर टेरेसा के पास गया और वे कटिंग देखते ही गुस्से में आग बबूला हो गयीं और उन्होंने कटिंग फाड़ कर फेंक दी| वे इतनी क्रोधित थीं कि कोई बयान देने के लिए तैयार नहीं हुईं| पर बयान तो उन्होने दे दिया- कटिंग को फाड़ कर|

पत्रकार ने कहा,” मैं तो हैरान हो गया उनका बर्ताव देखकर| मैंने उनसे कहा कि कटिंग तो मेरी थी और मैं तो उस बयान पर उनकी प्रतिक्रिया जानने उनके पास गया था”|

और ये लोग समझते हैं कि वे धार्मिक हैं| वास्तव में कटिंग फाड़ कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि मैंने जो कुछ उनके बारे में कहा था वह सही था : कि वे औसत और बेतुकी हैं| अब कटिंग फाड़ना एक बेतुकी बात है|

अब मुझे तो दुनिया भर से इतने ज्यादा कॉम्प्लीमेंट्स – “इनवर्टेड कौमाज़” वाले- मिलते हैं कि अगर मैं उन सबको फाड़ने लग जाऊं तो मेरी तो अच्छी खासी एक्सरसाइज इसी हरकत में हो जाए और तुम्हे पता ही है एक्सरसाइज मुझे कितनी नापसंद है|

 

(अंग्रेजी प्रवचन से अनुवादित)

मई 5, 2014

मोदी और दलित : प्रो. तुलसी राम

 Modi IT Senaसैमुअल हंटिगटन अपनी पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस’ के शुरू में ही एक फासीवादी उपन्यास से लिए गए उदाहरण के माध्यम से कहते हैं- ‘दुश्मन से अवश्य लड़ो। अगर तुम्हारे पास दुश्मन नहीं है तो दुश्मन निर्मित करो।’ मोदी का ‘परिवार’ इसी दर्शन पर सन 1925 की विजयदशमी से लेकर आज तक अमल करता आ रहा है। इस दर्शन की विशेषता है, अपने ही देशवासियों के एक बड़े हिस्से को दुश्मन घोषित करके उससे लड़ना। ऐसे दुश्मनों में सारे अल्पसंख्यक और दलित-आदिवासी शामिल हैं।

मोदी परिवार का दलित विरोध भारतीय संविधान के विरोध से शुरू होता है। सन 1950 से ही वे इसे विदेशी संविधान कहते आ रहे हैं, क्योंकि इसमें आरक्षण की व्यवस्था है। इसीलिए राजग के शासनकाल में इसे बदलने की कोशिश की गई थी। इतना ही नहीं, मोदी परिवार के ही अरुण शौरी ने झूठ का पुलिंदा लिख कर डॉ आंबेडकर को देशद्रोही सिद्ध करने का अभियान चलाया था। उसी दौर में मोदी के विश्व हिंदू परिषद ने हरियाणा के जींद जिले के ग्रामीण इलाकों में वर्ण-व्यवस्था लागू करने का हिंसक अभियान भी चलाया, जिसके चलते सार्वजनिक मार्गों पर दलितों के चलने पर रोक लगा दी गई थी। समाजशास्त्री एआर देसाई ने बहुत पहले कहा था कि गुजरात के अनेक गांवों में ‘अपार्थायड सिस्टम’ (भेदभावमूलक पार्थक्य व्यवस्था) लागू है, जहां दलितों को मुख्य रास्तों पर चलने नहीं दिया जाता।

गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी विश्व हिंदू परिषद की राजनीति में लगे हुए थे। यह संगठन त्रिशूल दीक्षा के माध्यम से अल्पसंख्यकों और दलितों के बीच सामाजिक आतंक स्थापित कर चुका था। अनेक जगहों पर दलितों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण को जबरन रोका जा रहा था। मोदी ने सत्ता में आते ही एक धर्मांतरण विरोधी कानून बनवा दिया। बौद्ध धर्म खांटी भारतीय है, लेकिन वे इसे इस्लाम और ईसाई धर्म की श्रेणी में रखते हैं। बड़ौदा के पास एक गांव में दलित युवती ने एक मुसलमान से प्रेम विवाह कर लिया था। मोदी समर्थकों ने उस बस्ती पर हमला करके सारे दलितों को वहां से भगा दिया। सैकड़ों दलित वडोदरा की सड़कों पर कई महीने सोते रहे। यह मोदी शासन के शुरुआती दिनों की बात है।

इस संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हमेशा जिला न्यायालयों पर निगरानी रखते हैं और कहीं भी हिंदू-मुसलिम के बीच विवाह की सूचना नोटिस बोर्ड पर देखते ही वे तुरंत उसका पता नोट कर अपने दस्ते के साथ ऐसे गैर-मुसलिम परिवारों पर हमला बोल देते हैं। गुजरात में ऐसी घटनाएं तेजी से फैल गई थीं। ऐसी घटनाओं में दलितों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किया जाता रहा है।

मोदी के सत्ता में आने के बाद गुजरात में छुआछूत और दलितों पर किए जा रहे अत्याचार की शिकायतें कभी भी वहां के थानों में दर्ज नहीं हो पातीं। इस संदर्भ में यह तथ्य विचारणीय है। जब आडवाणी भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने सामाजिक सद्भाव का रोचक फार्मूला गढ़ा। दलित अत्याचार विरोधी कानून के तहत देश के अनेक हिस्सों में हजारों मुकदमे दर्ज थे। आडवाणी के फार्मूले के अनुसार ऐसे अत्याचार के मुकदमों से ‘सामाजिक सद्भाव’ खतरे में पड़ गया था। इसलिए आडवाणी के निर्देश पर भाजपा शासित राज्यों ने सारे मुकदमे वापस ले लिए। ऐसे मुकदमों में सैकड़ों हत्या और बलात्कार से जुड़े हुए थे। इस फार्मूले पर मोदी हमेशा खरा उतरते हैं।

सन 2000 में नई शताब्दी के आगमन के स्वागत में गुजरात के डांग क्षेत्र में मोदी की विश्व हिंदू परिषद ईसाई धर्म में कथित धर्मांतरण के बहाने दलित-आदिवासियों पर लगातार हमला करती रही। बाद में यही फार्मूला ओडिशा के कंधमाल में भी अपनाया गया था। सन 2002 में गोधरा दंगों के दौरान अमदाबाद जैसे शहरों में दलितों की झुग्गी बस्तियों को जला दिया गया, क्योंकि ये बस्तियां शहर के प्रधान क्षेत्रों में थीं। तत्कालीन अखबारों ने खबर छापी कि ऐसे स्थलों को मोदी सरकार ने विश्व हिंदू परिषद से जुड़े भू-माफिया ठेकेदारों को हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने के लिए दे दिया।

नरसिंह राव ने स्कूलों के मध्याह्न भोजन की एक क्रांतिकारी योजना चलाई थी, जिसके तहत यह प्रावधान किया गया था कि ऐसा भोजन दलित महिलाएं पकाएंगी। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे। एक तो यह कि भोजन के बहाने गरीब बच्चे, विशेष रूप से दलित बच्चे स्कूल जाने लगेंगे। दूसरा था सामाजिक सुधार का कि जब दलित महिलाओं द्वारा पकाया खाना सभी बच्चे खाएंगे तो इससे छुआछूत जैसी समस्याओं से मुक्ति मिल सकेगी। लेकिन गोधरा दंगों के बाद विश्व हिंदू परिषद से जुड़े लोगों ने गुजरात भर में अभियान चलाया कि सवर्ण बच्चे दलित बच्चों के साथ दलितों द्वारा पकाए भोजन को नहीं खा सकते, क्योंकि इससे हिंदू धर्म भ्रष्ट हो जाएगा।

इस अभियान का परिणाम यह हुआ कि मोदी सरकार ने मध्याह्न भोजन की योजना को तहस-नहस कर दिया। मगर किसी-किसी स्कूल में यह योजना लागू है भी तो वहां सवर्ण बच्चों के लिए गैर-दलितों द्वारा अलग भोजन पकाया जाता है। दलितों को अलग जगह पर खिलाया जाता है। स्मरण रहे कि मोदी दलित बच्चों को मानसिक रूप से विकलांग घोषित करके उनके लिए नीली पैंट पहनने का फार्मूला घोषित कर चुके हैं। नीली पैंट इसलिए कि उन्हें देखते ही सवर्ण बच्चे तुरंत पहचान लेंगे और उनके साथ घुल-मिल नहीं पाएंगे। ऐसा ‘अपार्थायड सिस्टम’ पूरे गुजरात के स्कूलों में लागू है। मोदी एक किताब में लिख चुके हैं कि ईश्वर ने दलितों को सबकी सेवा के लिए भेजा है। इसलिए दलितों को दूसरों की सेवा में ही संतुष्टि मिलती है।

इतना ही नहीं, जब 2003 में गुजरात में विनाशकारी भूकम्प आया तो लाखों लोग बेघर हो गए। बड़ी संख्या में दलित जाड़े के दिनों में सड़क पर रात बिताने को मजबूर हो गए, क्योंकि राहत शिविरों में मोदी के समर्थकों ने दलितों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उन्हें राहत सामग्री भी नहीं दी जाती थी। उस समय ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अनेक खाली तंबुओं के चित्र छापे थे, जिनमें दलितों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। यह सब कुछ मोदी के नेतृत्व में हो रहा था।

Modi media ambaniइस समय मोदी के चलते ही गुजरात में छुआछूत का बोलबाला है। मोदी सरकार ने दलित आरक्षण की नीति को तहस-नहस कर दिया। सारी नौकरियां संघ से जुड़े लोगों को दी जा रही हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के ही अनुसार गोधरा कांड के बाद गुजरात के अनेक गांवों में सरकारी खर्चे पर विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को इसलिए नियुक्त किया गया है, ताकि वे मोदी सरकार को सूचना दे सकें कि वहां कौन देशद्रोही है! इस तरह बड़े व्यवस्थित ढंग से मोदी ने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव, शहर-दर-शहर दलित विरोधी आतंक का वातावरण कायम कर दिया है। ऐसा ही अल्पसंख्यकों के साथ किया गया है।

गुजरात में सत्ता संभालने के बाद मोदी ने सर्वाधिक नुकसान स्कूली पाठ्यक्रमों का२ किया। वहां वर्ण-व्यवथा के समर्थन में शिक्षा दी जाती है, जिसके कारण मासूम बच्चों में जातिवाद के साथ ही सांप्रदायिकता का विष बोया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में फासीवादियों का ही गुणगान किया जाता है। गोधरा कांड के बाद जब डरबन में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्त्वाधान में रंगभेद, जातिभेद आदि के विरुद्ध एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ तो विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष आचार्य गिरिराज किशोर ने गुजरात की धरती से ही अपने बयान में कहा- ‘भारत की वर्ण-व्यवस्था के बारे में किसी भी तरह की बहस

हमारे धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है।’ यह वही समय था जब राजस्थान हाईकोर्ट के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश गुम्मनमल लोढ़ा ने विश्व हिंदू परिषद के मंच का इस्तेमाल करते हुए ‘आरक्षण विरोधी मोर्चा’ खोल कर दलित आरक्षण के विरोध में अभियान चलाया था। इसके पहले 1987 में सिर्फ एक दलित छात्र का दाखिला अमदाबाद मेडिकल कॉलेज में हुआ था। उसके विरुद्ध पूरे एक साल तक दलित बस्तियों पर हिंदुत्ववादी हमला बोलते रहे। ऐसे मोदी के गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहा जा रहा है।उपर्युक्त विशेषताओं के चलते मोदी को आरएसएस ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना है। यही उनका गुजरात मॉडल है, जिसे वे पूरे भारत में लागू करना चाहते हैं। दुनिया भर के फासीवादियों का तंत्र हमेशा मिथ्या प्रचार पर केंद्रित रहता है। मोदी उसके जीते-जागते प्रतीक बन चुके हैं। वे हर जगह नब्बे डिग्री के कोण पर झुक कर सबको सलाम ठोंक रहे हैं। बनारस में वे पर्चा भरने गए तो डॉ आंबेडकर की मूर्ति को ढूंढ़ कर उस पर माला चढ़ाई, ताकि दलितों को गुमराह किया जा सके। संघ परिवार मोदी प्रचार के दौरान आंबेडकर को मुसलिम विरोधी के रूप में पेश कर रहा है, ताकि दलितों का भी ध्रुवीकरण सांप्रदायिक आधार पर हो सके। इस संदर्भ में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में, जहां मोदी का हेलीकॉप्टर उतरा, उसके पास ही गांधी की मूर्ति थी, लेकिन माला चढ़ाना तो दूर, उसकी तरफ उन्होंने देखा तक नहीं। मोदी के इस व्यवहार से भी पता चलता है कि आखिर गांधी की हत्या किसने की होगी।

इन चुनावों के शुरू होने के बाद मोदी का चुनाव घोषणा-पत्र आया, जिसमें सारे विश्वासघाती एजेंडे आवरण की भाषा में लिखे हुए हैं। सारा मीडिया कह रहा था कि इस घोषणा-पत्र पर पूरी छाप मोदी की है। इसमें दो बड़ी घातक शब्दावली का इस्तेमाल किया गया है। एक है ‘टोकनिज्म’, दूसरा है, ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी’, यानी सबको समान अवसर। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। ‘समान अवसर’ का इस्तेमाल सारी दुनया में शोषित-पीड़ित जनता के पक्ष में किया जाता है, लेकिन मोदी का संघ परिवार तर्क देता है कि दलितों के आरक्षण से सवर्णों के साथ अन्याय होता है। इसलिए आरक्षण समाप्त करके सबको एक समझा जाए। यही है मोदी के घोषणा-पत्र का असली दलित विरोधी चेहरा और समान अवसर की अवधारणा।

इसका व्यावहारिक रूप यह है कि दलितों को वापस मध्ययुग की बर्बरता में फिर से झोंक दिया जाए। अनेक मोदी समर्थक इस चुनाव में सार्वजनिक रूप से आरक्षण समाप्त करने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन मोदी उस पर बिल्कुल चुप हैं। इसलिए मोदी और संघ परिवार का दलित विरोध किसी से छिपा नहीं है।

लेकिन सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि दलित पार्टियां मोदी के खतरे से एकदम अनभिज्ञ हैं। उलटे वे लगातार मोदी का हाथ मजबूत करने में व्यस्त हैं। आज मायावती जगह-जगह बोल रही हैं कि मोदी की सत्ता का आना खतरनाक है, क्योंकि वे आरक्षण खत्म कर देंगे और समाज सांप्रदायिकता के आधार पर बंट जाएगा। ऐसा सुन कर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह सर्वविदित है कि 1995 तक कोई भी पार्टी भाजपा को छूने के लिए तैयार नहीं थी। यहां तक कि उस समय तक लोहियावादी समाजवादियों के अनेक धड़े भी भाजपा को नहीं छूना चाहते थे। लेकिन ज्यों ही 1996 में मायावती भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं तो भाजपा के समर्थन में दर्जनों पार्टियों की लाइन लग गई। एक तरह से मायावती ने भाजपा के समर्थन का बंद दरवाजा एक धक्के में खोल दिया और तीन-तीन बार उसके साथ सरकार चलाई। मायावती की भूमिका संघ परिवार की सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बेतहाशा वृद्धि का कारण बनी।ModiVsUPA

मायावती संघ और ब्राह्मणों के नजदीक तो अवश्य गर्इं, लेकिन 1995 में मुलायम-बसपा की सरकार को गिरा कर दलित-पिछड़ों की एकता को उन्होंने एकदम भंग कर दिया। इतना ही नहीं, 2004 के चुनावों में मायावती मोदी के समर्थन में प्रचार करने गुजरात चली गर्इं। दलित राजनीति की मूर्खता की यह चरम सीमा थी। अगर मायावती संघ के साथ कभी नहीं जातीं और सेक्युलर दायरे में रही होतीं तो देवगौड़ा के बदले 1996 में कांशीराम या मायावती में से कोई भी एक भारत का प्रधानमंत्री बन सकता था। लेकिन सत्ता के तात्कालिक लालच ने पूरी दलित राजनीति को जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति में बदल दिया। इससे जातिवादी सत्ता की भी होड़ मच गई। दलित नेताओं को यह बात एकदम समझ में नहीं आती है कि दलित हमेशा जातिवाद के कारण ही हाशिये पर रहे। इसलिए जातिवाद से छेड़छाड़ करना कभी भी दलितों के हित में नहीं है।

अब जरा अन्य दलित मसीहाओं पर गौर किया जाए। दलित राजनीति के तीन ‘राम’ हैं। एक हैं रामराज (उदित राज), दूसरे रामदास अठावले और तीसरे रामविलास पासवान। ये तीनों गले में भगवा साफा लपेट कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाने पर उतारू हैं। हकीकत यही है कि ये तीनों ‘राम’, ‘रामराज’ लाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। रामराज ने भारत को बौद्ध बनाने के अभियान से अपनी राजनीति शुरू की थी। मगर कुशीनगर और श्रावस्ती होते हुए उन्होंने अयोध्या आकर अपना बसेरा बना लिया। जिस प्रकार मुसलमानों के खिलाफ जब बोलना होता है तो भाजपा नकवी-हुसैन की जोड़ी को आगे कर देती है। अब जब दलितों के खिलाफ बोलना होता है तो रामराज हाजिर हो जाते हैं। इसका उदाहरण उस समय मिला, जब रामदेव ने दलितों के घर राहुल द्वारा हनीमून मनाने वाला बयान दिया, जिसके बाद देशभर के दलितों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसलिए बड़ी बेशर्मी से रामराज रामदेव के समर्थन में आ गए।

उधर रामदास अठावले, जो अपने को डॉ आंबेडकर का उत्तराधिकारी से जरा कम नहीं समझते, वे शिवसेना के झंडे तले मोदी के प्रचार में जुटे हुए हैं। उनकी असली समस्या यह थी कि वे मनमोहन सरकार में मंत्री बनना चाहते थे, लेकिन विफल रहे। इसलिए उन्होंने भगवा परिधान ओढ़ने में ही अपनी भलाई समझी। तीसरे नेता रामविलास पासवान पहले भी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में रह चुके हैं। हकीकत यह है कि 1989 से अब तक वीपी सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, वाजपेयी और मनमोहन सिंह, सबके मंत्रिमंडल में रामविलास पासवान केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। गोधरा दंगे के बाद उन्होंने राजग छोड़ा था। लेकिन मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में मंत्री न बन पाने के कारण वे फिर मोदी की हवा में उड़ने लगे। अब हर मंच से मोदी का प्रचार कर रहे हैं।

इस समय सारे दलित नेता दलित वोटों की भगवा मार्केंटिंग कर रहे हैं। ये नेता जान-बूझ कर दलितों को सांप्रदायिकता की आग में झोंक रहे हैं। इतना ही नहीं, वे वर्ण-व्यवस्थावादियों के हाथ भी मजबूत कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह जिम्मेदारी दलित समाज की है कि वे सारी दलित पार्टियों को भंग करने का अभियान चलाएं और उसके बदले जाति व्यवस्था विरोधी आंदोलनों की शुरुआत करें। अन्यथा इन नेताओं के चलते दलित हमेशा के लिए जातिवाद के शिकार बन जाएंगे।

प्रसिद्द  दलित चिंतक प्रो. तुलसी राम, अपनी आत्मकथा “मुर्दहिया” के कारण भी सर्वत्र जाने जाते हैं|

साभार : जनसत्ता (4 मई, 2014)

अप्रैल 30, 2014

ध्रुवीकरण के धुरंधर – रवीश कुमार (NDTV)

Muslim tirangaमुसलमान एक तरफ़ जाएगा तो उसके ख़िलाफ़ हिन्दू दूसरी तरफ़ जाएगा। इससे मिलता जुलता विश्लेषण आप टीवी पर ख़ूब सुनते होंगे। मतदान की आती तस्वीरों के साथ टीवी स्टुडियो में बैठे जानकार किस आधार पर यह बात कह रहे होते हैं समझना मुश्किल है। हमारी राजनीति में धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण एक तथ्य है मगर यह मिथक भी है। ध्रुवीकरण सतही और सामान्य व्याख्या का ऐसा औज़ार हो गया है जिसके सहारे जानकार एक मतदाता को साम्प्रदायिक रंग से पेंट कर देते हैं। इसी के साथ एक और मिथक की रचना करने लगते हैं। ‘टैक्टिकल वोटिंग’ का मिथक। क्या अन्य जाति धर्म समूह इस तरह से वोटिंग नहीं करते अगर करते हैं तो क्या वो इस कथित टैक्टिकल वोटिंग के जैसा ही है।

एक साइड मुसलमान तो दूसरी साइड हिन्दू। ऐसा लगता है कि स्टुडियो में बैठे जानकार एक ख़ास समुदाय की तरफ़ इशारा कर रहे हैं कि मुसलमान एकजुट हो रहे हैं । भाजपा के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहे हैं लिहाज़ा स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को भी भाजपा के पक्ष में एकजुट हो जाना चाहिए। अख़बारों में भी ऐसी बातें ख़ूब लिखी जा रही हैं। कई बार लगता है कि एक रणनीति के तहत ऐसा किया जा रहा है। मतदान प्रक्रिया का एक अदना सा एक्सपर्ट भी जान सकता है कि कुछेक अपवादों को छोड़ सामान्य रूप से यह बात सही नहीं है। कई बार लगता है कि चुनाव के समय ऐसे विश्लेषणों के सहारे समाज में साम्प्रदायिकता को भड़काने का काम किया जाता है।

क्या हिन्दू हमेशा यह देखकर वोट देता है कि मुसलमान किस तरफ़ वोट दे रहा है या मुसलमान यह देखकर वोट देता है कि हिन्दू किस तरफ़ देता है । इसका वैज्ञानिक आधार क्या है। हर चुनाव में मुस्लिम मतदाता को ब्रांड करने का खेल खेला जाता है। जैसे उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं है और वो सिर्फ मुसलमान बनकर वोट करता है। अगर ऐसा होता तो यह बात सही होती कि एक आम मुस्लिम मतदाता इमाम बुख़ारी जैसे धर्मगुरुओं के कहने पर ही वोट कर देता। किसी भी चुनाव का आँकड़ा देखेंगे तो यह ग़लत साबित होता है। आम मुस्लिम मतदाता बड़े आराम से मतदान के फ़ैसले में मुल्ला मौलवियों की दख़लंदाज़ी को पसंद नहीं करता। खुलकर बोलता भी है लेकिन मीडिया ऐसे धर्मगुरुओं के बहाने मुस्लिम मतदाताओं का सांप्रदायिकरण करता रहता है।

इसी संदर्भ में एक और बात कहना चाहता हूँ। बाबा रामदेव जैसे कई योग गुरु और धर्मगुरु भी तो किसी पार्टी के लिए वोट मांगते हैं। इमाम बुख़ारी का अपील करना साम्प्रदायिक और बाबा रामदेव या शंकराचार्य का अपील करना राष्ट्रभक्ति। कैसे? मैं दोनों की तुलना नहीं कर रहा लेकिन मूल बात यह है कि सभी प्रकार के मज़हबी नेता चुनाव के वक्त सक्रिय होते हैं। कोई आशीर्वाद के नाम पर इनके पास जाता है तो कोई अपने भाषणों में देवी देवताओं के प्रतीकों का इस्तमाल करके धर्म का इस्तमाल करता है। खुद को ईश्वर का दूत बताना क्या है।

आम मतदाता को इससे सचेत होने की ज़रूरत है। यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हमारे तमाम धर्मों के गुरुओं का समाज से गहरा नाता होता है। झट से उनके किसी राजनीतिक आचरण को साम्प्रदायिक क़रार देने से पहले देखना चाहिए कि वे क्यों ऐसा कर रहे हैं। उनका आधार सांप्रदायिक है धार्मिक है या राजनीतिक। अगर विरोध करना है तो एक साथ डेरों, मठों, मस्जिदों की राजनीतिक दख़लंदाज़ी का विरोध कीजिये।

मैं फिर से लौटता हूँ अपनी मूल बात पर। तमाम अध्ययन बताते हैं कि मुस्लिम मतदाता अपनी पसंद के हिसाब से अलग अलग राज्यों में अलग अलग पार्टी और नेता को वोट करता है। मुसलमान एक नहीं कई दलों को वोट करने के साथ साथ बीजेपी को भी वोट करता है। मध्यप्रदेश राजस्थान और गुजरात में भी करता है। हो सकता है कि प्रतिशत के लिहाज़ से कम हो लेकिन आप यह भी तो देखिये कि बीजेपी ने इन राज्यों में लोकसभा के चुनावी मैदान में कितने मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में कितने उतारे हैं। पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी को पचीस छब्बीस प्रतिशत मत मिले थे शेष और पचहत्तर फ़ीसदी मत अन्य दलों को। अगर हिन्दू वोट जैसा कुछ होता तो बीजेपी को पचहत्तर फ़ीसदी वोट मिलते। जो हिन्दू बीजेपी को वोट नहीं करते उनके न करने के आधार क्या हैं। हमारे ये जानकार हिन्दू मतदाताओं के विवेक के साथ भी अन्याय करते हैं। मतदाताओं का अति हिन्दूकरण कर साम्प्रदायिक रंग देते हैं।

चलिये इस बात को एक और तरीके से देखते हैं। हर समुदाय या जाति के लोग अपने उम्मीदवारों को वोट देते हैं। इसी आधार पर कांग्रेस बीजेपी सब अपने उम्मीदवार तय करते हैं। तब भी बीजेपी को हराने के लिए मुसलमान किसी मुसलमान उम्मीदवार को वोट नहीं करता है। वो उसी दल या उम्मीदवार को वोट करेगा जिसके पास पर्याप्त वोट हो। यह वोट कहाँ से आता है। कथित रूप से हिन्दू समाज से ही न। तो यह बात कैसे उचित ठहराई जा सकती है कि हिन्दू एक तरफ़ जाते हैं और मुस्लिम दूसरी तरफ़ । क़ायदे से तो एक दूसरे की पार्टी को हराने के लिए दोनों मिल-जुल कर एक दूसरे के ख़िलाफ़ गोलबंद होते हैं। इसके बाद भी सारे मुसलमान किसी एक व्यक्ति या दल को वोट नहीं करेंगे।

मुसलमानों को कथित रूप से बीजेपी के ख़िलाफ़ पेश किये जाने के बाद भी जानकार जानते हैं कि वे कहीं भी एकमुश्त वोटिंग नहीं करते। यह संभव भी नहीं है। ऐसा होने लगा तो समझिये कि मुस्लिम समाज के भीतर आपसी टकराव ही समाप्त हो जायें। आप भी जानते हैं कि मुसलमानों के बीच अगड़े पिछड़े और दलित मुसलमानों के हक़ को लेकर ज़बरदस्त टकराव है। पिछले दिनों कई राज्यों में जैसे उत्तर प्रदेश, केरल और असम, मुस्लिम दलों का उदय हुआ है क्या ये सभी बीजेपी के ख़िलाफ़ उभरे हैं? नहीं। इनसे चुनौती कांग्रेस सपा बसपा लेफ़्ट को भी मिलती है।

इसीलिए जानकारों को ध्रुवीकरण की बेहद सतही और ख़तरनाक व्याख्या से बचना चाहिए। बनारस में नरेंद्र मोदी जब अपने नामांकन के लिए जा रहे थे तो उस भीड़ में भी कैमरे मुसलमान ढूँढ रहे थे। उनका क्लोज़ अप दिखा रहे थे। मुझे इस बात से आपत्ति है। क्या कैमरे उस भीड़ में शामिल अन्य लोगों को भी उसी निगाह से देख रहे थे। अगर नहीं तो फिर एक या दो मुसलमान की तलाश क्यों हो रही थी। तब भी जब नरेंद्र मोदी के साथ मुख़्तार अब्बास नकवी नज़र आ रहे थे। बीजेपी भले हिन्दुत्व या संघ के कहने पर चले पर उसे मिलने वाला हर वोट इसके लिए नहीं मिलता। बीजेपी के कार्यकर्ता चाहें जितना हिन्दुत्व के रंग रूप में ढल कर आक्रामक हो जायें उनकी पार्टी को मिलने वाला हर वोट हिन्दू वोट नहीं है। ज़्यादातर दलित मतदाताओं को खुद को इस पहचान से जोड़ कर देखे जाने से आपत्ति हो सकती है जबकि हो सकता है कि वो वोट बीजेपी को दें।

हमें जनमत का साम्प्रदायिकरण नहीं करना चाहिए। सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण हमारी राजनीति की ख़तरनाक सच्चाई है लेकिन ऐसा हर जगह किसी एक फ़ार्मूले के तहत नहीं होता कि मुसलमान इधर गए तो हिन्दू उधर चले जायेंगे । कई बार लगता है कि जानकार मुस्लिम मतदाताओं का मज़हबी चरित्र चित्रण करते हुए ग़ैर मुस्लिम मतदाताओं को इशारा कर रहे होते हैं कि उन्हें वोट कहाँ देना चाहिए।

(रवीश कुमार)

अप्रैल 29, 2014

नरेंद मोदी की बनारस से हार का गणित

AKvs Modiबनारस का सियासी समीकरण नरेन्द्र मोदी को नाको चने चबवाने पर मजबूर कर सकता है| हम इस वक़्त बनारस में रहकर काशी की इस दिलचस्प लड़ाई का जायज़ा ले रहे है| इस दौरान हमें मोदी की कई ऐसी बातें मालूम पड़ी जो आपको चौंका सकती है| हम आपके सामने सिलसिलेवार तरीके से ऐसे पहलू रखने जा रहे हैं, जो चक्रव्यूह में फंसे मोदी की हक़ीक़त बेपर्दा कर देंगे|

मोदी ने काशी की लड़ाई में पार पाने के खातिर आनन-फानन में ‘अपना दल’ से समझौता कर लिया| अपना दल की पटेल-कुर्मी वोटरों पर पकड़ है और बनारस में इस तबके की आबादी ढाई लाख के करीब है| ऐसे में मोदी की जीत-हार में यह फैक्टर निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है| दिलचस्प बात यह है कि यह समझौता ‘अपना दल’ की युवा अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने आनन-फानन में बग़ैर अपने काडर की राय लिए कर लिया और बदले में मिर्ज़ापुर की लोकसभा सीट पर बीजेपी के सहयोग से टिकट हासिल कर लिया. जबकि इससे पहले ‘अपना दल’ की बातचीत कांग्रेस के साथ चल रही थी. ऐसे में काडर खुद को बुरी तरह ठगा महसूस कर रहा है. चर्चा गर्म है कि ‘अपना दल’ का यही काडर इस दग़ाबाज़ी का बदला चुनाव में मोदी की हार सुनिश्चित करके ले सकता है|

काशी में भूमिहार वोट तकरीबन सवा से डेढ़ लाख के बीच में है. यह पूरा वोट लामबंद होकर कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय के हक़ में गिर रहा है|

काशी की लड़ाई में दलित वोट भी बहुत महत्वपूर्ण है. एक से सवा लाख के बीच का यह दलित वोट-बैंक बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद टस से मस होने को तैयार नहीं है|

काशी में चौरसिया समाज के डेढ़ लाख वोट हैं| यादव 70 से 80 हज़ार हैं| पाल, सैनी जैसे दूसरे वोट-बैंक भी दो से ढाई लाख के करीब हैं, जो खांटी तौर पर जाति राजनीति के साथ जा रहे हैं| बीजेपी मज़हब की चाशनी के नाम पर इन्हें अपने खेमे में खींचने की पूरज़ोर कोशिश कर रही है, मगर यह वोट बैंक अपनी जातिय प्रतिबद्धताओं को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है|

मुस्लिम वोटबैंक बनारस में तीन से साढ़े तीन लाख के करीब है, जो ध्रुवीकरण की सूरत में बग़ैर बंटे एक तरफा तरीके से मोदी के खिलाफ जाएगें, जो मोदी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद घातक हो सकता है.

मोदी की सबसे बड़ी चिंता ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर है| काशी में ढ़ाई लाख के करीब ब्राह्मण हैं| यह तबका मुरली मनोहर जोशी की उपेक्षा और जातिय स्वाभिमान का उचित प्रतिनिधित्व न मिलने से भड़का हुआ है| इस बात की संभावनाएं है कि इस तबके के वोटों में चुनाव के मौके पर भारी बिखराव हो सकता है|

AKKashi1

अरविन्द केजरीवाल जिस तरीके से मोदी के गुजरात में छाए भ्रष्टाचार की कलई खोल रहे हैं, उसका असर पढ़े-लिखे तबके पर सीधे तौर पर पड़ रहा है. यह तबका अपनी विवेक के आधार पर सही मौके पर सही क़दम उठा सकता है|

मोदी का दो जगह से चुनाव लड़ना भी उनके खिलाफ काम कर रहा है| काशी के मतदाताओं के बीच यह मुद्दा उथल-पुथल पैदा कर चुका है. इस बात की चर्चाएं आम होती जा रही है कि मोदी चुनाव जीतने पर बनारस को चूसे हुए आम की गुठली की तरह फेंक देंगे|

मोदी के लिए राजनाथ फैक्टर भी टेढ़ी खीर बन चुका है| सुत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह अंदर ही अंदर मोदी को काटने में लगे हुए हैं| राजनाथ सिंह को अच्छी तरह से मालूम है कि अगर मोदी बनारस से हार गए तो उनके पीएम बनने की राह में हमेशा के लिए दीवार खड़ी हो जाएगी.

मोदी की काशी से दूरी भी उनके खिलाफ जा रही है. सुत्रों के मुताबिक मोदी के सलाहकारों ने उन्हें समझा दिया है कि उन्हें बनारस में जीत की खातिर पसीने बहाने की कोई ज़रूरत नहीं है. यहां जीत तय है. उन्हें नामांकन छोड़कर बनारस आने की भी ज़रूरत नहीं है. यही वजह है कि मोदी बनारस में दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, जबकि पास-पड़ोस के ज़िलों में रैली करके निकल जा रहे हैं. मोदी का यह अति आत्म-विश्वास उन पर भारी पड़ सकता है.

नरेन्द्र मोदी के लिए काशी की लड़ाई किसी वाटर लू से कम नहीं है. अगर मोदी यहां हारे तो उनके राजनीतिक भविष्य को कोई नहीं बचा सकता है| काशी में मोदी के वाटर लू की शुरूआत हो चुकी है|
(Shams Tabrez)

मई 26, 2013

मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई

Train to Pak

सादत हसन मंटो ने भारत-पाकिस्तान बंटवारे और इससे उपजी हिंसा पर बेहद प्रभावशाली कहानियां लिखी हैं और नफ़रत के ऐसे माहौल में इंसानियत कितना गिर सकती है इस बात को अपनी कहानियों के जरिये दुनिया को बताया है| अज्ञेय ने भी पनी संवेदनशीलता के बलबूते बंटवारे के समय उपजे अमानवीय हालात में एक मनुष्य की विवशता और दूसरे मनुष्य के अहंकार के संघर्ष को बड़े प्रभावी तरीके से इस बेहतरीन कहानी – मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई, में दर्शाया है| सैधान्तिक रूप से भले ही इस्लाम कहता हो कि सभी इंसान (और कम से कम मुसलमान) बराबर हैं पर मनुष्य बेहद चालाक जीव है और वह ऐसे उपदेशों को सिर्फ बोलने के लिए मानता है, इन पर अमल नहीं करता| धनी मुसलमान औरतें और मर्द ही ही मजलूम मुस्लिम औरतों की मदद नहीं करते बल्कि उन्हें अपने पद, और धन के रसूख से उपजे अहंकार के कारण बेइज्जत भी करते हैं| मंटो लिखते तो शायद इसी कहानी में धनी पुरुष की लालची और वासनामयी दृष्टि गरीब औरतों के जिस्म को खंगाल कर उससे बलात्कार करने लगती पर अज्ञेय की लेखनी अलग ढंग से काम करती है और यहाँ धनी पुरुष गरीब स्त्री के चरित्र पर घटिया संवादों से आक्रमण करता है|

मुस्लिम-मुस्लिम भाई-भाई

छूत की बीमारियाँ यों कई हैं; पर डर-जैसी कोई नहीं। इसलिए और भी अधिक, कि यह स्वयं कोई ऐसी बीमारी है भी नहीं-डर किसने नहीं जाना? – और मारती है तो स्वयं नहीं, दूसरी बीमारियों के ज़रिये। कह लीजिए कि वह बला नहीं, बलाओं की माँ है…

नहीं तो यह कैसे होता है कि जहाँ डर आता है, वहाँ तुरन्त घृणा और द्वेष, और कमीनापन आ घुसते हैं, और उनके पीछे-पीछे न जाने मानवात्मा की कौन-कौन-सी दबी हुई व्याधियाँ!

वबा का पूरा थप्पड़ सरदारपुरे पर पड़ा। छूत को कोई-न-कोई वाहक लाता है; सरदारपुरे में इस छूत का लाया सर्वथा निर्दोष दीखनेवाला एक वाहक – रोज़ाना अखबार!

यों अखबार में मार-काट, दंगे-फ़साद, और भगदड़ की खबरें कई दिन से आ रही थीं, और कुछ शरणार्थी सरदारपुरे में आ भी चुके थे – दूसरे स्थानों से इधर और उधर जानेवाले काफ़िले कूच कर चुके थे। पर सरदारपुरा उस दिन तक बचा रहा था।

उस दिन अखबार में विशेष कुछ नहीं था। जाजों और मेवों के उपद्रवों की खबरें भी उस दिन कुछ विशेष न थीं – ‘पहले से चल रहे हत्या-व्यापारों का ही ताज़ा ब्यौरा था। कवेल एक नयी लाइन थी’, ‘अफ़वाह है कि जाटों के कुछ गिरोह इधर-उधर छापे मारने की तैयारियाँ कर रहे हैं।’

इन तनिक-से आधार को लेकर न जाने कहाँ से खबर उड़ी कि जाटों का एक बड़ा गिरोह हथियारों से लैस, बन्दूकों के गाजे-बाजे के साथ खुले हाथों मौत के नये खेल की पर्चियाँ लुटाता हुआ सरदारपुरे पर चढ़ा आ रहा है।

सवेरे की गाड़ी तब निकल चुकी थी। दूसरी गाड़ी रात को जाती थी; उसमें यों ही इतनी भीड़ रहती थी और आजकल तो कहने क्या… फिर भी तीसरे पहर तक स्टेशन खचाखच भर गया। लोगों के चेहरों के भावों की अनदेखी की जा सकती तो ही लगता कि किसी उर्स पर जानेवाले मुरीद इकट्ठे हैं…

गाड़ी आयी और लोग उस पर टूट पड़े। दरवाजों से, खिड़कियों से, जो जैसे घुस सका, भीतर घुसा। जो न घुस सके वे किवाड़ों पर लटक गये, छतों पर चढ़ गये या डिब्बों के बीच में धक्का सँभालनेवाली कमानियों पर काठी कसकर जम गये। जाना ही तो है, जैसे भी हुआ, और फिर कौन टिकट खरीदा है जो आराम से जाने का आग्रह हो…

गाड़ी चली गयी। कैसे चली और कैसे गयी, यह न जाने, पर जड़ धातु होने के भी लाभ हैं ही आखिर!

और उसके चले जाने पर, मेले की जूठन-से जहाँ-तहाँ पड़े रह गये कुछ एक छोटे-छोटे दल, जो किसी-न-किसी कारण उस ठेलमठेल में भाग न ले सके थे-कुछ बूढ़े, कुछ रोगी, कुछ स्त्रियाँ और तीन अधेड़ उम्र की स्त्रियों की वह टोली, जिस पर हम अपना ध्यान केन्द्रित कर लेते हैं।

सकीना ने कहा, ‘‘या अल्लाह, क्या जाने क्या होगा।’’

अमिना बोली, ‘‘सुना है एक ट्रेन आने वाली है – स्पेशल। दिल्ली से सीधी पाकिस्तान जाएगी – उसमें सरकारी मुलाज़िम जा रहे हैं न? उसी में क्यों न बैठे?’’

‘‘कब जाएगी?’’

‘‘अभी घंटे-डेढ़ घंटे बाद जाएगी शायद..’’

जमीला ने कहा, ‘‘उसमें हमें बैठने देंगे? अफ़सर होंगे सब…’’

‘‘आखिर तो मुसलमान होंगे – बैठने क्यों न देंगे?’’

‘‘हाँ, आखिर तो अपने भाई हैं।’’

धीरे-धीरे एक तन्द्रा छा गयी स्टेशन पर। अमिना, जमीला और सकीना चुपचाप बैठी हुई अपनी-अपनी बातें सोच रही थीं। उनमें एक बुनियादी समानता भी थी और सतह पर गहरे और हल्के रंगों की अलग-थलक छटा भी… तीनों के स्वामी बाहर थे – दो के फ़ौज में थे और वहीं फ्रंटियर में नौकरी पर थे – उन्होंने कुछ समय बाद आकर पत्नियों को लिवा ले जाने की बात लिखी थी; सकीना का पति कराची के बन्दरगाह में काम करता था और पत्र वैसे ही कम लिखता था, फिर इधर की गड़बड़ी में तो लिखता भी तो मिलने का क्या भरोसा! सकीना कुछ दिन के लिए मायके आयी थी सो उसे इतनी देर हो गयी थी, उसकी लड़की कराची में ननद के पास ही थी। अमिना के दो बच्चे होकर मर गये थे; जमीला का खाविन्द शादी के बाद से ही विदेशों में पलटन के साथ-साथ घूम रहा था और उसे घर पर आये ही चार बरस हो गये थे। अब… तीनों के जीवन उनके पतियों पर केन्द्रित थे, सन्तान पर नहीं, और इस गड़बड़ के जमाने में तो और भी अधिक… न जाने कब क्या हो – और अभी तो उन्हें दुनिया देखनी बाक़ी ही है, अभी उन्होंने देखा ही क्या है? सरदारपुरे में देखने को है भी क्या-यहाँ की खूबी यही थी कि हमेशा अमन रहता और चैन से कट जाती थी, सौ अब वह भी नहीं, न जाने कब क्या हो… अब तो खुदा यहाँ से सही-सलामत निकाल ले सही…

स्टेशन पर कुछ चलह-पहल हुई, और थोड़ी देर बाद गड़गड़ाती हुई ट्रेन आकर रुक गयी।

अमिना, सकीना और जमीला के पास सामान विशेष नहीं था, एक-एक छोटा ट्रंक एक-एक पोटली। जो कुछ गहना-छल्ला था, वह ट्रंक में अँट ही सकता था, और कपड़े-लतर का क्या है-फिर हो जाएँगे। और राशन के ज़माने में ऐसा बचा ही क्या है जिसकी माया हो।

ज़मीला ने कहा, ‘‘वह उधर ज़नाना है!’’ – और तीनों उसी ओर लपकीं।

ज़नाना तो था, पर सेकंड क्लास का। चारों बर्थों पर बिस्तर बिछे थे, नीचे की सीटों पर चार स्त्रियाँ थीं, दो की गोद में बच्चे थे। एक ने डपटकर कहा, ‘‘हटो, यहाँ जगह नहीं है।’’

अमिना आगे थी, झिड़की से कुछ सहम गयी। फिर कुछ साहस बटोरकर चढ़ने लगी और बोली, ‘‘बहिन, हम नीचे ही बैठ जाएँगे – मुसीबत में हैं…’’

‘‘मुसीबत का हमने ठेका लिया है? जाओ, आगे देखो…’’

जमीला ने कहा, ‘‘इतनी तेज़ क्यों होती हो बहिन? आखिर हमें भी तो जाना है।’’

‘‘जाना है तो जाओ, थर्ड में जगह देखो। बड़ी आयी हमें सिखानेवाली!’’ और कहनेवाली ने बच्चे को सीट पर धम्म से बिठाकर, उठकर भीतर की चिटकनी भी चढ़ा दी।

जमीला को बुरा लगा। बोली, ‘‘इतना गुमान ठीक नहीं है, बहिन! हम भी तो मुसलमान हैं…’’

इस पर गाड़ी के भीतर की चारों सवारियों ने गरम होकर एक साथ बोलना शुरू कर दिया। उससे अभिप्राय कुछ अधिक स्पष्ट हुआ हो सो तो नहीं, पर इतना जमीला की समझ में आया कि वह बढ़-बढ़कर बात न करे, नहीं तो गार्ड को बुला लिया जाएगा।

सकीना ने कहा, ‘‘तो बुला लो न गार्ड को। आखिर हमें भी कहीं बिठाएँगे।’’

‘‘जरूर बिठाएँगे, जाके कहो न! कह दिया कि यह स्पेशल है स्पेशल, ऐरे-ग़ैरों के लिए नहीं है, पर कम्बख्त क्या खोपड़ी है कि…’’ एकाएक बाहर झाँककर बग़ल के डिब्बे की ओर मुड़कर, ‘‘भैया! ओ अमजद भैया! देखो ज़रा, इन लोगों ने परेशान कर रखा है…’’

‘अमजद भैया’ चौड़ी धारी के रात के कपड़ों में लपकते हुए आये। चेहरे पर बरसों की अफ़सरी की चिकनी पपड़ी, आते ही दरवाज़े से अमिना को ठेलते हुए बोले, ‘‘क्या है?’’

‘‘देखो न, इनने तंग कर रखा है। कह दिया जगह नहीं है, पर यहीं घुसने पर तुली हुई हैं। कहा कि स्पेशल है, सेकंड है, पर सुनें तब न। और यह अगली तो…’’

‘‘क्यों जी, तुम लोग जाती क्यों नहीं? यहाँ जगह नहीं मिल सकती। कुछ अपनी हैसियत भी तो देखनी चाहिए-’’

जमीला ने कहा, ‘‘क्यों हमारी हैसियत को क्या हुआ है? हमारे घर के ईमान की कमाई खाते हैं। हम मुसलमान हैं, पाकिस्तान जाना चाहते हैं। और…’’

‘‘और टिकट?’’

‘‘और मामूली ट्रेन में क्यों नहीं जाती?’’

अमिना ने कहा, ‘‘मुसीबत के वक्त मदद न करे, तो कम से कम और तो न सताएँ! हमें स्पेशल ट्रेन से क्या मतलब? – हम तो यहाँ से जाना चाहते हैं जैसे भी हो। इस्लाम में तो सब बराबर हैं। इतना ग़रूर – या अल्लाह!’’

‘‘अच्छा, रहने दे। बराबरी करने चली है। मेरी जूतियों की बराबरी की है तैने?’’

किवाड़ की एक तरफ का हैंडल पकड़कर जमीला चढ़ी कि भीतर से हाथ डाल कर चिकटनी खोले, दूसरी तरफ़ का हैंडल पकड़कर अमजद मियाँ चढ़े कि उसे ठेल दें। जिधर जमीला थी, उधर ही सकीना ने भी हैंडल पकड़ा था।

भीतर से आवाज़ आयी, ‘‘खबरदार हाथ बढ़ाया तो बेशर्मो! हया-शर्म छू नहीं गयी इन निगोड़ियों को…

सकीना ने तड़पकर कहा, ‘‘कुछ तो खुदा का खौफ़ करो! हम ग़रीब सही, पर कोई गुनाह तो नहीं किया…’’

‘‘बड़ी पाक़-दामन बनती हो! अरे, हिन्दुओं के बीच में रहीं, और अब उनके बीच से भागकर जा रही हो, आखिर कैसे? उन्होंने क्या यों ही छोड़ दिया होगा? सौ-सौ हिन्दुओं से ऐसी-तैसी कराके पल्ला झाड़ के चली आयी पाक़दामानी का दम भरने…’’

जमीला ने हैंडल ऐसे छोड़ दिया मानो गरम लोहा हो! सकीना से बोली, ‘‘छोड़ो बहिन, हटो पीछे यहाँ से!’’

सकीना ने उतरकर माथा पकड़कर कहा, ‘‘या अल्लाह!’’

गाड़ी चल दी। अमजद मियाँ लपककर अपने डिब्बे में चढ़ गये।

जमीला थोड़ी देर सन्न-सी खड़ी रही। फिर उसने कुछ बोलना चाहा, आवाज़ न निकली। तब उसने ओंठ गोल करके ट्रेन की ओर कहा, ‘‘थूः!’’ और क्षण-भर बाद फिर, ‘‘थूः!’’

आमिना ने बड़ी लम्बी साँस लेकर कहा, ‘‘गयी पाकिस्तान स्पेशल। या परवरदिगार!’’

(इलाहाबाद, 1947)

मई 17, 2013

अस्पताल वहीं बनाएंगे

मैंने जन्म लिया था

एक आयुर्वेदिक अस्पताल में

मगर अब उसी इमारत की

नींव पर खड़ा है एक

एलोपेथिक अस्पताल

मेरा तो कर्तव्य है

कि मुझे गिराना है

वह एलोपेथिक अस्पताल

और खड़ा करना है

वही आयुर्वेदिक अस्पताल

हालांकि मुझे मालूम है

एलोपेथिक हो या आयुर्वेदिक

अस्पतालों का मकसद एक है

अस्वस्थ को स्वस्थ करना

पर सवाल तो है जन्म स्थल का

और हमारी भावनाओं का

एक सुझाव आया है

थोड़ा हटकर बना लूं

अपना आयुवेदिक अस्पताल

पर कैसे मान लूँ इसे

सुनना पड़ जाएगा ताना

कि देखो , इसका खून

खून नहीं, पानी है

अब पूछते हैं लोग

सबूत है जन्मस्थल का?

प्रमाण है कोई?

मेरा तो जवाब है

सीधा सच्चा, किन्तु करारा

सबूत तो बैसाखी है

अदालत की, कानून की

यहाँ तो प्रश्न है

आस्था का, भावना का

मेरा तो धर्म है

वहाँ फिर खड़ा करना

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

बुद्धिजीवी समझाते हैं

मुझे क्या मिलेगा

एक अस्पताल गिरा कर

दूसरा अस्पताल बनाने में

पर मैं क्यों अपनाऊं

तुष्टीकरण की नीति

मेरा प्रथम कर्तव्य है

आयुर्वेदिक अस्पताल बनाना

इतिहास की भूल मानकर

कैसे खड़ा रहने दूँ

एलोपेथिक अस्पताल

गलती, गलती है फिर वह

साढ़े चार वर्ष पहले हुई

या साढ़े चार सौ वर्ष पहले

मैं तो अडिग हूँ

अपने पथ पर

भले ही मरीजों की

संख्या बढ़ जाए

दुख बढ़ जाएँ

दर्द बढ़ जाएँ

लाशें बढ़ जाएँ

निरोगी रोगी हो जाएँ

क्योंकि इनसे बड़ा सवाल है

जन्म स्थल का

आयुर्वेदिक अस्पताल का

मैं अपील करता हूँ

आयुर्वेदिक अस्पताल में

जन्मे हरेक व्यक्ति से

कि गर्व से कहो

हमें बनाना है

एक आयुर्वेदिक अस्पताल

आयुर्वेदिक अस्पताल

(अमिताभ बेहार)

सितम्बर 7, 2011

हिंदू, मुस्लिम सिख, ईसाई – आदमी कहाँ है भाई?

हिंदू . मुस्लिम, सिख, क्रिस्तान खूब थे
बस आदमी ही नहीं मिला इंसानों में

रौशनी देने के लिए शर्त है अँधेरे की
खूने-दिल जलाया जाए उजालदानों में

नेकियां हो जाती हैं गुनाह में शामिल
दिखावे का पुट हो अगर अहसानों में

वक्त की ठोकर की नाप ऐसी है यार
अच्छे अच्छे दिमाग आ गए पैमानों में

अपने अपने ज़र्फ की बात है ए दोस्त
कौन छलक गया कौन रहा पैमानों में

साहिल ने देखा उन बेडों को होते पार
लंगर जिन्होंने डाल दिए थे तूफानों में

निगाहें करम ओ मालिक निगाहें करम
ये जहान भी तो है तेरे ही जहानों में

जो सलूक किया तूने अच्छा ही किया
क्या कहें दुनिया के हम हैं मेहमानों में

फूलों को मुरझाना हुआ देख आये थे
दिल लगने लगा है अपना वीरानों में

पंख पिंजरे में हैं पर हौसला तो देखो
असीर का दिल है  अब भी उड़ानों में

सकून दिल कहाँ से लाओगे ए आलम
सकूने दिल मिलता नहीं है दुकानों में

असीर -कैदी

(रफत आलम)

 

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