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मई 13, 2013

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं

हाँ वे मुसलमान थे

हम जैसे इंसान थे

लेकिन उनके सीनों में कुरआन था

और हाथों में तलवार

यकीनन वे पुकारते होंगे

हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!

हिंद के वासियों को

वे हिन्दू ही कह सकते थे|

और हिंद के वासी

यानी बड़े नाम वाली नामवर जाति

बाएं बाजू की ताकत से बेखबर

दायें हाथ में तराजू लिए

अपना नफ़ा नुकसान तोल रही थी|

निम्न, अछूत, अनार्य इंधन पर

खौल रहा था

ब्राह्मणवाद का कढ़ाहा

और तली जा रही थीं

सत्ता और सुविधा की पूडियां |

पूडियां खाने के शौकीन

ब्राह्मण

उन्हें मलेच्छ कह सकते थे

पूडियां खाने का शौक और बनाने का फन

उन्हें निर्यात नहीं हुआ था

लेकिन

उनके दिलों में सफाई थी

वे ईमान की ताजगी लेकर निकले थे

तभी तो

दश्त क्या चीज है

दरिया भी उन्होंने नहीं छोड़े

जहां चाहा उतार दिए अपने घोड़े

हमलावर तो हमलावर होते हैं

घर लूटा और चलते बने

जैसे अंग्रेज आए और निकल भागे

वे कैसे हमलावर थे?

लूटने आए और लुटने वालों के होकर रह गये

सिर्फ तलवार के नहीं

वे विचार के धनी भी थे

जैसे ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती

हाँ! वे मुसलमान थे

ठीक कहते हो

वे आसमान से नहीं उतरे थे

लेकिन आसमानी धूप लेकर आए थे

वे मसावात-मसावात चिल्लाते आए थे

नया इन्कलाब लाए थे

वे यकीनन यहीं कहीं दूर से आए थे

और आर्यों की तरह आए थे

फर्क बस इतना था

आर्यों ने खदेड़ा था अनार्यों को

विंध्याचल के उस पार तक

जो शेष रह गये थे वे सेवक बनाए गए

अर्थात भंगी, चमार, नाई, धोबी, वगैरह-वगैरह

लेकिन वे मुसलमान थे

अहले-कुरआन थे

उन्होंने मुसलमान बनाए

अपनी इबादतगाहों में ले आए|

भंगी जब सैयद के साथ मस्जिद में बैठा होगा

ज़रा सोचकर देखो कि क्या सोचा होगा?

तुम कहते हो कि वे मुसलमान थे

वे दरहकीकत मुसलमान हैं

इतिहास के गलियारों में,

अतीत के बाजारों में,

ताकने-झाँकने से फायदा?

वे मुसलमान हैं

और हमारी तरह वर्तमान हैं

वे समस्याग्रस्त इंसान हैं

उन्हें अतीत में जीवित रखने की ख्वाहिश

जख्मों पर नमक लगाकर जगाने की काविश

जागृति नहीं खून के आंसू लाएगी

नंगे सच को

लफ्जों का लिबास देने से क्या होगा

सच को सच की तरह सुना जाए

तो सुनो-

मुसलमान न होते तो

कबीलों, वर्णों, तबकों, और जातियों के जंगल में

घृणावाद की आग लगी होती

जंगल जल चुका होता

फिर आरक्षण की धूप में किसे सेकते

आरक्षण का विरोध कौन करता

जनतंत्र की मैना कहाँ चहचहाती

समता, संतुलन, समाज सुधार शब्दकोश में धरे रहते

ईंट-पत्थर की इमारत कोई भी बना सकता है

शहर बसते ही रहते हैं

वे न होते तो बहुत कुछ न होता

या कुछ न कुछ होता

वे हैं तो दिक्कत क्या है?

वे मुसलमान हैं

वे रथ या घोड़े पर सवार आतंक नहीं हैं

वे राम से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

राम नाम के सौदागरों से

वे मार्क्स से नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

मार्क्स के नाफहम अनुयायियों से

वे वाकई नहीं डरते

लेकिन डरते हैं

हुक्मे-इलाही में मिलावट करने वाले मुल्लाओं से

वे तैरना जानते हैं लेकिन

नदी किनारे बैठने को विवश हैं

उनके सिर्फ रिश्तेदार पाकिस्तान में हैं

आडवाणी जैसों को टटोलिए

जन्मभूमि का महत्व क्या है

अयोध्या से अधिक वे कराची में जीते हैं

हाँ! वे मुसलमान हैं

दो सौ बरस तक अंग्रेजों से लड़ते रहे

उन्होंने पाकिस्तान बनाया

वे पाकिस्तान के खिलाफ जंग में शहीद हुए

वे मुसलमान हैं

उनके पुरखों की हड्डियां दफ़न हैं यहीं

वे कहीं से नहीं आए

वे कहीं नहीं गए

वे कहीं नहीं जायेंगे

वे पाकिस्तान समेत फिर आयेंगे

क्योंकि वे मुसलमान हैं

वे अहले-हिन्दुस्तान हैं |

(चन्द्रभान ‘खयाल’)

जनवरी 13, 2011

अछूत

कुंवर,

अछूत बने बिना कैसे समझोगे? खुद पर जब तक न बीते कोई मानव, पीड़ा समझता ही नहीं। अब बन जाओगे तो खुद ही समझ जाओगे। पीढ़ियों से चली आ रही बीमारी को तुम ही खत्म करोगे। मेरे द्वारा ही तुम्हारा तर्पण होना था। आज मैं तुम्हे मुक्त्ति देती हूँ। अब तुम ज्यादा लम्बे समय तक ऐसी शापित ज़िंदगी नहीं जियोगे।

कैसे?

शीघ्र ही तुम्हे पता चल जायेगा!

तुम्हारे लिये मैं अछूत बिरादरी की  एक कड़ी मात्र ही रही। मेरी बिरादरी के साये से भी तुम्हारी बिरादरी के लोग घृणा करते रहे हैं और तुम भी बहुत अलग नहीं थे उन सबसे।

मेरी माँ, उससे पहले उसकी माँ और उससे पहले उसकी माँ और उससे भी पहले उसकी माँ ने यही सब सहा होगा। जाने कितनी सदियों से यही सब चलता आ रहा है। इन अछूत औरतों के बेटों, भाइयों, और पतियों को तुमने और तुम्हारे पूर्वजों ने घृणा दी पर तुम लोगों की देह के लालच ने इन औरतों को सदा भोगा। बिस्तर में तुम्हे ये औरतें अछूत न लगीं कभी भी?

मेरी देह की बहुत चाह रही है तुम्हे। दिन में कभी भी खेतों पर न जाने वाले तुम राजकुंवर कैसे रात को ट्यूबवैल पर सोने आ जाते थे ताकि सुबह होने से कुछ पहले ही मुझे अपनी अंकशायिनी बना सकने का आनंद ले सको। याद है तुम्हे पहली बार तुमने मेरे साथ जबरदस्ती की थी।

आठवीं तक तो तुम मेरे साथ ही पढ़े थे, कैसे तुम ऐसा कर सके?

मैं कमजोर नारी कैसे तुम्हारा मुकाबला करती?

तब से सालों साल तुमने और तुम्हारे शक्त्तिशाली भाई-बंधुओं ने मेरी देह को ही नहीं भोगा है बल्कि मेरी आत्मा को भी कुचला है।  कमजोर औरतों को तुम शक्त्तिशाली लोग वेश्या बना डालते हो।

तुम्हे तो गुमान भी न होगा कि मेरी देह ने तुम्हे अंतिम सुख दे दिया है।

ऐसा कैसे?

चिंता न करो सरकार तुम्हे जल्दी ही पता चल जायेगा!

तुम्हे याद होगा कुछ समय पहले मैं इक्कीस दिनों के लिये गायब हो गयी थी। उन इक्कीस दिनों ने मेरी ज़िंदगी ही बदल दी। उन्ही दिनों किसी क्षण चेतना ने मेरे अंदर अँगड़ाई लेनी शुरु की थी। इस चेतना के जगते ही एक मकसद मिल गया जीवन में। पर इस चेतना से पहले एक ऐसे सत्य का सामना करना पड़ा जिसने मुझे पूरा हिला दिया था। सत्य जानते ही पहले तो मेरे सामने अंधेरा छा गया था पर बाद में इसी सत्य ने मुझे शक्त्ति भी दी।

वैसे भी मेरा जीवन था ही क्या ऐसे समाज में जहाँ छुआछूत ने लाखों लोगों का जीवन नर्क बना रखा है?

एक तरफ मैं एक अछूत बिरादरी की महिला थी और दूसरी तरफ महिला होने के नाते तुम लोगों ने मुझे वेश्या सरीखा जीवन जीने के लिये विवश कर रखा था। ऐसा जीवन जीता मनुष्य अपनी आयु न भी पूरी कर पाये तो क्या है?

खैर मैं वापिस आयी और पिछले एक माह में हर रात तुमने मेरे साथ ही गुजारी है।

सच जानने के बाद तुम्हे लगेगा कि मैंने तुम्हे ही क्यों छांटा?

कुछ तो संयोग और कुछ मुझे तुम्हारे अंदर और शोषकों से ज्यादा संभावनायें दिखायीं दीं। तुम कवितायें लिखते हो। मुझे लगा कि तुम्हारे अंदर परिवर्तन आ सकता है। बाकी तो आदमी के रुप में हिंसक जानवर सरीखे ही हैं।

मेरे पास ज्यादा वक्त्त नहीं है। तुम्हारे पास भी नहीं रह पायेगा पर जितना भी समय तुम्हे मिल पाये, कोशिश करना कि समाज से छुआछुत की बीमारी को खत्म करने की दिशा में कुछ काम कर सको।

तुम क्यों ऐसा करोगे? यही प्रश्न तुम्हे खा रहा होगा। पर तुम्हे ऐसा करना पडेगा क्योंकि तुम्हारे दोगले, लुके छिपे समाज में तुम्हे भी शीघ्र ही एक अछूत का दर्जा मिलने वाला है। जो लोग आज तुम्हारे साथ उठते बैठते हैं वही लोग तुम्हारे साये से भी दूर भागेंगे। तुम्हे दूर से गालियाँ दी जायेंगीं। तुम्हारे जैसा ही जीवन जी रहे लोग भी तुम्हे गालियाँ देंगे, कोसेंगे। शायद तुम्हारा परिवार भी तुम्हे छोड़ दे।

इन सब मानसिक प्रताड़नाओं से गुजर कर शायद तुम अछूतों की पीड़ा को समझ पाओ। कवि कहते हो अपने को पर कविता का मर्म तुम तभी समझ पाओगे। कुछ करना अछूत समस्या के लिये। तुम्हे एक मौका मिलेगा जीवन में कुछ खूबसूरती लाने का। आशा है इस मौके को गंवाओगे नहीं।

कुंवर साहब, तुम मुझे गालियाँ दे रहे होगे कि मैं ये क्या आयें-बायें बक रही हूँ पर मैंने जो कुछ भी लिखा है उसका एक एक शब्द सच्चा है।

तुम्हे ज्यादा रहस्य में नहीं रखूँगी। डाक्टर ने उस दिन मुझे बताया कि मुझे जानलेवा बीमारी एडस हो गयी है और मेरे पास मुश्किल से एक-दो साल ही बाकी हैं तो मैं गश खाकर गिर पड़ी थी पर मज़े की बात देखो इस बीमारी के सत्य ने मेरी आत्मा को उठा दिया।

मेरी देह को पाकर तुमने अपनी देह को मेरी देह जैसा ही बना लिया है। आज तुम्हे इस बात का पता नहीं है पर देर सबेर तुम्हे इस बात की जानकारी हो ही जायेगी। मुझे कोसने से कुछ नहीं होगा। अछूत समस्या पर मैंने जो लिखा उस पर सोचने की कोशिश करो शायद तुम्हारे नाकारा जीवन को उद्देश्य मिल जाये।

जब सारे बाहरी और अंदर के द्वंदों से गुज़र कर तुम्हारा मानस शांत और शुद्ध हो जायेगा तब शायद तुम मुझे अपना गुरु मानो।

मैंने तुम्हारी देह को मुक्त्ति देने की प्रक्रिया शुरु कर दी है, अपनी आत्मा की मुक्त्ति की कोशिश तुम्हे खुद ही करनी है।

आम्रपाली
11 दिसम्बर 1993

 

…[राकेश]

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