Posts tagged ‘Gazal’

सितम्बर 13, 2013

आओ हम तुम चन्दा देखें

Moon

लहरों के इन हिचकोलों पर

आज नाव में संग बैठकर

साथी हसीं रात में गाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

नर्म हथेली को सहलाएं

भावों में शबनम पिघलाएं

जल में अपने पाँव हिलाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

धडकन जब लहरों पर धडके

अधरों पर बिजली सी तड़के

कोई भारी कसम उठाते

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

चन्दन के पेड़ों से लिपटकर

खुशबू के घेरे में सिमटकर

करते कभी महकती बातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

देखो रात जा रही है घर से

कोई गज़ल गा रही स्वर से

दामन में ले सुर-सौगातें

आओ हम तुम चन्दा देखें

आओ हम तुम चन्दा देखें …

{कृष्ण बिहारी}

मार्च 17, 2011

ज़िंदगी फकत एक लहर लम्हों की (रफत आलम)

कौन रोया किसकी आँख पानी हुई
दीवाना मर गया खत्म कहानी हुई

जिंदगी क्या थी वक्त के समंदर में
एक लहर लम्हों की आनी जानी हुई

अपने आप झुकने लगे बाप के कंधे
घर में बिटिया जब कोई सयानी हुई

ईमानदारी का सबक सुन के बाप से
आज के बच्चों को बहुत हैरानी हुई

रसूख का पैमाना है घूस या घोटाला
चोरी हुई साहब ये के हुक्मरानी हुई

बेगुनाह प्यार को बेसबूत जला दिया
झुकने नहीं दी गाँव ने मूँछ तानी हुई

मज़हब कई थे पर मज़हबी कोई नहीं
बंदगी हुई हमसे या जाने शैतानी हुई

अहसास के आंसू हैं ये अर्थहीन शब्द
आलम हमसे कब गज़ल-ख्वानी हुई

(रफत आलम)

मार्च 15, 2011

मीर-ओ-ग़ालिब की गज़ल का सहारा

मौत की तलाश जीने का हौसला देने लगी
जिंदगी मुस्कुरा कर फिर से सजा देने लगी

लंबा था दर्द का सफर आँखों के सूखने तक
चोट पुरानी हो कर और भी मज़ा देने लगी

सुबह का भूला लुटपिट के घर को लौटा था
गिरती दीवार ही काम आई सहारा देने लगी

चौराहे पे थक कर बैठ गए जाते किधर हम
और लोगों को मंजिल खुद रास्ता देने लगी

आँखों में झिलमिलाने लगे मजारों के चिराग
सफर की थकन मंजिल का पता देने लगी

बिक गयी थी ये भी तेरे मीठे होटों की तरह
खाली एक बोतल प्यास का अंदाजा देने लगी

अहसास की रग-रग में ज़हर घोलने के बाद
जिए जाने का सबक हमें दुनिया देने लगी

नेता चालीसा बांचने वाले पुरोहितों के साथ
बस्ती! माटी के खुदाओं को सजदा देने लगी

रूठी हुई नींद पल दो पल ही आई थी पास
टीस दिल की मुझे सपने में सदा देने लगी

तन्हाई का अहसास अब नहीं होता आलम
मीर-ओ-ग़ालिब की गज़ल साथ मेरा देने लगी

(रफत आलम)

मार्च 15, 2011

बस आदमी मिलता नहीं…

विश्वास फरेब का नाम है बुजुर्गों ने कहा है
बता तो सही यार आस्तीन के पीछे क्या है

न शिकायत है किसी से न लबों पे गिला है
हम फकीरों के दिल में सबके लिए दुआ है

आज तो सारा माहौल ही कालिख से पुता है
आप अपना दामन बचाइए आपको क्या है

ज़ख्मो को खुला रख के घर से निकलता हूँ
मुझे मालूम है नमक भरने को दिन खड़ा है

तुम्हारा वादा-ए-मुहब्बत ज़बानी था और रहा
हमारा हर्फे वफ़ा दिल के वरक पे लिखा है

वक्त का उधार न चुका साँसों की पूंजी से
आदमी ने आखिर जीवन भी सूद में दिया है

बसे देखे दुनिया में सातों जातें चारों मज़हब
नहीं मिला तो बस आदमी ही नहीं मिला है

मैंने तो तेरी रहबरी का भरम रखा है आलम
ये रास्ता मंजिल को नहीं जाता मुझे पता है

(रफत आलम)

मार्च 13, 2011

लौट कर न आने वाले…

खुशबु किसी की आई  थी तारों के पार से
चांदनी लिपट के रोई बहुत मौसम-ए-बहार से

नज़दीक ज्यादा है वो महलों की मीनार से
आसमान पसीजता नहीं गरीब की पुकार से

उसका मामला तो है सितारों के भी पार से
दीवाना लिपट के हंस रहा है सूली-ओ-दार से

क्या सोच कर दीवाने ने किया गरेबाँ चाक
लहू के कतरे टपक रहे हैं दामन के तार से

वफ़ा करने का खूब इनाम दिया चमन को
सौगात में चंद खार मिले जाती हुई बहार से

तेरे साथ माटी मिला आया था दिल को मैं
जिंदगी फिर नहीं लौटी मौत की रहगुज़ार से

तने से लिपटी लता को हसरत से देखने वाले
लम्हा कोई लौटा क्या वक्त के खूनी गार से

पाक रिश्ते रूह के जिस्मों की भूख खा गयी
लोग खरीद लाये आलम प्यार भी बाज़ार से

(रफत आलम)

मार्च 11, 2011

मंहगाई डायन …

ईंट महंगी पत्थर महंगे हुए
माटी सोना हुई घर महंगे हुए

माहौल लहुलुहान हमने देखा
पत्थर महंगे न सर महंगे हुए

ख़ुदकुशी तरसती देखी बेचारी
मौत सस्ती ज़हर महंगे हुए

गाँव सब के सब बिके हमारे
लोग कहते हैं शहर महंगे हुए

दूरी ज़रूर कम की साधनों ने
जाइए कहाँ सफर महंगे हुए

‘चीनी’ फरेब का बोलबाला है
दस्तकार सस्ते हुनर महंगे हुए

आलम जी हीरे ठोकरों में रहे
तुम हो क्या मगर महंगे हुए

(रफत आलम)

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मार्च 9, 2011

आवारा पत्ता

 

दोस्त बनकर कोई गले से लगाए मुझे
अरसा हो गया है ताज़ा ज़ख्म खाए मुझे

शाख से टूट गया आवारा एक पत्ता हूँ
उडा जाता हूँ जिधर हवा ले जाए मुझे

ज़ख्मों ने जब भी माँगा दर्द का हिसाब
पुराने कुछ दोस्त बहुत याद आये मुझे

इस दौर में जन्मों के रिश्ते खोजता हूँ
दुनियादारी ज़रा तो वक्त सिखाये मुझे

मेरी किस्मत को दोस्ती रास नहीं आती
कोई दोस्त हो जो के दुश्मन बनाए मुझे

दोस्त बेरुखी की शिकायत लेके आये हैं
कोई जानता हो तो दोस्ती सिखाये मुझे

नज़र से गिरा हूँ तो खाक में जा मिलूँ
उससे कहना आंसू की तरह बहाए मुझे

उसकी याद को शिकवा हो मुझसे कभी
जिंदगी ऐसा दिन न कभी दिखाए मुझे

रास आये आलम न महफ़िल न वीराने
देखिये तकदीर अब कहाँ ले जाए मुझे

(रफत आलम)

फ़रवरी 22, 2011

नहीं रहा…

एक ज़ख्म हरा था नहीं रहा
दर्द खुद मसीहा था नहीं रहा

दिल का रिश्ता था नहीं रहा
वह दोस्त मेरा था नहीं रहा

जम गया दर्द सूनी आंखों में
पानी का झरना था नहीं रहा

कोई भी अब याद नहीं आता
मुझे अपना पता था नहीं रहा

अपनों का सलूक क्या कहिये
ज़माने से गिला था नहीं रहा

अमीर खुद है वक्त का खुदा
गरीब का खुदा था नहीं रहा

लोग आज कुरान बेच खाते हैं
ईमान कभी जिंदा था नहीं रहा

काला धंधा काली हकीकत है
रोज़गार सपना था नहीं रहा

डूबती कश्ती में ठहरता कौन
नाखुदा से गिला था नहीं रहा

गम की लौ में जलबुझा दिल
मोम का टुकड़ा था नहीं रहा

रोती होंगी सन्नाटों भरी राहें
आलम आवारा था नहीं रहा

(रफत आलम)

फ़रवरी 19, 2011

जानी दुश्मन भी बने हैं माँ के जने

तम में उजाले की दुआ करते हैं यारो
बुझे दीपकों के भी कुछ सपने हैं यारो

दीखत में लिबास बहुत उजले हैं यारो
बदन कोयले की दलाली करते हैं यारो

दिन ने ज़रूर कहीं आग पिलाई होगी
शोले रात भर आँखों से बरसे हैं यारो

यकीन और भरम में फर्क थोडा सा है
वो मेरे कब हुए जो मेरे अपने हैं यारो

संबंधों में गिरावट की अति तो देखो
जानी दुश्मन बने माँ के जने हैं यारो

बर्तनो की खनक से घर कहाँ उजड़ता
भाई तो रसोइयां भी तोड़ चले हैं यारो

दिन वो भी थे जो खुशबू जो जैसे उड़ गये
दिन ये भी हैं के पहाड लगते हैं यारो

सोचो तो प्यास में भी तृप्ति है वरना
मयकदे पीकर भी लोग तरसते हैं यारो

बहुत आसान हो गया है उसको भुलाना
हम अपने आपको ही भूल गये हैं यारो

जितने ज़र्फदार थे कब के सब मर गए
बचे हैं आलम साब बहुत नकटे हैं यारो

(रफत आलम)

फ़रवरी 4, 2011

दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते हैं (रफत आलम)

खुश्बुओं के सिलसिले हवाओं से मिलते ज़रूर हैं
वो वीराने में लगे हों तो भी फूल खिलते ज़रूर हैं

रात का दिन के साथ निबाह नामुमकिन है मगर
कोई एक मुकाम है जहाँ पर दोनों मिलते ज़रूर हैं

चोटों के निशान तो मर कर ही जाते हैं ऎ दोस्त
वक्त के धागे से ज़ख्मों के मुँह सिलते ज़रूर हैं

मुस्कान के पीछे छिपी पीड़ा की बात यूँ समझिये
काँटों की नोंक पर दीख्त में फूल खिलते ज़रूर हैं

सम्बंध वही मारते हैं जिन पर विश्वास हो बहुत
दिल छेदने से पहले दोस्त गले मिलते ज़रूर हैं

चमन की सुहानी उड़ानों का जब आता है ख़याल
पिंजरे के तारों से परों के ज़ख्म सिलते ज़रूर हैं

महफिलों की रौनक हैं बनावटी गुलदस्ते आलम
खुशबू दे नहीं सकते तो भी ये खिलते ज़रूर हैं

(रफत आलम)

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