Posts tagged ‘Imandari’

सितम्बर 30, 2011

सब बेकार की बातें हैं

आदमी की कीमत नहीं मानव अंगों का बाज़ार है बड़ा
रहम-करम, दया-करुणा, शराफत सब बेकार की बातें हैं

आत्महत्या करने पर मजबूर है बेबस सर्वहारा आदमी
ईमानदारी, इन्साफ, इंसानियत सब बेकार की बातें हैं

शहर में आजकल फैशन है दो रातें लिवइन रिश्तों का
इश्क, प्रीत–प्रेम, प्यार, मोहब्बत सब बेकार की बातें हैं

खूनेदिल का लिखा रद्दीभाव, सरकारी चालीसे चलते हैं
गद्य, कविता, समीक्षा, ज़हानत सब बेकार की बातें हैं

झूठ को सौ बार बोल कर सच बनाने वाले का दौर है
सत्य, यथार्थ, सच्चाई, हकीक़त सब बेकार की बातें हैं

सकून की ज़रूरत कहाँ तनाव पालने वाली बस्ती को
सूफी–दरबार, आध्यात्मिक-संगत सब बेकार की बातें हैं

ज़हानत – बुद्धिजीविता

(रफत आलम)

अप्रैल 21, 2011

ईमानदारी-भ्रष्टाचार के बीच झूलता मानस

रमेश ज़रूरी काम से गांव जाने के लिये सपत्नीक स्टेशन पहुँचा तो पाया कि पहले से ही मुसाफिरों की लंबी लाइन टिकट खिडकी पर लगी थी।

पत्नी बोली,” हे राम! टिकट कैसे मिलेगा, गाड़ी की रवानगी में बीस मिनट ही बचे हैं”।

रमेश मुस्करा कर बोला,” अभी मिलता है”।

और वह कुली के पास जा पंहुचा,” भाई! टिकट का इंतज़ाम हो जायगा क्या?”

“हाँ साब,  सौ रुपये अधिक लगेंगे”।

“कोई बात नहीं यार! तू टिकट तो दिला”।

यह बेईमानी की जीत थी!
….

पत्नी की बहुत मिन्नत के बाद रमेश सिनेमाघर गया था। टिकट खरीदारों की लंबी लाइन आगे सरक ही नहीं रही थी। बीच-बीच में एक दबंग टिकट खिडकी पर पहुँच कर इकट्ठे बहुत सारे टिकट लेता और वापिस भीड़ में टिकट ब्लैक करने आ जाता।

कतार तोड़ कर लोग स्वयं ही उसके साथ हो रहे थे।

रमेश सोच रहा था कैसे लोग हैं, जरा भी सब्र नहीं कर रहे। यूँ ही तो बेईमानी को बढ़ावा मिलाता है।
अचानक भडाक की आवाज़ के साथ टिकट खिडकी बंद हो गयी और दबंग की आवाज़ का सुर और भी तेज हो गया।

पत्नी बोली,” कुछ ही रुपये और लगेंगे, ले लो न टिकट”

कुछ तो टिकट नहीं मिलने की खीज थी और कुछ पत्नी द्वारा बेईमानी कराने की सलाह पर गुस्सा।

रमेश पत्नी का हाथ पकड कर घसीटता सा सिनेमाहॉल के बाहर निकल आया।

कारण कोई भी रहा हो पर यह ईमानदारी की तरफ उठा एक कदम था!

(रफत आलम)

अप्रैल 12, 2011

लोकपाल समिति : सदस्यता लूट ले

भारत में चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश करने वालों की संख्या बहुत अधिक है और नेतागण तो इस काम में बहुत आगे हैं। कुछ नेता लोकपाल मसले के बहाने अपनी छवि बनाने के लिये दैनिक स्तर पर तरह तरह की बयानबाजी कर रहे हैं और कुछ नेता इस पूरे मामले में पलीता लगाकर इसे उड़ाने की चेष्टा में हैं। इसे ध्वस्त करने की कोशिश करने वालों में सबसे बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो लोकपाल तैयार करने वाली समिति में शामिल लोगों पर एतराज करके अपनी अपनी पंसद के लोग वहाँ देखना चाहते हैं। बहाना वे कर रहे हैं कि महिला क्यों नहीं है, दलित क्यों नहीं है, पिछड़ा क्यों नहीं है, मुसलमान क्यों नहीं है, फलाना क्यों नहीं है ढ़िमाका क्यों नहीं है।

121  करोड़ लोगों की आबादी तले दबे भारत में भाँति-भाँति के लोग हैं और अगर किसी एक भी श्रेणी के लोगों की संख्या गिनी जाये तो वह भी करोड़ों में निकलेगी, मसलन गंजे लोग भी करोड़ों की संख्या में होंगे।

पूरे समाज का प्रतिनिधित्व यह समिति करे इसके लिये आवश्यक है कि समाज में वास कर रहे लोगों की हर श्रेणी से प्रतिनिधि इस बिल को बनाने वाली समिति के सदस्य होने चाहियें। तभी तो सामाजिक न्याय की कसौटी पर यह खरा उतरेगा। कुछ श्रेणियाँ नीचे सूचिबद्ध की गयी हैं।

लोकपाल बिल बनाने वाली समिति में निम्नांकित लोगों का होना बेहद जरुरी है।

  • एक काले बालों वाला, एक भूरे बालों वाला, और एक सफेद बालों वाला;
  • एक आधा गंजा और एक पूरा गंजा;
  • एक काली आँखों वाला, एक भूरी आँखों वाला, एक नीली आँखों वाला, एक कंजी आँखों वाला;
  • एक सिक्स पैक एब्स वाला, और एक तोंद वाला;
  • एक सबसे लम्बे कद का और एक सबसे छोटे कद का;
  • एक बिल्कुल स्वस्थ, और एक पूरी तरह से बीमार और रुग्ण शरीर वाला;
  • एक डी.लिट उपाधि वाला और एक बिल्कुल अनपढ़;
  • एक पूर्णतया शाकाहारी, एक पूर्णतया माँसाहारी;
  • एक दुनियाभर की सैर कर चुकने वाला और एक वह जो कभी अपने मोहल्ले से बाहर ही न गया हो;
  • एक हमेशा कपड़े पहनने वाला और एक हमेशा नग्न रहने वाला;
  • एक 32 दाँतो वाला और एक बिना दाँतो के पोपले मुँह वाला;
  • एक रोल्स रॉयस चलाने वाला और एक पैदल चलने वाला;
  • एक योग, व्यायाम करने वाला और एक सदा सोने वाला;
  • एक नाचने वाला और एक नाच न जाने आंगन टेढ़ा कहने वाला;
  • एक गा सकने वाला और एक गाने में गधे से मुकाबला करने वाला;
  • एक दिन में सोने वाला और एक रात में सोने वाला;
  • एक हिंसक और एक अहिंसक;
  • एक दो आँखों वाला, एक एक आँख वाला और एक न देख सकने वाला;
  • एक पूरा सुनने वाला और एक न सुन पाने वाला;
  • एक लगातार बोलने वाला और एक कभी भी बोल न सकने वाला;
  • एक दिन में तीन बार नहाने वाला और एक साल में एक बार नहाने वाला;
  • एक ब्रहमचारी और एक कामी;
  • एक ऐसा जो पत्नी के अलावा हरेक स्त्री में माँ-बहन देखे और एक ऐसा जिसे कम से कम एक बलात्कार का अनुभव हो;
  • एक साधु और एक हद दर्जे का अपराधी;
  • एक लगभग 5 साल का बच्चा और एक कम से कम 95 साल का वृद्ध;
  • एक सदैव प्रथम आने वाला और एक सदैव अनुत्तीर्ण होने वाला;
  • एक बला का शातिर, और एक निपट भोंदू…एकदम गोबरगणेश;
  • एक सवर्णों में सवर्ण, और एक दलितों में अति दलित;
  • एक अगड़ों में अगड़ा और एक पिछड़ों में पिछड़ा;
  • एक अतिआधुनिक, और एक पुरातनपंथी – एकदम पोंगापंथी;
  • एक खिलाड़ी और एक अनाड़ी;
  • एक खतरों का खिलाड़ी और एक चींटी तक से डर जाने वाला;
  • एक पुजारी और एक पूजा-प्रार्थना से घृणा करने वाला;
  • एक सन्यासी और एक संसारी;
  • एक आस्तिक और एक नास्तिक;
  • एक भ्रष्टाचारी और एक ईमानदार,
  • एक दानवीर और एक भिखारी;
  • एक महल में रहने वाला एक फुटपाथ पर बसर करने वाला;
  • एक वोट लेने वाला और एक वोट देने वाला;

आदि इत्यादी!

और बहुत सारी श्रेणियाँ छूट गयी हैं, पढ़ने वाले और इस मामले में रुचि रखने वाले लोग अपनी अपनी इच्छानुसार समाज के विभिन्न तबके के लोगों के प्रतिनिधि इस सूचि में जोड़ सकते हैं।

लोगों के बीमार शरीरों को ठीक करने वाली दवा को बनाने वाली शोधार्थियों की टीम से भारत के ये पंगेबाज महानुभाव यह नहीं कहते कि अपनी टीम में हर श्रेणी के लोग रखो क्योंकि वहाँ इनका बस नहीं चलता। करोड़ों तो ऐसे होंगे जो दवा का नाम भी ढ़ंग से उच्चारित नहीं कर सकते और वहाँ चूँकि शरीर के लाभ की बात है तो वहाँ इन्हे विशेषज्ञ चाहियें पर चूँकि यहाँ लोकपाल इनके हितों के खिलाफ है और चूँकि मामला मानसिक रुग्णता का है और मानसिक रुप से बीमार कभी भी ऐसा नहीं मानते कि वे बीमार हैं तो हरेक आदमी बढ़-चढ़ कर बोल रहा है।

जाति, सम्प्रदाय (रिलीजन), आर्थिक, क्षेत्र और भाषा के अंतर के मुद्दों को कुटिलता से उठाकर कुछ शातिर लोग लोकपाल बिल के मामले की हत्या करना चाहते हैं। इन शातिरों की राजनीति एक भ्रष्ट समाज में ही चल सकती है अतः वे घबराये हुये हैं कि अगर समाज ईमानदार बन गया तो उनकी दुकान बंद हो जायेगी इसलिये तरह तरह के मुखौटे ओढ़कर वे लोकपाल की भ्रूणहत्या करने आ गये हैं।

भारत को बचाना है तो ईमानदार, देशभक्त्तों को जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, और भाषा के तुच्छ अंतरों को भूलकर अपनी एकता बनाये रखकर इन शातिरों को करारा जवाब देना पड़ेगा। अगर भारत के सर्वनाश से फर्क नहीं पड़ता तो बनाये रखो इसे भ्रष्ट, जातिवादी, और साम्प्रदायिक। वर्तमान के भारत के लोगों की आने वाली पीढ़ियाँ मानवता के निम्न बिंदू को छूकर नये कीर्तिमान स्थापित करेंगी।

अब यहाँ कालिदास बन सकने की प्रक्रिया और परंपरा मर चुकी है, बहुमत मूर्ख ही जन्मते हैं, मूर्ख ही जीते हैं और ऐसे ही धरा छोड़ जाते हैं।

मुस्कुराइये कि आप भारत में रहते हैं।

…[राकेश]

Pic: Courtesy – srknews.com

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