Posts tagged ‘Communism’

नवम्बर 8, 2013

तिनकों का समाजवाद और पूंजीवाद

(1)

रोज की तरहstraw-001

कई-कई संकेत कर

आज भी अस्त हुआ

सूर्य!

कई तिनके बीने मैंने

तुमने भी कुछ तिनके उठाये

लोग भी थे

तिनके उठाते |

(2)

धरती बड़ी थी

जमीन उपजाऊ भी

कहीं बंजर भी

यदृच्छया लोग बिखेरे गये थे

बड़ी सी जमीन पर!

मौसम की हवा सर्द भी थी

गर्म भी!

बारिश की फुहारें भी थीं

ओले भी, बाढ़ भी!

सूरज भी पक्षपाती

गरम कहीं, नरम कहीं!

(3)

लोग भी भिन्न थे,

पता नहीं क्यों!

कुछ चपल, कुछ मद्धम

कुछ सुस्त, कुछ रेंगते से

एक ने कहा

तिनके बीनना है, लक्ष्य

यह खोज है,

संकेत है प्रगति का!

सब जुट गये,

‘अ’ ने, ‘ब’ ने, ‘स’ ने, ‘द’ ने

कई कई तिनके बीने

गट्ठर बनाए

(4)

तिनके बीनते बीनते,

एक ने पाया

कि,

इस तरह संतुलन बिगड रहा है

कुछ के पास तिनके ज्यादा हैं,

कुछ के पास कम

धरती भी कहीं तिनकों से पटी,

कहीं तिनका विहीन!

कई वाद चले,

तिनकों की ढेरियाँ बनती रहीं

बिगड़ती रहीं|

(5)

तिनकों का मूल्य क्या था?

तिनके क्या थे?

क्यों बीने गये?

कितने वृक्ष कटे?

कितने जंगल जले,

तिनकों के उत्पादन में?

तिनके तिनके थे,

चुभते भी थे,,

जलते भी थे|

(6)

तिनकों ने अपनी चुभन

अपनी जलन

उधार दी आदमी को

आदमी कभी न उतार सका

यह कर्ज!

ब्याज चक्रवृद्धि था

पुश्त दर पुश्त

बढ़ता गया…

(7)

आज फिर तुमने मुझसे बातें की

“‘युगल’

‘अ’ ने तिनके ज्यादा उठाये|”

मैंने मायूसी में सिर हिलाया

कोसा खुद को

चंद बातें की

मुट्ठी बांधी

कि,

कल हम अधिक तिनके उठाएंगे!

तिनके ही क्यों?

तिनके ही क्यों उठाएंगे

न तुम जानते थे,

न मुझे मालूम था|

Yugalsign1

जून 25, 2013

ओशो : श्रीपाद अमृत डांगे (कम्यूनिस्ट नेता)

OshoDangeजब मैंने कहा, तकरीबन बीस बरस पहले, कि आदमी-आदमी समान नहीं हैं, भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई) ने मेरी आलोचना करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष – एस. ऐ . डांगे ने घोषणा की कि शीघ्र ही उनका दामाद, जो कि एक प्रोफ़ेसर है, एक किताब लिखने वाला है मेरे विचार – कि आदमी आदमी समान नहीं होते-  के खिलाफ| उसने मेरे खिलाफ एक किताब लिखी है, हालांकि उसमें कोई तर्क नहीं है, वहाँ है केवल गुस्सा, गालियाँ और झूठ- कहीं कोई तर्क नहीं यह सिद्ध करने को कि आदमी समान होते हैं|

उसने मेरे खिलाफ थीसीस लिखी है क्योंकि मैं लोगों के दिमागों को भ्रमित कर रहा हूँ| ठीक ठीक यह पता लगाना असंभव है कि मैं ईश्वरवादी हूँ या अनीश्वरवादी, मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूँ या धर्मो की खिलाफत करने वाला| पूरी थीसिस में वह यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता है कि – मैं कौन हूँ- और यह काम असंभव जान पड़ता है और वह निष्कर्ष निकालता है कि मैं केवल भ्रम उत्पन्न करने वाला व्यक्ति हूँ|

अमृत डांगे, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष और दुनिया के सबसे पुराने कम्यूनिस्टों में से एक, रशियन क्रान्ति के समय अन्तर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य भी थे, लेनिन और ट्रोट्स्की के साथ वे भी एक सदस्य थे| संयोग से हम दोनों एक ही कूपे में यात्रा कर रहे थे|

उन्होंने मुझसे कहा,” क्या आपने देखा, मेरे दामाद ने आपके बारे में एक किताब लिखी है| वह तीन साल तक आपका अध्ययन करता रहा है| आपने इतना ज्यादा साहित्य रच दिया है कि आपके ऊपर शोध करना लगभग असंभव काम है| वह रात दिन लगा हुआ था और पागल हुआ जा रहा था| और आप असंभव लक्ष्य प्रतीत होते हैं| केवल यही नहीं कि आप पहले अपने ही कहे के विरोध में कहते हैं बल्कि आप इस नये कहे के भी विरोध में कहते हैं और उससे नये कहे के भी विरोध में कह देते हैं और अंत में यह पता लगाना असंभव हो जाता है कि आप क्या कहना चाहते हैं… और अंत में वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचा है|”

मैंने कहा,”आप इस किताब को ट्रेन से बाहर फेंक दें| उनसे कहियेगा कि वे मूर्ख हैं| उन्होंने क्यों तीन साल बर्बाद कर दिए| जीवन इतना छोटा है और आप एक कम्यूनिस्ट हैं: ऋणं कृत्वा  घृतं पिवेत | मेरे जैसे पागल आदमी के ऊपर इतना समय क्यों बर्बाद करना?” मैंने उनके हाथ से किताब ली और खिड़की से बाहर फेंक दी|

उन्होंने कहा,” यह क्या किया आपने| यह तो बहुत हो गया|”

मैंने कहा,” आप इमरजेंसी चेन खींच सकते हैं| आखिर यह लाल चेन किसलिए हमेशा लटकी रहती है|” पर तब तक ट्रेन मीलों दूर आ चुकी थी और मध्य रात्री का वक्त था|

अमृत डांगे ने कहा,”अब चेन खींचने से कोई लाभ नहीं होगा, अगर मैं चेन खींच भी दूँ …हम मीलों दूर आ चुके हैं और आधी रात हो चुकी है- हम कहाँ किताब को तलाशेंगे| वैसे भी बहुत चिंता की बात नहीं है| मेरे दामाद के पास इस किताब का पूरा का पूरा संस्करण पड़ा हुआ है| एक भी किताब बिकी नहीं है| क्योंकि लोग कहते हैं – भारत में एक स्पष्ट विभाजन था , या तो लोग मेरे पक्ष में थे या विरोध में, जो मेरे पक्ष में थे वे मेरी किताबें पढ़ रहे थे और वे उनके दामाद की लिखी किताब पर समय नष्ट करने की बात सोचते भी नहीं और जो मेरे विरोध में थे वे मेरा नाम भी सुनना नहीं चाहते थे- मुझ पर लिखी किताब पढ़ना तो दूर की बात है|”

सो अमृत डांगे ने कहा,”हमारे पास सारी किताबें हैं| शायद आप ठीक कहते हैं, मेरा दामाद मूर्ख है| उसने तीन साल नष्ट कर दिए और यह किताब उसने अपने पैसे से छपवाई है क्योंकि कोई भी प्रकाशक तैयार नहीं था इसे छापने के लिए, “क्योंकि”, उन्होंने कहा,” इस विषय में भारत में एक स्पष्ट विभाजन है, निष्पक्ष लोग हैं ही नहीं तो इस किताब को खरीदेगा कौन”| उसने अपने पैसे से किताब छपवाई और अब उनके ढेर पर बैठा हुआ है|”

मैंने कहा,” आप इसे बाँट सकते हैं जैसे आपने मुझे दी| बाँट दीजिए| लोगों को पढ़ने दीजिए| हालांकि उन्हें कुछ सार्थक सामग्री नहीं मिलेगी, क्योंकि आपके दामाद तीन साल लगा कर भी नहीं खोज पाए कि मेरा तात्पर्य क्या है| यह कोई भी नहीं जान सकता क्योंकि में कोई तार्किक, दार्शनिक सिद्धांत नहीं कह रहा हूँ…मैं पूर्ण अस्तित्व हूँ|”

विश्वसनीय धर्म न तो ईश्वरवादी होगा और न ही अनीश्वरवादी!

विश्वसनीय धर्म न तो भौतिकवादी होगा और न ही आध्यात्मिक!

विश्वसनीय धर्म पूर्णतावादी होगा!

यह जीवन को खांचों में विभाजित नहीं करेगा| यह पापी और पुण्यात्मा, और स्वर्ग और नरक के सारे विभाजनों को नष्ट करेगा|

मैंने बहुत सारे कम्यूनिस्टों से पूछा है, बहुत पुराने कम्यूनिस्टों से …

मैंने डांगे से पूछा,”क्या आपने कभी ध्यान (मेडिटेशन) किया है?”

उन्होंने कहा,”ध्यान? किसलिए? मुझे ध्यान क्यों करना चाहिए?”

मैंने कहा,” अगर आपने कभी ध्यान नहीं किया तो आपके पास अधिकार नहीं है यह कहने का कि कोई आत्मा नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है, कोई चेतना नहीं है| अपने अंदर गहरे में उतरे बिना आप कैसे कह सकते हैं कि अंदर कोई नहीं है? और ऐसे कथनों की निरर्थकता देखिये- कौन कह रहा है कि अंदर कोई नहीं है? निषेध के लिए भी आपको यह स्वीकार करना होगा कि कोई है| यह भी कहने के लिए कि कोई नहीं है इस बात की कल्पना करनी होगी कि कोई है|”

जून 6, 2013

ओशो : राहुल सांकृत्यायन (बौद्ध भिक्षु और वामपंथी लेखक)

Osho rahulमेरे एक मित्र, संस्कृत, पाली और प्राकृत के विद्वान, बौद्ध भिक्षु थे| लेकिन वे कम्यूनिज्म की ओर भी आकर्षित हो गये, और इसका कारण साधारण सी समानता थी, कि बुद्ध के यहाँ भी ईश्वर की परिकल्पना नहीं  है और मार्क्स के यहाँ भी नहीं है| सो वे मार्क्सिज्म की ओर आकर्षित हो गये और अंततः कम्यूनिस्ट बन गये| और सोवियत यूनिवर्सिटी ने उन्हें कहा कि वे वहाँ जाकर  संस्कृत पढाएं और वे मॉस्को चले गये|

भारत से बाहर, मॉस्को में हर चीज अलग थी| यहाँ उनके लिए असंभव था कि बौद्ध भिक्षु भी बने रहते और किसी स्त्री से प्रेम भी कर लेते| सोवियत यूनियन  में ऐसी कोई परेशानी नहीं थी| वे वहाँ एक स्त्री के प्रेम में पड़ गये| लोला– उसी यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थी और उसके दो बच्चे भी थे|

सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी कि वे लोला और उसके बच्चों को सोवियत संघ के बाहर ले जाएँ, अलबत्ता वहाँ वे उनके साथ रह सकते थे| पर राहुल भारत वापिस आना चाहते थे|  और वे घबराये हुए भी थे| एक तरह से सोवियत सरकार उनकी अंदुरनी इच्छा ही पूरी कर रही थी – कैसे वे पत्नी और दो बच्चों के साथ भारत जा सकते थे? सबने उनकी निंदा की होती, खासकर बौद्धों ने,”तुम एक भिक्षु हो|” सो एक तरह से वे खुश भी थे कि सोवियत सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी सो अब वह प्रश्न ही खड़ा नहीं हुआ|

वे वापिस आ गये| उन्होंने मुझे बताया,” जब मैं पहले पहले सोवियत संघ पहुंचा मैंने एक छोटे लड़के से पूछा,” क्या तुम ईश्वर में विश्वास रखते हो|” उसने कहा,”ईश्वर! लोग अंधे युगों में उसमें विश्वास किया करते थे| अगर आपको ईश्वर की मूर्ति देखनी हो तो आप म्यूजियम में जा देख सकते हैं|” ”

लेकिन ये सब भी प्रोग्रामिंग है| ऐसा नहीं है कि ऐसे छोटे लड़के जानते हैं कि ईश्वर नहीं है या कि कार्ल  मार्क्स ही जनता था कि ईश्वर नहीं है| केवल ध्यान में गहरे उतरने वाला व्यक्ति ही जां सकता है कि ईश्वर है या नहीं|

आप सब लोग किसी न किसी सांचे में ढाले गये लोग हो| आपकी प्रोग्रामिंग की गई है| और तुम्हारे साथ यह इतने गहरे में किया गया है कि तुम समझने लगे हो कि यह तुम्हारा स्वभाव है| तुम्हारी कल्पनाएं, तुम्हारी आशा, तुम्हारा भविष्य …कुछ भी प्राकृतिक नहीं है|

प्रकृति इस क्षण के सिवाय कुछ नहीं जानती| प्रकृति कुछ नहीं जानती, आशा, इच्छाएं , लालसा| प्रकृति तो आनंद उठाती है उसका जो इस क्षण, अभी और यहीं, उपलब्ध है|

राहुल ने मुझे बताया,” रशियन लोगों के लिए सबसे बड़ी अचरज की बात थी मेरे हाथ|”

मैंने कहा,” आपके हाथ!”

उन्होंने कहा,” हाँ मेरे हाथ! जब भी मैं उनसे हाथ मिलाता, वे तुरंत अपने हाथ खींच लेते और कहते,”तुम जरुर बुजुर्वा हो, तुम्हारे हाथ बताते हैं कि तुमने कभी काम नहीं किया|””

मैंने बौद्ध भिक्षु से कहा,”आप मेरे हाथ का स्पर्श करो| तब आपको पता लगेगा कि आप श्रमजीवी हो और मैं बुजुर्वा| यह आपको बहुत बड़ा दिलासा देगा|”

जून 2, 2013

ओशो : यशपाल (वामपंथी लेखक)

Osho Yashpalमेरे एक कम्यूनिस्ट मित्र थे- वे वास्तव में बड़े बौद्धिक थे| उन्होंने बहुत सारी किताबें लिखीं, सौ के आसपास, और सारी की सारी कम्यूनिस्ट थीम से भरी हुई, पर अपरोक्ष रूप से ही, वे उपन्यासों के माध्यम से यह करते थे|  वे अपने उपन्यासों के माध्यम से कम्यूनिस्म का प्रचार करते थे और इस तरीके से करते कि तुम उपन्यास से प्रभावित होकर कम्यूनिज्म की तरफ मुड जाओ| उनके लिखे उपन्यास प्रथम श्रेणी के हैं, वे बहुत अच्छे रचनात्मक लेखक थे, लेकिन उनके लिखे का अंतिम परिणाम यही होता है कि वे तुम्हे कम्यूनिज्म की तरफ खींच रहे होंगे|

उनका नाम ‘यशपाल’ था| मैंने उनसे कहा,”यशपाल, आप हरेक रिलीजन के खिलाफ हो” – और कम्यूनिज्म हर रिलीजन के खिलाफ है, यह नास्तिक दर्शन है, ” लेकिन जिस तरह आप व्यवहार करते हो और अन्य कम्यूनिस्ट लोग व्यवहार करते हैं वह सीधे-सीधे यही सिद्ध करता है कि कम्यूनिज्म भी एक रिलीजन ही है|”
उन्होंने पूछा,” आपका मतलब क्या है?”

मैंने कहा,” मेरे कहने का तात्पर्य सीधा सा है कि आप भी उतने ही कट्टर हो जितना कि कोई भी मुसलमान, या ईसाई हो सकता है| आपके अपने त्रिदेव हैं : मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन| आपकी अपनी मक्का है – मास्को, आपका अपना काबा है – क्रेमलिन, आपकी अपनी पवित्र किताब है – दस केपिटल, और हालांकि ‘दस केपिटल’ सौ साल पुरानी हो चुकी है पर आप तैयार नहीं हैं उसमे एक भी शब्द का हेरफेर करने के लिए| सौ साल में अर्थशास्त्र पूरी तरह बदल गया है, ‘दस केपिटल’ पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुकी है|”

वे तो लड़ने को तैयार हो गये|

मैंने कहा,” यह लड़ने का प्रश्न नहीं है| यदि आप मुझे मार भे डालते हैं तब भी यह सिद्ध नहीं होगा कि आप सही हैं| वह सीधे सीधे यही सिद्ध करेगा कि मैं सही था और आप मेरे अस्तित्व को सह नहीं पाए| आप मुझे तर्क दें|”

“कम्यूनिज्म के पास कोई तर्क नहीं हैं|”

मैंने उनसे कहा,” आपका पूरा दर्शन एक विचार पर आधारित है कि पूरी मानव जाति एक समान है| यह मनोवैज्ञानिक रूप से गलत है| सारा मनोविज्ञान कहता है कि हरेक व्यक्ति अद्वितीय है| अद्वितीय कैसे एक जैसे हो सकते हैं?”
लेकिन कम्यूनिज्म कट्टर है| उन्होंने मुझसे बात करनी बंद कर दी| उन्होंने मुझे पत्र लिखने बंद कर दिए| मैं मैं उनके शहर लखनऊ से गुजरकर जाया करता था और वे स्टेशन पर मुझसे मिलने आया करते थे, अब उन्होंने स्टेशन पर आकर मिलना बंद कर दिया|

जब उन्होंने मेरे कई पत्रों का जवाब नहीं दिया तो मैंने उनकी पत्नी को पत्र लिखा| वे एक सुलझी और स्नेहमयी महिला थीं| उन्होंने मुझे लिखा,”आप समझ सकते हैं| मुझे आपको यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि वे एक कट्टर व्यक्ति हैं| और आपने उनकी सबसे बड़ी कमजोरी को छू दिया है| यहाँ तक कि मैं भी सचेत रहती हूँ कि कम्यूनिज्म के खिलाफ कुछ न बोलूं| मैं कुछ भी कर सकती हूँ| उनके खिलाफ कुछ भी कह सकती हूँ| पर मुझे कम्यूनिज्म के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि वे यह स्वीकार ही नहीं कर सकते कि कोई कम्यूनिज्म के खिलाफ भी हो सकता है|”
यशपाल ने एक बार मुझसे कहा,” हम सारे संसार को नियंत्रित करने जा रहे हैं|”

मैंने कहा'”आपका लक्ष्य छोटा है, यह पृथ्वी तो बहुत छोटी है| आप मेरे लक्ष्य में क्यों नहीं भागीदार बन जाते?”

उन्होंने पूछा,” आपका लक्ष्य क्या है?”

मैंने कहा,” मेरा लक्ष्य बहुत साधारण है| मैं तो एक साधारण रूचि का व्यक्ति हूँ और बहुत आसानी से संतुष्ट हो जाता हूँ| मैं तो केवल ब्रह्माण्ड को नियंत्रित करने जा रहा हूँ| इतनी छोटी पृथ्वी की क्या चिंता करनी, यह तो ब्रह्माण्ड का एक छोटा सा हिस्सा भर है| इसके बारे में चिंता क्या करनी|”

लेकिन कम्यूनिस्ट इस बात में विश्वास रखते हैं कि वे सारी पृथ्वी को अपने कब्जे में कर लेंगे| आधी पृथ्वी को उन्होंने कर ही लिया है|

उनकी कट्टरता अमेरिका को कट्टर ईसाई बनाएगी| यही अमेरिकियों को एकमात्र विकल्प लगेगा लेकिन उन्हें नहीं पता कि कम्यूनिज्म से बचे रह सकते हैं पर कट्टर ईसाइयत से बचना मुश्किल है|

एक खतरे से बचने के लिए तुम ज्यादा बड़े खतरे में गिर रहे हो|

खुद को और पूरे संसार को कम्यूनिज्म से बचाने का एक उपाय है और अति सरल उपाय है| लोगों को और ज्यादा धनी बना दो| गरीबी को मिट जाने दो| गरीबी मिट जाने के साथ ही कम्यूनिज्म भी मिट जाएगा| 

मई 31, 2013

समाजवाद और साम्यवाद : ओशो (नये समाज की खोज)

oshoसमाजवाद और साम्यवाद

वही फर्क करता हूं मैं जो टी.बी. की पहली स्टेज में और तीसरी स्टेज में होता है, और कोई फर्क नहीं करता हूं। समाजवाद थोड़ा सा फीका साम्यवाद है, वह पहली स्टेज है बीमारी की। और पहली स्टेज पर बीमारी साफ दिखाई नहीं पड़ती इसलिए पकड़ने में आसानी होती है। इसलिए सारी दुनिया में कम्युनिज्म ने सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया है। कम्युनिज्म शब्द बदनाम हो गया है। और कम्युनिज्म ने पिछले पचास सालों में दुनिया में जो किया है, उसके कारण उसका आदर क्षीण हुआ है। पचास वर्षों में कम्युनिज्म की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है। इसलिए अब कम्युनिज्म सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर किया है। अब वह समाजवाद की बात करता है और यह भी कोशिश कर सकता है कि हम समाजवाद से भिन्न हैं। लेकिन समाजवाद और साम्यवाद में कोई बुनियादी भेद नहीं है, सिर्फ शब्द का भेद है। लेकिन शब्द के भेद पड़ने से बहुत फर्क मालूम पड़ने लगते हैं। शब्द को भर बदल दें तो ऐसा लगता है कोई बदलाहट हो गई।

कोई बदलाहट नहीं हो गई है।

समाजवाद हो या साम्यवाद हो, सोशलिज्म हो या कम्युनिज्म हो, एक बात पक्की है कि व्यक्ति की हैसियत को मिटा देना है, व्यक्ति को पोंछ डालना है, व्यक्ति की स्वतंत्रता को  समाप्त कर देना है, संपत्ति का व्यक्तिगत अधिकार छीन लेना है और देश की सारी जीवन-व्यवस्था राज्य के हाथ में केंन्द्रित कर देनी है।

लेकिन हमारे जैसे मुल्क में, जहां कि राज्य निकम्मे से निकम्मा सिद्ध हो रहा है, वहां अगर हमने देश की सारी व्यवस्था राज्य के हाथ में सौंप दी, तो सिवाय देश के और गहरी गरीबी, और गहरी बीमारी में गिरने के कोई उपाय न रह जाएगा।

आज मेरे एक मित्र मुझे एक छोटी सी कहानी सुना रहे थे, वह मुझे बहुत प्रीतिकर लगी। वे मुझे एक कहानी सुना रहे थे कि एक आदमी ने रास्ते से गुजरते वक्त, एक खेत में एक बहुत मस्त और तगड़े बैल को काम करते हुए देखा। वह पानी खींच रहा है और बड़ी शान से दौड़ रहा है। उसकी शान देखने लायक है। और उसकी ताकत, उसका काम भी देखने लायक है। वह जो आदमी गुजर रहा था, बहुत प्रशंसा से भर गया, उसने किसान की बहुत तारीफ की और कहा कि बैल बहुत अदभुत है।

छह महीने बाद वह आदमी फिर वहां से गुजर रहा था, लेकिन बैल अब बहुत धीमे-धीमे चल रहा था। जो आदमी उसे चला रहा था, उससे उसने पूछा कि क्या हुआ? बैल बीमार हो गया? छह महीने पहले मैंने उसे बहुत फुर्ती और ताकत में देखा था! उस आदमी ने कहा कि उसकी फुर्ती और ताकत की खबर सरकार तक पहुंच गयी और बैल को सरकार ने खरीद लिया है। जब से सरकार ने खरीदा है तब से वह धीमा चलने लगा है, पता नहीं सरकारी हो गया है।

छह महीने और बीत जाने के बाद वह आदमी फिर उस जगह से निकला तो देखा कि बैल आराम कर रहा है। वह चलता भी नहीं, उठता भी नहीं, खड़ा भी नहीं होता। तो उसने पूछा कि क्या बैल बिलकुल बीमार पड़ गया, मामला क्या है? तो जो आदमी उसके पास खड़ा था उसने कहा, बीमार नहीं पड़ गया है, इसकी नौकरी कन्फर्म हो गई है, अब यह बिल्कुल पक्का सरकारी हो गया है, अब इसे काम करने की कोई भी जरूरत नहीं रह गई है।

बैल अगर ऐसा करे तब तो ठीक है, आदमी भी सरकार में प्रवेश करते ही ऐसे हो जाते हैं। उसके कारण हैं, क्योंकि व्यक्तिगत लाभ की जहां संभावना समाप्त हो जाती है  और  जहां  व्यक्तिगत लाभ निश्चित हो जाता है, वहां कार्य करने की इनसेंटिव, कार्य करने की प्रेरणा समाप्त हो जाती है। सारे सरकारी दफ्तर, सारा सरकारी कारोबार मक्खियां उड़ाने का कारोबार है। पूरे मुल्क की सरकार नीचे से ऊपर तक आराम से बैठी हुई है। और हम देश के सारे उद्योग भी इनको सौंप दें! ये जो कर रहे हैं, उसमें सिवाय हानि के कुछ भी नहीं होता।

मेरा अपना सुझाव तो यह है कि जो चीजें इनके हाथ में हैं वे भी वापस लौटा लेने योग्य है। अगर हिन्दुस्तान की रेलें हिन्दुस्तान की व्यक्तिगत कंपनियों के हाथ में आ जाएं, तो ज्यादा सुविधाएं देंगी, कम टिकट लेंगी, ज्यादा चलेंगी, ज्यादा आरामदायक होंगी और हानि नहीं होगी, लाभ होगा। जिस-जिस जगह सरकार ने बसें ले लीं अपने हाथ में, वहां बसों में नुकसान लगने लगा। जिस आदमी के पास दो बसें  थीं, वह लखपति हो गया। और सरकार  जिसके पास लाखों बसें हो जाती हैं, वह सिवाय नुकसान के कुछ भी नहीं करती। बहुत आश्चर्यजनक  मामला है!

मैं अभी मध्यप्रदेश में था, तो वहां मध्यप्रदेश ट्रांसपोर्टेशन, बसों की व्यवस्था के जो प्रधान हैं-अब तो वे सब सरकारी हो गई हैं-उन्होंने मुझे कहा कि पिछले वर्ष हमें तेईस लाख रुपये का नुकसान लगा है। उन्हीं बसों से दूसरे लोगों को लाखों रुपये का फायदा होता था, उन्हीं बसों से सरकार को लाखों का नुकसान होता है। लेकिन होगा ही, क्योंकि सरकार को कोई प्रयोजन नहीं है, कोई काम्पिटीशन नहीं है।

दूसरा सुझाव मैं यह भी देना चाहता हूं कि अगर सरकार बहुत ही उत्सुक है धंधे हाथ में लेने को, तो काम्पिटीशन में सीधा मैदान में उतरे और बाजार में उतरे। जो दुकान एक आदमी चला रहा है, ठीक उसके सामने सरकार भी अपनी दुकान चलाए और फिर बाजार में मुकाबला करे। एक कारखाना आदमी चला रहे है, ठीक दूसरा कारखाना खोले और दोनों के साथ समान व्यवहार करे और अपना कारखाना चला कर बताए। तब हमको पता चलेगा कि सरकार क्या कर सकती है।

सरकार कुछ भी नहीं कर सकती है। असल में सरकारी होते ही सारे काम से प्रेरणा विदा हो जाती है और जहां सरकार प्रवेश करती है वहां नुकसान लगने शुरू हो जाते हैं।

समाजवाद और साम्यवाद दोनों ही, जीवन की व्यवस्था को राज्य के हाथों में दे देने का उपाय हैं। जिसे हम आज पूंजीवाद कहते हैं, वह पीपुल्स कैपिटलिज्म है, वह जन-पूंजीवाद है। और जिसे समाजवाद और साम्यवाद कहा जाता है, वह स्टेट कैपिटलिज्म, राज्य-पूंजीवाद है। और कोई फर्क नहीं है। जो चुनाव करना है वह चुनाव यह है कि हम पूंजीवाद व्यक्तियों के हाथ में चाहते हैं कि राज्य के हाथ में चाहते हैं, यह सवाल है। व्यक्तियों के हाथ में पूंजीवाद बंटा हुआ है, डिसेंट्रलाइज्ड है। राज्य के हाथ में पूंजीवाद इकट्ठा हो जाएगा, एक जगह इकट्ठा हो जाएगा।

और ध्यान रहे, बीमारी है अगर पूंजीवाद, तो बंटा हुआ रखना ही अच्छा है। कनसनट्रेटेड बीमारी और खतरनाक हो जाएगी, और कुछ भी नहीं हो सकता।

[नये समाज की खोजओशो]

मई 31, 2013

कम्युनिज्म : ‘सआदत हसन मंटो’ की दृष्टि में

वह अपने घर का तमाम जरूरी सामान एक ट्रक में लदवाकर दूसरे शहर जा रहा था कि रास्ते में लोगों ने उसे रोक लिया|
एक ने ट्रक के सामान पर नज़र डालते हुए कहा,” देखो यार, कितने मजे से अकेला इतना सामान उडाये चला जा रहा है|”
सामान के मालिक ने कहा.”जनाब माल मेरा है|”
दो तीन आदमी हँसे,” हम सब जानते हैं|”
एक आदमी चिल्लाया,” लूट लो! यह अमीर आदमी है, ट्रक लेकर चोरियां करता है|”

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