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मार्च 31, 2014

आततायी की प्रतीक्षा…(अशोक वाजपेयी)

आततायी की प्रतीक्षा

(एक)

सभी कहते हैं कि वह आ रहा है
उद्धारक, मसीहा, हाथ में जादू की अदृश्य छड़ी लिए हुए
इस बार रथ पर नहीं, अश्वारूढ़ भी नहीं,
लोगों के कंधों पर चढ़ कर वह आ रहा है :
यह कहना मुश्किल है कि वह खुद

आ रहा है
या कि लोग उसे ला रहे हैं।

हम जो कीचड़ से सने हैं,
हम जो खून में लथपथ हैं,
हम जो रास्ता भूल गए हैं,
हम जो अंधेरे में भटक रहे हैं,
हम जो डर रहे हैं,
हम जो ऊब रहे हैं,
हम जो थक-हार रहे हैं,
हम जो सब जिम्मेदारी दूसरों पर डाल रहे हैं,
हम जो अपने पड़ोस से अब घबराते हैं,
हम जो आंखें बंद किए हैं भय में या प्रार्थना में;
हम सबसे कहा जा रहा है कि
उसकी प्रतीक्षा करो :
वह सबका उद्धार करने, सब कुछ ठीक करने आ रहा है।

हमें शक है पर हम कह नहीं पा रहे,
हमें डर है पर हम उसे छुपा रहे हैं,
हमें आशंका है पर हम उसे बता नहीं रहे हैं!
हम भी अब अनचाहे
विवश कर्तव्य की तरह
प्रतीक्षा कर रहे हैं!

(दो)

हम किसी और की नहीं
अपनी प्रतीक्षा कर रहे हैं :
हमें अपने से दूर गए अरसा हो गया
और हम अब लौटना चाहते हैं :
वहीं जहां चाहत और हिम्मत दोनों साथ हैं,
जहां अकेले पड़ जाने से डर नहीं लगता,
जहां आततायी की चकाचौंध और धूमधड़ाके से घबराहट नहीं होती,
जहां अब भी भरोसा है कि ईमानदार शब्द व्यर्थ नहीं जाते,
जहां सब के छोड़ देने के बाद भी कविता साथ रहेगी,
वहीं जहां अपनी जगह पर जमे रहने की जिद बनी रहेगी,
जहां अपनी आवाज और अंत:करण पर भरोसा छीजा नहीं होगा,
जहां दुस्साहस की बिरादरी में और भी होंगे,
जहां लौटने पर हमें लगेगा कि हम अपनी घर-परछी, पुरा-पड़ोस में
वापस आ गए हैं !

आततायी आएगा अपने सिपहसालारों के साथ,
अपने खूंखार इरादों और लुभावने वायदों के साथ,
अश्लील हंसी और असह्य रौब के साथ..
हो सकता है वह हम जैसे हाशियेवालों को नजरअंदाज करे,
हो सकता है हमें तंग करने के छुपे फरमान जारी करे,
हो सकता है उसके दलाल उस तक हमारी कारगुजारियों की खबर पहुंचाएं,
हो सकता है उसे हमें मसलने की फुरसत ही न मिले,
हो सकता है उसकी दिग्विजय का जुलूस हमारी सड़कों से गुजरे ही न,
हो सकता है उसकी दिलचस्पी बड़े जानवरों में हो, मक्खी-मच्छर में नहीं।
ashok vajpai-001पर हमें अपनी ही प्रतीक्षा है,
उसकी नहीं।
अगर आएगा तो देखा जाएगा!

(अशोक वाजपेयी )

साभार “जनसत्ता”

नवम्बर 21, 2013

जो चाहे करो कातिल मेरे

रात अंगारों पे बीती कल की मेरीmanrain-001

तुम को तो नींद आई होगी…

जलते देखा है किसी को तुमने ओस की बूंदों  से?

कल मुझे देखा होता…

बहुत देर भीगा बाहर लेकिन

तुम्हारी रेशमी तपन से बहुत देर तक जला बदन

रात ने एक पल को भी पलकें नहीं मूँदी

जागती पडी रही बिस्तर पे मेरे

कम न हुयी फिर भी  सीने की जलन

कल अगर सीने से तुम लगती

तो ख़त्म हो जाते मैं और तुम, हम में

या तो अब पास आ जाओ तुम मेरे

या कुछ बुलाने का सामान करो

मसीहा मान लिया है अपना

खुद अपने कातिल को मैंने

अब मर्जी पे तुम्हारी है

जो जी में आये करो मेरा…

(रजनीश)

सितम्बर 17, 2011

टूटे दिल का कौन मसीहा

कली का दिल फटा
पुष्प महका

बांस का दिल छिदा
बाँसुरी बना

सीप का दिल कटा
मोती जन्मा

आदमी का दिल टूटा
क्या हुआ?

न सुगंध,
न सुर,
न मोल,
एक अनाम दर्द
वह भी लापता

दरक गई धड़कनों के,
न स्वप्न,
न वास्तविकता,
तोड़ दिए गए दिल का,
कोई नहीं मसीहा

(रफत आलम)

अगस्त 26, 2011

अन्ना सोचो तो बताओ तो

मैं जनता हूँ
मुझमें और कसाई की भेड़ों में
बस इतना ही अंतर है,
भाषणों के बाजीगरों द्वारा
संवेदना की छुरियों से काटा जाता है मुझे।

मेरा पथप्रदर्शक ही असल पथभ्रष्ट हैं
उसका रास्ता सदा शहादतों को रौंधता हुआ
सत्ता सुख तक जाता है।

हर आंदोलन में ठगा जाता है
स्वप्निल दुनिया में जीने वाला मध्यम वर्ग
या फिर सर्वहारा शोषित
समाज की यही भीड़
ज़मीनी वास्तविकताओं से दूर
असम्भव को संभव बनाते वादाफरोशों की
सबसे बड़ी शिकार है।

कोई हो तो बताओ
आंदोलनो, क्रान्तियों या इन्कलाबों से
सत्ता परिवर्तन के सिवा क्या हुआ है?
जनता का कितना भला हुआ है?

समय के गुलाम उत्तेजित हालात
नियति के धारे में जाने कब बह जाते हैं
न भूख की तस्वीर बदलती है, न प्यास की सूरत।

अन्ना हो कि कोई दूसरा मसीहा
हालात में बदलाव के सूत्रधार
आंदोलनों के बेक़सूर औजार
ज़हर के प्यालों, सूलियों या गोलियों के शिकार
चौराहों पर पत्थर के बुत बना दिए जाते है।

कबूतरों का वास बन कर
बीटों में सड़ते रहते है बेचारे
बाकी कुछ भी नहीं बदलता
कैलेण्डर के पन्नों के सिवा।

(रफत आलम)

फ़रवरी 22, 2011

नहीं रहा…

एक ज़ख्म हरा था नहीं रहा
दर्द खुद मसीहा था नहीं रहा

दिल का रिश्ता था नहीं रहा
वह दोस्त मेरा था नहीं रहा

जम गया दर्द सूनी आंखों में
पानी का झरना था नहीं रहा

कोई भी अब याद नहीं आता
मुझे अपना पता था नहीं रहा

अपनों का सलूक क्या कहिये
ज़माने से गिला था नहीं रहा

अमीर खुद है वक्त का खुदा
गरीब का खुदा था नहीं रहा

लोग आज कुरान बेच खाते हैं
ईमान कभी जिंदा था नहीं रहा

काला धंधा काली हकीकत है
रोज़गार सपना था नहीं रहा

डूबती कश्ती में ठहरता कौन
नाखुदा से गिला था नहीं रहा

गम की लौ में जलबुझा दिल
मोम का टुकड़ा था नहीं रहा

रोती होंगी सन्नाटों भरी राहें
आलम आवारा था नहीं रहा

(रफत आलम)

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