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मई 9, 2013

यशोदा

तुझे मैं सुला लूंगी

अपनी छाती के कंटीले वन में ,

उलझे बालों को तेरे

संवार दूंगी,

रेगिस्तानों की हवा से

पहना दूंगी तुझे

समुद्र और पूरा आसमान

कहलने को दूंगी तुझे

निर्वासितों को उसाँसें|

चले जायेंगे हम दोनों

एक रोग-शून्य जगह,

जहां बच्चे खेलते होंगे

अस्पताल के खाली कमरों में

जहां मेरा भाग्यफल

अलग होगा और

तेरा भाग्यफल होगाहर रोज बंधा

मेरे आँचल से|

यहाँ तेरी ढूंढाई होती है

आंसुओं और आसक्ति भरी धुंध में,

तू तो बैठा मुस्कुरा रहा है

इतनी बड़ी लहर पर

कोई देख नहीं पाता,

रोते-रोते सूज जाता है मुंह

सभी देखते हैं

केवल गाय के झुण्ड को लौटते

उसके पीछे एक शून्य स्थान|

में तुझे देखती हूँ साफ़-साफ़

आग-सा दीखता है लप-लप

मेरे पागलपन का अति मनोरम स्वप्न

रात भर दिन भर दिखता रहे

तू तो एक नीलकंठ है

बैठा है मैदान के पेड़ पर

कोटि कोटि हैं रूप तेरे,

एक से बढ़कर एक सुंदरता में|

यहाँ के लिए कोई रास्ता-घाट नहीं,

फिर भी मैं कैसे आई यहाँ?

यहाँ पृथ्वी के सारे लोग, सारे पशु-पक्षी

मेरे और तेरे अंदर हैं ,

सारी नदियाँ, पेड़ और पर्वत

बन गये केवल एक नदी, पेड़ पर्वत

विश्राम कर रही हूँ मैं उस पेड़ तले

तुझे चिपकाए अपनी गीली छाती से

गा रही हूँ गीत तेरे लिए,

पर नहीं जानती

वह गीत सुनाई दे रहा है मेरे स्वर से या

मेरे बेटे के स्वर से|

(रमाकांत रथ)

अनुवाद – राधेश्याम मिश्र

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