Posts tagged ‘Black Money’

नवम्बर 11, 2016

कालाधन – विचारार्थ कुछ पहलू …(के.एन. गोविन्दाचार्य)

500 और 1000 के नोट समाप्त करने से केवल 3% काला धन आ सकता है बाहर !!

प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 500 और 1000 के नोट समाप्त करने के फैसले से पहले मैं भी अचंभित हुआ और आनंदित भी। पर कुछ समय तक गहराई से सोचने के बाद सारा उत्साह समाप्त हो गया। नोट समाप्त करने और फिर बाजार में नए बड़े नोट लाने से अधिकतम 3% काला धन ही बाहर आ पायेगा, और मोदी जी का दोनों कामों का निर्णय कोई दूरगामी परिणाम नहीं ला पायेगा, केवल एक और चुनावी जुमला बन कर रह जाएगा। नोटों को इसप्रकार समाप्त करना- ‘खोदा पहाड़ ,निकली चुहिया ” सिद्ध होगा। समझने की कोशिश करते हैं।

अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत में 2015 में सकल घरेलु उत्पाद(GDP) के लगभग 20% अर्थव्यवस्था काले बाजार के रूप में विद्यमान थी। वहीँ 2000 के समय वह 40% तक थी, अर्थात धीरे धीरे घटते हुए 20% तक पहुंची है। 2015 में भारत का सकल घरेलु उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ था, अर्थात उसी वर्ष देश में 30 लाख करोड़ रूपये काला धन बना। इस प्रकार अनुमान लगाएं तो 2000 से 2015 के बीच न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये काला धन बना है।

रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2016 में 500 और 1000 रुपये के कुल नोटों का कुल मूल्य 12 लाख करोड़ था जो देश में उपलब्ध 1 रूपये से लेकर 1000 तक के नोटों का 86% था। अर्थात अगर मान भी लें कि देश में उपलब्ध सारे 500 और 1000 रुपये के नोट काले धन के रूप में जमा हो चुके थे, जो कि असंभव है, तो भी केवल गत 15 वर्षों में जमा हुए 400 लाख करोड़ रुपये काले धन का वह मात्र 3% होता है!

प्रश्न उठता है कि फिर बाकी काला धन कहाँ है? अर्थशास्त्रियों के अनुसार अधिकांश काले धन से सोना-चांदी, हीरे-जेवरात, जमीन- जायदाद, बेशकीमती पुराण वस्तु ( अंटिक्स)- पेंटिंग्स आदि खरीद कर रखा जाता है, जो नोटों से अधिक सुरक्षित हैं। इसके आलावा काले धन से विदेशों में जमीन-जायदाद खरीदी जाती है और उसे विदेशी बैंकों में जमा किया जाता है। जो काला धन उपरोक्त बातों में बदला जा चूका है, उन पर 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से कोई फरक नहीं पड़ेगा।

अधिकांश काला धन घूस लेने वाले राजनेताओं-नौकरशाहों, टैक्स चोरी करने बड़े व्यापारियों और अवैध धंधा करने माफियाओं के पास जमा होता है। इनमें से कोई भी वर्षों की काली कमाई को नोटों के रूप में नहीं रखता है, इन्हें काला धन को उपरोक्त वस्तुओं में सुरक्षित रखना आता है या उन्हें सीखाने वाले मिल जाते हैं। इसीप्रकार जो कुछ नोटों के रूप में उन बड़े लोगों के पास होगा भी, उसमें से अधिकांश को ये रसूखदार लोग इधर-उधर करने में सफल हो जाएंगे। 2000 से 2015 में उपजे कुल काले धन 400 लाख करोड़ का केवल 3% है सरकार द्वारा जारी सभी 500 और 1000 के नोटों का मूल्य । अतः मेरा मानना है कि देश में जमा कुल काले धन का अधिकतम 3% ही बाहर आ पायेगा और 1% से भी कम काला धन सरकार के ख़जाने में आ पायेगा वह भी तब जब मान लें कि देश में जारी सभी 500 और 1000 के नोट काले धन के रूप में बदल चुके हैं।
केवल 500 और 1000 के नोटों को समाप्त करने से देश में जमा सारा धन बाहर आ जाएगा ऐसा कहना या दावा करना, लोगों की आँख में धूल झोंकना है। उलटे सरकार के इस निर्णय से सामान्य लोगों को बहुत असुविधा होगी और देश को 500 और 1000 के नोटों को छापने में लगे धन का भी भारी नुकसान होगा वह अलग ।

 (के. एन. गोविंदाचार्य)
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अगस्त 14, 2011

तिरंगा : किस मुँह से फहराओगे, किस मुँह से देखोगे?

केसरिया रंग

हमारे तिरंगे का मुकुट
कट्टरता का प्रतीक बन गया है
पार्कों-स्कूल के मैदानों पर
तिरंगे का काम ही क्या?

भगवा झंडों के साये में
अस्त्र-शस्त्र चालन प्रक्षिक्षण शिविर
गवाह हैं जगाई जाती नफरतों के
जहाँ से केसर की खुशबु फैलनी चाहिये थी
बमों के विस्फोट हो रहे हैं
स्वर्ग को नरक बना दिया है नफरतों ने।

सफेद रंग

हमारे तिरंगे का ह्रदय
काले को सफ़ेद करने का जादू भर है आज
मोती तोंद वाले सफेदपोश
सिल्क खादी की जगमगाहट के पीछे
अपनी तमाम काली करतूतें
आसानी से छिपाए हुए हैं
सफेद वो सियाही है
जिसके लिखे स्विस खातों के नम्बर
किसी से नहीं पढ़े जाते
हाँ,

बीच का चक्कर

ज़रूर घूम रहा है
दलाली, कमीशन और घोटालों की
पहचान बन कर
दरसल आज़ादी के ये ही रसफल
हमसे चुनाव लड़वाते हैं
हिस्ट्रीशीटरों को नेता बनवाते हैं।

हरा रंग

हमारे तिरंगे की बुनियाद
गाँवों से लाता था हरियाली की मजबूती
खेतों में मासूमियत की खाद से
गहराती थी अपने पाक संस्कारों की जड़ें
उस विशाल वृक्ष तले अपनत्व की शीतल छाँव थी
शहरियत के कंक्रीट जंगल ने
मशीनी धुंआं फेंकते दानवों का
शोर उगा दिया है
पक्षियों की कलरव के स्थान पर
अपने-अपने सीमेंट के दडबों में बंद हुआ आदमी
भूल चला है सभी संवेदनाए
राजा हरीश चन्द्र का किस्सा अब किसे लुभाता है
आज नए  दौर के हीरो राजा–राडिया-कलमाड़ी-रेड्डी-येद्दयुरप्पा हैं
बेईमानी के हमाम में सभी नंगे
घोटालों–घूसखोरी की फसलें काट रहे हैं
रूपये-डालर-मार्क–येन-मार्क-पौंड का हिसाब
स्विस बैंको में है दफन।

एक बूढ़ा नैतिकता की बात कर रहा है
नूराकुश्ती में मग्न पक्ष भी, विपक्ष भी
सब होंठों तले हंस रहे हैं।

मेरे दोस्तों! स्वतत्रता दिवस बहुत मुबारक
क्या तुम्हे कल ज़रा भी ख्याल आएगा
किस मुँह से पी.एम.फहरायेंगे तिरंगा?
किस मुँह से तुम देखोगे तिरंगे को?

(रफत आलम)

जून 16, 2011

बाबा रामदेव: आर.एस.एस, भाजपा और कांग्रेस


बतकही 1-
बाबा रामदेव: छाप, तिलक, अनशन सब छीनी रे नेताओं ने पुलिस लगाय के

अशोक – एक बार को मान भी लो कि चलो भाई आर.एस.एस ने बाबा रामदेव के कार्यक्रम का समर्थन किया तो ऐसा करना कहाँ गलत है? क्या आर.एस.एस को अधिकार नहीं है भ्रष्टाचार का विरोध करने का? क्या आर.एस.एस भारत का अंग नहीं है।

हरि – अशोक बाबू हमारा आर.एस.एस की अनुदार विचारधारा से हमेशा से मतभेद रहा है परंतु यहाँ हमें भी आपकी बात के कुछ पहलू अनुचित नहीं लगते। कोई भी संगठन क्यों न हो उसका कैसा भी इतिहास क्यों न र्हा हो, उसकी कैसी भी छवि न रही हो, अगर वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में साथ देना चाहता है तो क्यों उसके इन प्रयासों को गलत नज़र से देखा जाये?

सुनील – यह बात सही है। एक तरफ तो सरकार आतंकवादियों से हथियार छोड़ने, मुख्य धारा में आने और देश के विरोध में अलगाववादी बातें करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही नहीं करती और दूसरी ओर इस आसान से मुद्दे को इतना जटिल बना कर पेश कर रही है। यहाँ असली मुद्दा आर्थिक भ्रष्टाचार का है और अगर आर.एस.एस इस लड़ाई में साथ आना चाहती है तो यह स्वागत योग्य कदम है। भाई या तो आर.एस.एस और अन्य संगठनों को देश निकाला दे दो या फिर उनकी आड़ लेकर भ्रष्टाचार जैसे बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे की धार खत्म मत करो।

विजय – लोकतंत्र की बढ़ोत्तरी के लिये भारत के राजनीतिक और सामाजिक रुख में और उदारता और स्पष्टता लाने की जरुरत है। हर मुद्दे को अलग-अलग ढ़ंग से देखे जाने की जरुरत है। अभी अगर आर्थिक मुद्दा हल हो जाये तो अगला मुद्दा नैतिकता का होगा। और उस मुद्दे पर सभी राजनीतिक और सामाजिक संगठन कमजोर नज़र आते हैं। वहाँ सभी दलों और संगठनों में बहुत ज्यादा सुधार की आवश्यकता है।

हरि- मुझे तो ऐसा लगता है कि अन्ना हज़ारे के अनशन के बाद से जैसा माहौल देश में बना था उसमें ज्यादातर नेता, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों, अपनी साख खो चुके थे और घायल होकर वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों के पीछे हाथ धोकर पड़ गये हैं। कांग्रेस को खुश होना चाहिये कि आर.एस.एस भ्रष्टाचार जैसे एक मुद्दे पर मुख्य धारा से जुड़ना चाहती है और यह ऐसा मुद्दा है जिसने पूरे देश के और इसके सभी वर्गों के लोगों के विकास के काम को बाधित किया है।

अशोक – अजी कांग्रेस के राज में इतना भ्रष्टाचार पनपा है। उसे तो घबराहट होगी ही।

सुनील – अशोक जी, यह एकतरफा सोच है। भ्रष्टाचार तो हरेक सरकार के काल में जम कर पनपा है। भाजपा के काल में भी कम नहीं था भ्रष्टाचार। कुछ को ही सही पर कांग्रेस के काल में कलमाड़ी, ए. राजा, और कनीमोझी जैसे शक्तिशाली नेताओं को जेल में बंद किया गया है। उन पर जाँच चल रही है। अशोक – इन्हे तो जनता के दबाव में अंदर किया गया है।

विजय – सुनील जी, आपकी बात वाजिब है। सनक भरी एकतरफा सोच से तो देश का काम चलेगा नहीं। आपकी बात को थोड़ा आगे बढ़ाऊँ तो मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि भले ही कांग्रेस द्वारा की जा रही कार्यवाही भ्रष्टाचार के विकराल रुप को देखते हुये ऊँट के मुँह में जीरा लगे पर एक शुरुआत तो हुयी है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने चाहे किन्ही भी दबाव में ऐसा किया हो पर आर.टी.आई आदि जैसी सुविधायें जनता को दी हैं। अपने और सहयोगी दलों के नेताओं को जेल भेजा है। कांग्रेस की बदकिस्मती से वक्त्त ऐसा है कि जनता केवल इतने भर से संतुष्ट नहीं है। जहाँ कांग्रेस आशा कर रही थी कि उसे जनता से सहयोग और शाबासी मिलेगी इन निर्णयों को लेने से वहीं जनता के सामने बहुत बड़े बड़े मामले खुलते जा रहे हैं। विदेश में जमा काला धन, देश में काले धन की समांतर अर्थ-व्यवस्था, मंहगाई, राजनीतिक भ्रष्टाचार और अक्षमता आदि मुद्दे जनता को अधीर कर रहे हैं। अब जनता का बहुत बड़ा हिस्सा मूर्ख बन कर नेताओं को लाभ देते रहने की स्थिति को पार कर चुका है या तेजी से पार करता जा रहा है। कांग्रेस को कुछ और ठोस कदम उठाने पड़ेंगे तभी वह कुछ उजली और सक्षम दिख सकती है अन्य दलों के मुकाबले में।

सुनील- विजय जी सही है आपकी बात। मुझे भी ऐसा ही लग रहा है कि कांग्रेस अपने द्वारा लिये गये कुछ अच्छे निर्णयों पर भी जनता से सराहना नहीं पा सकी है और यही इसकी कुंठा है। इसी कुंठा में वह बाबा रामदेव के मुद्दे को ढ़ंग से सुलटा नहीं पायी। उसे यह भी दिख गया कि अगर वह आगे भी अच्छे निर्णय अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव जैसे गुटों के दबाव के कारण लेगी तो उसे कोई राजनीतिक लाभ नहीं होने वाला है। मुझे लगता है कि कुछ निर्णय कांग्रेस अपने आप लेगी और उसकी ही नहीं बल्कि हर दल के नेताओं की अंदुरनी इच्छा और कोशिश यही होगी कि ऐसे गुट निष्प्रभावी हो जायें ताकि जनता में पैंठ बना चुके इन मुद्दों के राजनीतिक लाभ नेताओं को ही मिलें।

हरि – इन विचारों से मेरे दिमाग में एक बात आयी है कि चूँकि कांग्रेस को आर.टी.आई और कलमाड़ी आदि को जेल भेजने के फैसलों का लाभ नहीं मिल पा रहा था तो उसके सामने साफ हो गया कि ये मुद्दे तो अपनी जगह है पर इन मुद्दों की आड़ में राजनीतिक तंत्र की सारी कालिख कांग्रेस के मुँह पर ही मलने के गुपचुप प्रयास भी हो रहे थे। सरकार घोटालों और महंगाई के बावजूद विपक्ष के मुकाबले मजबूत थी और भाजपा समेत विपक्ष के सामने अगले तीन साल तक सरकार को गिराने का बहुत बड़ा अवसर था नहीं। पाँच साल तक दल इंतजार करने को तैयार नहीं थे, खासकर भाजपा। चूँकि कोई भी दल भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम में पाक-साफ नज़र नहीं आ सकता इसीलिये भाजपा और आर.एस.एस ने मौका तलाशते हुये बाबा रामदेव और अन्ना हज़ारे के अंदोलन से उठी जन-जाग्रती की लहर पर सवार होने की चेष्टा की।

अशोक – ऐसा कैसे कहा जा सकता है?

विजय – बात से बात निकलती है। आपकी बात में सच्चाई नज़र आती है सुनील जी। भाजपा खुद ऐसा आंदोलन नहीं खड़ा कर सकती थी क्योंकि उस पर भी भ्रष्टाचार के बहुत बड़े बड़े आरोप लगे हुये हैं। वह ऐसा करती तो दोगली करार दी जाती। तभी जब जनता आंदोलित हो गयी तो भाजपा के प्रवक्त्ता आदि टीवी चैनलों पर एक बात स्थापित करने में जोर लगा रहे हैं कि ये सारे मुद्दे आडवाणी ने उठाये थे। आडवाणी तो उप-प्रधानमंत्री भी रहे हैं और भाजपा अध्यक्ष भी, तब तो उन्होने अपने दल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के खिलाफ कदम नहीं उठाये। भाजपा की राजनीति के पीछे कहीं न कहीं यह इच्छा भी है कि किसी तरह से आडवाणी एक बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले लें। अगर तीन साल और इंतजार किया तो जीवन भर यह मौका हाथ नहीं आयेगा। हो सकता है आने वाले तीन सालों में राजनीतिक फिजां बदल जाये और कांग्रेस कुछ और बड़ी मछलियों को जेल भेजे और जनता अंतत: कांग्रेस के पक्ष में हो जाये। ऐसा लगता है कि कलमाड़ी आदि को जेल भेजना विपक्षी दलों को हिला गया है। भ्रष्ट सभी दल हैं और अगर कांग्रेस अपने नेताओं को जेल भेज सकती है तो दूसरे दल के नेताऒ पर कोताही करने का कोई मतलब है ही नहीं।

हरि- आप लोग कह रहे हैं तो मुझे भी दूर की एक कौड़ी सूझी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो अब देश में खड़ा होना ही है और हो रहा है पर कांग्रेस जो कह रही है कि बाबा रामदेव के आंदोलन के पीछे आर.एस.एस का हाथ है तो यह कुछ हद तक सही लगता है। खाली आर.एस.एस का ही नहीं बल्कि अन्य ताकतों का भी जो भी कांग्रेस की सप्रंग सरकार को पाँच साल तक सत्ता में देखने को तैयार नहीं है। देखिये हो सकता है दूर की कौड़ी हो परंतु ध्यान दिया जाये तो जून का महीना भारत में राजनीतिक रुप से इमेरजैंसी वाले महीने के रुप में याद दिलाने की चेष्टा गैर-कांग्रेसी दल करते रहे हैं। भाजपा और आडवाणी इस बात पर विशेष तवज्जो देते रहे हैं। रामदेव का अनशन जून के माह में ही क्यों आयोजित किया गया? यह मार्च में भी हो सकता था जब इतनी गर्मी नहीं थी। या कुछ माह बाद सितम्बर या अक्टुबर में। पर इसे जून में किया गया। अगर आंदोलन केवल रामदेव के हाथों में होता तो शायद वे सरकार से कई मुद्दों पर आश्वासन मिलने के बाद अनशन खत्म कर देते पर उनके ऐसा करने से केवल उन्हे और सरकार को ही लाभ और राहत मिलती। विपक्षी दल अपने आप को सारे मामले से अलग महसूस करते। अनशन न तोड़ने देने के लिये जरुर ही रामदेव को शातिर दिमागों ने सलाह दी होगी। रामदेव राजनीति में नौसिखिया हैं। वे इतनी दूर का नहीं सोच सकते। कुछ लोगों को पक्का पता था कि अगर रामदेव दिल्ली में डटे रहें तो सरकार और रामदेव में टकराव होना ही होना है। उन्होने सोचा था कि सरकार सख्ती करेगी और उस पर आपातकाल के आरोप लगाये जायेंगे। अगर सरकार रामदेव के आंदोलन को कुचलती है तो एक तो रामदेव व्यक्तिगत रुप से उसके खिलाफ हो जायेंगे दूसरे सरकार बदनाम होगी और तीसरे भ्रष्टाचार का मुद्दा रामदेव और अन्ना हज़ारे के पास ही न रहकर विपक्षी दलों खासकर भाजपा के पास आ जायेगा। रामदेव का तो ठीक है कि उन्हे राजनीति की समझ नहीं है पर कांग्रेस को क्या कहा जाये वह भी इन चालों के सामने धराशायी हो गयी? एक से एक शातिर राजनीतिक दिमाग कांग्रेस के पास हैं और वे इन संभावनाओं को नहीं देख पाये और अब टीवी चैनलों पर तमतमाये हुये बयान देते घूम रहे हैं और अपनी और ज्यादा फजीहत करा रहे हैं।

अशोक – आपको लगता है कि आर.एस.एस और भाजपा इतनी आगे की सोच सकते हैं? अगर रामदेव उनके बढ़ाये हुये होते तो उन्हे रामदेव की ऐसी हालत करके क्या हासिल होता। रामदेव की समझ में भी तो आयेगा कि उन्हे इस्तेमाल किया गया है।

सुनील- राजनीतिक दल कितनी भी आगे की सोच सकते हैं। हरि भाई आपकी सोच पर चलें तो अब समझ में आता है राजघाट पर खुशी से नाचने का मतलब। अब यह भी लगता है कि अगर आर.एस.एस और भाजपा को भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चलाना भी है तो उन्हे पहले अपने संगठनों से शुरुआत करनी चाहिये। बल्कि किसी भी राजनीतिक दल को यही करना चाहिये। उन्हे किसने रोका है कि वे अपने दल के आरोपित लोगों के खिलाफ कार्यवाही करें? अभी तो इन सभी दलों ने असली मुद्दे को पीछे ढ़केल दिया है और अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेकने आगे आ गये हैं। आर.एस.एस को खुले रुप में आंदोलन खड़ा करना चाहिये। उनका इतना बड़ा काडर है वे आज तक क्यों भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन नहीं कर पाये। भाजपा का इतना बड़ा समर्थक वर्ग है वह खुद से और अपने समर्थकों से शुरुआत क्यों नहीं करती। मुझे ऐसा लगता है कि कोई भी दल और संगठन गम्भीर नहीं है भ्रष्टाचार को समापत करने के लिये। ऐसा करना उनके हितों के खिलाफ है।

विजय- सही है सुनील जी, रामदेव के आंदोलन से सही ढ़ंग से निबटने में कांग्रेस की विफलता ने भाजपा को वह जगह मुहैया करा दी है जो उसे मिल नहीं रही थी उसके लाख प्रयास के बावजूद। लोगों का जिस तेजी से कांग्रेस से मोह भंग हुआ है उसकी भरपाई करने के लिये कांग्रेस को बहुत बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। अभी ऐसा माहौल बना दिया गया है कि कांग्रेस के कारण भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन गति नहीं पकड़ पा रहा है। जबकि सच्चाई यह नहीं है। सभी दल भ्रष्ट हैं। कांग्रेस ने दिखावे के लिये ही सही पर थोड़े से कदम उठाये हैं, पर वे काफी नहीं हैं। अपनी जमीन वापिस पाने के लिये उसे बड़े कदम उठाने ही पड़ेंगे। अब कांग्रेस को जमीन में तो दफनाया नहीं जा सकता। आर.एस.एस समर्थित भाजपा से तो लोगों की शंकायें रहेंगी ही। देशव्यापी दलों में कांग्रेस ही है जिस पर देश के बहुत सारे वर्गों का भरोसा रहा है। देश की एकजुटता की खातिर कांग्रेस का बने रहना जरुरी है। कांग्रेस को अपनी और देश की खातिर अपनी सफाई और अपने सुधार से शुरुआत करनी चाहिये।

हरि – कांग्रेस और भाजपा, दोनों बड़ी राजनीतिक शक्तियों को चाहिये कि देश हित में भ्रष्टाचार जैसे राक्षस को समाप्त करने के लिये वे भले ढ़ंग से आपस में सहयोग करें। कांग्रेस को चाहिये कि वह बचे हुए तीन सालों में सत्ता का सदुपयोग करके भ्रष्टाचार समाप्त करने की ओर ठोस कदम उठाये। भाजपा को चाहिये कि एक अच्छे विपक्ष की तरह सरकार पर दबाव बनाये रखे। पिछले दरवाजे से सत्ता नहीं मिलने वाली और अगर मिल भी जाये तो यह दलों की साख गिराती ही है। भारत के लोकतंत्र को स्वच्छ और विकसित बनाने के लिये राजनीतिक दलों को शातिर और कुटिल चालों के बजाय साफ-सुथरी और पारदर्शी राजनीति को स्थान देना ही पड़ेगा।

…जारी…

जून 4, 2011

बाबा रामदेव : भ्रष्टाचार मुर्दाबाद

उजाला करने के लिए
सलाम आपको बाबा!

करोड़ों आखों को
आज यही ईमान की रौशनी चाहिए
अन्यथा
गाँव का सबसे ईमानदार आदमी
शराब के ठेकेदार से
सरपंच का चुनाव हारता रहेगा
रातो-रात बदलती रहेंगी निष्ठाएं

माहौल की सड़न इसी तरह
सदा बिकने वाले को
मेले का खरीदार बना देती है
जड़ों में फैली गंद को
कमल ने सर पे रख लिया है.
यानी व्यवस्था की खराबी को
जनता आवश्यकता मानने लगी है

मन से रोती है परन्तु
खुश-खुश ‘सुविधा शुल्क’ दे रही है
ले रही है

आप बाखूब जानते हैं बाबा साहिब!
ये वह दुनिया है जहाँ
मसीहाओं के उजालों का
स्वागत सदा सियारों ने किया है
जो मौका पाते ही सूली में कीलें ठोकते हैं।

हमाम के ये ही नंगे
कल आपके साथ हो लेंगे
कुछ तो अभी से शेर की बोली बोल रहे हैं।

ये केवल सत्ता के दलाल हैं
इन्हें तख्ते नही तख़्त की है आरज़ू
इन्होने सदा ही संवदनाओं का शोषण किया है
इन्होने ही पनपाया है
भ्रष्टाचार को विष वृक्ष
इन बेईमानों को दूर रखना है ज़रूरी
कल हमें इन्ही के पास कैद
काले धन को आज़ाद कराना है।

शोषण से त्रस्त सारा देश
आपको आशा से देख रहा है
लाखों दीपक चल पड़ने को हैं आतुर
आपके उजाले के साथ।

कल कश्मीर से कन्याकुमारी तक
करोड़ों नारे लगने तय हैं
भ्रष्टाचार मुर्दाबाद!
कल ज़रूर मैली धूप उजली होगी।

(रफत आलम)

मई 2, 2011

ख्वाब इंकलाब का

फिर आ रही है इंकलाब की सदाएं फिर दौर ले रहा है अंगड़ाई
दूर हैं अभी इन्साफ-तलबों की आहटें के कांपने लगे हैं आततायी
काल धन खुद उगलेंगे बरसों से जनता का हक डकारते अजगर
काला बाजारियों के गोदाम जब लुटेंगे खुद मिट जायगी मंहगाई

इस ख्वाब की ताबीर के लिए आँखों की बेदारी दरकार है अभी
लाखों झूठ के फंदे कटने है जनता वहम में गिरिफ्तार है अभी
झूठ के साथी ले आये है कोई सी.डी किसी के महल का ब्यौरा
बेईमानी उजागर करने वाले दामनों पर धब्बों की मार है अभी

बात ये नहीं यारों कौन चोर कौन साहूकर है बात नीयत की है
हम सबके विवेक का इम्तेहान होना है आज फैसले की घडी है
उठ कर कहो हमें हर हाल देश की अकूत लूट का हिसाब चाहिए
बताओ, बताओ रहनुमाओ बताओ काली दौलत कहाँ पर गड़ी है

कुछ ही सीखचों के पीछे जाए और बात खत्म ये न होने देना
पाई पाई का जब तक ना मिले हिसाब न सोना न सोने देना
भ्रष्टाचार को मिटा कर ही दम लेना है कसम मुल्क की तुम्हे
ईमान के इन्साफ का अवसर हाथ आया है इसे न खोने देना

(रफत आलम)

अप्रैल 19, 2011

बगुलाभगत आये रे!

वो जो बेचते थे
जहर अब तक,
सुना है
पहने झक सफेद कपड़े
डाले गले में आला
महामारी भगाने की
अपनी क्षमता का
विज्ञापन करते
घूम रहे हैं।

भटका दिये गये थे
बहुरुपिये के स्वर्ण मृग रुपी कौशल से राम
हर ली गयी थी
साधु वेश में आये रावण के छल से सीता
दौ सौ साल लूटा
दास बनाकर भारत को
झुककर व्यापार करने की
इजाज़त लेने आये लूटेरों ने।

विदेशी लूटेरे चले गये
विशालकाय तिजोरियाँ खाली छोड़कर
पर उन पर जल्द कब्जे हो गये
वे फिर से भरी रहने लगीं
देश फिर से लूटा जाने लगा,
लूटा जाता रहा है दशकों से।

डाकुओं के खिलाफ आवाज़ें उठी
तो
छलिये रुप बदल सामने आ गये हैं
जो कहते न थकते थे
“पैसा खुदा तो नहीं
पर खुदा की कसम
खुदा से कम भी नहीं”
वे कस्में खा रहे हैं
रुखी सूखी खायेंगे
पानी पीकर
देश का स्वास्थ्य ठीक करेंगे,
भ्रष्ट हो गया है
यह देश
इसे ठीक करेंगे!

होशियार
सियार हैं ये
शेर की खाल ओढ़े हुये
सामने से नहीं
आदतन फिर से
लोगों की
पीठ में ही खंजर भोकेंगे
लोगों की
मिट्टी की
गुल्लकें
ले भागेंगे
हजारों मील दूर रखी
अपनी तिजोरियाँ भरने के लिये।

जाग जाओ
वरना ये फिर ठगेंगे
इंतजार बेकार है
किसी भगीरथ का
जो लाकर दे पावन गंगा
अब तो हरेक को
अपने ही अंदर एक भगीरथ
जन्माना होगा
जो खुद को भी श्वेत धवल बनाये
और आसपास की गंदगी भी
दूर बहा दे।

पहचान लो इस बात को
डर गये हैं कुटिल भ्रष्टाचारी
धूर्तता दिखा रहे हैं
इनके झांसे में न आ जाना
इनका सिर्फ ऊपरी चोला ही सफेद है
ये हंस नहीं
जो दूध और पानी को अलग कर दें
बल्कि ये तो बगुलेभगत हैं
जो गिद्ध दृष्टि गड़ाये हुये हैं
देश की विरासत पर।

सावधान ये करेंगे
हर संभव प्रयास
जनता को बरगलाने का
ताकि बनी रहे इनकी सत्ता
आने वाले कई दशकों तक
दबा-कुचला रहे
आम आदमी इनकी
जूतियों तले
साँस भी ले
तो इनके रहमोकरम
का शुक्रिया अदा करके।

वक्त्त आ गया है जब
इन्हे जाल में फँसा कर
सीमित करनी होगी इनकी उड़ान
तभी लौट पायेगा
इस देश का आत्म सम्मान
असमंजस की घड़ियाँ गिनने का वक्त चला गया
यह अवसर है
धर्म युद्ध में हिस्सा लेने का
जीत हासिल कर
एक नये युग का सूत्रपात करने का।

…[राकेश]

अक्टूबर 29, 2010

गुल्लू बाबू और स्विस बैंक में भारत का काला धन

गुल्लू बाबू अभी चौदह साल के हैं। उम्र की यह दहलीज बड़ी रोचक स्थितियाँ रचती है। बचपन तो चला जाता है इस उम्र के आने तक पर अभी किशोरवस्था जवानी की तरफ पूरी तरह से जा नहीं पाती और किशोर हार्मोंस की उठापठक के बीच जाने अन्जाने अहसासों से रुबरु होने लगते हैं। कुछ लड़कों की आवाज भर्राने लगती है तो वे थोड़े चुप हो जाते हैं और कुछ आवाज के इस परिवर्तन से या तो समझौता करके या लड़ाई करके हद दर्जे के लफ्फाज हो जाते हैं। गुल्लू बाबू दूसरी श्रेणी में आते हैं। दो-चार उनके यार दोस्त भी हैं ऐसे ही और ये लोग जहाँ भी इकट्ठे होते हैं वहीं मेले जैसा शोर-शराबा और माहौल रच देते हैं। इंटरनेट की कृपा से दुनिया भर के विषयों की जानकारी इन महानुभावों को हो गयी है और सार्थक या अनर्गल, किसी भी तरह की बहस में घिरे हुये गुल्लू बाबू और उनके गैंग को पाया जा सकता है। कभी कभी उनकी बहस खासा मनोरंजन भी उत्पन्न कर देती है।

बीते रविवार को गुल्लू एंड पार्टी नयी प्रदर्शित हुयी फिल्म Knock Out देख कर आये थे और उनकी बहस केन्द्रित हो गयी थी कथित रुप से स्विस बैंकों में रखे भारत के काले धन पर।

बहस तो उनकी लम्बी थी पर कुछ मुख्य और रोचक बातों का जिक्र किया जा सकता है। किशोर दिमाग बड़े रोचक तरीके से सोच सकते हैं और बहुत दफा अनुभवी और पके हुये दिमागों के लिये अलग ढ़ंग से सोच पाना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हो जाता है।

सबसे बड़ी बात है कि भारत की किशोर पीढ़ी के बहुत सारे नुमांइदे कितने ही गम्भीर मुद्दों पर बहस करने को तैयार दिखते हैं। उनके पास सूचनाओं का भंडार है और वे आत्मविश्वास से लबरेज़ दिखते हैं।

उनकी बहस के कुछ अंश…

अरे इतना हल्ला होता रहता है भारत के काले धन और स्विस बैंको का और फिल्म ने भी दिखाया कैसे एक नेता हजारों करोड़ रुपये स्विस बैंक में जमा करता है। पर ये बात समझ में नहीं आयी कि स्विस बैंक किस करेंसी में धन जमा करके रखते हैं अपने लॉकर्स में?

क्या फर्क पड़ता है किसी भी करेंसी में रखें?

फर्क कैसे नहीं पड़ता, कोई बताओ, पौंड, डॉलर, यूरो या स्विस फ्रेंक, किस मुद्रा में पैसा रखा जाता है वहाँ?

चलो मान लो कि अमेरिकन डॉलर के रुप में रखा जाता है, पर इस बात से क्या फर्क पड़ता है?

ओ.के. मान लिया अमेरिकन डॉलर… पर अब सवाल उठता है, जैसा कि कहा जा रहा है कि भारत का ही लाखों करोड़ रुपया वहाँ जमा है। और भी देश हैं जिनका काला धन वहाँ जमा है तो क्या अमेरिका इतने विशाल धन के लिये अलग से करेंसी नोटों की व्यवस्था करता है?

अरे ये बात तो सही है- कौन सा देश इतने सारे करेंसी नोट अलग से छापता होगा स्विस बैंक के लिये?

ये भी तो हो सकता है कि धन वहाँ सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात आदि वैकल्पिक मुद्राओं के रुप में रखा जाता है।

हो सकता है पर इतने सारे लोग स्विस बैंक और काले धन के बारे में सालों से चर्चा कर रहे हैं और हमें यह भी पढ़ने को नहीं मिला कि कौन सी करेंसी वहाँ चलती है?

एक और मुद्दा है कि क्या स्विस बैंक इस धन पर ब्याज भी देते हैं जैसे कि अन्य बैंक या वे अपने यहाँ धन रखने के लिये फीस लेते हैं?

ब्याज कहाँ से देंगे, रखने के बदले पैसा लेते होंगे आखिरकार तभी बैंक इतने अमीर हैं। करोड़ों डॉलर्स की जमापूँजी पर ब्याज देने के लिये तो उन्हे बहुत सारा धन कमाना भी पड़ेगा, कहाँ से लायेंगे इतना पैसा और उनकी गतिविधियाँ तो गुप्त रहती हैं, ओपन मार्केट में तो क्या ही लगाते होंगे पैसा?

कहीं पढ़ा था कि अमेरिका 9/11 के बाद डर गया था कि कहीं ओसामा लादेन स्विस बैंकों जैसे गुप्त खाता खोलने वाले बैंको में धन जमा न कर ले।

मेरी समझ में नहीं आता कि ओसामा चाहे अरबों डॉलर्स जमा कर ले पर हथियार तो वह कहीं से खरीदता ही होगा।

सही बात है, हथियार ओसामा लादेन जैसे आतंकवादी खुद तो बना नहीं सकते। अमेरिका, रुस, फ्रांस, ब्रिटेन, इज़रायल, चीन, कोरिया, और जापान, जैसे बड़े और विकसित देश और पाकिस्तान जैसे लड़ाकू देश हथियार बेचने का धंधा दुनिया में चलाना बंद कर दें तो ओसामा का सारा धन रखा रह जायेगा।

तब तो ओसामा जैसे किसी देश में उस धन से कैसिनो या पब चलाकर जीविका कमाने के लिये विवश हो जायेंगे और चुपचाप जीवन जियेंगे। हथियार तो उन्हे यही शक्तिशाली देश ही देते हैं।

हाँ ऐसा पढ़ा था कि अमेरिका स्विस बैंकों पर प्रैशर डाल रहा है और वहाँ जमा अमेरिकी धन पर कब्जा करने के मूड में है।

पर खाली धन से तो आतंकवाद फैल नहीं सकता। खाली धन तो किसी भी काम का नहीं होता। अगर दुनिया में विनाश फैलाने वाले हथियार ही नहीं होंगे तो आतंकवादी क्या कर लेंगे। आमने सामने की कुश्ती में तो हरेक देश की जनता ही पीट पीट कर भुर्ता बना देगी इन आतंकवादियों का।

सही बात है अगर अमेरिका जैसे देश ठान लें तो आतंकवाद का नामोनिशान न रहे दुनिया में।

हथियार की बिक्री बंद कर दो जैसे कि कोई भी देश परमाणु हथियार नहीं खरीद सकता या बना नहीं सकता ऐसे ही सारे मारक हथियारों पर यू.एन से रोक लगवा दो। जो भी देश इस बात का उल्लंघन करे उसका पूरी तरह से बॉयकाट कर दे सारे देश। एक महीने में ठीक हो जायेगा बदमाशी करने वाला देश। जब कोई भी देश न कुछ खरीदेगा कोई भी चीज उस देश से न ही उसे कुछ बेचेगा तो वहाँ की जनता अपने आप अपनी सरकार पर दबाव डालेगी।

सही बात है, सब दिखावा होता है वर्ल्ड पॉलिटिक्स में। सब नाटकबाजी है।

और क्या, अगर यू.एन, अमेरिका, भारत और तमाम बड़े देश चाहते तो चीन, तिब्बत को आजद न कर देता। दुनिया भर की मैनूफैक्चरिंग इंडस्ट्री चीन में लगी हुयी हैं और अगर सारे प्रभावशाली देश चीन पर प्रैशर डाल देते या हर देश की जनता ही ऐसी घोषणा कर देती कि न तो चीनी सामान खरीदेंगे न ही किसी चीनी को कुछ बेचेंगे तो एक महीने में चीन की जनता अपने नेताओं और सेना वालों को पीट पीट कर विवश कर देती तिब्बत को आजाद करने के लिये।

सही है, इतना ज्यादा व्यापार देशों का आपस में होता है कि अगर किसी सही बात के लिये सब शक्तिशाली देश ठान लें तो उसे पूरा करने में आज के दौर में बहुत समय नहीं लग सकता।

सब ड्रामा चलता है। किसी को भी तिब्बत की आजादी से कुछ मतलब है नहीं। हम भारतीय ही कौन सा चीन को नाराज करना चाहते हैं। चीन के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जाते हैं हमारे नेता, सेना वाले और उधोगपति लोग। अगर भारत की जनता ही ठान ले कि चीनी सामान का बहिष्कार करेगी तो भी बड़ा फर्क पड़ेगा चीन की दादागिरी पर।

जनता तो सस्ते पर जाती है और चीनी सामान सबसे सस्ता है। कैसे बहिष्कार करेगी भारत की जनता चीनी सामान का?

चलो हम तुम ही बहिष्कार कर दें चीनी सामान का।

तिब्बत छोड़ो, हमारे तुम्हारे चार लोगों के करने से क्या होगा? अगर जाकर देखोगे तो प्रधानमंत्री के दफ्तर में भी मेड इन चाइना सील वाला सामान लगा हुया होगा।

आज चार हैं बाद में बढ़ भी जायेंगे। शुरुआत तो करनी चाहिये।

चलो फिर आज से ही चीनी सामान पर पाबंदी। स्कूल में कल से ही प्रचार शुरु।

स्विस बैंक से कहाँ भटक गये तुम लोग? स्विस बैंक में जमा कालाधन भारत के लिये बहुत महत्वपूर्ण विषय है।

कहते हैं कि भारत का इतना धन वहाँ जमा है कि अगर सारा वापस आ जाये तो भारत का सारा विदेशी कर्ज चुकता हो जाये और तब भी बहुत सारा धन बचा रहेगा।

गजब के करप्ट रहे होंगे भारत के नेता और बाकी दलाल किस्म के लोग जिन्होने वहाँ लाखों करोड़ रुपया जमा करा दिया।

मैं ने भी पढ़ा था कहीं इंटरनेट पर कि काला धन वापस लाने से भारत ऊर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर हो जायेगा।

अरे कैसी वाहियात बात कर रहे हो, धन लाने से कैसे भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जायेगा?

ये भी न ऐसी ऐसी दूर की कौड़ी सामने लाता है। अरे भाई, क्या खाली धन भारत में ऊर्जा के लिये वैज्ञानिक शोध को टॉप गियर में डाल देगा। वैज्ञानिक रातों रात कुछ खोज देंगे क्या?

मेरे भइया एक दिन बता रहे थे कि ज्यादातर तो बाहर की रिसर्च को देख कर ही भारत में रिसर्च होती है। 95% लोगों की कोशिश यही होती है कि किसी तरह से रिसर्च पेपर छप जाये किसी बाहर से छपने वाले जर्नल में। अब उनकी रिसर्च देश के काम आनी है या नहीं इस बात से उन्हे कोई मतलब नहीं होता। सी.वी पर पेपर्स की संख्या बढ़ाते रहते हैं। भइया के एक दोस्त तो कह रहे थे कि बड़े नामी इंस्टीट्यूशन्स के भी यही हाल हैं।

सही बात है, इतने तीरंदाज होते भारत के वैज्ञानिक तो आज देश में न पोल्यूशन इतना न होता और न ही ऊर्जा के क्षेत्र में देश इतना कमजोर होता। पानी साफ करने तक की टैक्नोलॉजी है नहीं अपने देश के पास। देश के काम आने वाली टैक्निक डेवेलप की होतीं अगर हमारे साइंटिस्टों ने तो आज देश की तस्वीर ही और होती, किसान और गरीब आत्महत्यायें न कर रहे होते।

किसी को पी.आई.एल करनी चाहिये या फिर आर.टी.आई पोलिसी के अंदर जाँच करवानी चाहिये देश की सभी शिक्षण और शोध संस्थानों के पिछले साठ सालों के क्रियाकलापों के सही मूल्यांकन के लिये। तभी दूध का दूध और पानी का पाने हो पायेगा। आखिर जनता का ही पैसा तो है जो खर्च होता है।

तुम लोग फिर भटक गये। स्विस बैंक से वापस मिले धन से विकसित देशों से तकनीक खरीदी जा सकती हैं। कितना इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारा जा सकता है, कितना नया खड़ा किया जा सकता है। देश एकदम धनी हो जायेगा।

जितने काम पैसे से हो सकते हैं उतने तो हो जायेंगे पर विकसित होने की मानसिकता तो नहीं आ जायेगी रातोंरात। अगर कोई रॉ-मेटीरियल नहीं है हमारे देश के पास या कोई तकनीक नहीं हैं तब पैसे उसे विकसित तो नहीं कर देंगे। उसके लिये तो क्षमता विकसित करनी पड़ेगी और उसके लिये टाइम, लगन और बुद्धि चाहिये।

सही बात है, सब कुछ सिर्फ पैसे से नहीं हो जायेगा। बुद्धि और देश के प्रति निष्ठा की जरुरत है। पर देश को नियंत्रण करने वाले नेता, इंडस्ट्रियेलिस्ट्स और बड़े लोग जब देश हित में निर्णय लेंगे तभी ऐसा हो सकता है। वे तो देश के रिसोर्सेज के खनन करने का ठेक भी विदेशी कमपनियों को दे रहे हैं। भला कौन सी ऐसी कम्पनी है दुनिया की जो अपना हित छोड़कर भारत का हित देखेगी?

हाँ उन्हे हमारे एनवारयन्मेंट से क्या मतलब, चाहे यहाँ सूखा पड़े या बाढ़ आये, उन्हे तो रॉ-मेटीरियल चाहिये और प्रोफिट चाहिये, वो उन्हे हमारे यहाँ के भ्रष्ट नेता और कर्मचारी दिलवा ही देंगे

उनकी बातों का सिलसिला लम्बा खिंचा पर बहस का बाकी हिस्सा किसी और दिन। क्या पता उससे पहले ही गुल्लू और मित्र लोग किसी अन्य मुद्दे पर इससे भी रोचक बहस छेड़ दें।

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