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मई 7, 2015

तुम्हारे लिए (हिमांशु जोशी) : दुखद प्रेमकथा से लुभाता उपन्यास

tumhare liyeधर्मवीर भारती का उपन्यास – गुनाहों का देवता और हिमांशु जोशी का उपन्यास – तुम्हारे लिए, शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास – देवदास की भांति भावुकता की चाशनी में पगे हुए उपन्यास हैं, जिन्हें भारतीय साहित्य के लेखक और समीक्षक महान साहित्य की श्रेणी में कतई रखने को राजी नहीं होंगे पर ये ऐसे उपन्यास हैं हैं जो अपने रचे जाने के साल से लेकर वर्तमान तक पाठकों को निरंतर लुभाते रहे हैं| और ऐसा नहीं कि किशोर वय में जब पाठक साहित्य में गोते लगाना शुरू ही करता है तभी इन उपन्यासों ने उसे लुभाया हो, बलि साहित्य की सैंकडो किताबें पढ़ चुकने के बाद (अति) भावुकता के आरोपों से घिरे इन उपन्यासों को लोग पढते हैं और इनसे जुड़ाव महसूस करते हैं| भीड़ में इन उपन्यासों को भले ही हल्का कह कर नकार दे साहित्यरसिक परन्तु एकांत में इन उपन्यासों का आनंद वह हमेशा ही लेता रहता है| इनसे पूरी तरह छुटकारा कभी नहीं हो पाता|

जैसे जैसे साहित्य की समझ बढ़ती जाती है, इन उपन्यासों को पढते समय बहुत सारी कमियां स्पष्ट नज़र आती हैं पर तब भी ये उपन्यास ध्यान खींचते हैं| ये उपन्यास गुलशन नंदा और अन्य लेखकों दवारा लिखे जाने वाले कोरी भावुकता के बुनियाद पर रचे जाने वाले सामाजिक उपन्यास नहीं हैं बल्कि ये अच्छे साहित्य के किले में पाठक को प्रवेश दिलवाने वाले द्वार हैं जिनसे नये और पुराने और अनुभवी पाठक साहित्य में प्रवेश करते ही रहते हैं|

मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ऐसा मानना बिल्कुल ही निपट कल्पना नहीं हैं कि शरत चंद्र के उपन्यास देवदास की छाया ने कहीं न कहीं “गुनाहों का देवता” और “तुम्हारे लिए” की रचना प्रक्रिया को प्रभावित किया है|

उत्तराखंड के कुमाऊं के नैनीताल की पृष्ठभूमि में  मनोहर श्याम जोशी के महान उपन्यास “कसप” की भांति “तुम्हारे लिए” का कैनवास विशाल नहीं है बल्कि उसकी तुलना में यह हर लिहाज से एक लघु उपन्यास है| जहां “कसप” कथा और चरित्र चित्रण और मनोवैज्ञानिक स्तर पर गहरा और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करके पाठक को सम्मोहित करके उसे एक परिपूर्ण प्रेमकथा पढ़ने की अनुभूति देता है और दुखद अंत पाठक को अरसे तक हिलाए रखता है, “तुम्हारे लिए”  कथा और चरित्र चित्रण के स्तर पर जितना बताता या दर्शाता नहीं उससे ज्यादा छोडता चलता है पर फिर भी दुख और एक दुखद प्रेमकथा को भांजता यह उपन्यास आकर्षित करता है| उपन्यास की इस बनावट से एक बात का अनुमान लगता है कि जब हिमांशु जोशी ने इसे रचा तब उनके सामने एक महान प्रेमकथा रचने का उद्देश्य नहीं रहा होगा पर लिखते लिखते कुछ ऐसा रचा गया जो अपनी तमाम कमियों के बावजूद पाठकों को लुभाता चला आ रहा है|

चरित्र चित्रण के स्तर पर देखें तो उपन्यास का नायक विराग है, जिसकी जातिगत पहचान के बारे में उसके सहपाठी और मित्र सुहास (जिसे देवदास के चुन्नी बाबू से प्रेरित चरित्र माना जा सकता है) दवारा उसे “विराग शर्मा” पुकारने पर पता चलता है| कुमाऊं के दूर दराज के गाँव में “शर्मा” उपनाम धारण करने वाले और पूरोहिताई करके जीवनयापन करने वाला परिवार पाया जाता होगा या नहीं इस पर सोचा जा सकता है और तर्क किये जा सकते हैं|

उपन्यास की नायिका – अनुमेहा, ड़ा दत्ता की भतीजी है| अब ड़ा. दत्ता और उस नाते अनुमेहा बंगाली है या पंजाबी, इस बात को स्पष्ट रूप से उपन्यास नहीं स्थापित करता, हाँ ड़ा. दत्ता की मृत्यु के बाद उनकी दूसरी पत्नी के अपने माता-पिता के पास चंडीगढ़ चले जाने की बात सुहास विराग को बताता है तो उससे अनुमान भर लगाया जा सकता है कि अनुमेहा एक पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखती है| नायिका का नाम आकर्षक है और इस बात में अतिशयोक्ति नहीं कि पिछली सदी के अस्सी और नब्बे के दशकों में इस उपन्यास को पढ़ने वाले बहुसंख्यक पाठकों ने पहली ही बार इस नाम को जाना होगा| दुखद प्रेमकथा की नायिका का नाम होने के बावजूद नाम में इतना आकर्षण है कि इस उपन्यास को पढकर बहुतों ने अपनी बेटियों के नाम इस नाम पर रखे हों ऐसा भी हुआ होगा क्योंकि पच्चीस- तीस साल से छोटी युवतियों के नाम तो अनुमेहा देखने सुनने को मिल जाते हैं पर चालीस पचास साल की नारी का अनुमेहा नाम बिरला ही सुनने में आया होगा|

गरीबी से त्रस्त विराग, जो बड़ी मुश्किल से नैनीताल में रहकर अध्ययन कर पा रहा है, अपने सहपाठी सुहास की मदद के कारण अनुमेहा को ट्यूशन देने का काम पा जाता है जिसके एवज में उसे २० रूपये प्रति माह मिलने हैं जिससे उसकी आर्थिक परेशानियां बहुत हद तक दूर हो सकती हैं|

अनुमेहा के ड़ा. पिता का देहांत हो चुका है और वह अपने चाचा (जिन्हें वह उपन्यास के काल में भी अंकल ही कहती है) के घर रह कर पढ़ रही है| उसके अपने दुख हैं और गुरु विराग और शिष्या अनुमेहा के दुख कब एक दूसरे का संबल बन जाते हैं, उपन्यास उन घटनाओं का ब्योरा नहीं देता बस शुरू के पृष्ठों में ही सांकेतिक रूप से बताया जाता है कि दोनों की भावनाएं हैं एक दूसरे के प्रति, पर जहां अनुमेहा मुखर है इस बात को स्पष्ट करने में कि उसे विराग की चिंता है, विराग इस बात को मुखरित नहीं गोने देना चाहता| शायद उसकी गरीबी और उसके परिवार की कठिनाइयां उसे प्रेम नामक अनुभव को लेने से रोकती हैं और वह इस बात से ही ग्लानि से भर जाता है कि उसके पिता पेट काट काट कर उसे नैनीताल में रख कर पढ़ा रहे हैं और वह यहाँ प्रेम में फंसा हुआ है| यही एक बात संभव लगती है विराग दवारा अनुमेहा के प्रेम को स्वीकार न कर पाने के पीछे|

विराग-अनुमेहा के प्रेम, जो विराग की मुखर स्वीकृति न मिल पाने के कारण एक निश्चित आकार ग्रहण नहीं कर पाता, और इस लिहाज से अनगढ़ रह कर प्रेमकथा को भी अनगढ़ और बहुत हद तक हवाई ही रहने देते हैं, विराग के गाँव में अपने पिता और भाई के साथ के दृश्य उपन्यास को ठोस धरातल देते हैं और वास्तविकता के करीब लेकर जाते हैं और साहित्य के घेरे में उपन्यास का प्रवेश कराते हैं| एक गरीब ब्राह्मण, जिसने अपने खेत-खलिहान और घर तक इस आशा में गिरवी रखकर बड़े पुत्र की पढ़ाई के ऊपर न्योछावर कर दिए हैं कि पुत्र पढ़ लिखकर कुछ बड़ा काम करेगा, अपनी हर निराशा, सीमितता, कठिनाई, और अपने दुख को शास्त्रों में उपलब्ध श्लोकों और ज्ञान के भरोसे सहन कर लेता है, पर इस किताबी ज्ञान से नैनीताल रहकर आधुनिक जीवन शैली के संपर्क में आ चुके ज्येष्ठ पुत्र को सहारा नहीं मिल सकता| विराग नैनीताल में पिता की परिपाटी से काम नहीं चला  सकता पर संस्कारों के कारण वह आदर्शवाद को छोड़ भी नहीं पाता|

उसकी गरीबी, उसके आदर्शवाद, और उसके संस्कार जब वास्तविक जीवन के कुछ पहलुओं से टकराते हैं तो वह अजीब दुविधा में घिर जाता है| अनुमेहा का प्रेम उसके लिए ऐसा बन गया है जिसे अनुमेहा के सामने वह स्वीकार भी नहीं कर पाता और अपने एकांत में अपने ह्रदय में अनुमेहा के प्रति प्रेम को नकार भी नहीं पाता| प्रेम को प्रदर्शित और स्वीकार न कर पाने की कमी के कारण उसका व्यक्तित्व विकसित हो ही नहीं पाता, और वह कुंठित हो उठता है| अंदर कहीं गहरे में उसे यह आशा हो सकती है कि भले ही वह अनुमेहा से प्रेम को सच रूप में नहीं स्वीकारता पर अनुमेहा उसके लिए ही इंतजार करेगी| वह अनुमेहा से बचता भी है और उससे बंध कर भी रहना चाहता है| सुहास के साथ अनुमेहा को घूमते देख उसकी कुंठा मुखरित हो उठती है और उसे अपने जीवन की विवशताएं विशालकाय लगने लगती हैं| देवदास के अनिर्णय या एक गलत निर्णय लेने की मानसिकता ने उसके जीवन को पछतावे से भरकर गलत मार्ग पर डाल दिया था, और ऐसा ही विराग के साथ भी होता है|

कुछ अरसे के अंतराल के बाद मिलने पर सुहास, विराग को ज्ञान देता है,” मुझे लगता है जीवन में न तो अतिसंयम आवश्यक है, न अतिअसंयम| बुद्ध का संतुलित सम्यक सिद्धांत ही मुझे हर समस्या का एकमात्र समाधान नजर आता है – न विरक्ति, न आसक्ति| यानि…”

पहले भी जब सुहास का साहित्य आदि पढ़ने से कोई नाता न था और वह नितांत शरीर ही था, तब भी विराग अतिसंयम का पालन करता था और बाद में भी बहुत अरसे तक करता रहा|

विराग के स्मृतियों के सहारे फ्लैशबैक में चलता उपन्यास पाठक को गहराई में एक और डूबकी तब लगवाता है, जब बहुत साल बाद विराग और अनुमेहा मिलते हैं और भावनाओं का समुद्र अनुमेहा और विराग को ही नहीं बांधता बल्कि पाठक को भी पुस्तक से बांध लेता है|

चूँकि कोई कहानी या उपन्यास उसमें उपस्थित चरित्रों की कहानी होती है पर कई मर्तबा ऐसी कथाएं सामने आ जाती हैं जिनके चरित्रों के व्यवहार को देखकर पाठक के मन में प्रश्न उठते हैं कि ये चरित्र ऐसा क्यों नहीं कर रहे या कह रहे, क्योब्की यही सही होगा| परन्तु चरित्र अपनी ही तरह के होते हैं, उनका अपना स्वभाव होता है आखिर तभी वे एक कहानी को प्रस्तुत कर पाते हैं| उपन्यास में कई बार ऐसे भाव उठते हैं कि विराग और अनुमेहा ऐसा क्यों नहीं कर लेते जिससे उनके जीवन आसान हो जाएँ| पहले उनमें सुलझेपन का नितांत अभाव दिखाई देता है और पाठक को स्पष्ट दिखाई देता है कि सुलझे दिमाग की अनुपस्थिति उनके जीवन में दुख के मूल कारणों में से एक है|

और जब दोनों जीवन में उस स्थिति में पहुंचकर मिलते हैं जहां उनके मिलन में कोई परेशानी नहीं है और बीते सालों तक जो विराग इस रिश्ते को ठोस आकार देने में नाकाम रहा है, वही प्रस्ताव रखता है,” मान लो, जिससे तुम शादी करना चाहती थीं, वह अब भी तुमसे शादी करना चाहे …|”

तो अनुमेहा इंकार कर देती है,” नहीं नहीं, , मैं स्वयं अब उससे शादी नहीं कर सकती| मैं उसके योग्य नहीं रही…|”

जब पाठक को लगने लगता है कि नितांत अकेले रहे रहे अनुमेहा और विराग जीवन के इस पड़ाव में मिलने पर एक दूसरे को अपने प्रेम का सहारा दे सकते हैं और पाठक को एक आशा घेर लेती है कि अंततः दुख से भरी इस प्रेमकथा में कुछ सुखद अंश भी समा सकते हैं, उपन्यास ऐसी सारी आशाओं को सिरे से समाप्त करके न केवल दोनों चरित्रों को बल्कि पाठकों भी उनके दुख में डुबो देता है|

अनुमेहा से विदा लेते समय कुछ याद करके विराग पूछता है,” अब कब आऊँ?”

रोकर अनुमेहा कहती है,” नहीं – नहीं| अब मत आना| कभी नहीं – कभी भी नहीं| नहीं तो मेरे लिए जीना और भी अधिक दूभर हो जायेगा| समझ लेना अनुमेहा मर गई|”

समय के साथ विराग वास्तविकता के नजदीक आ गया है पर अनुमेहा आद्रश्वाद के ज्यादा नजदीक पौंच गई है| कहते हैं प्रेम दोनों प्रेमियों को बदलता है और अगर उनमें दूरी आ जाये तो प्रेमी प्रेमिका की सोच की भांति बनता जाता है और प्रेमिका प्रेमी के विचारों की भांति सांचे में ढलने लगती है| वैसे भी यह सच है कि किसी भी रिश्ते में दोनों लोग अपने साथी के साथ कम और अपने मन में साथी की मूरत के साथ ज्यादा रहते हैं| अनुमेहा के मन में विराग की एक आदर्शवादी मूरत बसी हुयी है और उससे इतर किसी और खंडित मूरत के साथ रहने को वह राजी नहीं|

सालों के अंतराल के बाद अनुमेहा पुनः विराग के जीवन में आती है, और कुछ घंटों की मुलाक़ात में बीमार अनुमेहा जब विराग को सुहास के दिवंगत हो जाने और मरने से पहले अपनी सारी अर्जित संपत्ति दान कर जाने के बारे में बताती है तो विराग के साथ पाठक भी स्तब्ध रह जाता है| एक बिगडैल सुहास पर विराग के आदर्शवाद और अनुमेहा के प्रति प्रेम का बहुत असर रहा और दोनों के साथ और असर ने उसका जीवन संवार दिया|

इस बार अनुमेहा विराग से विदा लेने आई है तो इस जीवन में अंतिम बार विदा लेने के लिए और सुहास और अपने से जुड़े कुछ कागजात देने|

चलते समय अगली सुबह पालम एयरपोर्ट आने का वचन लेकर अनुमेहा विराग को ढांढस बंधाते हुए कहती है,”सुनो, दुखी न होना| पता नहीं, हमारा यह किस जन्म का कैसा बैर था, जो…जो…|”

और अनुमेहा फूट-फूटकर रोने लगती है, पाठक को भ्रमित छोड़कर कि क्यों दोनों चरित्र इतने दुख को पाले रहते हैं जबकि थोड़ा सा प्रंबधन उनके जीवन को सामान्य ढर्रे पर ला सकता था|

पर यही इस उपन्यास की विशेषता है| विराग-अनुमेहा के सहारे दुख का प्रदर्शन ही उपन्यास को बार बार पढ़ने की ओर आकर्षित करता है और पाठक सालों के अंतराल के बाद इस उपन्यास को फिर से उठा लेते हैं|

दुख को ऐसे भांजा गया है कि पाठक दोराहे पर खड़ा रहता है, कि इस दुख से सीधा मुकाबला अच्छा या इससे दूर जाने में ही भलाई है|

विराग ने ऐसे दोराहों पर हमेशा अनुमेहा से दूर जाने का रास्ता चुना और बाद में अनुमेहा ने भी यही राह चुनी|

पालम पर भी विराग के पहुँचने से पहले ही अनुमेहा का विमान टेक-ऑफ कर जाता है और बीती रात की मुलाक़ात उनके जीवन की अंतिम मुलाक़ात बन जाती है| विराग-अनुमेहा के मध्य फिर से अधूरापन रह जाता है|

उपन्यास का अंतिम पृष्ठ कहानी को समाप्त नहीं करता बाकि बिरले ऐसे पाठक होंगे जो अंतिम पृष्ठ को पढकर उत्पन्न हुए दुख में डूबकर पुस्तक के पहले अध्याय पर पुनः लौट कर न आए होंगे, बहुत सी बातें छोड़ छोड़ कर पाठक को कहानी सुनाती पुस्तक को पूरा ग्रहण करने के लिए|

ऐसा ही वर्तुल इस कहानी के साथ बना रहता है| यह पुनः पुनः लौट कर आती है जीवन में|

…[राकेश]

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