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दिसम्बर 23, 2013

शीशे से पत्थर तोड़ते ‘अरविन्द केजरीवाल’ और ‘आप’

arvind kejriwal-001पत्थर से शीशा तोडना तो रोजमर्रा की बात है, पर बात तो तभी जमती है जब कोई शीशे से पत्थर को तोड़कर उसे तराश कर दिखाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ और उनके दल ‘आप‘ ने विगत में यह करिश्मा करके दिखाया जब उन्होंने पारदर्शी तरीके से चन्दा जुटाया और 20 करोड़ रुपयों में 70 सीटों पर चुनाव लड़कर 28 सीटें जीतीं, जबकि ऐसा कहा जाता है कि जमे जमाये दल एक विधायक की सीट के लिए भी करोड़ो रूपये खर्च कर देते हैं और यह तो सर्वविदित है ही कि पिछले साढ़े छः दशकों में किसी भी दल ने कभी भी अपने को मिले धन के बारे में पारदर्शिता नहीं दिखाई और कोई नहीं जानता कहाँ से उन्हें सैंकडों करोड़ रूपये मिलते रहे हैं| ‘आप‘ ने भारतीय राजनीति को स्वच्छ बनाने की ओर एक कदम उठा दिया है और अब जनता के हाथ में है कि वह बाकी दलों को भी मजबूर करे कि वे अपने आर्थिक स्रोतों का खुलासा करें और अपनी चन्दा व्यवस्था को पारदर्शी बनाएँ| वरना तो सभी को पता है कि जो धन कुबेर उन्हें करोड़ों दे रहे हैं वे उन्हें मुफ्त में धन नहीं देते रहे और उनकी अपेक्षायें चुनाव में जीतने के बाद उनकी आर्थिक कृपादृष्टि से लाभ पाए दल पूरा करते रहे होंगे| यह विशुद्ध लेन देन वाला व्यापार रहा है| इसी लेन देन की भारतीय राजनीतिक अर्थशास्त्र की प्रक्रिया ने भारत की तरक्की को असमानता वाला बनाया है क्योंकि धन कुबेरों ने कोई धर्मखाता तो खोल नहीं रखा है| राजनीतिक दलों ने ऐसे ही निर्णय लिए होंगे जिससे धन का लाभ लेने वाले दल उन्ही प्रोजेक्टों को पास करते रहे हैं जिससे उन्हें धन देने वाले कुबेरों का लाभ होता रहे| काले धन की बुनियाद पर खड़ी राजनीतिक व्यवस्था ने भारतीय समाज को आकंठ भ्रष्टाचार के दलदल में धकेल दिया है|

दूसरी बार पत्थर को शीशे से ‘आप‘ ने तोड़ा जब उसने यह सिद्ध करके दिखा दिया कि बड़े दलों की जातीय, साम्प्रदायिक और तमाम तरह के भेदों वाली राजनीति से परे जाकर चुनाव लड़ा और जीता जा सकता है| ‘आप‘ के उम्मीदवारों की न मतदाताओं ने जाति देखी, न क्षेत्रीयता और न ही उनका संप्रदाय|

तीसरी बार शीशे से पत्थर को तोड़ने और तराशने का काम ‘आप‘ ने तब किया जब भाजपा और कांग्रेस ने जाल बिछाकर ‘आप‘ को बदनाम करना चाहा कि वे लोगों से झूठे वादे करके चुनाव में इतनी सीटें जीते हैं और अब सरकार न बना कर अपनी खाल बचाना चाहते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वे अपने वादे पूरे नहीं कर पायेंगे|

कर्मठ और ईमानदार आदमी अगर बुद्धिमान भी हो तो भविष्य में बसे संभावित परिणामों में से सबसे बेहतर को हाथ बढ़ा अपने लिए पकड़ लेता है| ताजे दिमाग की भांति ‘आप‘ ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को बैकफुट पर भेज दिया सरकार बनाने के लिए दिल्ली की जनता की राय जानने के लिए लोगों से दुबारा समपर्क स्थापित करके| यह बुद्धिमत्ता भरा पूर्ण कदम था जिसने कांग्रेस को थोड़ा कम (क्योंकि उसकी तो केवल आठ ही  सीटें आयी हैं), पर भाजपा को बौखलाहट के स्तर तक दहका दिया और कल तक ‘आप’ को रोज चुनौती दे रही भाजपा के सुर ही बदल गये| वे सीधे सीधे ‘आप‘ पर किस्म किस्म के उलजलूल आरोप मढने लगे|

अब जबकि यह तय हो गया है कि ‘अरविन्द केजरीवालदिल्ली के अगले मुख्यमंत्री बन रहे हैं, भाजपा के नीचे से राजनीतिक जमीन खिसक गयी है| उसकी सरकार किसी भी हालत में नहीं बन पा रही थी| ‘आप‘ द्वारा रचे गये नैतिक माहौल के कारण वह ‘आप‘ के नवनिर्वाचित विधायकों को तोड़ने का प्रयास करती भी नहीं दिखना चाहती थी और कांग्रेस और ‘आप’ दोनों में से कोई भी दल उसे समर्थन दे नहीं सकता था| उसकी हालत देख पुरानी कहावत “खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे” चिरतार्थ होती दिखाई दे रही है| भाजपा के नेता ‘आप‘ के बारे में केवल तीन चार दिन पहले दिए गये बयानों से उलट वाणी बोल उस पर आक्रमण कर रहे हैं|

यह ‘आप‘ की राजनीति की ही सूक्ष्म कला है कि ‘आप‘ एकदम स्पष्ट शब्दों में बोल रही है कि उसने कांग्रेस से समर्थन नहीं लिया है और कांग्रेस उसकी  या वह कांग्रेस की सहायक पार्टी नहीं है| वह अपनी 28 सीटों के बलबूते सरकार बनाने जा रही है और बिलकुल मुमकिन है कि विधानसभा में पहले ही दिन ‘आप‘ की सरकार विश्वास मत हासिल न कर पाए| वैसे ऐसा लगता नहीं है कि समर्थन की घोषणा करके कांग्रेस पहले ही दिन सरकार गिराने की बदनामी अपने सिर लेना चाहेगी| पूंजीपतियों की नीतियों के हितों की परवाह कर करके कांग्रेस और भाजपा को इस बात की उत्सुकता भी है कैसे ‘आप‘ उन वादों को पूरा कर सकती है जो उसने अपने 70 घोषणापत्रों में किये थे|

सरकार बनाने के बाद ‘आप‘ का अगला कारनामा होगा दिल्ली में बिजली की दरों के मामले में दिल्ली वासियों को बड़ी राहत देना| ‘आप‘ ने भली भांति अध्ययन करके ही इतनी बड़ी घोषणा की है और इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए आगामी दिनों में दिल्लीवासियों को बिजली के मामले में एक बड़ी राहत मिलने वाली है और देश में पहली बार कोई ऐसा मुख्यमंत्री सत्ताधीन होगा जो केवल मुनाफे के लिए जोड़तोड़ करने वाली कंपनियों की हाँ में हाँ नहीं मिलाएगा| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ के लिए ऐसा कर पाना मुमकिन होगा क्योंकि उन्होंने किसी कम्पनी से धन लेकर चुनाव नहीं लड़ा है और उन पर किसी किस्म का दबाव नहीं है कि वे जनता के हितों को कंपनियों के आलीशान दफ्तरों में गिरवी रख दें|

रोजाना ‘700 लीटर‘ पानी इस्तेमाल करने वाले परिवार को ‘जलमित्र‘ घोषित करना निस्संदेह बेहद बुद्धिमानी का कदम होगा| 701 और उससे ऊपर पानी की मात्रा इस्तेमाल करने वाले परिवार पूरे पानी का धन देंगे और जब वे देखेंगे कि उनसे केवल 1-2 लीटर काम पानी इस्तेमाल करने वाला परिवार मुफ्त में पानी का उपयोग कर पा रहा है तो उसमें अपने आप चेतना आयेगी कि वह भी 700 लीटर पानी में ही गुजारा करे| शुरू में इस कदम के आलोचक इसका अर्थ भले ही न समझ पायें पर अगर यह योजना चल निकली तो एक साल के आंकडें जल सरंक्षण और जल वितरण की दिशा में काम करने वाले लोगों के लिए आँखें खोलने वाले सिद्ध हो सकते हैं| जो छोटे परिवार रोजाना 300-400 लीटर पानी से ही गुजारा करते रहे हैं वे इस योजना के सीधे लाभार्थी होंगे| यहाँ यह जिक्र करना निरर्थक न होगा कि भाजपा और कांग्रेस, जिन्होने ‘आप‘ का घोषणापत्र गहराई से पढ़ने की जहमत नहीं उठाई है और सतही तौर पर पढ़ कर इसकी आलोचना करते रहे हैं, पानी वाले मुद्दे पर ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाकर दरअसल अपने को ही हास्यास्पद स्थिति में पहुंचा चुके हैं| अगर उन्होंने ढंग से पानी वाला मुद्दा पढ़ा होता तो ‘आप‘ की खिल्ली उड़ाने के बारे में सोचते भी नहीं|

दिल्ली पुलिस को जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने एक नई परिपाटी की शुरुआत की है| छुटभैये नेता भी इसी जुगाड में लगे रहते हैं कि उन्हें एक दो सरकारी गनर मिल जाएँ जिससे कि वे अपने रुतबे को समाज में दिखा सकें और बाबा रामदेव जैसे अतिमहत्वाकांक्षी योग गुरु और दवा व्यापारी ने तो जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए जी तोड कोशिश की थी| यही हाल भाजपा के प्रधानमंत्री पड़ के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का है जिनके लिए जेड प्लस सुरक्षा लेने के लिए भाजपा ने जमीन आसमान एक कर दिया था| जहां सड़क दुर्घटनाएं आम हों और राजनीतिक विरोधियों को आसानी से ठिकाने लगा दिया जाता रहा हो वहाँ सुरक्षा लेने से इनकार करके ‘अरविन्द केजरीवाल‘ ने खतरा उठाया है पर सत्य यह भी है कि अगर गांधी जिंदा होते, सुभाष बोस जिंदा होते या भगत सिंह जिंदा होते और देश के नेता होते तो वे भी कभी सुरक्षा के नाम पर जनता से दूरी न बनाते|

यह भी आज का बहुत बड़ा सत्य है जनता का वह तबका जिसका जमीर राजनीतिक दलों के यहाँ बंधक नहीं है, मौजूदा राजनीतिक माहौल से इस कदर उकता चुका है कि अगर ‘अरविन्द केजरीवाल‘ जैसी नई आशा को खरोंच भी आती है तो पूरा विश्व इस बात का गवाह बन सकता है कि जब आम जनता का गुस्सा फूटता है तो बड़े बड़े तख़्त हिल जाते हैं और बाद एबदे सूरमा धराशायी हो जाते हैं| ‘अरविन्द केजरीवाल‘ की सुरक्षा की जिम्मेदारी अब हर राजनीतिक दल की है क्योंकि अरविन्द केजरीवाल को कुछ भी होने की अवस्था में नुकसान राजनीतिक दलों का ही होना है| हो सकता है बहुत से दलों का राजनीतिक अस्तित्व ही समाप्त हो जाए और उन्हें हमेशा के लिए निर्वासन पर जाना पड़ जाए|

अरविन्द केजरीवाल‘ का यह कदम वी.आई.पी संस्कृति से बुरी तरह से ग्रसित और दूषित दिल्ली के सामाजिक और राजनीतिक के सुधार की ओर एक बड़ा कदम है| और उनका और उनके मंत्रियों और विधायकों की साधारण जीवन शैली आने वाले दिनों में राजसी जीवन जीने के आदि हो चुके नेताओं के लिए खतरे का सबब बनने वाली है| |

अरविन्द केजरीवाल‘ को अभी बहुत से पत्थरों को शीशे से तोड़ कर तराश कर उन्हें खूबसूरत बुतों का आकार प्रदान करना है|  पर ईमानदारी, सच्चाई का साथ और हौसला उन्हें कामयाबी दिलाएगा बड़े से बड़े मुकाम पाने में|

जान हथेली पर रख निडर होकर आगे बढ़ने वाले सूरमाओं के लिए ही कहा गया है :-

हयाते- जाविदां आई है जां-बाजों के हिस्से में

हमेशा जीने वाले है ये जितने मरने वाले हैं

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जून 16, 2011

बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस


बतकही 1-
बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

अशोक – एक बार को मान भी लो कि चलो भाई आर.एस.एस ने बाबा रामदेव के कार्यक्रम का समर्थन किया तो ऐसा करना कहाँ गलत है? क्या आर.एस.एस को अधिकार नहीं है भ्रष्टाचार का विरोध करने का? क्या आर.एस.एस भारत का अंग नहीं है।

हरि – अशोक बाबू हमारा आर.एस.एस की अनुदार विचारधारा से हमेशा से मतभेद रहा है परंतु यहाँ हमें भी आपकी बात के कुछ पहलू अनुचित नहीं लगते। कोई भी संगठन क्यों न हो उसका कैसा भी इतिहास क्यों न र्हा हो, उसकी कैसी भी छवि न रही हो, अगर वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में साथ देना चाहता है तो क्यों उसके इन प्रयासों को गलत नज़र से देखा जाये?

सुनील – यह बात सही है। एक तरफ तो सरकार आतंकवादियों से हथियार छोड़ने, मुख्य धारा में आने और देश के विरोध में अलगाववादी बातें करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करती और दूसरी ओर इस आसान से मुद्दे को इतना जटिल बना कर पेश कर रही है। यहाँ असली मुद्दा आर्थिक भ्रष्टाचार का है और अगर आर.एस.एस इस लड़ाई में साथ आना चाहती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। भाई या तो आर.एस.एस और अन्य संगठनों को देश निकाला दे दो या फिर उनकी आड़ लेकर भ्रष्टाचार जैसे बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की धार खत्म मत करो।

विजय – लोकतंत्र की बढ़ोत्तरी के लिये भारत के राजनीतिक और सामाजिक रुख में और उदारता और स्पष्टता लाने की जरुरत है। हर मुद्दे को अलग-अलग ढ़ंग से देखे जाने की जरुरत है। अभी अगर आर्थिक मुद्दा हल हो जाये तो अगला मुद्दा नैतिकता का होगा। और उस मुद्दे पर सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन कमजोर नज़र आते हैं। वहाँ सभी दलों और संगठनों में बहुत ज्यादा सुधार की आवश्यकता है।

हरि- मुझे तो ऐसा लगता है कि अन्ना हज़ारे के अनशन के बाद से जैसा माहौल देश में बना था उसमें ज्यादातर नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, अपनी साख खो चुके थे और घायल होकर वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं। कांग्रेस को खुश होना चाहिये कि आर.एस.एस भ्रष्टाचार जैसे एक मुद्दे पर मुख्य धारा से जुड़ना चाहती है और यह ऐसा मुद्दा है जिसने पूरे देश के और इसके सभी वर्गों के लोगों के विकास के काम को बाधित किया है।

अशोक – अजी कांग्रेस के राज में इतना भ्रष्टाचार पनपा है। उसे तो घबराहट होगी ही।

सुनील – अशोक जी, यह एकतरफा सोच है। भ्रष्टाचार तो हरेक सरकार के काल में जम कर पनपा है। भाजपा के काल में भी कम नहीं था भ्रष्टाचार। कुछ को ही सही पर कांग्रेस के काल में कलमाड़ी, ए. राजा, और कनीमोझी जैसे शक्तिशाली नेताओं को जेल में बंद किया गया है। उन पर जाँच चल रही है। अशोक – इन्हे तो जनता के दबाव में अंदर किया गया है।

विजय – सुनील जी, आपकी बात वाजिब है। सनक भरी एकतरफा सोच से तो देश का काम चलेगा नहीं। आपकी बात को थोड़ा आगे बढ़ाऊँ तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भले ही कांग्रेस द्वारा की जा रही कार्यवाही भ्रष्टाचार के विकराल रुप को देखते हुये ऊँट के मुँह में जीरा लगे पर एक शुरुआत तो हुयी है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने चाहे किन्ही भी दबाव में ऐसा किया हो पर आर.टी.आई आदि जैसी सुविधायें जनता को दी हैं। अपने और सहयोगी दलों के नेताओं को जेल भेजा है। कांग्रेस की बदकिस्मती से वक्त्त ऐसा है कि जनता केवल इतने भर से संतुष्ट नहीं है। जहाँ कांग्रेस आशा कर रही थी कि उसे जनता से सहयोग और शाबासी मिलेगी इन निर्णयों को लेने से वहीं जनता के सामने बहुत बड़े बड़े मामले खुलते जा रहे हैं। विदेश में जमा काला धन, देश में काले धन की समांतर अर्थ-व्यवस्था, मंहगाई, राजनीतिक भ्रष्टाचार और अक्षमता आदि मुद्दे जनता को अधीर कर रहे हैं। अब जनता का बहुत बड़ा हिस्सा मूर्ख बन कर नेताओं को लाभ देते रहने की स्थिति को पार कर चुका है या तेजी से पार करता जा रहा है। कांग्रेस को कुछ और ठोस कदम उठाने पड़ेंगे तभी वह कुछ उजली और सक्षम दिख सकती है अन्य दलों के मुकाबले में।

सुनील- विजय जी सही है आपकी बात। मुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि कांग्रेस अपने द्वारा लिये गये कुछ अच्छे निर्णयों पर भी जनता से सराहना नहीं पा सकी है और यही इसकी कुंठा है। इसी कुंठा में वह बाबा रामदेव के मुद्दे को ढ़ंग से सुलटा नहीं पायी। उसे यह भी दिख गया कि अगर वह आगे भी अच्छे निर्णय अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव जैसे गुटों के दबाव के कारण लेगी तो उसे कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला है। मुझे लगता है कि कुछ निर्णय कांग्रेस अपने आप लेगी और उसकी ही नहीं बल्कि हर दल के नेताओं की अंदुरनी इच्छा और कोशिश यही होगी कि ऐसे गुट निष्प्रभावी हो जायें ताकि जनता में पैंठ बना चुके इन मुद्दों के राजनीतिक लाभ नेताओं को ही मिलें।

हरि – इन विचारों से मेरे दिमाग में एक बात आयी है कि चूँकि कांग्रेस को आर.टी.आई और कलमाड़ी आदि को जेल भेजने के फैसलों का लाभ नहीं मिल पा रहा था तो उसके सामने साफ हो गया कि ये मुद्दे तो अपनी जगह है पर इन मुद्दों की आड़ में राजनीतिक तंत्र की सारी कालिख कांग्रेस के मुँह पर ही मलने के गुपचुप प्रयास भी हो रहे थे। सरकार घोटालों और महंगाई के बावजूद विपक्ष के मुकाबले मजबूत थी और भाजपा समेत विपक्ष के सामने अगले तीन साल तक सरकार को गिराने का बहुत बड़ा अवसर था नहीं। पाँच साल तक दल इंतजार करने को तैयार नहीं थे, खासकर भाजपा। चूँकि कोई भी दल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम में पाक-साफ नज़र नहीं आ सकता इसीलिये भाजपा और आर.एस.एस ने मौका तलाशते हुये बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के अंदोलन से उठी जन-जाग्रती की लहर पर सवार होने की चेष्टा की।

अशोक – ऐसा कैसे कहा जा सकता है?

विजय – बात से बात निकलती है। आपकी बात में सच्चाई नज़र आती है सुनील जी। भाजपा खुद ऐसा आंदोलन नहीं खड़ा कर सकती थी क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार के बहुत बड़े बड़े आरोप लगे हुये हैं। वह ऐसा करती तो दोगली करार दी जाती। तभी जब जनता आंदोलित हो गयी तो भाजपा के प्रवक्त्ता आदि टीवी चैनलों पर एक बात स्थापित करने में जोर लगा रहे हैं कि ये सारे मुद्दे आडवाणी ने उठाये थे। आडवाणी तो उप-प्रधानमंत्री भी रहे हैं और भाजपा अध्यक्ष भी, तब तो उन्होने अपने दल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ कदम नहीं उठाये। भाजपा की राजनीति के पीछे कहीं न कहीं यह इच्छा भी है कि किसी तरह से आडवाणी एक बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लें। अगर तीन साल और इंतजार किया तो जीवन भर यह मौका हाथ नहीं आयेगा। हो सकता है आने वाले तीन सालों में राजनीतिक फिजां बदल जाये और कांग्रेस कुछ और बड़ी मछलियों को जेल भेजे और जनता अंतत: कांग्रेस के पक्ष में हो जाये। ऐसा लगता है कि कलमाड़ी आदि को जेल भेजना विपक्षी दलों को हिला गया है। भ्रष्ट सभी दल हैं और अगर कांग्रेस अपने नेताओं को जेल भेज सकती है तो दूसरे दल के नेताऒ पर कोताही करने का कोई मतलब है ही नहीं।

हरि- आप लोग कह रहे हैं तो मुझे भी दूर की एक कौड़ी सूझी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो अब देश में खड़ा होना ही है और हो रहा है पर कांग्रेस जो कह रही है कि बाबा रामदेव के आंदोलन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है तो यह कुछ हद तक सही लगता है। खाली आर.एस.एस का ही नहीं बल्कि अन्य ताकतों का भी जो भी कांग्रेस की सप्रंग सरकार को पाँच साल तक सत्ता में देखने को तैयार नहीं है। देखिये हो सकता है दूर की कौड़ी हो परंतु ध्यान दिया जाये तो जून का महीना भारत में राजनीतिक रुप से इमेरजैंसी वाले महीने के रुप में याद दिलाने की चेष्टा गैर-कांग्रेसी दल करते रहे हैं। भाजपा और आडवाणी इस बात पर विशेष तवज्जो देते रहे हैं। रामदेव का अनशन जून के माह में ही क्यों आयोजित किया गया? यह मार्च में भी हो सकता था जब इतनी गर्मी नहीं थी। या कुछ माह बाद सितम्बर या अक्टुबर में। पर इसे जून में किया गया। अगर आंदोलन केवल रामदेव के हाथों में होता तो शायद वे सरकार से कई मुद्दों पर आश्वासन मिलने के बाद अनशन खत्म कर देते पर उनके ऐसा करने से केवल उन्हे और सरकार को ही लाभ और राहत मिलती। विपक्षी दल अपने आप को सारे मामले से अलग महसूस करते। अनशन न तोड़ने देने के लिये जरुर ही रामदेव को शातिर दिमागों ने सलाह दी होगी। रामदेव राजनीति में नौसिखिया हैं। वे इतनी दूर का नहीं सोच सकते। कुछ लोगों को पक्का पता था कि अगर रामदेव दिल्ली में डटे रहें तो सरकार और रामदेव में टकराव होना ही होना है। उन्होने सोचा था कि सरकार सख्ती करेगी और उस पर आपातकाल के आरोप लगाये जायेंगे। अगर सरकार रामदेव के आंदोलन को कुचलती है तो एक तो रामदेव व्यक्तिगत रुप से उसके खिलाफ हो जायेंगे दूसरे सरकार बदनाम होगी और तीसरे भ्रष्टाचार का मुद्दा रामदेव और अन्ना हज़ारे के पास ही न रहकर विपक्षी दलों खासकर भाजपा के पास आ जायेगा। रामदेव का तो ठीक है कि उन्हे राजनीति की समझ नहीं है पर कांग्रेस को क्या कहा जाये वह भी इन चालों के सामने धराशायी हो गयी? एक से एक शातिर राजनीतिक दिमाग कांग्रेस के पास हैं और वे इन संभावनाओं को नहीं देख पाये और अब टीवी चैनलों पर तमतमाये हुये बयान देते घूम रहे हैं और अपनी और ज्यादा फजीहत करा रहे हैं।

अशोक – आपको लगता है कि आर.एस.एस और भाजपा इतनी आगे की सोच सकते हैं? अगर रामदेव उनके बढ़ाये हुये होते तो उन्हे रामदेव की ऐसी हालत करके क्या हासिल होता। रामदेव की समझ में भी तो आयेगा कि उन्हे इस्तेमाल किया गया है।

सुनील- राजनीतिक दल कितनी भी आगे की सोच सकते हैं। हरि भाई आपकी सोच पर चलें तो अब समझ में आता है राजघाट पर खुशी से नाचने का मतलब। अब यह भी लगता है कि अगर आर.एस.एस और भाजपा को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाना भी है तो उन्हे पहले अपने संगठनों से शुरुआत करनी चाहिये। बल्कि किसी भी राजनीतिक दल को यही करना चाहिये। उन्हे किसने रोका है कि वे अपने दल के आरोपित लोगों के खिलाफ कार्यवाही करें? अभी तो इन सभी दलों ने असली मुद्दे को पीछे ढ़केल दिया है और अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेकने आगे आ गये हैं। आर.एस.एस को खुले रुप में आंदोलन खड़ा करना चाहिये। उनका इतना बड़ा काडर है वे आज तक क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं कर पाये। भाजपा का इतना बड़ा समर्थक वर्ग है वह खुद से और अपने समर्थकों से शुरुआत क्यों नहीं करती। मुझे ऐसा लगता है कि कोई भी दल और संगठन गम्भीर नहीं है भ्रष्टाचार को समापत करने के लिये। ऐसा करना उनके हितों के खिलाफ है।

विजय- सही है सुनील जी, रामदेव के आंदोलन से सही ढ़ंग से निबटने में कांग्रेस की विफलता ने भाजपा को वह जगह मुहैया करा दी है जो उसे मिल नहीं रही थी उसके लाख प्रयास के बावजूद। लोगों का जिस तेजी से कांग्रेस से मोह भंग हुआ है उसकी भरपाई करने के लिये कांग्रेस को बहुत बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। अभी ऐसा माहौल बना दिया गया है कि कांग्रेस के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन गति नहीं पकड़ पा रहा है। जबकि सच्चाई यह नहीं है। सभी दल भ्रष्ट हैं। कांग्रेस ने दिखावे के लिये ही सही पर थोड़े से कदम उठाये हैं, पर वे काफी नहीं हैं। अपनी जमीन वापिस पाने के लिये उसे बड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे। अब कांग्रेस को जमीन में तो दफनाया नहीं जा सकता। आर.एस.एस समर्थित भाजपा से तो लोगों की शंकायें रहेंगी ही। देशव्यापी दलों में कांग्रेस ही है जिस पर देश के बहुत सारे वर्गों का भरोसा रहा है। देश की एकजुटता की खातिर कांग्रेस का बने रहना जरुरी है। कांग्रेस को अपनी और देश की खातिर अपनी सफाई और अपने सुधार से शुरुआत करनी चाहिये।

हरि – कांग्रेस और भाजपा, दोनों बड़ी राजनीतिक शक्तियों को चाहिये कि देश हित में भ्रष्टाचार जैसे राक्षस को समाप्त करने के लिये वे भले ढ़ंग से आपस में सहयोग करें। कांग्रेस को चाहिये कि वह बचे हुए तीन सालों में सत्ता का सदुपयोग करके भ्रष्टाचार समाप्त करने की ओर ठोस कदम उठाये। भाजपा को चाहिये कि एक अच्छे विपक्ष की तरह सरकार पर दबाव बनाये रखे। पिछले दरवाजे से सत्ता नहीं मिलने वाली और अगर मिल भी जाये तो यह दलों की साख गिराती ही है। भारत के लोकतंत्र को स्वच्छ और विकसित बनाने के लिये राजनीतिक दलों को शातिर और कुटिल चालों के बजाय साफ-सुथरी और पारदर्शी राजनीति को स्थान देना ही पड़ेगा।

…जारी…

जून 8, 2011

भ्रष्टाचार विरोध को इंसाफ मिलेगा क्या?


बीते दिनों
सन्यासी, ठग, व्यपारी और
मसीहा के बीच
उलझे हुये
सत्य का
अजीब रूप देखने को मिला है।

खून-पसीने की चोरी का
हिसाब माँगने गए
निहत्थे आंदोलनकारियों पर
क्यों भांजी गयी लाठियाँ,
समझ से बाहर है।

फिर शुरू हो गया
आरोप प्रत्यारोप का दौर
बंदरों में होड़ मच गयी है
भ्रष्टाचार विरोध की सिकी
रोटी हथियाने की।

चक्की के दोनों बड़े पाट तैयार हैं
पिसे हुओं को और पीसने के लिए
जनसंवेदनाओं से मखौल कर
वोटों की राजनीती हुई है गर्म
कोयल के वेश में काग-राग से
असल मुद्दा–बेमुद्दा हो चला है।

हराम कमाई से हुए मुस्टंडे
नूरा-कुश्ती के माहिर
काले धन के बचाव का दाव
खेल गए हैं।

डर है डूबो न दी जाएँ
भ्रष्टाचार विरोधियों की नावें
इस गन्दी व्यवस्था के कीचड़ में
फिर धोखा खा न जाएँ
इन्साफ की बाट तकती
गीली आँखें।

(रफत आलम)

जून 6, 2011

बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

बाबा रामदेव के काले धन की विदेश से वापसी और भ्रष्टाचार के खिलाफ किये अनशन से सम्बंधित दुखद घटनाक्रमों ने भारत को हलचल से भर दिया है। कहीं कोलाहल है तो कहीं चुपचाप देखा जा रहा है कि आगे क्या होगा। कल, विजय, अशोक, हरि और सुनील, चार बुजुर्ग मित्रों की रोज़ाना होने वाली बैठक एक बहस-गोष्ठी में बदल गयी। बहुत समय बाद चारों के दिमाग और ज़ुबान दोनों ही राजनीतिक तेवरों से ओत-प्रोत हो रहे थे।

आम तौर पर चारों सुबह दस बजे किसी भी एक के घर मिल बैठ दुनिया जहान की बातें किया करते हैं। दोस्ताना माहौल में वक्त्त अच्छा बीत जाता है। सुख-दुख की बातें हो जाती हैं।

मजमा विजय के घर पर लगा। चारों के हाथों में अलग-अलग अखबार थे।

विजय बाबू ने गहरी साँस भ्रने के बाद गम्भीर स्वर में कहा,” घटनाक्रमों ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिये हैं। सारे मामले के बहुत सारे पहलू उजागर हुये हैं”।

हरि – विजय जी, एक बात तो तय है कि अनशन को तोड़ने के लिये आधी रात को पुलिस बल से जैसी हिंसक कारवाही करवायी गयी है उस निर्णय ने जैसी किरकिरी कांग्रेस पार्टी और सरकार की की है, उसका कलंक आसानी से हटने वाला है नहीं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की कहावत का इससे अच्छा उदाहरण हो नहीं सकता।

सुनील – ये तो सही कहा आपने हरि भाई। पर विजय बाबू आप कुछ सवाल और पहलुओं की बात कर रहे थे। कुछ बताओ।

अशोक – हाँ पहले आप ही बताओ आपको क्या दिखता है इस मामले में?

विजय – पहली बात तो यही है कि बाबा रामदेव, अन्ना हजारे के अनशन के समय से ही सार्वजनिक रुप से मीडिया को दिये साक्षात्कारों में बार-बार कह रहे थे कि वे जून के पहले हफ्ते से अपने एक लाख समर्थकों के साथ भ्रष्टाचार और काले धन की विदेश से वापसी जैसे मुद्दों को सुलझाने के लिये सरकार पर उचित कार्यवाही करने के लिये दबाव बनाने के लिये अनशन पर बैठेंगे। सरकार कहती है कि अनुमति सिर्फ योग-शिविर लगाने के लिये ली गयी थी। अगर ऐसा था तो दिल्ली में जब रामलीला मैदान में शिविर लगाये जा रहे थे तभी सरकार ने उचित कदम क्यों नहीं उठाये? बाबा रामदेव के दिल्ली पहुँचने के बाद भी उनसे स्पष्ट क्यों नहीं कहा कि शिविर की अनुमति के साथ वे शांतिपूर्ण ढ़ंग से भी वहाँ अनशन पर नहीं बैठ सकते।

हरि – सही कह रहे हो विजय बाबू, जब बाबा रामदेव और सरकार दोनों को पता था कि अनुमति सिर्फ योग शिविर लगाने की ली गयी है और सरकार अनशन के दूसरे या तीसरे दिन कानूनी कार्यवाही कर सकती है तो क्यों हजारों लोगों की जान को जोखिम में डाला गया? अनशन से पहले दिन टीवी पर ऐसी बातें भी उठ रही थीं कि रामलीला मैदान में योग शिविर ही रहेगा और अनशन जंतर-मंतर पर किया जायेगा। सरकार के चार बड़ी मंत्रियों ने हवाई-अड्डे पर ही बाबा रामदेव को पकड़ कर क्या इस बात की संभावना उनके दिमाग से हटा दी कि जंतर-मंतर पर अलग से अनशन करने की जरुरत नहीं है और सरकार से बातचीत से उचित हल निकल आयेगा, और बाबा रामदेव जंतर मंतर को भूलकर रामलीला मैदान में ही अनशन की लीला दिखाने लगे और उन्हे लगता था कि सब कुछ ठीक पटरी पर चल रहा है और सब ऐसे ही निबट जायेगा? हमें तो घपला लगता है मामले में।

सुनील – जब अनशन की पहली ही शाम आते आते सरकार और बाबा रामदेव में वार्ता टूट गयी तो क्या सरकार का फर्ज नहीं बनता था कि अनशन स्थल पर बैठे हजारों लोगों की जान की सलामती की फिक्र करती? सरकार का बाबा रामदेव से कुछ भी रिश्ता हो, कोई भी सरकार हजारों लोगों की भीड़ की जान के साथ खिलवाड़ कैसे कर सकती है? बहुत शोर मचाकर कहा जा रहा है कि सांसद संवैधानिक रुप से जनता द्वारा चुने गये हैं तो ऐसे समय में संविधान की मूल भावना की धज्जियाँ उड़ाते हुये इन्ही सांसदों से बनी सरकार ने हजारों लोगों की जान जोखिम में डालते हुये पुलिस को आधी रात को लोगों को वहाँ से हटाने के लिये भेजा? कैसे पुलिस को आदेश देने वाले मंत्रियों ने नहीं सोचा कि अगर पुलिस की लाठियों से लोग बच भी गये तो भगदड़ में महिलायें, बच्चे और वृद्ध अपनी जान बचा पायेंगे या घायल होने से बच पायेंगे? सरकार अनशन पर बैठे लोगों को दिन में नोटिस देकर कुछ घंटे का समय नहीं दे सकती थी जिससे लोगों को पता चल जाये कि सरकार की मंशा अब रामलीला मैदान से लोगों को हटाने की है। अगर अनशन अवैध था तो कोर्ट से नोटिस लाया जा सकता था। पर किसी तरह से भी संविधान का सम्मान न करते हुये लोगों को सबक सिखाने के लिये पुलिसिया कार्यवाही की गयी।

अशोक – अरे सरकार की बदमाशी है। यह सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ लिप्त है और संसदीय लोकतंत्र में इनका विश्वास दिखावा है। इन्होने ही तो इमेरजैंसी लगवायी थी, तभी भाजपा राजघाट पर अनशन में बैठ गयी है इनकी करतूतों के विरोध में।

विजय – अशोक बाबू भाजपा भी दूध की धुली नहीं है। राजघाट में कब से उसकी श्रद्धा हो गयी? कल्याण सरकार के दिन भूल गये क्या? कैसे गांधी को पानी पी पी कोसा जाता था। गाँधी से इनका क्या लेना देना। बल्कि किसी भी दल का कुछ लेना देना नहीं है गाँधी से। उन्हे तो अलग ही रखें।

सुनील – कांग्रेस नियंत्रित सप्रंग सरकार की दूसरी पारी के आरम्भ से ही भाजपा निष्क्रिय स्थिति में पड़ी हुयी थी। उसे राजनीतिक जमीन नहीं मिल रही थी। पांच साल का इंतजार उसे और निष्क्रिय बना देता। कांग्रेस की सरकार ने भाजपा में जान डाल दी। उसे मुकाबले में खड़ा कर दिया। कांग्रेस ने बाबा रामदेव को संघ की ओर धकेल दिया। सबको लगता था कि कांग्रेस नियंत्रित सरकार की दूसरी पारी आसानी से अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी और कहीं कई अड़चन नहीं आयेगी। ताजे घटनाक्रमों ने दिखा दिया है कि सरकार की आगे की राह मुश्किल हैं। सरदार जी ने माथे पर कलंक लगवा ही लिया। इतिहास तो उन्हे ऐसे प्रधानमंत्री के रुप में याद करेगा जिसकी सरकार ने रात में सोते हुये स्त्री-बच्चों, बूढ़ों और अनशनकारियों पर लाठियाँ बरसवायीं। उन्हे घायल किया और उनकी जान को जोखिम में डाला।

हरि- कांग्रेस की सरकार ने तो भाजपा को थाली में सजाकर मौका दे दिया है। इससे ज्यादा खुश भाजपा और अन्य विपक्षी दल कभी भी नहीं हुये होंगे, पिछले पांच-सात साल में।

अशोक- अजी भाजपा निष्क्रिय नहीं थी। उसी ने मुद्दा उठाया था काले धन की वापसी का, भ्रष्टाचार के खात्मे का।

विजय- अशोक जी भाजपा की ईमानदारी तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री और रेड्डी भाइयों के मामलों में चमक ही रही है। गुजरात के मामले में उसकी नैतिकता भी जगजाहिर रही है!

सुनील – भाजपा की बात छोड़ो। मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार बार उठ रहा है – क्या शुरु में बाबा रामदेव से मीठी मीठी बातें करने के कुछ घंटो बाद सरकार को वस्तुस्थिति का एहसास हुआ कि अगर बाबा रामदेव के अनशन के कारण उनकी माँगें मानी गयीं तो यह बाबा रामदेव की जीत कहलायेगी और सरकार द्वारा उठाये गये कदम मजबूरी में उठाये गये कदम कहलायेंगे और कांग्रेस को राजनीतिक लाभ नहीं मिल पायेगा।

हरि – सरकार के किन्ही भी सलाहकारों ने ऐसी बर्बरतापूर्ण कार्यवाही करने की सलाह दी हो और उस पर दबाव डाला हो, क्या कांग्रेस को इस घटना के बाद किसी किस्म का राजनीतिक लाभ मिल पायेगा? इसमें पूरा संदेह है।

विजय- कुछ ही दिन पूर्व कांग्रेस मायावाती सरकार द्वारा भट्टा पारसौल में उ.प्र पुलिस द्वारा किसानों पर अत्याचार कराने को लेकर संघर्षरत थी। अब उसकी खुद की सरकार ने वैसा ही कर दिया है। कांग्रेस के पास अब नैतिक चेहरा है ही नहीं किसी अन्य सरकार द्बारा पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही कराये जाने की निंदा करने का। भारत की जनता हमेशा से ही शोषित के पक्ष में रही है और अब पुराना समय नहीं रहा जब किसी तरह की कोई भी खबर दबायी जा सकती थी। इस इलेक्ट्रानिक युग में कांग्रेस ने ऐतिहासिक राजनीतिक भूल की है और इसका राजनीतिक खामियाजा या तो अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर देगा या फिर उसकी सीटें इतनी कम हो सकती हैं कि वह बड़ी संख्या में दूसरे दलों पर निर्भर हो जाये।

सुनील- देश अगली बार फिर से कई दलों की मिली जुली सरकार के चंगुल में फंसता दिखायी दे रहा है। कांग्रेस का उ.प्र अभियान भी गड्ढ़े में पड़ा समझिये। दुख की बात है कि दो दशकों से ज्यादा समय से उ.प्र क्षेत्रीय स्तर की पार्टियों द्वारा संचालित हो रहा है। विकास कार्य लगभग ठप रहे हैं। वैसे भी पाँच नहीं तो दस साल में सरकारें बदल जानी चाहियें। तभी संतुलन ठीक बना रहता है।

अशोक – कांग्रेस का आरोप है कि बाबा रामदेव के अनशन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है। अगर ऐसा है भी तो जब हवाईअड्डे पर सरकार के बड़े मंत्री उनकी अगुवाई करने गये थे तब भी उन्हे इस बात का पता होगा। अगर पता था और उन्हे इस बात से परहेज था तो उन्होने अनशन को शुरु ही क्यों होने दिया?

सुनील- अशोक जी आपकी इस बात से सहमति है। अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो इस संगठन को कानून का सहारा लेकर प्रतिबंधित क्यों नहीं किया जाता? अगर आर.एस.एस से इतना परहेज है तो कांग्रेस और इसके द्वारा नियंत्रित सरकार आर.एस.एस द्वारा समर्थित और नियंत्रित भाजपा के सांसदों से परहेज क्यों नहीं करती? उन्हे संसद से बाहर का रास्ता दिखा दे। उन्हे किसी भी कमेटी में न रखे। आखिरकार भाजपा को तो आर.एस.एस का पूरा समर्थन है। ऐसा कैसी हो सकता है कि भाजपा के सांसद तो स्वीकार्य हैं पर जो सांसद नहीं हैं और जिन पर शक है कि आर.एस.एस उन्हे समर्थन देता है, वे स्वीकार्य नहीं हैं।

विजय- सबसे बड़ी बात यह है कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे, जो भारत को खाये जा रहे हैं, को लेकर जनता को ठोस हल चाहिये और उसे इस बात से क्या मतलब कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये जा रहे प्रयास को आर.एस.एस समर्थन दे रहा है या कोई अन्य संगठन।

हरि- अरे अगर ऐसा है तो आर.एस.एस को देशद्रोही साबित करके प्रतिबंधित कर दो, कानूनी राह पर चला दो और अगर ऐसा साबित हो जाता है तो जनता चूँ भी नहीं करेगी।

विजय- मेरी समझ में तो ऐसा पैरानोइया आता नहीं। आप ये जानो कि जब भाजपा राजनीतिक दौर के शिखर पर थी तब भी उसे केवल 26% मतों का समर्थन हासिल था और जो अब घटकर 20% के आसपास आ गया है। देश की कुल आबादी का 75-80% हिन्दुओं को माना जा सकता है तो ऐसा तो है नहीं कि सभी हिन्दु भाजपा को समर्थन देते हैं और मत देते हैं। फिर क्यों इतनी हायतौबा, क्यों इतना भय? यह देश मुख्यतः सेकुलर रहा है और रहेगा।

…जारी…

बतकही 2 -बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस

जून 4, 2011

बाबा रामदेव : भ्रष्टाचार मुर्दाबाद

उजाला करने के लिए
सलाम आपको बाबा!

करोड़ों आखों को
आज यही ईमान की रौशनी चाहिए
अन्यथा
गाँव का सबसे ईमानदार आदमी
शराब के ठेकेदार से
सरपंच का चुनाव हारता रहेगा
रातो-रात बदलती रहेंगी निष्ठाएं

माहौल की सड़न इसी तरह
सदा बिकने वाले को
मेले का खरीदार बना देती है
जड़ों में फैली गंद को
कमल ने सर पे रख लिया है.
यानी व्यवस्था की खराबी को
जनता आवश्यकता मानने लगी है

मन से रोती है परन्तु
खुश-खुश ‘सुविधा शुल्क’ दे रही है
ले रही है

आप बाखूब जानते हैं बाबा साहिब!
ये वह दुनिया है जहाँ
मसीहाओं के उजालों का
स्वागत सदा सियारों ने किया है
जो मौका पाते ही सूली में कीलें ठोकते हैं।

हमाम के ये ही नंगे
कल आपके साथ हो लेंगे
कुछ तो अभी से शेर की बोली बोल रहे हैं।

ये केवल सत्ता के दलाल हैं
इन्हें तख्ते नही तख़्त की है आरज़ू
इन्होने सदा ही संवदनाओं का शोषण किया है
इन्होने ही पनपाया है
भ्रष्टाचार को विष वृक्ष
इन बेईमानों को दूर रखना है ज़रूरी
कल हमें इन्ही के पास कैद
काले धन को आज़ाद कराना है।

शोषण से त्रस्त सारा देश
आपको आशा से देख रहा है
लाखों दीपक चल पड़ने को हैं आतुर
आपके उजाले के साथ।

कल कश्मीर से कन्याकुमारी तक
करोड़ों नारे लगने तय हैं
भ्रष्टाचार मुर्दाबाद!
कल ज़रूर मैली धूप उजली होगी।

(रफत आलम)

अप्रैल 12, 2011

लोकपाल समिति : सदस्यता लूट ले

भारत में चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करने वालों की संख्या बहुत अधिक है और नेतागण तो इस काम में बहुत आगे हैं। कुछ नेता लोकपाल मसले के बहाने अपनी छवि बनाने के लिये दैनिक स्तर पर तरह तरह की बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ नेता इस पूरे मामले में पलीता लगाकर इसे उड़ाने की चेष्टा में हैं। इसे ध्वस्त करने की कोशिश करने वालों में सबसे बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लोकपाल तैयार करने वाली समिति में शामिल लोगों पर एतराज करके अपनी अपनी पंसद के लोग वहाँ देखना चाहते हैं। बहाना वे कर रहे हैं कि महिला क्यों नहीं है, दलित क्यों नहीं है, पिछड़ा क्यों नहीं है, मुसलमान क्यों नहीं है, फलाना क्यों नहीं है ढ़िमाका क्यों नहीं है।

121  करोड़ लोगों की आबादी तले दबे भारत में भाँति-भाँति के लोग हैं और अगर किसी एक भी श्रेणी के लोगों की संख्या गिनी जाये तो वह भी करोड़ों में निकलेगी, मसलन गंजे लोग भी करोड़ों की संख्या में होंगे।

पूरे समाज का प्रतिनिधित्व यह समिति करे इसके लिये आवश्यक है कि समाज में वास कर रहे लोगों की हर श्रेणी से प्रतिनिधि इस बिल को बनाने वाली समिति के सदस्य होने चाहियें। तभी तो सामाजिक न्याय की कसौटी पर यह खरा उतरेगा। कुछ श्रेणियाँ नीचे सूचिबद्ध की गयी हैं।

लोकपाल बिल बनाने वाली समिति में निम्नांकित लोगों का होना बेहद जरुरी है।

  • एक काले बालों वाला, एक भूरे बालों वाला, और एक सफेद बालों वाला;
  • एक आधा गंजा और एक पूरा गंजा;
  • एक काली आँखों वाला, एक भूरी आँखों वाला, एक नीली आँखों वाला, एक कंजी आँखों वाला;
  • एक सिक्स पैक एब्स वाला, और एक तोंद वाला;
  • एक सबसे लम्बे कद का और एक सबसे छोटे कद का;
  • एक बिल्कुल स्वस्थ, और एक पूरी तरह से बीमार और रुग्ण शरीर वाला;
  • एक डी.लिट उपाधि वाला और एक बिल्कुल अनपढ़;
  • एक पूर्णतया शाकाहारी, एक पूर्णतया माँसाहारी;
  • एक दुनियाभर की सैर कर चुकने वाला और एक वह जो कभी अपने मोहल्ले से बाहर ही न गया हो;
  • एक हमेशा कपड़े पहनने वाला और एक हमेशा नग्न रहने वाला;
  • एक 32 दाँतो वाला और एक बिना दाँतो के पोपले मुँह वाला;
  • एक रोल्स रॉयस चलाने वाला और एक पैदल चलने वाला;
  • एक योग, व्यायाम करने वाला और एक सदा सोने वाला;
  • एक नाचने वाला और एक नाच न जाने आंगन टेढ़ा कहने वाला;
  • एक गा सकने वाला और एक गाने में गधे से मुकाबला करने वाला;
  • एक दिन में सोने वाला और एक रात में सोने वाला;
  • एक हिंसक और एक अहिंसक;
  • एक दो आँखों वाला, एक एक आँख वाला और एक न देख सकने वाला;
  • एक पूरा सुनने वाला और एक न सुन पाने वाला;
  • एक लगातार बोलने वाला और एक कभी भी बोल न सकने वाला;
  • एक दिन में तीन बार नहाने वाला और एक साल में एक बार नहाने वाला;
  • एक ब्रहमचारी और एक कामी;
  • एक ऐसा जो पत्नी के अलावा हरेक स्त्री में माँ-बहन देखे और एक ऐसा जिसे कम से कम एक बलात्कार का अनुभव हो;
  • एक साधु और एक हद दर्जे का अपराधी;
  • एक लगभग 5 साल का बच्चा और एक कम से कम 95 साल का वृद्ध;
  • एक सदैव प्रथम आने वाला और एक सदैव अनुत्तीर्ण होने वाला;
  • एक बला का शातिर, और एक निपट भोंदू…एकदम गोबरगणेश;
  • एक सवर्णों में सवर्ण, और एक दलितों में अति दलित;
  • एक अगड़ों में अगड़ा और एक पिछड़ों में पिछड़ा;
  • एक अतिआधुनिक, और एक पुरातनपंथी – एकदम पोंगापंथी;
  • एक खिलाड़ी और एक अनाड़ी;
  • एक खतरों का खिलाड़ी और एक चींटी तक से डर जाने वाला;
  • एक पुजारी और एक पूजा-प्रार्थना से घृणा करने वाला;
  • एक सन्यासी और एक संसारी;
  • एक आस्तिक और एक नास्तिक;
  • एक भ्रष्टाचारी और एक ईमानदार,
  • एक दानवीर और एक भिखारी;
  • एक महल में रहने वाला एक फुटपाथ पर बसर करने वाला;
  • एक वोट लेने वाला और एक वोट देने वाला;

आदि इत्यादी!

और बहुत सारी श्रेणियाँ छूट गयी हैं, पढ़ने वाले और इस मामले में रुचि रखने वाले लोग अपनी अपनी इच्छानुसार समाज के विभिन्न तबके के लोगों के प्रतिनिधि इस सूचि में जोड़ सकते हैं।

लोगों के बीमार शरीरों को ठीक करने वाली दवा को बनाने वाली शोधार्थियों की टीम से भारत के ये पंगेबाज महानुभाव यह नहीं कहते कि अपनी टीम में हर श्रेणी के लोग रखो क्योंकि वहाँ इनका बस नहीं चलता। करोड़ों तो ऐसे होंगे जो दवा का नाम भी ढ़ंग से उच्चारित नहीं कर सकते और वहाँ चूँकि शरीर के लाभ की बात है तो वहाँ इन्हे विशेषज्ञ चाहियें पर चूँकि यहाँ लोकपाल इनके हितों के खिलाफ है और चूँकि मामला मानसिक रुग्णता का है और मानसिक रुप से बीमार कभी भी ऐसा नहीं मानते कि वे बीमार हैं तो हरेक आदमी बढ़-चढ़ कर बोल रहा है।

जाति, सम्प्रदाय (रिलीजन), आर्थिक, क्षेत्र और भाषा के अंतर के मुद्दों को कुटिलता से उठाकर कुछ शातिर लोग लोकपाल बिल के मामले की हत्या करना चाहते हैं। इन शातिरों की राजनीति एक भ्रष्ट समाज में ही चल सकती है अतः वे घबराये हुये हैं कि अगर समाज ईमानदार बन गया तो उनकी दुकान बंद हो जायेगी इसलिये तरह तरह के मुखौटे ओढ़कर वे लोकपाल की भ्रूणहत्या करने आ गये हैं।

भारत को बचाना है तो ईमानदार, देशभक्त्तों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, और भाषा के तुच्छ अंतरों को भूलकर अपनी एकता बनाये रखकर इन शातिरों को करारा जवाब देना पड़ेगा। अगर भारत के सर्वनाश से फर्क नहीं पड़ता तो बनाये रखो इसे भ्रष्ट, जातिवादी, और साम्प्रदायिक। वर्तमान के भारत के लोगों की आने वाली पीढ़ियाँ मानवता के निम्न बिंदू को छूकर नये कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

अब यहाँ कालिदास बन सकने की प्रक्रिया और परंपरा मर चुकी है, बहुमत मूर्ख ही जन्मते हैं, मूर्ख ही जीते हैं और ऐसे ही धरा छोड़ जाते हैं।

मुस्कुराइये कि आप भारत में रहते हैं।

…[राकेश]

Pic: Courtesy – srknews.com

अप्रैल 8, 2011

रागिनी अपने और देश के सम्मान के लिये कुछ भी करेगी

“तुम पक्के देशद्रोही बन चुके हो सुदीप”, आवेश से तमतमाती हुयी रागिनी ने कहा।

“हराम… तू बहुत गाँधी की चमची बन रही है”। गुस्से में थूक उगलते सुदीप ने हाथ घुमाकर रागिनी को थप्पड़ मारना चाहा।

रागिनी पीछे हट गयी और फुफकारते हुये बोली,” दोबारा हाथ उठाने की गलती मत कर बैठना सुदीप बहुत पछताओगे, सालों जेल में सड़ोगे और अगर बच गये तो तुम्हारे जैसे नीच आदमी को तो…”। रागिनी बात पूरी करते करते रुक गयी।

सुदीप आग्नेय नेत्रों से रागिनी को घूरता रहा पर रागिनी के हौसले और रुप को देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुयी कि वह उस पर फिर से हाथ उठा पाता।

बात आज उस समय शुरु हुयी जब सुदीप रात को घर आया। वह बाहर से पीकर आया था। बीती रात भी उसकी और रागिनी की तू तू मैं मैं हो गयी थी। सुबह घर से जाते हुये उसकी और रागिनी की कोई बात नहीं हुयी थी। आज वह यह सोचकर घर आया था कि रागिनी को मजा चखा देगा उसके सामने ज़बान खोलने के लिये। आज रात वापस घर आने के बाद सुदीप गुस्से से पागल हो गया यह जानकर कि शाम को ही रागिनी उनके बेटे, सौरभ, को अपने भाई के घर छोड़ आयी थी।

उसने गुस्से से लालपीले होकर पूछा कि रागिनी की हिम्मत कैसे हुयी ऐसा करने की?

उसके गुस्से की परवाह न करते हुये रागिनी ने शांत भाव से उसे जवाब दिया कि वह नहीं चाहती थी कि सौरभ के सामने उन दोनों के मध्य झगड़ा हो और आज उसे सुदीप से बात करनी ही करनी थी।

उनमें तकरार बढ़ती रही।

सुदीप रागिनी को गालियाँ देता रहा और वह उसे आइना दिखाती रही, उसकी गलतियों, कमजोरियों एवम उसके छल-कपट को उजागर करके।

मीडियाकर्मी सुदीप को बिल्कुल भी आदत नहीं थी कि कोई उसकी बात को काटे या उसकी बात को नज़रअंदाज़ करे। उसकी इच्छा तो हो रही थी कि वह रागिनी को पटक पटक कर पीटे पर रागिनी के रुप को देखकर उसकी हिम्मत हुयी नहीं और वह मौखिक रुप से उसे गालियाँ बक कर ही अपने गुस्से को उस पर उड़ेलता रहा।

वैसे तो शादी के बाद से ही सुदीप की आदतों के कारण रागिनी उसके साथ बहुत सहज नहीं हो पायी और उनके बीच अक्सर तनाव घर कर लेता था। पिछले कई महीनों से तो दोनों के बीच लगातार तनाव चल रहा था। उनके बीच का तनाव क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान और बढ़ गया।

सुदीप को आदत थी हर बात में निगेटिव पहलू देखने की। वह सारे समय ही चिढ़ा हुआ रहता था। अपनी कही बात के अलावा उसे किसी और की कही बात कभी नहीं सुहाती थी। अपनी बात तो उसे परम सत्य लगती और दूसरों की हर बात में उसे साजिश दिखायी देती।

तंग रागिनी ने उसे यह सब कहा भी कि वह पूर्णतया निगेटिव विचारधारा का आदमी होता जा रहा है। वह लोकतांत्रिक तो बिल्कुल भी नहीं था। क्रिकेट के विश्वकप के दौरान तो उसने हद ही कर दी। भारत-पाक मैच के प्रसारण के दौरान जब वह घर आया तो पाकिस्तान के बल्लेबाज खेल रहे थे और सुदीप यह देखकर चिड़ गया कि रागिनी और सौरभ खुश हो होकर मैच देख रहे थे। जैसे ही पाकिस्तान का विकेट गिरता वे हल्ला मचा मचाकर खुश होते। सुदीप ने सौरभ के चाँटा मार दिया और टीवी बंद करके उसे पढ़ने बैठने के लिये कहा।

विश्वकप शुरु होने से पहले से ही अपनी आदत के मुताबिक सुदीप विश्वकप की मुखालिफत में लगा हुआ था। मीडिया खरीद लिया गया है…सब कुछ फिक्स है…यह सब इलीट वर्ग की अय्याशी है आदि इत्यादि वचन उसके दिमाग से सारे समय झरते रहते।

जागते रहने के दौरान ज्यादातर समय वह फेसबुक और टविटर पर संदेश लिखता रहता और अपनी सनक इधर उधर फैलाता रहता। अपने जैसे ही लोग वहाँ मिल जाने के कारण उसे ऐसा लगता कि वह बहुत बड़ी क्रांति का जनक बन गया है।

रागिनी ने यह सब कुछ उसके सामने उजागर किया।

उसने कहा,” सुदीप तुम घोर जातिवादी आदमी बन गये हो और क्या पता तुम पहले से ही ऐसे हो और पहले इस बात को छिपा कर रखते रहे हो। अब तो तुम्हारी हर बात से जातिवाद की झलक मिलती है। तुम्हे खुद ही नहीं पता कि तुम निगेटिविटी के रास्ते पर कितना आगे जा चुके हो। तुम्हारे अनुसार जो भी विचार तुम्हारे अंदर नहीं पनपा है वह गलत है। तुम्हे कुछ भी कहीं भी अच्छा होता हुआ दिखायी नहीं देता। तुम्हे देश की हर बात गलत लगती है। कमी तुम्हारे अपने अंदर है पर तुम सारा समय उसे दूसरों पर थोपने में लगे रहते हो। मैंने भी तुम्हारी ही जाति में जन्म लिया है, कुछ सालों से इसे ओबीसी में मान लिया गया है, मैंने तो कभी बचपन से जाति के नाम पर किसी तरह के शोषण का सामना नहीं किया, मेरी मित्रता तो स्कूल कॉलेज में हर जाति के साथियों से रही। और जहाँ तक मेरी जानकारी है तुम्हे भी ऐसा कुछ कभी सहन करना नहीं पड़ा फिर तुम्हारे अंदर जातिवाद का इतना जहर कहाँ से भर गया? तुम जो चारों तरफ जातिवाद के नाम पर जहर फैलाते रहते हो तुम्हारी अंतर्रात्मा तुम्हे कचोटती नहीं? तुम अपने आप तो दलितों और अपने से ज्यादा पिछड़ी जाति वाले लोगों से इतना भेद करते हो फिर तुम कैसे यह सब नाटक कर लेते हो जैसे तुम्ही एक अकेले मसीहा हो इस देश में सामाजिक न्याय के?

उस दिन तो एक दूसरे को कोसकर दोनों सो गये पर जब अन्ना हज़ारे दिल्ली आकर आमरण अनशन पर बैठ गये तो सुदीप और रागिनी में फिर से तकरार बढ़ गयी। अनशन की पहली रात सुदीप जब घर लौटा तो रागिनी अपनी सहेली से फोन पर अन्ना हज़ारे के अनशन के बारे में ही बातें कर रही थी। सुदीप उसके उत्साह से और ज्यादा चिढ़ गया, उससे सहन नहीं हो रहा था कि रागिनी फोन पर इस तरह से खुश हो होकर इन बातों को करे। वह तो दिन भर फेसबुक और टविटर पर अन्ना हज़ारे के आंदोलन को बोगस करार देता रहा था और लोगों को बताता रहा था कि कैसे यह इलीट वर्ग के दिमाग की खुजली से ज्यादा कुछ भी नहीं है। जंतर मंतर पर जुटी भीड़ को उसने सिरफिरों की भीड़ बताया था जिन्हे और कोई काम नहीं है।

जैसे ही रागिनी ने फोन बंद किया सुदीप ने जहरीले लहज़े में उससे कहा,” झाँसी की रानी बनने का काम खत्म हो गया हो खाना परोसो”।

रागिनी आहत तो हो गयी पर वह शांत रही। खाना खाने के बाद सोने से पहले सुदीप ने रागिनी को धमकाते हुये कहा कि वह इस तरह की फिजूल बातों से पल्ला झाड़ ले और कैसे यह बातें उसके अपने आदर्श के खिलाफ हैं और लोग क्या कहेंगे जब उन्हे पता चलेगा कि उसकी अपनी पत्नी ही उसके विचारों से सहमति नहीं रखती।

बात बढ़ गयी और वह गाली गलौच पर उतर आया और रागिनी के माता-पिता को भी गरियाने लगा तो रागिनी ने भी मोर्चा खोल दिया और उसकी कलई खोलने लगी।

क्रोध में पागल सुदीप ने पास रखा पानी का जग रागिनी को फेंक कर मारा था जो सौभाग्य से उसे न लग कर दीवार पर लगकर चूर हो गया।

गुस्से से रागिनी तुरंत कमरे से बाहर निकल गयी थी और सौरभ के कमरे में जाकर अंदर से कमरा बंद कर लिया था।

सुबह रागिनी ने सौरभ को स्कूल भेजा तो सुदीप सो रहा था और बाद में दोनों में कोई बात नहीं हुयी।

अब दोनों आमने-सामने खड़े थे और रागिनी कह रही थी।

“तुम्हारे इतने घटिया व्यवहार के बावजूद मैं आज शाम सौरभ को भैया के यहाँ छोड़कर वापस आते समय यह सोच कर आयी थी कि तुम्हे एक मौका और दिया जाये और मैं खुले दिमाग से आयी थी पर तुम इस लायक हो नहीं कि तुम्हारे साथ किसी किस्म की कोई रियायत बरती जाये। तुम्हे पता है सुदीप तुम हद दर्जे के काइयाँ इंसान हो। शायद तुम्हारी रीढ़ की हड्डी है ही नहीं। तुम्हारे सारे काम इस आशा से होते हैं कि राजनीतिक दल तुम्हे पिछड़ों का खैरख्वाह मान लें और कोई पोस्ट दे दें। सारा दिन तुम इस कोशिश में रहते हो कि किसी तरह पिछड़े और दलित वर्ग से आने वाले नेता ही तुम्हारी विचारधारा से प्रभावित होकर तुम्हे बुला लें और कोई पद दे दें। तुम्हारी लालची नज़र हरेक विचारधारा के दल की तरफ लगी रहती है कि कोई तो तुम्हे राजनीतिक सहारा दे दे। और तो और जिन राष्ट्रीय दलों को तुम पानी पी-पी कर कोसते हो और उन्हे सवर्णों के दल बताते हो उन दलों की तरफ देख कर भी तुम्हारी लार टपकती रहती है कि वही तुम्हे अपने पिछ्ड़ा एवम अन्य पिछड़ा वर्ग का नेता और विचारक मान कर जगह दे दे। जिन नेताओं से तुम्हे आशा है कि किसी दिन वे तुम्हारी ओर हडडी का टुकड़ा फेंकेगे उनमें तुम्हे रत्ती भर भी बुराई नज़र नहीं आती पर बाकी सब नेता तुम्हारे हिसाब से तुम्हारी तथाकथित सामाजिक न्याय की थ्योरी के दुश्मन हैं। तुम्हारे अंदर किसी दलित या पिछड़े के लिये कोई संवेदना नहीं है, इन शब्दों का मुखौटा तुमने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिये चढ़ा रखा है। हर वर्ग, हर जाति में अच्छे और बुरे लोग हैं पर तुम तो देश में जहर फैला रहे हो। अपनी घटिया थ्योरी के लिये तुम देश बेचने से भी बाज नहीं आओगे। रात दिन तुम मीडिया को कोसते रहते हो और नौकरी भी वहीं करते हो। तुम्हे खुद नहीं पता होगा कि तुम्हारी असलियत क्या है “।

“सुदीप तुम एक कुंठित जीव हो। तुम्हे इंसान कहना इंसान की तौहीन करना है। तुमने अपने अंदर इतना तेजाब इकट्ठा कर लिया है कि तुम्हारे पास और तुम्हारे साथ रहने वाले लोग उसमें जलने लगे हैं और एक दिन तुम खुद इसमें गल जाओगे। मैं और मेरा बेटा, हम दोनों ही तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे। मुझे तुम्हारी जरुरत है नहीं और अपने बेटे को तुम्हारी जरुरत मैं महसूस होने नहीं दूँगी। हम दोनों के जीवनयापन के लिये मैं समर्थ हूँ और न भी होती तो भी तुम्हारे जैसे जहरीले आदमी की छाया से अपने बेटे को बचाना मुझे इंसानियत का पहला कर्त्तव्य जान पड़ता है। तुम्हारी तो छाया पड़ने से भी आदमी निगेटिव हो जाये। इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ तुम जैसे द्रोही न केवल जन्म लेते हैं बल्कि उन्हे और उनकी हरकतों को सहन भी किया जाता है। सुधार अपने घर से और अपने अंदर से शुरु होता है और मुझे खुशी है कि आज मैं तुम्हारे जैसे वैचारिक रुप से अति-भ्रष्ट और कर्म से अति-निम्न कोटि के आदमी को अपने जीवन से दूर कर रही हूँ।  बिल्कुल साफ शब्दों में तुम्हे कह रही हूँ कभी मेरे और मेरे बेटे के रास्ते में आने की चेष्टा भी मत करना वरना तुम्हारे लिये अच्छा नहीं होगा। हमारे लिये तुम्हारा अस्तित्व समाप्त होता है।”

सुदीप को गुस्से में बिलबिलाता छोड़कर रागिनी घर से बाहर चली गयी जीवन की नयी शुरुआत करने।

….[राकेश]

अप्रैल 6, 2011

इस मुल्क में हमारी हुकुमत नहीं रही (दुष्यंत कुमार)


ये कैसा भारत बना लिया है हमने कि देश के स्वास्थ्य को कोढ़ की तरह खाकर मृत्यु शैय्या पर ले जाने वाले भ्रष्टाचार का जड़ से समूल विनाश करने के लिये ईमानदार भारतीय चाहते हैं कि कदम उठाये जायें और लोकतंत्र (जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन) के नाम पर राजसुख भोगने वाले नेतागण और अधिकारीगण तरह तरह की चालाकियाँ दिखा रहे हैं जिससे कि जनहित वाला लोकपाल विधेयक विधिवत रुप से कार्यकारी न हो जाये। ऐसा हो गया तो उनके विशाल उदरों में काले धन की पूर्ति कैसे होगी? जनता चाहती है कि लोकपाल विधेयक अपने संशोधित रुप में जारी हो और नेता और अधिकारी इस जिम्मेदारी से मुँह चुरा रहे हैं।
किसी सभ्य लोकतांत्रिक देश में ऐसा नहीं हुआ होगा जैसा भारत में हो रहा है। लोकतंत्र में जनता जो लोकहित में चाहती है वैसा करना सरकारों का कर्त्तव्य होता है।
आज भारत उस मोड़ पर आकर खड़ा है जब अगर अभी भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता सामुहिक रुप से न उठी तो फितर यह इस देश से कभी भी रुखसती न पा पायेगा और ऐसे ही दैनिक जीवन का अपरिहार्य अंग बने रह कर इस पावन देश का नाश कर देगा।
कोई आश्चर्य नहीं कि अगर भविष्य में कोई सच्चा मनुष्य दुखी होकर चित्कार कर बैठे

दुनिया में अगर कहीं नर्क है
तो बस यहीं (भारत) है यहीं है!

क्रिकेट जैसे व्यवसायिक खेल के प्रति गजब की एकजुटता दिखाने वाले भारतीय, और खासकर इसकी युवा पीढ़ी, जिसमें करोड़ों युवा आते हैं, अगर भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसी ही एकजुटता दिखा दें तो भारत के धनी से धनी, शक्तिशाली से शक्तिशाली, बड़े से बड़े लोग सात दिनों के अंदर घुटनों के बल बैठे मिलेंगे।

युवा पीढ़ी का सुंदर भविष्य निर्भर करता है इस बात पर कि उनका देश कितना ईमानदार है क्योंकि ईमानदार माहौल में ही वे अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं। भ्रष्टाचार मुक्त माहौल में वे अपने नये से नये विचारों को फलीभूत होते देखने का प्रयास कर सकते हैं। भ्रष्टाचार लील लेता है युवा पीढ़ी के अरमानों को।

भ्रष्टाचार से लड़ना आज के भारतीय युवा की सबसे बड़ी जरुरत है।

अगर आज नहीं लड़े तो फिर उन्हे एक भ्रष्ट देश के निकृष्टतम माहौल में ही बूढ़े होकर मर जाना होगा। और अगर आज भारत को भ्रष्टाचार से मुक्त्त कर दिया गया तो इसकी उड़ान को दुनिया में कोई नहीं रोक सकता।

आज के आंदोलित माहौल में सबसे ज्यादा याद आते हैं तेजस्वी कवि स्व. दुष्यंत कुमार।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

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आज सड़कों पर
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आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
पर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

एक दरिया है यहां पर दूर तक फैला हुआ
आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
यह हक़ीक़त देख लेकिन खौफ़ के मारे न देख

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख

ये धुंधलका है नज़र का तू महज़ मायूस है
रोजनों को देख दीवारों में दीवारें न देख

राख कितनी राख है, चारों तरफ बिखरी हुई
राख में चिनगारियां ही देख अंगारे न देख

स्व. दुष्यंत कुमार की आग्नेय कविताओं का पाठ

P.S. : Pic. Courtesy The Hindu

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